श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ९/३३३-३४४ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दिन-दशे इहा-सबार करि' समाधान। तोमार पाछे पाछे आमि करिब प्रयाण॥" ३३४॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—"प्रभो! आप अभी अकेले ही नीलाचल चले जाइये, क्योंकि मेरे साथ बहुतसे हाथी, घोड़े और सैनिक हैं और इनके कारण बहुत शोर हो रहा है। दस दिनोंमें मैं इन सबकी व्यवस्था कर दूँगा। तब मैं आपके पीछे-पीछे नीलाचल आ जाऊँगा॥" ३३३-३३४॥ महाप्रभुकी सम्मति और पुरीकी ओर गमन :- तबे महाप्रभु ताँरे आसिते आज्ञा दिया। नीलाचले चलिला प्रभु आनन्दित हञा॥ ३३५॥ अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीरामानन्द रायको पुरी आनेकी आज्ञा देकर आनन्दपूर्वक नीलाचलकी ओर चल पड़े॥ ३३५॥ वैष्णवता प्राप्त भक्तोंपर कृपा प्रदर्शन करनेके लिये महाप्रभुका पहलेवाले मार्गसे ही गमन :- येइ पथे पूर्वे प्रभु कैला आगमन। सेइ पथे चलिला देखि, सर्व वैष्णवगण॥ ३३६॥ अनुवाद—जिस मार्गसे महाप्रभु पहले आये थे, उसी मार्गसे ही वे नीलाचलकी ओर गये और मार्गमें सभी वैष्णवोंने उनके दर्शन किये॥ ३३६॥ याँहा याय, लोक उठे हरिध्वनि करि'। देखि' आनन्दित-मन हैला गौरहरि॥ ३३७॥ अनुवाद—महाप्रभु जहाँ भी जाते, उनको देखकर लोग हरिध्वनि करने लगते। यह देखकर श्रीगौरहरिको बहुत आनन्द हुआ॥ ३३७॥ आलालनाथमें आकर श्रीनित्यानन्दादिको वहाँ लानेके लिये अपने सङ्गी कृष्णदासको भेजना :- आलालनाथे आसि' कृष्णदासे पाठाइल। नित्यानन्द-आदि निजगणे बोलाइल॥ ३३८॥ अनुवाद—आलालनाथ पहुँचकर महाप्रभुने कृष्णदासको भेजकर श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि अपने परिकरोंको वहीं बुलवाया॥ ३३८॥ महाप्रभुके दर्शनोंके लिये श्रीनित्यानन्दादिका अति शीघ्रागमन :- प्रभुर आगमन शुनि' नित्यानन्द-राय। उठिया चलिला, प्रेमे थेह नाहि पाय॥ ३३९॥ जगदानन्द, दामोदर-पण्डित, मुकुन्द। नाचिया चलिला, देहे ना धरे आनन्द॥ ३४०॥ अनुवाद—महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रेममें अधीर हो गये और तुरन्त उठकर महाप्रभुसे मिलने चल पड़े। श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित तथा श्रीमुकुन्द भी प्रेमानन्दमें उन्मत्त होकर उनके साथ नाचते हुए चलने लगे॥ ३३९-३४०॥ गोपीनाथाचार्य चलिला आनन्दित हञा। प्रभुरे मिलिला सबे पथे लाग् पाञा॥ ३४१॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्य भी बहुत आनन्दित होकर महाप्रभुसे मिलनेके लिये चले और मार्गमें ही उनका महाप्रभुसे मिलन हुआ॥ ३४१॥ महाप्रभुके द्वारा सबको प्रेम-आलिङ्गन :- प्रभु प्रेमावेशे सबाय कैल आलिङ्गन। प्रेमावेशे सबे करे आनन्द-क्रन्दन॥ ३४२॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें महाप्रभुने उन सबका आलिङ्गन किया और सभी प्रेमाविष्ट होकर आनन्दसे रोने लगे॥ ३४२॥ समुद्रतटपर श्रीसार्वभौमके साथ मिलन :- सार्वभौम भट्टाचार्य आनन्दे चलिला। समुद्रेर तीरे आसि' प्रभुरे मिलिला॥ ३४३॥ सार्वभौम महाप्रभुर पड़िला चरणे। प्रभु ताँरे उठाञा कैल आलिङ्गने॥ ३४४॥ ३९८ ।