भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1248

[ 9/354-359 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको सार्वभौम—हे देव! इसलिये मैंने आपसे निवेदन भोजन करनेके लिये भेज दिया और उस रात उनकी किया था, वे अवश्य ही आपसे मिलनेके योग्य हैं। प्रसन्नताके लिये उन्हींके घरमें रह गये। महाप्रभुने श्रीकृष्णचैतन्य—कुछ वैष्णव भी दिखे थे, वे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और अपने परिकरोंके साथ अपनी नारायणके ही उपासक हैं, अन्य कुछ तत्त्ववादी भी थे तीर्थ-यात्राका वृत्तान्त बतलाते हुए सारी रात जागरण जो उनके समान हैं, परन्तु उनका मत निर्दोष नहीं है। किया॥ 354-355॥ अन्य अधिकांश तो शैव ही हैं और पाखण्डी तो बड़ी संख्यामें महाप्रबल हैं, किन्तु मुझे तो रामानन्दका मत महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्दकी प्रशंसा :— ही रुचिकर लगा॥”355-357॥ प्रभु कहे,—“एत तीर्थ कैलुँ पर्यटन। तोमा-सम वैष्णव ना देखिलुँ एकजने॥ 356॥ महाप्रभुकी तीर्थयात्राका वृत्तान्त इस ग्रन्थमें संक्षेपमें ही वर्णित :— एक रामानन्द राय बहु सुख दिल।” तीर्थयात्रा-कथा एइ कैलुँ समापन। भट्ट कहे,—“एइ लागि’ मिलिते कहिल॥” 357॥ संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय वर्णन॥ 358॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे कहा,— अनुवाद—(ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी “मैंने इतने तीर्थोंमें भ्रमण किया, किन्तु आपके जैसा कह रहे हैं—) मैं महाप्रभुकी तीर्थयात्राकी कथाको यहीं एक भी वैष्णव मुझे दिखायी नहीं दिया। हाँ, एक समाप्त करता हूँ। मैंने संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया रामानन्दरायने मुझे बहुत आनन्द प्रदान किया।” श्रीसार्वभौम है, क्योंकि विस्तारपूर्वक इसका वर्णन नहीं किया जा भट्टाचार्यने कहा,—“इसलिये मैंने आपको उनसे मिलनेकी सकता॥ 358॥ प्रार्थना की थी॥” 356-357॥ अनुभाष्य—इस अध्यायकी 74 संख्यामें “शियालीते अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम और श्रीकृष्णचैतन्यका भैरवी देवी करि’ दरशन” पाठके स्थानपर “शियालीते वार्त्तालाप श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके आठवें अङ्कमें इस श्रीभू-वराह करि’ दरशन” होगा। शियाली एवं चिदम्बरमके प्रकार लिखा हुआ है, जैसे- निकट सुविख्यात ‘श्रीमुञ्चम्’–मन्दिर है। वहाँ श्रीकृष्णचैतन्यः। सार्वभौम ! एतावद्दूरं पर्यटितम्; भवत्सदृशः श्रीभू-वराहदेवका विग्रह है। चिदम्बरम् तालुकाके अन्तर्गत कोऽपि न दृष्टः, केवलमेव रामानन्दरायः, स तु अलौकिक दक्षिण–आर्कट् जिलेमें शियालीके निकटमें ‘श्रीभू-वराहदेव’ एव भवति। ही विराजमान हैं, ‘भैरवीदेवी’ नहीं॥ 358॥ सार्वभौमः। देव ! अतएव निवेदितं—सोऽवश्यमेव द्रष्टव्य इति। चैतन्यलीला-वर्णन करनेकी ग्रन्थकारकी लालसा :— श्रीकृष्णचैतन्यः। कियन्त एव वैष्णवा दृष्टास्तेऽपि नारायणोपासका अनन्त चैतन्यलीला कहिते ना जानि। एव; अपरे तत्त्ववादिनस्ते तथाविधा एव निरवद्यं न भवति लोभे लज्जा खाञा तार करि टानाटानि॥ 359॥ तेषां मतम्; अपरे तु शैवा एव बहवः, पाषण्डास्तु महाप्रबला भूयांस एव। किन्तु भट्टाचार्य! रामानन्द-मतमेव मे रुचितम्।” अनुवाद—महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन्हें अर्थात् श्रीकृष्णचैतन्य—हे सार्वभौम ! मैं इतनी दूर कहनेका सामर्थ्य मुझमें नहीं है। तथापि लोभवशतः तक घूमते हुए गया, किन्तु आपके समान कोई नहीं लज्जाको खाकर अर्थात् निर्लज्ज होकर मैं उन दिखा, केवलमात्र एक रामानन्दराय ही मिले, वे लीलाओंको वर्णन करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ॥ 359॥ अलौकिक ही हैं। 400 ।