भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1245

नौवाँ अध्याय 9/323-333 ] अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायको अपनी तीर्थ यात्राका पूर्ण वृत्तान्त सुनाया और अपने साथ लायी हुई कर्णामृत एवं ब्रह्मसंहिता—नामक दो पुस्तकें उन्हें प्रदान कीं॥ 323 ॥ प्रभु कहे,—“तुमि ये 'प्रेम-सिद्धान्त' कहिले। एइ दुइ पुस्तके सेइ रसेर साक्षी दिले॥" 324 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “तुमने जिस 'प्रेम-सिद्धान्त' का वर्णन किया था, ये दोनों ग्रन्थ उस रसके साक्षी हैं॥" 324 ॥ रायेर आनन्द हैल पुस्तक पाइया। प्रभु-सह आस्वादिल, राखिल लिखिया ॥ 325 ॥ अनुवाद—उन दोनों ग्रन्थोंको प्राप्त करके श्रीरामानन्द रायको बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने महाप्रभुके साथ उन दोनों ग्रन्थोंका आस्वादन किया तथा उनकी नकल करके रख ली॥ 325 ॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंका समागम :— 'गोसाञि' आइला', ग्रामे हैल कोलाहल। प्रभुके देखिते लोक आइल सकल ॥ 326 ॥ अनुवाद— 'गोसाईं आये हैं'—यह समाचार सुनकर विद्यानगर ग्राममें कोलाहल हो गया। सभी लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आने लगे॥ 326 ॥ अनुभाष्य— 'गोसाञि'—श्रीचैतन्य गोसाईं ॥ 326 ॥ बहिरङ्ग-लोगोंको देखकर श्रीरामानन्द राय और महाप्रभुका अपने-अपने कार्यके लिये प्रस्थान :— लोक देखि' रामानन्द गेला निजघरे। मध्याह्न उठिला प्रभु भिक्षा करिबारे ॥ 327 ॥ अनुवाद—लोगोंकी भीड़को देखकर श्रीरामानन्द राय अपने घर लौट गये और महाप्रभु भी मध्याह्न भोजन करनेके लिये उठ खड़े हुए ॥ 327 ॥ महाप्रभु और श्रीरायका कृष्णकथा-प्रसङ्गमें एक सप्ताह व्यतीत :— रात्रिकाले राय पुनः कैल आगमन। दुइजने कृष्णकथाय कैल जागरण ॥ 328 ॥ दुइजने कृष्णकथा कहे रात्रि-दिने। परम-आनन्दे गेल पाँच-सात दिने ॥ 329 ॥ अनुवाद—रातके समय श्रीरामानन्द राय पुनः महाप्रभुके पास आये। दोनोंने श्रीकृष्णकथामें सारी रात बितायी। इस प्रकार दोनों रात-दिन कृष्णकथा कहते-सुनते रहे और पाँच-सात दिन परमानन्दमें बीते ॥ 328-329 ॥ महाप्रभुकी आज्ञानुसार श्रीरायका पुरीमें जानेके विषयमें बतलाना :— रामानन्द कहे,—“प्रभु, तोमार आज्ञा पाञा। राजाके लिखिलुँ आमि विनय करिया ॥ 330 ॥ राजा मोरे आज्ञा दिल नीलाचले याइते। चलिबार उद्योग आमि लागियाछि करिते ॥" 331 ॥ अनुवाद—तब श्रीरामानन्द रायने कहा, — “प्रभो ! आपकी आज्ञा पाकर मैंने राजाको पत्र लिखा था जिसमें मैंने उनसे राजकार्य छोड़कर नीलाचल जानेकी अनुमतिके लिये विनती की थी। अब राजाने मुझे नीलाचल जानेकी अनुमति प्रदान कर दी है। इसलिये अब मैं नीलाचल जानेकी तैयारी कर रहा हूँ॥" 330-331 ॥ महाप्रभुका विद्यानगरमें आनेका कारण :— प्रभु कहे,—“एथा मोर ए-निमित्ते आगमन। तोमा लञा नीलाचले करिब गमन ॥" 332 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा, — “मेरे यहाँ आनेका यही कारण है। मैं तुम्हें अपने साथ लेकर नीलाचल जाऊँगा ॥" 332 ॥ रायके द्वारा महाप्रभुको पहले पुरी जानेका निवेदन और बादमें स्वयं आनेके लिये सहमति :— राय कहे,—“प्रभु, आगे चल नीलाचले। मोर सङ्गे हाती-घोड़ा, सैन्य-कोलाहले ॥ 333 ॥ । 397