भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1250

[ 9/361-365 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस कलिकालमें श्रीहरिनाम सङ्कीर्त्तनके नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त॥ अतिरिक्त और कोई भी धर्म नहीं है। सभी वैष्णव एवं श्रीश्रीचैतन्यचन्द्रकी लीलाका असमोर्द्ध गाम्भीर्य वैष्णव शास्त्रोंकी कथाका यही सार है॥ 362 ॥ और ग्रन्थकारका सहज दैन्य :— अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य जीवोंके प्रति स्वाभाविक चैतन्यचन्द्रेर लीला—अगाध, गम्भीर। दयाके साथ अर्थात् उनके प्रति ईर्ष्यावृत्ति (भोगबुद्धिके प्रवेश करिते नारि,—स्पर्शि रहि' तीर ॥ 363 ॥ कारण उन्हें श्रीकृष्णके वि मुख करनेकी चेष्टा) सम्पूर्ण रूपसे परित्याग करके मुखसे 'हरि' 'हरि' बोलो। (इसके अनुवाद—श्रीचैतन्यचन्द्रकी लीला अगाध एवं गम्भीर अतिरिक्त) इस कलिकालमें अन्य कोई धर्म नहीं (गहरी) है। मैं उसमें प्रवेश नहीं कर सकता, परन्तु है,—शुद्धवैष्णव-सेवा, शुद्धवैष्णव-शास्त्र पाठ करना ही उसके तटपर रहकर केवल उसका स्पर्श कर रहा जीवोंका एकमात्र धर्म है॥ 361-362 ॥ हूँ॥ 363 ॥ नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त॥ श्रीचैतन्यमहाप्रभुके अनुशीलनसे श्रीकृष्णमें प्रीति-प्राप्ति :— अनुभाष्य—वैष्णवों और वैष्णव-शास्त्रोंकी सारकथा चैतन्यचरित श्रद्धाय सुने येइ जन। यह है कि विश्वाससहित भक्तिपूर्वक श्रीचैतन्यलीला यतेक विचारे, तत पाय प्रेमधन ॥ 364 ॥ श्रवण करनेसे जीवोंमें मात्सर्य नहीं रह सकता। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कलिकालमें निर्मत्सर शुद्धजीवोंके लिये श्रीगौरपादाश्रित चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 365 ॥ होकर हरिनाम-कीर्त्तन ही एकमात्र सनातन धर्म है। 'वैष्णव'—शुद्धभक्त महाजन अथवा विद्वत्-अनुभवी; इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे दक्षिणदेशतीर्थ-भ्रमणं 'वैष्णव-शास्त्र'—श्रुति अथवा शब्द प्रमाण; दोनोंका नाम नवम-परिच्छेदः॥ अनुसरण ही श्रौतपन्थामें अवस्थान है। चरम कल्याणकी अनुवाद—श्रीचैतन्यचरितको जो श्रद्धापूर्वक सुनता अकाङ्क्षा रखनेवाले व्यक्तिमात्रके लिये इसके अतिरिक्त है और सुनकर उसपर जितना विचार करता है, उतना अन्य कोई उपाय नहीं है। (भाः 11/19/17)— ही उसे महाप्रभुके चरणोंमें प्रेमरूपी धन प्राप्त होता है। “श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम्। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते॥” करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन अर्थात् “श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य (इतिहास) और कर रहा है॥ 364-365 ॥ अनुमान—इन चार प्रमाणोंके द्वारा स्वर्गादि-भोगरूप सभी विकल्पोंका सर्वकालिक अवस्थानका अभाव अर्थात् श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें दक्षिणदेश-तीर्थ-भ्रमण इनकी नश्वरता दिखायी देनेपर जीव इनसे विरक्त हो नामक नौवें अध्यायका अनुवाद समाप्त॥ जाता है॥” 361-362 ॥ 402 ।