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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1249

नौवाँ अध्याय [right-aligned: 9/359-362 ]

अनुभाष्य— 'लज्जा खाञा'—लज्जाका सिर खाकर (निर्लज्ज होकर); 'तार'—श्रीचैतन्यलीलाका ॥ 359 ॥

महाप्रभुकी तीर्थयात्राके छलसे लोगोंके उद्धारकी कथाके श्रवणका फल :— प्रभुर तीर्थयात्रा-कथा शुने येइ जन। चैतन्यचरणे पाय गाढ़ प्रेमधन ॥ 360 ॥

**अनुवाद—**महाप्रभुकी तीर्थ-यात्राकी कथाको जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, उसे महाप्रभुके चरणोंमें गाढ़ प्रेमधनकी प्राप्ति होती है ॥ 360 ॥

**अनुभाष्य—**निर्विशेषवादी पञ्चोपासक लोग जगत्में अपने जड़ेन्द्रिय-ज्ञानके अनुरूप परम-तत्त्वके किसी रूपकी कल्पना करके उसे उपास्य मान लेते हैं, किन्तु श्रीमद्भागवत अथवा श्रीकृष्णचैतन्यदेव वैसी इन्द्रिय-भोगमयी उपासनाको 'परमार्थ' नहीं कहते। मायावादी अहंग्रहोपासक परम-तत्त्वको निराकार मानते हैं और उनके जितने भी रूप कहे जाते हैं, वे सब आकाश-कुसुमकी भाँति काल्पनिक हैं। मायावादी और परम-तत्त्वके काल्पनिक रूपकी उपासना करनेवाले, दोनों ही भ्रान्त हैं। उनके विचारके अनुसार भगवान्‌के श्रीविग्रह अथवा उनके किसी अन्य रूपकी उपासना बद्धजीवका भ्रम है। परन्तु श्रीगौरसुन्दरने श्रीमद्भागवतके प्रतिपाद्य अचिन्त्य-भेदाभेद-विचारके अनुसार वैसे कर्मी, ज्ञानी और योगियोंकी अनुभूतिकी अकर्मण्यताको (निकम्मेपनको) प्रदर्शित किया है। महाप्रभुने सर्वत्र तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मन्दिरोंमें भगवान्‌के नाम रूप-गुण-लीलाका परिचय देनेवाली भगवद्-वस्तुका ही दर्शन किया था। वैष्णव लोग जब शिवादि विभिन्न देवताओंके मन्दिरमें उनके दर्शन करते हैं, तो उनका दर्शन अवैष्णवोंके दर्शनसे भिन्न होता है, इसे बतानेके लिये ही महाप्रभुने वहाँ अधोक्षज वस्तुका ही दर्शन किया। आत्मवृत्तिसे अधोक्षज वस्तुका दर्शन और जड़ेन्द्रियोंके द्वारा मूर्ति-दर्शन, दोनों सम्पूर्ण रूपसे विपरीत भावमें अवस्थित हैं,—यही गौर-दासोंका अनुसरणीय विषय हैं। श्रीकृष्णकी परिकर गोपियोंकी कात्यायनीकी पूजाका लक्ष्य गोपीजनवल्लभको उपपति रूपमें पाना था। प्राकृत सहजिया लोग “महामाया” आदि अनेकानेक देवताओंको भोग प्रदान करनेवाले यन्त्रके रूपमें देखते हैं, इसलिये वे अपने इन देवी-देवताओंकी पूजाके साथ गोपियोंकी पूजाको 'एक' अथवा 'समान' मानकर विवर्त्तवादके गड्ढेमें गिरते हैं। श्रौतपन्था अर्थात् गुरु-परम्पराको समझ नहीं पानेके कारण तर्कपन्थी पञ्चोपासना विधिका प्रचार करते हैं। (विष्णु, शिव, दुर्गा, गणेश और सूर्य) पाँच उपास्य देवताओंमेंसे अन्योंका त्यागकर एकको ही 'परमेश्वर' मानकर उनको भी विश्वमें निर्विशेष ब्रह्मका प्रतीक मानकर जो दर्शन है, वही 'पञ्चोपासना' है। वैसा दर्शन मूर्तिपूजाके ही अन्तर्गत है, वही बादमें मायावादियोंके निर्विशेषवादमें परिणत हुआ है। श्रीकृष्ण दर्शनके अभावके कारण ही जीव अवैष्णव होकर पञ्चोपासक बनता है, और कभी नास्तिक बनता है। किन्तु महाप्रभुने शुद्धभक्तोंके विषयमें कहा है,—“स्थावर जङ्गम देखे, ना देखे तार (स्थावरजङ्गमरे) मूर्ति। सर्वत्र स्फुरये ताँर इष्टदेव मूर्ति॥” अर्थात् न तो उन्हें स्थावर-जङ्गम दिखायी देता है, न ही उनकी मूर्ति (आकार) दिखायी देती है, बस सर्वत्र उन्हें अपने इष्टदेवकी ही स्फूर्ति होती है ॥ 360 ॥

श्रीकृष्णचैतन्यमें दृढ़-श्रद्धा और छलरहित मनसे हरि-सङ्कीर्त्तन ही जीवोंका एकमात्र परमधर्म :— चैतन्यचरित शुन श्रद्धा-भक्ति करि'। मात्सर्य छाड़िया मुखे बल 'हरि' 'हरि' ॥ 361 ॥

**अनुवाद—**हे श्रोताओं! महाप्रभुके चरित्रका श्रद्धा-प्रेम सहित श्रवण कीजिये और मात्सर्यकी भावनाको त्यागकर मुखसे 'हरि' 'हरि' सङ्कीर्तन कीजिये ॥ 361 ॥

इसे छोड़कर “नान्य पन्था विद्यतेऽयनाय” :— एइ कलिकाले आर नाहि कोन धर्म। वैष्णव, वैष्णवशास्त्र, एइ कहे मर्म ॥ 362 ॥

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