श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1247, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/343-355 ] अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य भी आनन्दित होकर महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल पड़े और समुद्रके तटपर उनका महाप्रभुसे मिलन हुआ। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुको देखते ही उनके चरणोंमें गिर पड़े और महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 343-344 ॥ सभीको साथ लेकर महाप्रभुका श्रीजगन्नाथ-दर्शन और भावावेशमें नृत्य-गीत :- प्रेमावेशे सार्वभौम करिला रोदने। सबा-सङ्गे आइला प्रभु ईश्वर-दरशने ॥ 345 ॥ जगन्नाथ-दरशन प्रेमावेशे कैल। कम्प-स्वेद-पुलकाश्रुते शरीर भासिल ॥ 346 ॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें श्रीसार्वभौम रोने लगे। महाप्रभु सभीको साथ लेकर श्रीजगन्नाथके दर्शन करने गये। श्रीजगन्नाथके दर्शनसे प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुका शरीर कम्प, स्वेद, पुलक और अश्रुओं आदि सात्त्विक भावोंसे व्याप्त हो गया॥ 345-346 ॥ बहु नृत्यगीत कैल प्रेमाविष्ट हञा। पाण्डापाल आइल सबे माला-प्रसाद लञा ॥ 347 ॥ अनुवाद—प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुने बहुत देर तक नृत्य-गान किया। सब पण्डा लोगोंने आकर महाप्रभुको श्रीजगन्नाथकी माला और प्रसाद दिया॥ 347 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाण्डापाल'—श्रीजगन्नाथकी जो पूजा करते हैं, वे—पाण्डा हैं। जो अन्य प्रकारसे टहल करते हैं, अर्थात् मन्दिरके बाहरके कार्योंको देखते हैं, वे—पशुपाल हैं। ये दोनों एक साथ मिलकर 'पाण्डापाल' हुए हैं॥ 347 ॥ महाप्रभुका धैर्य-धारण और श्रीजगन्नाथ-सेवकोंके साथ मिलन :- मालाप्रसाद पाञा प्रभु सुस्थिर हइला। जगन्नाथेर सेवक सब आनन्दे मिलिला ॥ 348 ॥ काशीमिश्र आसि' प्रभुर पड़िला चरणे। मान्य करि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गने ॥ 349 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथकी माला और प्रसाद पाकर महाप्रभुका आवेश दूर हुआ। तब श्रीजगन्नाथके सब सेवक आनन्दसे महाप्रभुसे मिले। श्रीकाशीमिश्र आकर महाप्रभुके चरणोंमें पड़ गये और महाप्रभुने उन्हें सम्मान देते हुए उनका आलिङ्गन किया॥ 348-349 ॥ मध्याह्नमें सगण महाप्रभुको भट्टाचार्यके द्वारा भिक्षादान :- प्रभु लञा सार्वभौम निज-घरे गेला। 'मोर घरे भिक्षा' बलि' निमन्त्रण कैला ॥ 350 ॥ दिव्य महाप्रसाद अनेक आनाइल। पीठा-पाना आदि जगन्नाथ ये खाइल ॥ 351 ॥ मध्याह्न करिला प्रभु निजगण लञा। सार्वभौम-घरे भिक्षा करिला असिया ॥ 352 ॥ भिक्षा कराञा ताँरे कराइल शयन। आपने सार्वभौम करे पादसम्वाहन ॥ 353 ॥ अनुवाद—'आज आप मेरे घरमें भिक्षा ग्रहण कीजिये'—यह कहकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया और उन्हें अपने घर ले गये। पीठा-पाना आदि जो-जो व्यञ्जन श्रीजगन्नाथदेवने खाये थे, श्रीसार्वभौमने बहुतसा वह दिव्य महाप्रसाद मँगवाया। महाप्रभु अपने परिकरोंके साथ श्रीसार्वभौमके घरपर आये और सभीने भोजन किया। भोजन कराके श्रीसार्वभौमने महाप्रभुको विश्रामके लिये लिटाया और स्वयं उनके चरण दबाने लगे॥ 350-353 ॥ भट्टाचार्यके घरमें रात्रिमें वास और सभीको तीर्थयात्राके वृत्तान्तका वर्णन :- प्रभु ताँरे पाठाइल भोजन करिते। सेइ रात्रि ताँर घरे रहिला ताँर प्रीते ॥ 354 ॥ सार्वभौम-सङ्गे आर लञा निजगण। तीर्थयात्रा-कथा कहि' कैल जागरण ॥ 355 ॥ । 399