श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 9/276 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ] शुद्ध-भगवद्-ज्ञान भी कर्मके बिना मोक्ष प्रदान करनेमें समर्थ होनेपर भी किसी-किसी स्थानमें कर्म-ज्ञानके कर्मसचिव रूपमें स्वीकृत हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि श्रीमध्वपादने कर्मको मुख्य रूपमें मुक्तिका उपाय या ‘साधन' कहकर स्वीकार नहीं किया गया है। उसे गौण कर्म-निर्वाहक मन्त्रीका आसन मात्र दिया है। श्रीमद्भागवतके मतके साथ इस मतका कोई विरोध नहीं है, इसे भागवतके (10/47/24) श्लोककी आलोचनाके द्वारा यह समझा जा सकता है-“दान-व्रत-तपो-होम-जप- स्वाध्याय-संयमैः। श्रेयोभिर्विविधैश्चान्यैः कृष्णे भक्तिर्हि साध्यते॥” अर्थात् “जीव इस जगत्में दान, व्रत, तपस्या, होम, जप, वेद अध्ययन, संयम और अन्यान्य अनेक प्रकारके मङ्गल-अनुष्ठानके द्वारा श्रीकृष्णभक्तिकी साधना करते हैं।” तथापि अपनी इन्द्रियोंके सुखके लिये विष्णुके उद्देश्यसे अनुष्ठित जो याज्ञ, यज्ञादि हैं, उस प्रकारके कर्म गौणरूपमें भी भक्तिके सचिव नहीं हो सकते। कर्म साधारणतः ही अपनी इन्द्रियोंके सुखके लिये किये जाते हैं, इसलिये श्रीमन्महाप्रभुने कहा है,—“कर्मनिन्दा, कर्मत्याग-सर्वशास्त्रे कहे॥” किन्तु, जो कर्म धर्मके उद्देश्यसे किये जाते हैं और जिस धर्मका पालन वैराग्यके उद्देश्यसे किया जाता है और जो वैराग्य भगवान्के चरणकमलोंकी सेवाके लिये ही होता है, वह गौणरूपमें अभिधेय हो सकता है। श्रीमध्वाचार्यने इस प्रकारके कर्मको ही मात्र भक्तिके सचिवका आसन प्रदान किया है। जो परमार्थके उद्देश्यसे नहीं किया जाता, ऐसे कर्म निन्दनीय और वर्जनीय हैं। इस बातको उन्होंने ब्रह्मसूत्र (3/3/50)के भाष्यमें स्पष्ट रूपसे निर्देश किया है,—“कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते। तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥” अर्थात् “कर्मसे जीव बँधता है और विद्याके द्वारा मुक्त होता है, इसलिये पारदर्शी यतिगण कर्म नहीं करते।” श्रीमध्वाचार्यके मतमें अमला भक्तिही एकमात्र ‘साधन' रूपमें विवेचित हुई है। मध्व-सम्प्रदायमें सुप्रचलित, संक्षिप्त मध्वमत-प्रकाशक एक श्लोकमें यह व्यक्त हुआ
[दायाँ स्तम्भ] है। जैसे-“श्रीमध्वमते हरिः परतरः सत्यं जगत् तत्त्वतो, भेदो जीवगणा हरेरनुचरा नीचोच्चभावं गताः। मुक्तिर्नैजसुखानुभूतिरमला भक्तिश्च तत्साधनं, ह्यक्षादि त्रितयं प्रमाणमखिलाम्नायैकवेद्यो हरिः ॥” अर्थात् “श्रीमध्वके मतसे हरि ही सर्वश्रेष्ठ तत्त्व हैं, वस्तुतः जगत् सत्य है, जीवका भगवान्से नित्य भेद है और वह उनका नित्य दास है तथा जीव संसारमें उच्च-नीच गतिको प्राप्त करता रहता है। निज आनन्द (हरिदास्य)की अनुभूति ही मुक्ति है और अमला भक्ति ही उसका साधन है। प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द-ये तीन ही प्रमाण हैं और समस्त आम्नाय धाराके (गुरु-परम्पराके) द्वारा श्रीहरि ही जानने योग्य हैं।” इस श्लोकके ही अनुरूप एक श्लोक-“श्रीमध्वः प्राह विष्णुं परतमम्” अर्थात् “श्रीमध्वने कहा विष्णु ही परम तत्त्व हैं।” श्रीप्रमेय-रत्नावली-ग्रन्थमें श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभुने प्रकाश करके श्रीमध्वमत और श्रीचैतन्यमतका अभेद दिखलाया है। श्रीमन्मध्वने अपने विभिन्न भाष्योंमें श्रवण- कीर्त्तन-लक्षणा भक्तिको ही मुख्य साधनरूपमें बार-बार घोषित किया है। जैसे (मुण्डकोपनिषद्-भाष्यमें उद्धृत नारायणसंहिता-वचन)—द्वापरीयैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः॥” अर्थात् “द्वापरमें पञ्चरात्र विधिके अनुसार विष्णुकी आराधना होती है, किन्तु कलियुगमें केवल नामके द्वारा ही भगवान्की पूजा होती है।"; (3/3/53 सूत्रभाष्य)—“भक्तिरेवैनं दर्शयति, भक्तिवशः पुरुषो, भक्तिरेव भूयसीति माठर श्रुतेः।” (माठर श्रुतिमें कहा है-भक्ति ही भगवान्के दर्शन कराती है, भगवान् भक्तिके द्वारा ही वशीभूत होते हैं और शास्त्रोंमें सर्वत्र ही भक्तिकी महिमाका गान किया गया है)।; (महाभारत-तात्पर्य 1/118)—“भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित्। स एव मुक्तिदाता च भक्तिस्तत्रैव कारणम्॥” अर्थात् “भक्तिसे ही विष्णु सन्तुष्ट होते हैं, उनके सन्तोष अन्य कोई कारण नहीं है। वे ही मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं और भक्ति ही मुक्तिका कारण है।”
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नौवाँ अध्याय 9/276 ]
इस प्रकारसे उन्होंने बार-बार विभिन्न शास्त्रवचनोंको उद्धृत करके यह बतलाया कि 'भक्ति'के अतिरिक्त साध्य-मुक्ति प्राप्त करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है।
श्रीमध्वमतमें जिस मुक्तिको 'साध्य'रूपमें निर्णीत किया गया है, वह पाँच प्रकारकी मुक्तियोंके अन्तर्गत जीव-परमात्मैक्य-रूपा सायुज्य मुक्ति नहीं है। यदि वे जीव और परमात्माका ऐक्य ही स्वीकार करेंगे, तब उन्हें शुद्धद्वैतवादी या नित्य पञ्चभेदवादी कहनेके बदले भास्कर-भट्टादिके जैसे औपचारिक भेदवादी कहना होगा। श्रीमध्वाचार्यने जीवोंको श्रीहरिका नित्य सेवक कहा है। मुक्तावस्थामें भी जीव और ईश्वरके भेद और जीवकी ईश्वर-उपासनाकी बात उन्होंने उच्चस्वरसे घोषित की है।
“न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिता इत्यादि श्रुति-स्मृतिषु तात्पर्यं मुक्तानां भेदस्यैवोक्तेः।” (छान्दोग्य-भाष्य छठे अः)—अर्थात् जिस स्थानमें दूसरोंकी बात तो दूर रहे, स्वयं माया भी जहाँ प्रवेश नहीं कर सकती, वहाँ देवासुरादि समस्त जीवोंके पूजनीय हरिसेवकगण अवस्थान करते हैं, इत्यादि श्रुति-स्मृतिका तात्पर्य यह है कि सर्वत्र ही मुक्तजीव भगवान्से भिन्न हैं। “कृष्णोमुक्तैरिज्यते वीतमोहैः” (महाभारत तात्पर्य 2/62)—अर्थात् मोहरहित मुक्तगणोंके द्वारा श्रीकृष्ण पूजित होते हैं। “मुक्ता अपि हि कुर्वन्ति स्वेच्छयोपासनं हरे ॥” (सूत्रभाष्य 3/3/27); “मुक्तानामपि भक्तिर्हि नित्यानन्द-स्वरूपिणी” (मः भाः 1/105) आदि वाक्योंमें मुक्तगणोंकी भी श्रीहरि-उपासना और भक्ति, जो मुक्तगणोंकी नित्य आनन्दस्वरूपिणी है, वह प्रकाशित हुई है। “भेद व्यपदेशाच्च” ब्रह्मसूत्र (1/1/17)के भाष्यमें भी उन्होंने श्रीमद्भागवत-सिद्धान्तसे ही मुक्तिका (आत्माके) स्वरूप-रूपमें वर्णन किया है,—“मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः” (भाः 2/10/6) अर्थात् मायिक, स्थूल-सूक्ष्मरूप दोनोंका परित्याग करके शुद्धजीव-स्वरूपमें अर्थात् भगवद्-पार्षदरूपमें अवस्थानका नाम ही मुक्ति है। यहाँ तक कि, उक्त मतमें मुक्ति और मुक्तजीवोंके मध्यमें भी तारतम्य और आनन्दका तारतम्य स्वीकृत हुआ है; (संक्षिप्त मध्वमत)—“जीवगणा हरेरनुचरा नीचोच्चभावं गताः” अर्थात् “जीव हरिका नित्य दास है तथा जीव संसारमें उच्च-नीच गतिको प्राप्त करता रहता है।"; (सूत्रभाष्य 3/3/33)—“मुक्तावानन्दो विशिष्यते” अर्थात् “मुक्तिमें आनन्द एक विशेष वस्तु है।”
इसलिये मायावाद-दलन चिह्न उठानेवाले श्रीमध्वपादने जिस मुक्तिको साध्य कहकर निर्णीत किया है, वह नितान्त ही भक्तिपरक और श्रीमद्भागवत-विचारपरक है, उसमें कोई ज्ञान-दोष नहीं है। श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभुने श्रीमध्वाचार्यके द्वारा कही गयी उक्त मुक्तिको “मोक्षं विष्ण्वङ्घ्रिलाभं।” अर्थात् श्रीविष्णुके चरणकमलोंकी प्राप्ति कहकर वर्णित किया है। घीमें जिस प्रकार दूधकी मौलिकता होती है अर्थात् दूध जैसे घीका मूल है, उसी प्रकार श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रचारित साध्य-सार प्रेमके मध्यमें भी श्रीमध्व-प्रतिपाद्य 'साध्य' श्रीविष्णुके चरणकमल प्राप्तिरूपा मुक्ति भी ग्रथित है।
श्रीमध्वाचार्यकी परम्परामें तत्त्ववादी-आचार्य रघुवर्यतीर्थकी या उनके अनुगत शिष्यवर्गकी अथवा परवर्ती तत्त्ववादियोंकी विचारधारामें कालक्रमसे श्रीमध्वाचार्यके वास्तविक मतसे अनेक भेद आ गये हैं, यह श्रीमध्वाचार्यकी लेखनी और आधुनिक तत्त्ववादियोंकी आचार-प्रचार लेखनीपर विचार करके अच्छी तरहसे समझा जा सकता है। इसलिये परवर्त्ती विकृत मतको मूल-आचार्यका सिद्धान्त कहकर स्थापित नहीं किया जा सकता। श्रीमन्महाप्रभुने मध्व-सम्प्रदायको स्वीकार करके भी उक्त तत्त्ववादि-आचार्यको “तुम्हारे सम्प्रदाय” कहकर जो कहा, उससे उक्त तत्त्ववादि-महाशय मूल 'मध्व-सम्प्रदाय'की धारासे बहुत दूर होकर स्वतन्त्र हो गये हैं, वही सूचित हुआ है।
उन्होंने उक्त वाक्यके द्वारा उस तत्त्ववादि-आचार्यको इस प्रकार समझाया,—“मेरा अभिप्रेत और स्वीकृत जो मध्व-सम्प्रदाय है, तुमने उसके वास्तविक तात्पर्यको न समझकर केवल बाहरी-मतजालमें आबद्ध होकर एक
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[ 9/276–280 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पृथक् सम्प्रदायकी सृष्टि की है, —उसमें एक भगवद्- विग्रहकी सत्यताको स्वीकार करना छोड़कर और कोई भी शुद्ध वैष्णव-सिद्धान्त नहीं देखा जाता। इसलिये तुम्हारे कल्पित इस सम्प्रदायके साथ व्यास-शिष्य श्रीमद्धका और मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है।” ‘आउल’, ‘बाउल’, ‘प्राकृतिक सहजिया’ आदि गोष्ठी अपना परिचय महाप्रभुके अनुगत और गौड़ीय वैष्णव-सम्प्रदायके रूपमें देते हैं। किन्तु ऐसा कहनेसे उनके अपसिद्धान्तको महाप्रभुके द्वारा प्रचारित मत नहीं कहा जा सकता। बल्कि कोई उक्त अपसिद्धान्तोंका खण्डन करके यह कहे कि उसने महाप्रभुके मतका खण्डन किया है, तो इस प्रकारका विचार नितान्त अयुक्तिपूर्ण है। इसी प्रकार तथाकथित तत्त्ववादियोंके अपसिद्धान्तका महाप्रभुके द्वारा शास्त्रयुक्तिसे खण्डन करनेकी बात कहकर कि महाप्रभुने चार-सात्वत- सम्प्रदायोंके एक मुख्य पूर्वाचार्य श्रीमद्धके प्रवर्त्तित श्रौतमतका खण्डन किया है, इसलिये उन्होंने कभी भी श्रीमध्व सम्प्रदायको स्वीकार नहीं किया—इस प्रकारकी युक्ति नितान्त बालभाष्य है अर्थात् बालककी वाणी है॥ 276 ॥ फल्गुतीर्थमें आगमन :— एइमत ताँर घरे गर्व चूर्ण करि’। फल्गुतीर्थे तबे आइला श्रीगौरहरि ॥ 278 ॥ अनुवाद—इस प्रकार उनके गर्वको चूर्ण करके तब श्रीगौरहरि फल्गुतीर्थमें आये॥ 278 ॥ अनुभाष्य—‘ताँर घरे’—अर्थात् ‘उनके’; आज तक भी हावड़ा-आमता लाईन पर ‘माजु’ आदि स्थानों पर एवं वर्द्धमान-काटोयाकी ओर ‘तत्’ ‘युष्मद्’ और ‘अस्मद्’ शब्दके कर्मकारकमें द्वितीया विभक्तिके एक वचनमें और बहुवचनमें चलित भाषामें सम्बन्ध-विभक्ति ‘र’के साथ ‘घरे’ शब्दका व्यवहार प्रसिद्ध है। जैसे—‘तादेर घरे’, ‘तोमादेर घरे’ एवं ‘आमादेर घरे’ आदि शब्दोंका अर्थ क्रमशः ‘उनके’, ‘तुम्हारे’ एवं ‘हमारे’ होता है। पूर्वी बङ्गालमें इन सभी शब्दोंके कर्मकारकमें द्वितीया-विभक्तिमें केवलमात्र बहुवचनमें ‘गोरे’ शब्द इस ‘घरे’ शब्दके अपभ्रंशके रूपमें प्रचलित है; किन्तु सम्बन्ध विभक्त ‘र’ आगम नहीं होता; जैसे-‘तुम्हें बुला रहे हैं’ को बङ्गला भाषामें ‘तोमादिगके डाकिय़ाछें’ कहनेके स्थानपर पूर्वबङ्गालमें चलती भाषामें ‘तोमागौरे डाकछें’ ही प्रचलित है॥ 278 ॥ त्रितकूपमें विशालाका दर्शन और पञ्चाप्सरा तीर्थमें आगमन :— त्रितकूपे विशाला करिल दरशन। पञ्चाप्सरा-तीर्थे आइला शचीर नन्दन ॥ 279 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने त्रितकूपमें विशालाके दर्शन किये। उसके बाद श्रीशचीनन्दन पञ्चाप्सरा-तीर्थमें गये॥ 279 ॥ अनुभाष्य—‘पञ्चाप्सरा तीर्थ’—शातकर्णिकी, अन्य मतमें माण्डकर्णिकी, और एक अन्य मतमें अच्युत-ऋषिकी तपस्याको भङ्ग करनेके उद्देश्यसे इन्द्रने लता, बुदबुदा, समीची, सौरभेयी और वर्णा—इन पाँच अप्सराओंको भेजा। परन्तु वे ऋषिके द्वारा श्रापग्रस्त होकर मगरमच्छके रूपमें सरोवरमें वास करने लगीं। बादमें श्रीरामचन्द्रने इस सरोवरको देखा था। नारदजीके वचनोंसे पता चलता है कि अर्जुनने तीर्थयात्रा करते हुए यहाँ आकर मगरमच्छकी योनिसे इन पाँच अप्सराओंका उद्धार किया। तबसे यह सरोवर तीर्थके रूपमें परिणत हो गया है॥ 279 ॥ गोकर्णमें शिवका दर्शन और द्वैपायनि और सूपारक-तीर्थमें आगमन :— गोकर्णे शिव देखि’ आइला द्वैपायनि। सूपारक-तीर्थे आइला न्यासि-शिरोमणि ॥ 280 ॥ अनुवाद—उसके बाद महाप्रभुने गोकर्णमें आकर शिवजीका दर्शन किया और वहाँसे वे द्वैपायनि आये। संन्यासी शिरोमणि महाप्रभु तब सूपारक तीर्थमें गये॥ 280 ॥ अनुभाष्य—‘गोकर्ण’—बम्बई प्रदेश (वर्तमान महाराष्ट्र 390 ।
नौवाँ अध्याय 9/280-285 ] में उत्तर कानाड़ामें कारवारके बीस मील दक्षिण-पूर्वकी ओर अवस्थित है और महाबलेश्वर शिवलिङ्गके मन्दिरके लिये विख्यात है। इस स्थानपर तीर्थ करनेके उद्देश्यसे बहुत यात्री आते हैं (बोम्बाई गेजेटियार)। 'सूपारक'-मुम्बईसे छब्बीस मील उत्तरकी ओर थाना जिलेमें 'सोपारा' नामक स्थान है। अति प्राचीन कालसे मध्ययुग तक यह 'कोङ्कण'की राजधानी थी (बोम्बाई गेजेटियार)। मःभाः शाःपः 49/66-67 देखें॥ 280 ॥ कोलापुरमें लक्ष्मी, भगवती, गणेश और पार्वती-दर्शन :- कोलापुरे लक्ष्मी देखि' देखे क्षीर-भगवती। लाङ्ग-गणेश देखि' देखे चोर-पार्वती ॥ 281 ॥ अनुवाद-महाप्रभु तब कोलापुर आये और वहाँ क्षीर-भगवती मन्दिरमें उन्होंने लक्ष्मीजीके दर्शन किये। उसके बाद चोर-पार्वती मन्दिरमें उन्होंने लाङ्ग-गणेशके दर्शन किये ॥ 281 ॥ अनुभाष्य- 'कोलापुर'-महाराष्ट्र एक जिला है। इसके उत्तरमें-साँतारा, पूर्व और दक्षिणमें-बेलग्राम, पश्चिममें-रत्नगिरि है। यहाँपर 'उर्णा' नदी है। कोलापुरमें पहले लगभग ढाई सौ मन्दिर थे; उनमेंसे अब ये छह मन्दिर प्रसिद्ध हैं-
- अम्बाबाई अथवा महालक्ष्मीका मन्दिर,
- विठोवाका मन्दिर,
- टेम्बालाईका मन्दिर,
- महाकालीका मन्दिर,
- फिराङ्गर्ई अथवा प्रत्यङ्गिराका मन्दिर और
- याल्लाम्मार मन्दिर। (बोम्बाई गेजेटियार) ॥ 281 ॥ भीमा-नदीके तटपर स्थित पाण्डरपुरमें आगमन और विट्ठलदेवका दर्शन :- तथा हैते पाण्डरपुरे आइला गौरचन्द्र। विठ्ठल-ठाकुर देखि' पाइला आनन्द ॥ 282 ॥ अनुवाद-वहाँसे श्रीगौरचन्द्र पाण्डरपुरमें आ गये और वहाँ ठाकुर श्रीविट्ठल देवका दर्शन करके बहुत आनन्दित हुए ॥ 282 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पाण्डरपुर'-भीमा नदीके तटपर 'पाण्डुपुर' अथवा 'पाण्डरपुर' नगर है। अनुसन्धान करनेपर यह जाना जाता है कि इस स्थानपर महाप्रभुने तुकारामाचार्यको हरिनाम् देकर कृपाकी थी-इसे तुकारामकृत 'अभङ्ग'में उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया है। तुकारामसे ही उस प्रदेशमें मृदङ्गादि वाद्यके साथ कीर्तनका प्रचार हुआ है ॥ 282 ॥ अनुभाष्य- 'पाण्डरपुर अथवा पण्डरपुर'-महाराष्ट्र प्रदेशमें शोलापुर जिलेके अन्तर्गत एक छोटा शहर है। पाण्डरपुर शोलापुर नगरसे अड़तीस मील सीधे पश्चिम दिशामें है। यहाँपर विठ्ठल अथवा विठोवा-देव ठाकुर हैं; वे-चतुर्भुज श्रीनारायण-मूर्ति हैं। यह नगर भीमा नदीके तटपर अवस्थित है। पन्द्रह सौ शक-शताब्दीमें यहाँ 'तुकाराम' नामक प्रसिद्ध वैष्णव-साधु रहते थे॥ 282 ॥ महाप्रभुका नृत्य-गीत और एक वैष्णव ब्राह्मणके घर भिक्षा :- प्रेमावेश कैल बहुत कीर्त्तन-नर्त्तन। ताँहा एक विप्र ताँरे कैल निमन्त्रण ॥ 283 ॥ वहाँ श्रीरङ्गपुरीके होनेका समाचार मिलना :- बहुत आदरे प्रभुके भिक्षा कराइल। भिक्षा करि' तथा एक शुभवार्त्ता पाइल ॥ 284 ॥ माधवपुरीर शिष्य 'श्रीरङ्गपुरी' नाम। सेइग्रामे विप्रगृहे करिला विश्राम ॥ 285 ॥ अनुवाद-श्रीविट्ठलदेवके मन्दिरमें महाप्रभुने प्रेमावेशमें बहुत देर तक कीर्त्तन-नृत्य किया। वहाँ एक ब्राह्मणने आकर महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। उस ब्राह्मणने महाप्रभुको बहुत आदरपूर्वक भोजन कराया। भोजन करके महाप्रभुको एक शुभ समाचार मिला कि श्रीमाधवेन्द्रपुरीके एक शिष्य जिनका नाम 'श्रीरङ्गपुरी' है, वे उसी ग्राममें एक ब्राह्मणके घरमें कुछ समयसे रह रहे हैं ॥ 283-285 ॥ । 391
[ 9/286–293 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीरङ्गपुरीके पास जाना और उनको प्रणाम करना :- शुनिया चलिला प्रभु ताँरे देखिबारे। विप्रगृहे बसि' आछेन, देखिला ताँहारे ॥ 286 ॥ प्रेमावेशे करे ताँरे दण्ड-परणाम। अश्रु, पुलक, कम्प, सर्वाङ्गे पड़े घाम ॥ 287 ॥ महाप्रभुके भावोंको देखकर रङ्गपुरीका महाप्रभुका माधवेन्द्रपुरीके साथ सम्बन्ध मानना :- देखिया विस्मित हैला श्रीरङ्ग-पुरीर मन। 'उठह श्रीपाद' बलि' बलिला वचन ॥ 288 ॥ “श्रीपाद, धर मोर गोसाञिर सम्बन्ध। ताहा बिना अन्यत्र नाहि एइ प्रेमार गन्ध ॥ ”289 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभु श्रीरङ्गपुरीके दर्शनके लिये चल पड़े और ब्राह्मणके घरमें जाकर उन्होंने देखा कि श्रीरङ्गपुरी बैठे हुए है। महाप्रभुने प्रेमावेशमें उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। उनके शरीरमें अश्रु, पुलक, कम्प एवं सभी अङ्गोंमें पसीना आदि अष्ट-सात्त्विक विकार प्रकाशित होने लगे। महाप्रभुके सात्त्विक विकारोंको देखकर श्रीरङ्गपुरी मन-ही-मन विस्मित हो गये और कहा,-'उठो श्रीपाद, अवश्य ही आपका मेरे गुरुदेवसे कुछ सम्बन्ध है, क्योंकि उनसे सम्बन्धके बिना इस प्रकारके प्रेमकी गन्ध भी नहीं देखी जाती ॥ ”286-289 ॥ अनुभाष्य-श्रीपाद माधवेन्द्रपुरीसे पहले श्रीपाद लक्ष्मीपति तीर्थ तक मध्व-सम्प्रदायमें अकेले श्रीकृष्णकी पूजा ही प्रचलित थी। श्रील माधवेन्द्रपुरीसे ही जगत्में ऐकान्तिक- श्रीराधादास्यके भावसे विप्रलम्भ-रससे कृष्णप्रेम अवतरित हुआ है। क्योंकि “भक्तिकल्पतरुर तैँ ह प्रथम अङ्कुर” (आदिलीला 9/10 संख्या)। श्रील माधवेन्द्रपुरीके साथ प्रिय सम्बन्धवाले जातरुचि भक्तोंका ही इस श्रीकृष्णप्रेममें अधिकार है। मध्यलीला 2/83 संख्या भी देखें। 'गोसाञिर'–गोस्वामी। निष्किञ्चन (संसारकी किसी भी वस्तु अपना नहीं माननेवाले) परमहंसकुल-शिरोमणि (त्यागियोंमें सर्वश्रेष्ठ) कृष्णैकशरण (ऐकान्तिक श्रीकृष्ण-शरणागत) श्रीगुरुदेव, जिन्होंने छह (वाणी, मन, क्रोध, जिह्वा, उदर और जननेन्द्रियोंके) वेगोंको विजय किया है, वे ही 'गोस्वामी' कहलाने योग्य हैं। इसलिये गृहका त्याग करनेवाले श्रीमाधवेन्द्रपुरी पादको 'गोस्वामी' शब्दके द्वारा सम्बोधित किया गया है। इसके द्वारा यह समझना चाहिये कि 'गोस्वामी'-शब्द रक्त अथवा शुक्र अथवा शौक्रवंशमें आबद्ध नहीं है, अर्थात् किसी विशेष परिवारमें जन्मके द्वारा स्वयंको गोस्वामी नहीं कहा जा सकता। किन्तु वैष्णवोंसे विरोधकी स्पृहाके कारण अवैधरूपसे 'गोस्वामी' शब्द वर्तमानकालमें पारिवारिक उपाधिमें परिवर्तित हो गया है। इसलिये वह 'गोस्वामी' पदवी अनधिकारी व्यक्तियोंके द्वारा व्यवहार किये जानेपर उनकी व्याधिका कारण बन गयी है ॥ 289 ॥ महाप्रभुको आलिङ्गन और दोनोंका प्रेम-क्रन्दन :- एत बलि' प्रभुके उठाञा कैल आलिङ्गन। गलागलि करि' दुँहे करेन क्रन्दन ॥ 290 ॥ दोनोंका धैर्य; परस्परके परिचयकी प्राप्ति एवं प्रेम :- क्षणेके आवेश छाड़ि' दुँहे धैर्य हैला। ईश्वरपुरीर सम्बन्ध गोसाञि जानाइला ॥ 291 ॥ अद्भुत प्रेमेर वन्या दुँहार उथलिल। दुँहे मान्य करि' दुँहे आनन्दे बसिल ॥ 292 ॥ दोनोंके द्वारा सात दिन तक श्रीकृष्णकथा-आलोचना :- दुइजने कृष्णकथा कहे रात्रि-दिने। एइमते गोडाइल पाँच-सात दिने ॥ 293 ॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीरङ्गपुरीने महाप्रभुको उठाकर उनका आलिङ्गन किया। दोनों एक-दूसरेको गले लगाकर रोने लगे। कुछ समयके बाद प्रेमावेश कम हुआ और दोनोंने धैर्य धारण किया। तब महाप्रभुने श्रीरङ्गपुरीको श्रीईश्वरपुरीके साथ अपने सम्बन्धके विषयमें बतलाया। दोनोंमें एक अद्भुत प्रेमकी बाढ़ उमड़ पड़ी। अन्ततः दोनों एक-दूसरोंको सम्मान देते हुए आनन्दपूर्वक बैठकर बातचीत करने लगे। दोनों ही रात-दिन 392 ।
नौवाँ अध्याय 9/290–303 ] श्रीकृष्णकथा कहने लगे। इस प्रकार उन्होंने पाँच-सात दिन वहाँ बिताये ॥ 290-293 ॥ पुरीके पूछनेपर महाप्रभुका 'जन्मस्थान-नवद्वीप' बताना :- कौतुके पुरी ताँरे पुछिल जन्मस्थान। गोसाञि कौतुके कहेन 'नवद्वीप' नाम ॥ 294 ॥ अनुवाद—तब उत्सुकतावश श्रीरङ्गपुरीने महाप्रभुसे उनके जन्मस्थानके विषयमें पूछा। महाप्रभुने कौतुकवश अपने जन्मस्थानका नाम 'नवद्वीप' बतलाया ॥ 294 ॥ पहले शचीमाताके घरपर रङ्गपुरीके द्वारा उनके हाथोंसे बने हुए भोजनको ग्रहण करनेका सुयोग :- श्रीमाधवपुरीर सङ्गे श्रीरङ्गपुरी। पूर्वे आसियाछिला तेंहो नदीया-नगरी ॥ 295 ॥ जगन्नाथमिश्र-घरे भिक्षा ये करिल। अपूर्व मोचार घण्ट ताँहा ये खाइल ॥ 296 ॥ जगन्नाथेर ब्राह्मणी, तेंह—महा-पतिव्रता। वात्सल्ये हयेन तेंह येन जगन्माता ॥ 297 ॥ रन्धने निपुणा ताँ-सम नाहि त्रिभुवने। पुत्रसम स्नेह करेन संन्यासि-भोजने ॥ 298 ॥ ताँर एक योग्य पुत्र करियाछे संन्यास। 'शङ्करारण्य' नाम ताँर अल्प वयस ॥ 299 ॥ रङ्गपुरीके मुखसे विश्वरूपके संन्यासके बाद उनकी सिद्धि प्राप्तिका संवाद श्रवण :- एइ तीर्थे शङ्करारण्येरे सिद्धिप्राप्ति हैल। प्रस्तावे श्रीरङ्गपुरी एतेक कहिल ॥ 300 ॥ अनुवाद—श्रीरङ्गपुरीको नदिया नाम सुनते ही वहाँकी बातें स्मरण हो आयीं जब वे श्रीमाधवेन्द्र पुरीके साथ पहले एक बार नदीया-नगरी आये थे। उन दोनोंने श्रीजगन्नाथ मिश्रके घरमें भोजन किया था और भोजनमें अपूर्व स्वादिष्ट केलेके फूलकी सूखी सब्जी खाई थी। श्रीजगन्नाथ मिश्रकी पत्नी महान पतिव्रता थीं और जिनका वात्सल्य ऐसा था, मानो वे सामस्त जगत्की माता हों। भोजन बनानेमें त्रिभुवनमें उनके समान कोई भी निपुण नहीं था। पुत्रकी भाँति स्नेह करते हुए उन्होंने संन्यासियोंको भोजन कराया था। उनका एक योग्य पुत्र था, उसने छोटी आयुमें ही संन्यास ग्रहण किया था। उनका संन्यासका नाम 'शङ्करारण्य' था। इसी पाण्डरपुर तीर्थमें आकर शङ्करारण्यने सिद्धि प्राप्त की अर्थात् यहीं वे अप्रकट हुए। प्रसङ्गवशतः श्रीरङ्गपुरीने महाप्रभुसे यह सब वृत्तान्त कहा ॥ 295–300 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुके ज्येष्ठ भ्राता श्रीमद्विश्वरूपको संन्यास ग्रहण करके 'शङ्करारण्य स्वामी' नाम प्राप्त हुआ था। उन्होंने देश भ्रमण करते-करते 'पाण्डरपुर'-तीर्थमें सिद्धि प्राप्त की थी, अर्थात् चिन्मय-धाममें प्रवेश किया था। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य और श्रीईश्वरपुरीके गुरुभाई श्रीरङ्गपुरीने यह संवाद महाप्रभुको दिया ॥ 300 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपने पूर्वाश्रमका परिचय देना :- प्रभु कहे,—'पूर्वाश्रमे तेंहो मोर भ्राता। जगन्नाथ मिश्र—पूर्वाश्रमे मोर पिता ॥' 301 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,—'पूर्वाश्रममें 'शङ्करारण्य' मेरे भाई थे। श्रीजगन्नाथ मिश्र मेरे पूर्वाश्रममें पिता थे ॥' 301 ॥ श्रीरङ्गपुरीकी द्वारका यात्रा :- एइमत दुइजने इष्टगोष्ठी करि'। द्वारका देखिते चलिला श्रीरङ्गपुरी ॥ 302 ॥ अनुवाद—इस प्रकार दोनोंने इष्टगोष्ठी की और उसके बाद श्रीरङ्गपुरी द्वारका दर्शनके लिये चले गये ॥ 302 ॥ वैष्णव ब्राह्मणके घरपर महाप्रभुका चार दिन वास और विठ्ठलदेव दर्शन :- दिन-चारि तथा प्रभुके राखिल ब्राह्मण। भीमानदी स्नान करि' करेन विठ्ठल-दर्शन ॥ 303 ॥ । 393
[ 9/303-310 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीरङ्गपुरीके जानेके बाद चार दिन तक महाप्रभु उस ब्राह्मणके घरमें रहे। महाप्रभु प्रतिदिन भीमा नदीमें स्नान करते और श्रीविठ्ठलदेवका दर्शन किया करते॥ ३०३॥ कृष्णवेण्वाके तटपर आगमन :— तबे महाप्रभु आइला कृष्णवेण्वा-तीरे। नाना तीर्थ देखि' ताँहा देवता-मन्दिरे॥ ३०४॥ अनुवाद—तब महाप्रभु कृष्णवेण्वा नदीके तटपर आये। वहाँ उन्होंने अनेक तीर्थों और बहुतसे देवताओंके मन्दिरोंका दर्शन किये॥ ३०४॥ अनुभाष्य—'कृष्णवेण्वा'—सह्याद्रि-पर्वतपर स्थित महाबलेश्वरसे कृष्णा नदीकी दो धाराओंकी उत्पत्ति हुई है। इसी नदीके तटपर ही बिल्वमङ्गल ठाकुरका वासस्थान था। 'वेण्वा'के स्थान पर कोई-कोई 'वीणा', कोई-कोई 'वेणी', 'सिना' और कोई 'भीमा' कहते हैं॥ ३०४॥ वहाँके ब्राह्मणगण-वैष्णव और कर्णामृत-पाठक :— ब्राह्मण-समाज सब—वैष्णव-चरित्र। वैष्णव सकल पड़े 'कृष्णकर्णामृत'॥ ३०५॥ अनुवाद—वहाँके ब्राह्मण-समाजमें सब शुद्ध वैष्णव थे जो नियमित रूपसे बिल्वमङ्गल ठाकुर-कृत 'कृष्णकर्णामृत'का पाठ किया करते थे॥ ३०५॥ अनुभाष्य—'कृष्णकर्णामृत'—श्रीठाकुर बिल्वमङ्गलके द्वारा रचित एक सौ बारह श्लोकोंवाला ग्रन्थ है। इस नामके ही दो-तीन और भी गीतिग्रन्थ पाये जाते हैं। 'कृष्णकर्णामृत'की श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी और श्रीचैतन्यदास गोस्वामीके द्वारा लिखीं दो गौड़ीय वैष्णवोंके लिये पढ़ने योग्य टीकाएँ हैं॥ ३०५॥ कर्णामृत-श्रवणसे महाप्रभुको हर्ष और ग्रन्थकी नकलका संग्रह :— कृष्णकर्णामृत शुनि' प्रभुर आनन्द हैल। आग्रह करिया पुँथि लेखाञा लैल॥ ३०६॥ 'कर्णामृत'की महिमा :— 'कर्णामृत'-सम वस्तु नाहि त्रिभुवने। याहा हैते हय कृष्णे शुद्धप्रेमज्ञाने॥ ३०७॥ सौन्दर्य-माधुर्य-कृष्णलीलार अवधि। सेइ जाने, ये 'कर्णामृत' पड़े निरवधि॥ ३०८॥ अनुवाद—कृष्णकर्णामृतको सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने आग्रह करके उस ग्रन्थकी नकल करवाके अपने पास रख ली। त्रिभुवनमें 'कृष्णकर्णामृत'के समान कोई भी ग्रन्थ नहीं है जिसको पढ़नेसे श्रीकृष्णमें शुद्धप्रेमका ज्ञान प्राप्त होता है। जो 'कर्णामृत'का नित्य पाठ करता है, वह श्रीकृष्णके सौन्दर्य, माधुर्य और उनकी लीलाओंको पूर्णरूपसे जान सकता है॥ ३०६-३०८॥ महाप्रभुके द्वारा दो ग्रन्थोंका संग्रह— (१) सिद्धान्त और (२) रसशास्त्र :— 'ब्रह्मसंहिता', 'कर्णामृत' दुइ पुँथि पाञा। महा यत्न करि' पुँथि आइला लञा॥ ३०९॥ अनुवाद—महाप्रभुने 'ब्रह्मसंहिता' और 'कर्णामृत', ये दो ग्रन्थ-रत्न प्राप्त किये। अति सावधानीके साथ उन दोनों ग्रन्थोंको वे अपने साथ लेकर आये॥ ३०९॥ अनुभाष्य—'ब्रह्म संहिता'—इसी अध्यायकी 237 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ ३०९॥ ताप्ती और नर्मदाके तटपर तीर्थ-दर्शन और माहिष्मतीपुरमें आगमन :— तापी स्नान करि' आइला माहिष्मतीपुरे। नाना तीर्थ देखि' ताँहा नर्मदार तीरे॥ ३१०॥ अनुवाद—वहाँसे महाप्रभु तापी नदीके तटपर आये और नदीमें स्नान करके माहिष्मतीपुरमें आये। वहाँ उन्होंने नर्मदा नदीके तटपर स्थित अनेक तीर्थोंका दर्शन किया॥ ३१०॥ अनुभाष्य—'तापी'—इसका वर्तमान नाम 'ताप्ती' है। 394 ।
नौवाँ अध्याय 9/310-316 ] यह मध्य-भारतके मूलताइ-गिरिसे निकलकर सौराष्ट्र उत्तर अंशमें पश्चिम-सागरमें जाकर मिलती है। ‘माहिष्मतीपुर’—‘चुलिमहेश्वर’; महाभारत सभापर्वमें सहदेवकी दिग्विजयपर 31/21 श्लोक— “ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ। तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभः॥” अर्थात् “तदन्तर वे नरश्रेष्ठ (सहदेव) वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर माहिष्मती पुरीको गये और वहाँ राजा नीलके साथ घोर युद्ध किया।” पहले गुजरातका ब्रोच जिला कार्त्तवीर्यार्जुनका स्थान था॥310॥ सबसे सङ्कीर्ण पर्वतपथके बगलमें जो पर्वत निजाम-राज्यमें पड़ता है, वही ऋष्यमूक पर्वत है। किसी औरके मतसे, यह मध्यप्रदेशमें अवस्थित है और इसका वर्तमान नाम ‘राम्य’ है; किसी अन्यके मतानुसार, त्रिवाङ्कुर-राज्यमें ‘अनमलय’ और फिर किसीके मतानुसार ऋष्यमूक पर्वतसे ही पम्पा नदी बाहर निकलकर अनागुण्डिरके निकट तुङ्गभद्रामें आकर मिलती है। ‘दण्डकारण्य’—उत्तरमें ‘खानदेश’से दक्षिणमें अहमदनगर एवं बीचमें ‘नासिक’ और ‘औरङ्गाबाद’ तक गोदावरी-नदीके तटपर स्थित विस्तृत भूभागपर ‘दण्डकारण्य’ नामक विशाल वन था। ‘सप्तताल’—वानरराज सुग्रीवको बालीका वध करनेमें अपने सामर्थ्यमें विश्वास दिलानेके लिये श्रीरामचन्द्रका एक ही बाणसे सप्ततालको बींधनेका प्रसङ्ग रामायणके किष्किन्धाकाण्डमें ग्यारहवें और बारहवें सर्गमें वर्णित है॥311-312॥ धनुस्तीर्थ-दर्शन और निर्विन्ध्या-नदीमें स्नान, उसके बाद ऋष्यमूक पर्वतसे दण्डकारण्यमें आगमन और ‘सप्तताल’का उद्धार :— धनुस्तीर्थ देखि’ करिला निर्विन्ध्ये स्नाने। ऋष्यमूक-गिरि आइला दण्डकारण्ये॥311॥ ‘सप्तताल-वृक्ष’ देखे कानन-भितर। अति वृद्ध, अति स्थूल, अति उच्चतर॥312॥ सप्तताल देखि’ प्रभु आलिङ्गन कैल। सशरीरे सप्तताल अन्तर्धान हैल॥313॥ लोगोंके द्वारा महाप्रभुको श्रीरामका अवतार समझना :— शून्यस्थल देखि’ लोकेर हैल चमत्कार। लोके कहे,—“ए संन्यासी-राम-अवतार॥314॥ सशरीरे ताल गेल श्रीवैकुण्ठ-धाम। ऐछे शक्ति कार हय, बिना एक राम?”॥315॥ अनुवाद—धनुस्तीर्थका दर्शन करके महाप्रभुने निर्विन्ध्या नदीमें स्नान किया। फिर ऋष्यमूक पर्वतसे दण्डकारण्यमें आये। दण्डकारण्यमें महाप्रभुने ‘सप्तताल वृक्ष’ देखे। ये सात तालके वृक्ष बड़े पुराने, बहुत मोटे और बहुत ऊँचे थे। सप्तताल वृक्षोंको देखकर महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया और साथ-ही-साथ वे वृक्ष सशरीर अन्तर्धान हो गये॥311-313॥ अनुवाद—जिस स्थानपर ताल वृक्ष थे, उस स्थानको रिक्त देखकर लोग बहुत आश्चर्यचकित हुए। वे कहने लगे,—“ये संन्यासी तो भगवान् श्रीरामचन्द्रके अवतार हैं। तालवृक्ष सशरीर श्रीवैकुण्ठ-धाममें चले गये। ऐसी शक्ति तो एकमात्र भगवान् श्रीरामचन्द्रके अतिरिक्त और किसमें हो सकती है?”॥314-315॥ पम्पा-सरोवरमें स्नान और पञ्चवटीपर विश्राम :— प्रभु आसि’ कैल पम्पा-सरोवरे स्नान। पञ्चवटी आसि ताँहा करिल विश्राम॥316॥ अनुभाष्य—‘निर्विन्ध्या नदी’—उज्जयनीके निकट पूर्वोत्तरमें अवस्थित पारा-नदीके पश्चिममें और पावनी नदीके दक्षिणमें है। ‘ऋष्यमूक’—कोई कोई कहते हैं कि बेलारि-जिलेमें हाम्पि-ग्रामके निकट तुङ्गभद्रा-नदीके तटपर स्थित अनुवाद—सप्ततालका उद्धार करके महाप्रभुने पम्पा सरोवर आकर उसमें स्नान किया और फिर पञ्चवटी नामक स्थानपर आकर विश्राम किया॥316॥ । 395
[ 9/316-323 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'पम्पा'—"ऋष्यमूकस्तु पम्पायां पुरस्तात् पुष्पितद्रुमः” अर्थात् "पम्पा नगरीमें ऋष्यमूक पर्वत है जिसके आगे पुष्पित वृक्ष हैं।"; कोई-कोई कहते हैं, —तुङ्गाभद्रा-नदीका ही प्राचीन नाम 'पम्बा' है। मतान्तरमें—विजयनगरकी प्राचीन प्रसिद्ध राजधानी हाम्पि-ग्राम ही पहले पम्पा-तीर्थके नामसे प्रसिद्ध था। मतान्तरमें—हैदराबादकी ओर, अनागुण्डिरके निकट तुङ्गाभद्राके तटपर स्थित एक सरोवर ही 'पम्पा सरोवर'के नामसे जाना जाता है; मतान्तरमें—पम्पा-सरोवर ही त्रिवाङ्कुरकी पम्वै-नदी है; मतान्तरमें—जल स्थिर होनेके कारण नदीको ही सरोवर कहा जाता है। 'पञ्चवटी'—दण्डकारण्यके अन्तर्गत एक वन है; यह वर्तमान 'नासिक' शहरमें अवस्थित है। यहाँपर श्रीलक्ष्मणने शूर्पणखाके नाकको काटा था। नासिक शहरमें 'त्र्यम्बक' नामक महादेव हैं (बोम्बाई गेजेटियार) ॥ 316 ॥ नासिकमें शिवका दर्शन करनेके बाद ब्रह्मगिरि एवं उसके बाद कुशावर्त्तमें आगमन :— नासिके त्र्यम्बक देखि' गेला ब्रह्मगिरि। कुशावर्त्ते आइला याँहा जन्मिला गोदावरी ॥ 317 ॥ अनुवाद—महाप्रभु नासिकमें त्र्यम्बकके दर्शन करके ब्रह्मगिरि गये। और फिर वे कुशावर्त्त आये जो गोदावरी नदीका उद्गम-स्थल है॥ 317 ॥ अनुभाष्य—'कुशावर्त्त'—पश्चिम घाट अथवा सह्याद्रिके कुशट्ट-नामक प्रदेशसे गोदावरीकी मूल धाराएँ उत्पन्न होती हैं। कुशावर्त्त नासिकके निकट स्थित है; किसी- किसीके मतानुसार यह विन्ध्याकी तलहटीमें अवस्थित है॥ 317 ॥ गोदावरीके सप्तशाखाओंके तटोंपर बहुत तीर्थोंका उद्धारकर विद्यानगरमें आगमन :— सप्त गोदावरी आइला करि' तीर्थ बहुतर। पुनरपि आइला प्रभु विद्यानगर ॥ 318 ॥ अनुवाद—बहुतसे तीर्थोंका दर्शन करनेके बाद महाप्रभु सप्त गोदावरी आये। और अन्तमें फिर वे विद्यानगर लौट आये ॥ 318 ॥ अनुभाष्य—गोदावरीके उत्पत्ति-स्थानसे वर्तमान हैदराबादके उत्तर-अंशसे होते हुए 'वस्तार' होकर उत्तर-सर्कार्समें कलिङ्गदेशमें पहुँचे ॥ 318 ॥ महाप्रभुके साथ श्रीरामानन्द रायका मिलन :— रामानन्द राय शुनि' प्रभुर आगमन। आनन्दे आसिया कैल प्रभुसह मिलन ॥ 319 ॥ दण्डवत् हञा पड़े चरणे धरिया। आलिङ्गन कैल प्रभु ताँरे उठाञा ॥ 320 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायको महाप्रभुका विद्यानगरमें आगमनका समाचार मिला, तो वे बड़े आनन्दित होकर महाप्रभुसे मिलनेके लिये आये। आकर श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके चरणकमलोंमें दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया ॥ 319-320 ॥ दोनोंका प्रेमानन्द और इष्टगोष्ठी :— दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन। प्रेमानन्दे शिथिल हैल दुँहाकार मन ॥ 321 ॥ कतक्षणे दुइ जना सुस्थिर हञा। नाना इष्टगोष्ठी करे एकत्र बसिया ॥ 322 ॥ अनुवाद—दोनों एक-दूसरेको मिलकर प्रेमावेशमें रोने लगे और प्रेमानन्दमें दोनोंका मन शिथिल हो गया। कुछ समयके बाद सुस्थिर होकर दोनों एक साथ बैठे। तब उन्होंने अनेक विषयोंपर चर्चा की ॥ 321-322 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपनी तीर्थयात्राके वृत्तान्तका वर्णन और संगृहीत दोनों ग्रन्थ प्रदान :— तीर्थयात्रा-कथा प्रभु सकल कहिला। कर्णामृत, ब्रह्मसंहिता, —दुइ पुँथि दिला ॥ 323 ॥ 396 ।
नौवाँ अध्याय 9/323-333 ] अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायको अपनी तीर्थ यात्राका पूर्ण वृत्तान्त सुनाया और अपने साथ लायी हुई कर्णामृत एवं ब्रह्मसंहिता—नामक दो पुस्तकें उन्हें प्रदान कीं॥ 323 ॥ प्रभु कहे,—“तुमि ये 'प्रेम-सिद्धान्त' कहिले। एइ दुइ पुस्तके सेइ रसेर साक्षी दिले॥" 324 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “तुमने जिस 'प्रेम-सिद्धान्त' का वर्णन किया था, ये दोनों ग्रन्थ उस रसके साक्षी हैं॥" 324 ॥ रायेर आनन्द हैल पुस्तक पाइया। प्रभु-सह आस्वादिल, राखिल लिखिया ॥ 325 ॥ अनुवाद—उन दोनों ग्रन्थोंको प्राप्त करके श्रीरामानन्द रायको बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने महाप्रभुके साथ उन दोनों ग्रन्थोंका आस्वादन किया तथा उनकी नकल करके रख ली॥ 325 ॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंका समागम :— 'गोसाञि' आइला', ग्रामे हैल कोलाहल। प्रभुके देखिते लोक आइल सकल ॥ 326 ॥ अनुवाद— 'गोसाईं आये हैं'—यह समाचार सुनकर विद्यानगर ग्राममें कोलाहल हो गया। सभी लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आने लगे॥ 326 ॥ अनुभाष्य— 'गोसाञि'—श्रीचैतन्य गोसाईं ॥ 326 ॥ बहिरङ्ग-लोगोंको देखकर श्रीरामानन्द राय और महाप्रभुका अपने-अपने कार्यके लिये प्रस्थान :— लोक देखि' रामानन्द गेला निजघरे। मध्याह्न उठिला प्रभु भिक्षा करिबारे ॥ 327 ॥ अनुवाद—लोगोंकी भीड़को देखकर श्रीरामानन्द राय अपने घर लौट गये और महाप्रभु भी मध्याह्न भोजन करनेके लिये उठ खड़े हुए ॥ 327 ॥ महाप्रभु और श्रीरायका कृष्णकथा-प्रसङ्गमें एक सप्ताह व्यतीत :— रात्रिकाले राय पुनः कैल आगमन। दुइजने कृष्णकथाय कैल जागरण ॥ 328 ॥ दुइजने कृष्णकथा कहे रात्रि-दिने। परम-आनन्दे गेल पाँच-सात दिने ॥ 329 ॥ अनुवाद—रातके समय श्रीरामानन्द राय पुनः महाप्रभुके पास आये। दोनोंने श्रीकृष्णकथामें सारी रात बितायी। इस प्रकार दोनों रात-दिन कृष्णकथा कहते-सुनते रहे और पाँच-सात दिन परमानन्दमें बीते ॥ 328-329 ॥ महाप्रभुकी आज्ञानुसार श्रीरायका पुरीमें जानेके विषयमें बतलाना :— रामानन्द कहे,—“प्रभु, तोमार आज्ञा पाञा। राजाके लिखिलुँ आमि विनय करिया ॥ 330 ॥ राजा मोरे आज्ञा दिल नीलाचले याइते। चलिबार उद्योग आमि लागियाछि करिते ॥" 331 ॥ अनुवाद—तब श्रीरामानन्द रायने कहा, — “प्रभो ! आपकी आज्ञा पाकर मैंने राजाको पत्र लिखा था जिसमें मैंने उनसे राजकार्य छोड़कर नीलाचल जानेकी अनुमतिके लिये विनती की थी। अब राजाने मुझे नीलाचल जानेकी अनुमति प्रदान कर दी है। इसलिये अब मैं नीलाचल जानेकी तैयारी कर रहा हूँ॥" 330-331 ॥ महाप्रभुका विद्यानगरमें आनेका कारण :— प्रभु कहे,—“एथा मोर ए-निमित्ते आगमन। तोमा लञा नीलाचले करिब गमन ॥" 332 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा, — “मेरे यहाँ आनेका यही कारण है। मैं तुम्हें अपने साथ लेकर नीलाचल जाऊँगा ॥" 332 ॥ रायके द्वारा महाप्रभुको पहले पुरी जानेका निवेदन और बादमें स्वयं आनेके लिये सहमति :— राय कहे,—“प्रभु, आगे चल नीलाचले। मोर सङ्गे हाती-घोड़ा, सैन्य-कोलाहले ॥ 333 ॥ । 397
[ ९/३३३-३४४ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दिन-दशे इहा-सबार करि' समाधान। तोमार पाछे पाछे आमि करिब प्रयाण॥" ३३४॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—"प्रभो! आप अभी अकेले ही नीलाचल चले जाइये, क्योंकि मेरे साथ बहुतसे हाथी, घोड़े और सैनिक हैं और इनके कारण बहुत शोर हो रहा है। दस दिनोंमें मैं इन सबकी व्यवस्था कर दूँगा। तब मैं आपके पीछे-पीछे नीलाचल आ जाऊँगा॥" ३३३-३३४॥ महाप्रभुकी सम्मति और पुरीकी ओर गमन :- तबे महाप्रभु ताँरे आसिते आज्ञा दिया। नीलाचले चलिला प्रभु आनन्दित हञा॥ ३३५॥ अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीरामानन्द रायको पुरी आनेकी आज्ञा देकर आनन्दपूर्वक नीलाचलकी ओर चल पड़े॥ ३३५॥ वैष्णवता प्राप्त भक्तोंपर कृपा प्रदर्शन करनेके लिये महाप्रभुका पहलेवाले मार्गसे ही गमन :- येइ पथे पूर्वे प्रभु कैला आगमन। सेइ पथे चलिला देखि, सर्व वैष्णवगण॥ ३३६॥ अनुवाद—जिस मार्गसे महाप्रभु पहले आये थे, उसी मार्गसे ही वे नीलाचलकी ओर गये और मार्गमें सभी वैष्णवोंने उनके दर्शन किये॥ ३३६॥ याँहा याय, लोक उठे हरिध्वनि करि'। देखि' आनन्दित-मन हैला गौरहरि॥ ३३७॥ अनुवाद—महाप्रभु जहाँ भी जाते, उनको देखकर लोग हरिध्वनि करने लगते। यह देखकर श्रीगौरहरिको बहुत आनन्द हुआ॥ ३३७॥ आलालनाथमें आकर श्रीनित्यानन्दादिको वहाँ लानेके लिये अपने सङ्गी कृष्णदासको भेजना :- आलालनाथे आसि' कृष्णदासे पाठाइल। नित्यानन्द-आदि निजगणे बोलाइल॥ ३३८॥ अनुवाद—आलालनाथ पहुँचकर महाप्रभुने कृष्णदासको भेजकर श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि अपने परिकरोंको वहीं बुलवाया॥ ३३८॥ महाप्रभुके दर्शनोंके लिये श्रीनित्यानन्दादिका अति शीघ्रागमन :- प्रभुर आगमन शुनि' नित्यानन्द-राय। उठिया चलिला, प्रेमे थेह नाहि पाय॥ ३३९॥ जगदानन्द, दामोदर-पण्डित, मुकुन्द। नाचिया चलिला, देहे ना धरे आनन्द॥ ३४०॥ अनुवाद—महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रेममें अधीर हो गये और तुरन्त उठकर महाप्रभुसे मिलने चल पड़े। श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित तथा श्रीमुकुन्द भी प्रेमानन्दमें उन्मत्त होकर उनके साथ नाचते हुए चलने लगे॥ ३३९-३४०॥ गोपीनाथाचार्य चलिला आनन्दित हञा। प्रभुरे मिलिला सबे पथे लाग् पाञा॥ ३४१॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्य भी बहुत आनन्दित होकर महाप्रभुसे मिलनेके लिये चले और मार्गमें ही उनका महाप्रभुसे मिलन हुआ॥ ३४१॥ महाप्रभुके द्वारा सबको प्रेम-आलिङ्गन :- प्रभु प्रेमावेशे सबाय कैल आलिङ्गन। प्रेमावेशे सबे करे आनन्द-क्रन्दन॥ ३४२॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें महाप्रभुने उन सबका आलिङ्गन किया और सभी प्रेमाविष्ट होकर आनन्दसे रोने लगे॥ ३४२॥ समुद्रतटपर श्रीसार्वभौमके साथ मिलन :- सार्वभौम भट्टाचार्य आनन्दे चलिला। समुद्रेर तीरे आसि' प्रभुरे मिलिला॥ ३४३॥ सार्वभौम महाप्रभुर पड़िला चरणे। प्रभु ताँरे उठाञा कैल आलिङ्गने॥ ३४४॥ ३९८ ।
नौवाँ अध्याय 9/343-355 ] अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य भी आनन्दित होकर महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल पड़े और समुद्रके तटपर उनका महाप्रभुसे मिलन हुआ। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुको देखते ही उनके चरणोंमें गिर पड़े और महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 343-344 ॥ सभीको साथ लेकर महाप्रभुका श्रीजगन्नाथ-दर्शन और भावावेशमें नृत्य-गीत :- प्रेमावेशे सार्वभौम करिला रोदने। सबा-सङ्गे आइला प्रभु ईश्वर-दरशने ॥ 345 ॥ जगन्नाथ-दरशन प्रेमावेशे कैल। कम्प-स्वेद-पुलकाश्रुते शरीर भासिल ॥ 346 ॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें श्रीसार्वभौम रोने लगे। महाप्रभु सभीको साथ लेकर श्रीजगन्नाथके दर्शन करने गये। श्रीजगन्नाथके दर्शनसे प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुका शरीर कम्प, स्वेद, पुलक और अश्रुओं आदि सात्त्विक भावोंसे व्याप्त हो गया॥ 345-346 ॥ बहु नृत्यगीत कैल प्रेमाविष्ट हञा। पाण्डापाल आइल सबे माला-प्रसाद लञा ॥ 347 ॥ अनुवाद—प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुने बहुत देर तक नृत्य-गान किया। सब पण्डा लोगोंने आकर महाप्रभुको श्रीजगन्नाथकी माला और प्रसाद दिया॥ 347 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाण्डापाल'—श्रीजगन्नाथकी जो पूजा करते हैं, वे—पाण्डा हैं। जो अन्य प्रकारसे टहल करते हैं, अर्थात् मन्दिरके बाहरके कार्योंको देखते हैं, वे—पशुपाल हैं। ये दोनों एक साथ मिलकर 'पाण्डापाल' हुए हैं॥ 347 ॥ महाप्रभुका धैर्य-धारण और श्रीजगन्नाथ-सेवकोंके साथ मिलन :- मालाप्रसाद पाञा प्रभु सुस्थिर हइला। जगन्नाथेर सेवक सब आनन्दे मिलिला ॥ 348 ॥ काशीमिश्र आसि' प्रभुर पड़िला चरणे। मान्य करि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गने ॥ 349 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथकी माला और प्रसाद पाकर महाप्रभुका आवेश दूर हुआ। तब श्रीजगन्नाथके सब सेवक आनन्दसे महाप्रभुसे मिले। श्रीकाशीमिश्र आकर महाप्रभुके चरणोंमें पड़ गये और महाप्रभुने उन्हें सम्मान देते हुए उनका आलिङ्गन किया॥ 348-349 ॥ मध्याह्नमें सगण महाप्रभुको भट्टाचार्यके द्वारा भिक्षादान :- प्रभु लञा सार्वभौम निज-घरे गेला। 'मोर घरे भिक्षा' बलि' निमन्त्रण कैला ॥ 350 ॥ दिव्य महाप्रसाद अनेक आनाइल। पीठा-पाना आदि जगन्नाथ ये खाइल ॥ 351 ॥ मध्याह्न करिला प्रभु निजगण लञा। सार्वभौम-घरे भिक्षा करिला असिया ॥ 352 ॥ भिक्षा कराञा ताँरे कराइल शयन। आपने सार्वभौम करे पादसम्वाहन ॥ 353 ॥ अनुवाद—'आज आप मेरे घरमें भिक्षा ग्रहण कीजिये'—यह कहकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया और उन्हें अपने घर ले गये। पीठा-पाना आदि जो-जो व्यञ्जन श्रीजगन्नाथदेवने खाये थे, श्रीसार्वभौमने बहुतसा वह दिव्य महाप्रसाद मँगवाया। महाप्रभु अपने परिकरोंके साथ श्रीसार्वभौमके घरपर आये और सभीने भोजन किया। भोजन कराके श्रीसार्वभौमने महाप्रभुको विश्रामके लिये लिटाया और स्वयं उनके चरण दबाने लगे॥ 350-353 ॥ भट्टाचार्यके घरमें रात्रिमें वास और सभीको तीर्थयात्राके वृत्तान्तका वर्णन :- प्रभु ताँरे पाठाइल भोजन करिते। सेइ रात्रि ताँर घरे रहिला ताँर प्रीते ॥ 354 ॥ सार्वभौम-सङ्गे आर लञा निजगण। तीर्थयात्रा-कथा कहि' कैल जागरण ॥ 355 ॥ । 399
[ 9/354-359 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको सार्वभौम—हे देव! इसलिये मैंने आपसे निवेदन भोजन करनेके लिये भेज दिया और उस रात उनकी किया था, वे अवश्य ही आपसे मिलनेके योग्य हैं। प्रसन्नताके लिये उन्हींके घरमें रह गये। महाप्रभुने श्रीकृष्णचैतन्य—कुछ वैष्णव भी दिखे थे, वे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और अपने परिकरोंके साथ अपनी नारायणके ही उपासक हैं, अन्य कुछ तत्त्ववादी भी थे तीर्थ-यात्राका वृत्तान्त बतलाते हुए सारी रात जागरण जो उनके समान हैं, परन्तु उनका मत निर्दोष नहीं है। किया॥ 354-355॥ अन्य अधिकांश तो शैव ही हैं और पाखण्डी तो बड़ी संख्यामें महाप्रबल हैं, किन्तु मुझे तो रामानन्दका मत महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्दकी प्रशंसा :— ही रुचिकर लगा॥”355-357॥ प्रभु कहे,—“एत तीर्थ कैलुँ पर्यटन। तोमा-सम वैष्णव ना देखिलुँ एकजने॥ 356॥ महाप्रभुकी तीर्थयात्राका वृत्तान्त इस ग्रन्थमें संक्षेपमें ही वर्णित :— एक रामानन्द राय बहु सुख दिल।” तीर्थयात्रा-कथा एइ कैलुँ समापन। भट्ट कहे,—“एइ लागि’ मिलिते कहिल॥” 357॥ संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय वर्णन॥ 358॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे कहा,— अनुवाद—(ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी “मैंने इतने तीर्थोंमें भ्रमण किया, किन्तु आपके जैसा कह रहे हैं—) मैं महाप्रभुकी तीर्थयात्राकी कथाको यहीं एक भी वैष्णव मुझे दिखायी नहीं दिया। हाँ, एक समाप्त करता हूँ। मैंने संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया रामानन्दरायने मुझे बहुत आनन्द प्रदान किया।” श्रीसार्वभौम है, क्योंकि विस्तारपूर्वक इसका वर्णन नहीं किया जा भट्टाचार्यने कहा,—“इसलिये मैंने आपको उनसे मिलनेकी सकता॥ 358॥ प्रार्थना की थी॥” 356-357॥ अनुभाष्य—इस अध्यायकी 74 संख्यामें “शियालीते अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम और श्रीकृष्णचैतन्यका भैरवी देवी करि’ दरशन” पाठके स्थानपर “शियालीते वार्त्तालाप श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके आठवें अङ्कमें इस श्रीभू-वराह करि’ दरशन” होगा। शियाली एवं चिदम्बरमके प्रकार लिखा हुआ है, जैसे- निकट सुविख्यात ‘श्रीमुञ्चम्’–मन्दिर है। वहाँ श्रीकृष्णचैतन्यः। सार्वभौम ! एतावद्दूरं पर्यटितम्; भवत्सदृशः श्रीभू-वराहदेवका विग्रह है। चिदम्बरम् तालुकाके अन्तर्गत कोऽपि न दृष्टः, केवलमेव रामानन्दरायः, स तु अलौकिक दक्षिण–आर्कट् जिलेमें शियालीके निकटमें ‘श्रीभू-वराहदेव’ एव भवति। ही विराजमान हैं, ‘भैरवीदेवी’ नहीं॥ 358॥ सार्वभौमः। देव ! अतएव निवेदितं—सोऽवश्यमेव द्रष्टव्य इति। चैतन्यलीला-वर्णन करनेकी ग्रन्थकारकी लालसा :— श्रीकृष्णचैतन्यः। कियन्त एव वैष्णवा दृष्टास्तेऽपि नारायणोपासका अनन्त चैतन्यलीला कहिते ना जानि। एव; अपरे तत्त्ववादिनस्ते तथाविधा एव निरवद्यं न भवति लोभे लज्जा खाञा तार करि टानाटानि॥ 359॥ तेषां मतम्; अपरे तु शैवा एव बहवः, पाषण्डास्तु महाप्रबला भूयांस एव। किन्तु भट्टाचार्य! रामानन्द-मतमेव मे रुचितम्।” अनुवाद—महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन्हें अर्थात् श्रीकृष्णचैतन्य—हे सार्वभौम ! मैं इतनी दूर कहनेका सामर्थ्य मुझमें नहीं है। तथापि लोभवशतः तक घूमते हुए गया, किन्तु आपके समान कोई नहीं लज्जाको खाकर अर्थात् निर्लज्ज होकर मैं उन दिखा, केवलमात्र एक रामानन्दराय ही मिले, वे लीलाओंको वर्णन करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ॥ 359॥ अलौकिक ही हैं। 400 ।
नौवाँ अध्याय [right-aligned: 9/359-362 ]
अनुभाष्य— 'लज्जा खाञा'—लज्जाका सिर खाकर (निर्लज्ज होकर); 'तार'—श्रीचैतन्यलीलाका ॥ 359 ॥
महाप्रभुकी तीर्थयात्राके छलसे लोगोंके उद्धारकी कथाके श्रवणका फल :— प्रभुर तीर्थयात्रा-कथा शुने येइ जन। चैतन्यचरणे पाय गाढ़ प्रेमधन ॥ 360 ॥
**अनुवाद—**महाप्रभुकी तीर्थ-यात्राकी कथाको जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, उसे महाप्रभुके चरणोंमें गाढ़ प्रेमधनकी प्राप्ति होती है ॥ 360 ॥
**अनुभाष्य—**निर्विशेषवादी पञ्चोपासक लोग जगत्में अपने जड़ेन्द्रिय-ज्ञानके अनुरूप परम-तत्त्वके किसी रूपकी कल्पना करके उसे उपास्य मान लेते हैं, किन्तु श्रीमद्भागवत अथवा श्रीकृष्णचैतन्यदेव वैसी इन्द्रिय-भोगमयी उपासनाको 'परमार्थ' नहीं कहते। मायावादी अहंग्रहोपासक परम-तत्त्वको निराकार मानते हैं और उनके जितने भी रूप कहे जाते हैं, वे सब आकाश-कुसुमकी भाँति काल्पनिक हैं। मायावादी और परम-तत्त्वके काल्पनिक रूपकी उपासना करनेवाले, दोनों ही भ्रान्त हैं। उनके विचारके अनुसार भगवान्के श्रीविग्रह अथवा उनके किसी अन्य रूपकी उपासना बद्धजीवका भ्रम है। परन्तु श्रीगौरसुन्दरने श्रीमद्भागवतके प्रतिपाद्य अचिन्त्य-भेदाभेद-विचारके अनुसार वैसे कर्मी, ज्ञानी और योगियोंकी अनुभूतिकी अकर्मण्यताको (निकम्मेपनको) प्रदर्शित किया है। महाप्रभुने सर्वत्र तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मन्दिरोंमें भगवान्के नाम रूप-गुण-लीलाका परिचय देनेवाली भगवद्-वस्तुका ही दर्शन किया था। वैष्णव लोग जब शिवादि विभिन्न देवताओंके मन्दिरमें उनके दर्शन करते हैं, तो उनका दर्शन अवैष्णवोंके दर्शनसे भिन्न होता है, इसे बतानेके लिये ही महाप्रभुने वहाँ अधोक्षज वस्तुका ही दर्शन किया। आत्मवृत्तिसे अधोक्षज वस्तुका दर्शन और जड़ेन्द्रियोंके द्वारा मूर्ति-दर्शन, दोनों सम्पूर्ण रूपसे विपरीत भावमें अवस्थित हैं,—यही गौर-दासोंका अनुसरणीय विषय हैं। श्रीकृष्णकी परिकर गोपियोंकी कात्यायनीकी पूजाका लक्ष्य गोपीजनवल्लभको उपपति रूपमें पाना था। प्राकृत सहजिया लोग “महामाया” आदि अनेकानेक देवताओंको भोग प्रदान करनेवाले यन्त्रके रूपमें देखते हैं, इसलिये वे अपने इन देवी-देवताओंकी पूजाके साथ गोपियोंकी पूजाको 'एक' अथवा 'समान' मानकर विवर्त्तवादके गड्ढेमें गिरते हैं। श्रौतपन्था अर्थात् गुरु-परम्पराको समझ नहीं पानेके कारण तर्कपन्थी पञ्चोपासना विधिका प्रचार करते हैं। (विष्णु, शिव, दुर्गा, गणेश और सूर्य) पाँच उपास्य देवताओंमेंसे अन्योंका त्यागकर एकको ही 'परमेश्वर' मानकर उनको भी विश्वमें निर्विशेष ब्रह्मका प्रतीक मानकर जो दर्शन है, वही 'पञ्चोपासना' है। वैसा दर्शन मूर्तिपूजाके ही अन्तर्गत है, वही बादमें मायावादियोंके निर्विशेषवादमें परिणत हुआ है। श्रीकृष्ण दर्शनके अभावके कारण ही जीव अवैष्णव होकर पञ्चोपासक बनता है, और कभी नास्तिक बनता है। किन्तु महाप्रभुने शुद्धभक्तोंके विषयमें कहा है,—“स्थावर जङ्गम देखे, ना देखे तार (स्थावरजङ्गमरे) मूर्ति। सर्वत्र स्फुरये ताँर इष्टदेव मूर्ति॥” अर्थात् न तो उन्हें स्थावर-जङ्गम दिखायी देता है, न ही उनकी मूर्ति (आकार) दिखायी देती है, बस सर्वत्र उन्हें अपने इष्टदेवकी ही स्फूर्ति होती है ॥ 360 ॥
श्रीकृष्णचैतन्यमें दृढ़-श्रद्धा और छलरहित मनसे हरि-सङ्कीर्त्तन ही जीवोंका एकमात्र परमधर्म :— चैतन्यचरित शुन श्रद्धा-भक्ति करि'। मात्सर्य छाड़िया मुखे बल 'हरि' 'हरि' ॥ 361 ॥
**अनुवाद—**हे श्रोताओं! महाप्रभुके चरित्रका श्रद्धा-प्रेम सहित श्रवण कीजिये और मात्सर्यकी भावनाको त्यागकर मुखसे 'हरि' 'हरि' सङ्कीर्तन कीजिये ॥ 361 ॥
इसे छोड़कर “नान्य पन्था विद्यतेऽयनाय” :— एइ कलिकाले आर नाहि कोन धर्म। वैष्णव, वैष्णवशास्त्र, एइ कहे मर्म ॥ 362 ॥
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[ 9/361-365 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस कलिकालमें श्रीहरिनाम सङ्कीर्त्तनके नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त॥ अतिरिक्त और कोई भी धर्म नहीं है। सभी वैष्णव एवं श्रीश्रीचैतन्यचन्द्रकी लीलाका असमोर्द्ध गाम्भीर्य वैष्णव शास्त्रोंकी कथाका यही सार है॥ 362 ॥ और ग्रन्थकारका सहज दैन्य :— अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य जीवोंके प्रति स्वाभाविक चैतन्यचन्द्रेर लीला—अगाध, गम्भीर। दयाके साथ अर्थात् उनके प्रति ईर्ष्यावृत्ति (भोगबुद्धिके प्रवेश करिते नारि,—स्पर्शि रहि' तीर ॥ 363 ॥ कारण उन्हें श्रीकृष्णके वि मुख करनेकी चेष्टा) सम्पूर्ण रूपसे परित्याग करके मुखसे 'हरि' 'हरि' बोलो। (इसके अनुवाद—श्रीचैतन्यचन्द्रकी लीला अगाध एवं गम्भीर अतिरिक्त) इस कलिकालमें अन्य कोई धर्म नहीं (गहरी) है। मैं उसमें प्रवेश नहीं कर सकता, परन्तु है,—शुद्धवैष्णव-सेवा, शुद्धवैष्णव-शास्त्र पाठ करना ही उसके तटपर रहकर केवल उसका स्पर्श कर रहा जीवोंका एकमात्र धर्म है॥ 361-362 ॥ हूँ॥ 363 ॥ नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त॥ श्रीचैतन्यमहाप्रभुके अनुशीलनसे श्रीकृष्णमें प्रीति-प्राप्ति :— अनुभाष्य—वैष्णवों और वैष्णव-शास्त्रोंकी सारकथा चैतन्यचरित श्रद्धाय सुने येइ जन। यह है कि विश्वाससहित भक्तिपूर्वक श्रीचैतन्यलीला यतेक विचारे, तत पाय प्रेमधन ॥ 364 ॥ श्रवण करनेसे जीवोंमें मात्सर्य नहीं रह सकता। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कलिकालमें निर्मत्सर शुद्धजीवोंके लिये श्रीगौरपादाश्रित चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 365 ॥ होकर हरिनाम-कीर्त्तन ही एकमात्र सनातन धर्म है। 'वैष्णव'—शुद्धभक्त महाजन अथवा विद्वत्-अनुभवी; इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे दक्षिणदेशतीर्थ-भ्रमणं 'वैष्णव-शास्त्र'—श्रुति अथवा शब्द प्रमाण; दोनोंका नाम नवम-परिच्छेदः॥ अनुसरण ही श्रौतपन्थामें अवस्थान है। चरम कल्याणकी अनुवाद—श्रीचैतन्यचरितको जो श्रद्धापूर्वक सुनता अकाङ्क्षा रखनेवाले व्यक्तिमात्रके लिये इसके अतिरिक्त है और सुनकर उसपर जितना विचार करता है, उतना अन्य कोई उपाय नहीं है। (भाः 11/19/17)— ही उसे महाप्रभुके चरणोंमें प्रेमरूपी धन प्राप्त होता है। “श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम्। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते॥” करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन अर्थात् “श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य (इतिहास) और कर रहा है॥ 364-365 ॥ अनुमान—इन चार प्रमाणोंके द्वारा स्वर्गादि-भोगरूप सभी विकल्पोंका सर्वकालिक अवस्थानका अभाव अर्थात् श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें दक्षिणदेश-तीर्थ-भ्रमण इनकी नश्वरता दिखायी देनेपर जीव इनसे विरक्त हो नामक नौवें अध्यायका अनुवाद समाप्त॥ जाता है॥” 361-362 ॥ 402 ।
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दसवाँ अध्याय कथासार-महाप्रभुने जब दक्षिण भारतकी यात्राके लिये गये, तब उनके विषयमें श्रीसार्वभौमके साथ राजा प्रतापरुद्रकी बहुत बातचीत हुई। राजाने महाप्रभुके दर्शन करनेकी अभिलाषा प्रकट की। तब श्रीसार्वभौमने कहा था कि महाप्रभुके लौटकर आनेपर वे उनके साथ किसी प्रकारसे साक्षात्कार करा देंगे। महाप्रभु लौटकर आनेके बाद काशीमिश्रके घरमें रहने लगे। श्रीसार्वभौमने श्रीमहाप्रभुके साथ क्षेत्रवासी वैष्णवोंका परिचय करा दिया। श्रीरामानन्द रायके पिता श्रीभवानन्द रायने अपने पुत्र श्रीवाणीनाथ पट्टनायकको महाप्रभुको सौंप दिया। जब महाप्रभुने काला कृष्णदासके भट्टथारिसे मिलनके दोषको व्यक्त करके उसे विदायी देनेका प्रस्ताव रखा, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु और अन्यान्य भक्तोंने युक्ति करके, उसके द्वारा श्रीनवद्वीपमें एवं गौड़देशमें सर्वत्र महाप्रभुके लौट आनेका संवाद भिजवाया। नवद्वीपादि स्थानोंपर संवाद पहुँचनेपर भक्त लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आनेके लिये तैयारी करने लगे। इसी समय श्रीपरमानन्दपुरीने नदीया-नगरमें आकर जब महाप्रभुके नीलाचलमें पहुँचनेका संवाद श्रवण किया, तब वे ब्राह्मण कमलाकान्तको साथ लेकर पुरुषोत्तम क्षेत्रमें महाप्रभुके पास पहुँचे। नवद्वीपवासी पुरुषोत्तम भट्टाचार्य वाराणसीमें 'चैतन्यानन्द' नामक गुरुसे संन्यास ग्रहण करके 'स्वरूप' नाम ग्रहण करके नीलाचलमें महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित हुए। श्रीईश्वरपुरीके अप्रकट होनेके बाद उनके सेवक 'गोविन्द' उनकी आज्ञासे महाप्रभुके पास आये। केशव-भारतीके सम्पर्कसे ब्रह्मानन्द-भारती महाप्रभुके पूजनीय थे; उनके उपस्थित होनेपर महाप्रभुने कृपा करके उनका चर्म्माम्बर (चमड़ेका वस्त्र) छुड़वाया। महाप्रभुके प्रभावसे ब्रह्मानन्दने महाप्रभुके माहात्म्यको जानकर उन्हें 'कृष्ण' मानकर स्वीकार किया। जब श्रीसार्वभौमने महाप्रभुको 'कृष्ण' कहकर निर्देश किया, तब महाप्रभुने उनकी बातको 'अतिस्तुति' कहकर उस बातका अनादर किया। (इसी बीच एकदिन) काशीश्वर गोस्वामी आकर उपस्थित हुए। इस अध्यायमें, समुद्रमें नद-नदी-मिलनकी भाँति महाप्रभुके साथ बहुतसे देशोंके भक्तोंके मिलनका वर्णन हुआ है। —(अमृतप्रवाहभाष्य) भक्तोंके जीवनधन श्रीगौरको प्रणाम :— तं वन्दे गौरजलदं स्वस्य यो दर्शनामृतैः। विच्छेदावग्रम्लान-भक्तशस्यान्यजीवयत् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने अपने दर्शनामृत-वर्षणके द्वारा विच्छेदरूप अकालके द्वारा मुरझाये हुए भक्तरूपी धान्योंको जीवित किया था, उन गौररूप मेघकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यः (श्रीकृष्णचैतन्यदेवः) स्वस्य (निजश्रीमूर्त्तेः) दर्शना- मृतैः (निजदर्शनान्येव अमृ़तानि पीयूषाणि तैः) विच्छेदावग्रम्लानभक्तशस्यानि (विच्छेदः अनुपस्थितिजन्य-विरहः एव अवग्रहः वर्षणाभावः तेन म्लानानि भक्तरूप-शस्यानि) अजीवयत् (प्राणदानेन रक्षयामास) तं गौरजलदं (श्रीचैतन्यमेघम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, समस्त श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ 2 ॥ । 405
[ 10/3-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके दक्षिण भ्रमणके समय राजाप्रतापरुद्र और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका वार्त्तालाप :- पूर्वे यबे महाप्रभु चलिला दक्षिणे। प्रतापरुद्र राजा तब बोलाइल सार्वभौमे॥ ३॥ राजाके द्वारा महाप्रभुके परिचयकी जिज्ञासा और उनके दर्शनकी आकाङ्क्षा :- बसिते आसन दिल करि' नमस्कारे। महाप्रभुर वार्त्ता तब पुछिल ताँहारे॥ ४॥ “शुनिलाङ तोमार घरे एक महाशय। गौड़ हइते आइला, तेंहो-महा-कृपामय॥ ५॥ तोमारे बहु कृपा कैला, कहे सर्वजन। कृपा करि' कराह मोरे ताँहार दर्शन॥" ६॥ अनुवाद-महाप्रभु जब दक्षिण भारतकी यात्राके लिये चले गये, तब राजा प्रतापरुद्रने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने महलमें बुलवाया था। उनके आनेपर महाराज प्रतापरुद्रने उन्हें प्रणाम किया और बैठनेके लिये आसन दिया। तब वे श्रीसार्वभौमसे महाप्रभुके सम्बन्धमें पूछने लगे,-“मैंने सुना है कि गौड़देशसे एक महापुरुष आये हैं और वे आपके घरमें रह रहे हैं। मैंने यह भी सुना है कि वे महा-कृपालु हैं और लोग कह रहे हैं कि उन्होंने आपपर बहुत कृपा की है। इसलिये आप कृपा करके मुझे भी उनके दर्शन करा दीजिये॥" ३-६॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुके आचरणका वर्णन :- भट्ट कहे,-“ये शुनिला सब सत्य हय। ताँर दर्शन तोमार घटन ना हय॥ ७॥ विरक्त संन्यासी तेंहो रहेन निर्जने। स्वप्नेह ना करेन तेंहो राजदरशने॥ ८॥ तथापि प्रकारे तोमा कराइताम दरशन। सम्प्रति करिला तेंहो दक्षिण गमन॥" ९॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-“आपने जो सुना है, वह सब सत्य है, परन्तु आपको उनके दर्शन नहीं मिलेंगे। यद्यपि वे एकान्तमें वास करनेवाले विरक्त संन्यासी हैं और वे स्वप्नमें भी राजाका दर्शन नहीं करते, तथापि मैं आपको किसी प्रकार उनका दर्शन कराता, परन्तु अभी तो वे दक्षिण भारतकी यात्रापर गये हुए हैं॥" ७-९॥ राजाके द्वारा महाप्रभुके पुरुषोत्तम परित्याग करनेके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे, - "जगन्नाथ छाड़ि' केने गेला।" भट्ट कहे, - "महान्तेर एइ एक लीला ॥ १०॥ भट्टाचार्यका सद्-उत्तर :- तीर्थ पवित्र करिते करे तीर्थभ्रमण। सेइ छले निस्तारये सांसारिक जन॥ ११॥ अनुवाद-यह सुनकर राजाने कहा,-“वे श्रीजगन्नाथ पुरीको छोड़कर क्यों गये?" श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-"महापुरुषोंकी यह एक लीला है, वे तीर्थोंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे तीर्थोंमें भ्रमण करते हैं। इस बहानेसे वे तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए सांसारिक लोगोंका उद्धार कर रहे हैं॥ १०-११॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/39 संख्या देखें और (भाः 4/30/37)- “तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया। भीतस्य किं न रोचेत तावकानां समागमः ॥" अर्थात् “प्रचेतागण श्रीजनार्दनसे बोले,-हे भगवन्! आपके भक्त सभी तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये पैदल ही भ्रमण करते हैं। इसलिये संसारसे भयभीत किस व्यक्तिके लिये उनका समागम रुचिकर नहीं होगा?" ॥ १०-११॥ श्रीमद्भागवत (1/13/10)- भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता॥ १२॥ अनुवाद-आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। आप लोग अपने अन्तःस्थित भगवान्की पवित्रताके 406 ।
दसवाँ अध्याय 10/12-20 ] बलसे पापियोंके पापोंसे मलिन सभी तीर्थोंको पवित्र करते हैं॥12॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/63 संख्या देखें॥12॥ दीनजनोंका उद्धार करना ही महान्त लोगोंका स्वभाव है, उसपर भी वे स्वेच्छामय परमेश्वर हैं :- वैष्णवेर हय एइ एक स्वभाव निश्चल। तेंहो जीव नहेन, हन स्वतन्त्र ईश्वर ॥”13 ॥ अनुवाद-वैष्णवोंका ऐसा ही निश्चल स्वभाव होता है और वे तो जीव नहीं, स्वतन्त्र ईश्वर हैं॥13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैष्णवोंका यह एक अचल स्वभाव है—‘तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये तीर्थभ्रमण और उसके छलसे सांसारिक लोगोंका उद्धार करना।' वास्तवमें श्रीकृष्णचैतन्य-‘जीव' नहीं हैं, वे-स्वतन्त्र ईश्वर हैं, तथापि उन्होंने गुप्तरूपसे भक्तावतार होकर वैष्णवों जैसा स्वभाव ग्रहण किया है॥"13॥ अनुभाष्य-श्रीभागवतगण तीर्थोंमें जाकर उन्हें पवित्र करते हैं और तीर्थमें जानेके बहानेसे तीर्थवासी सांसारिक लोगोंका उद्धार करते हैं—यही परदुःख-दुःखी (दूसरोंके दुःखमें दुःखी) शुद्धभक्तोंका नित्य स्वभाव है। किन्तु श्रीमहाप्रभु परतन्त्र भक्तरूपमें लीला करनेपर भी स्वयं स्वतन्त्र परमेश्वर हैं। 'निश्चल'–अचल, सनातन, नित्य ॥ 13 ॥ राजाके द्वारा भट्टाचार्यसे शिकायत :- राजा कहे,-"ताँरे तुमि याइते केने दिले? पाय पड़ि' यत्न करि' केने ना राखिले ? ॥" 14 ॥ अनुवाद-तब राजा प्रतापरुद्रने कहा, - "आपने उनको जाने क्यों दिया ? उनके चरणोंमें पड़कर आग्रह करके उन्हें रोक क्यों नहीं लिया ? ॥"14॥ राजाको वैधभक्तके भाँति श्रीभट्टाचार्यका उत्तर देना :- भट्टाचार्य कहे,- “तेंहो स्वयं ईश्वर स्वतन्त्र। साक्षात् श्रीकृष्ण, तेंहो नहे परतन्त्र ॥ 15 ॥ तथापि राखिते ताँरे महायत्न कैलुँ। ईश्वरेर स्वतन्त्र भाव, राखिते नारिलुँ ॥”16 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उत्तर दिया, - "वे स्वयं ईश्वर और परम स्वतन्त्र हैं। वे साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, वे परतन्त्र नहीं हैं। तथापि मैंने उन्हें रोकनेका बहुत प्रयास किया, परन्तु भगवान्की अपनी स्वतन्त्र इच्छा है, मैं उन्हें रोक नहीं पाया ॥"15-16 ॥ महापण्डित भट्टाचार्यके वचनोंपर राजाका विश्वास :- राजा कहे,- "भट्ट, तुमि विज्ञशिरोमणि । तुमि ताँरे 'कृष्ण' कह, ताते सत्य मानि ॥ 17 ॥ राजाकी एक बार महाप्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षा :- पुनरपि इँहा ताँर हैले आगमन। एकबार देखि' करि सफल नयन ॥”18॥ अनुवाद-राजाने कहा, - "हे भट्टाचार्य ! आप विद्वानोंमें शिरोमणि हैं। आप उन्हें साक्षात् 'श्रीकृष्ण' कह रहे हैं, तो मैं इसे सत्य मानता हूँ। जब वे यहाँ लौटकर आयेंगे, तब उनका एकबार दर्शन करके मैं भी अपने नेत्रोंको सफल करना चाहता हूँ ॥"17-18 ॥ अनुभाष्य-महाजनके वाक्यमें विश्वास करनेसे राजाका मङ्गल और उनमें भक्तिका उदय हुआ॥ 17 ॥ महाप्रभुके शीघ्र आनेके समाचारका ज्ञापन और राजाको महाप्रभुके योग्य वास-स्थानके निर्देशका अनुरोध :- भट्टाचार्य कहे,- “तेंहो आसिबे अल्पकाले। रहिते ताँर एक स्थान चाहिये विरले ॥ 19 ॥ ठाकुरेर निकट, आर हइबे निर्जने। एमत निर्णय करि' देह' एक स्थाने ॥"20 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - "वे शीघ्र ही लौट आयेंगे, किन्तु उनके रहनेके लिये एक एकान्त और शान्त स्थानकी आवश्यकता है। वह स्थान ठाकुरके (श्रीजगन्नाथके) मन्दिरके निकट हो और एकान्त भी हो, इस विषयपर विचार करके आप एक स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये ॥"19-20 ॥ ॥ 407
[ 10/21–26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला राजाके द्वारा काशीमिश्रके भवनका निर्देश :- राजा कहे,—“ऐछे काशीमिश्रेर भवन। ठाकुरेर निकट, हय परम निर्जन॥” २१॥ अनुवाद—राजाने कहा,—“ऐसा स्थान तो काशीमिश्रका घर है। वह श्रीजगन्नाथ-मन्दिरके निकट तथा अत्यन्त निर्जन-शान्त स्थान है॥” २१॥ अनुभाष्य—‘काशीमिश्रेर भवन’—श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें मन्दिरसे कुछ दक्षिणकी ओर बालिसाहिके अन्तर्गत वर्तमान श्रीराधाकान्त मठ है; श्रीमन्महाप्रभु वहाँ वास करते थे। श्रीवक्रेश्वर पण्डितके शिष्य श्रीगोपालगुरु थे और उनके शिष्य श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामीने वहाँ श्रीविग्रह स्थापित किये थे। वह स्थान श्रीजगन्नाथदेव-मन्दिरके निकटमें है और उस समय वह निर्जन स्थान था॥ २१॥ राजाकी महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा :- एत कहि’ राजा रहे उत्कण्ठित हञा। भट्टाचार्य काशीमिश्रे कहिल आसिया॥ २२॥ अनुवाद—ऐसा कहकर राजा उत्कण्ठित होकर महाप्रभुके लौटनेकी प्रतीक्षा करने लगे। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीकाशीमिश्रके पास आकर उन्हें राजाकी इच्छा बतलायी॥ २२॥ काशीमिश्रको राजाका आदेश बताना और सुनकर मिश्रका आनन्द :- काशीमिश्र कहे,—“आमि बड़ भाग्यवान्। मोर गृहे ‘प्रभुपादेर’ हवे अवस्थान॥” २३॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीकाशीमिश्रने कहा,—“मैं बहुत भाग्यवान् हूँ। मेरे घरमें ‘प्रभुपाद’ (महाप्रभु) वास करेंगे॥” २३॥ अनुभाष्य—स्वयं भगवान् श्रीमन्महाप्रभुको उनके दासका अभिमान रखनेवाले जीवमात्र ही ‘प्रभुपाद’ कहकर पुकारते हैं। श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु और श्रीमद् अद्वैत प्रभु—ये दोनों भी उसी प्रकार ‘प्रभुपाद’के नामसे कहे जाते हैं, क्योंकि सभी विषय-विग्रह विष्णुतत्त्व हैं एवं विष्णु ही जीवोंके नित्य प्रभु हैं। और भी, श्रीकृष्णतत्त्ववेत्ता आश्रय-विग्रह श्रीगुरुदेव भी लघु-शिष्यके लिये साक्षात् ‘कृष्णचैतन्य’ अथवा ‘हरि’ स्वरूप होनेके कारण ‘ॐ विष्णुपाद’ कहलाते हैं। श्रीगुरुदेवके अतिरिक्त अन्यान्य शुद्धभक्तों अथवा शुद्ध-वैष्णवोंको उनके सभी शिष्य-स्थानीय जीव ‘श्रीपाद’के नामसे बुलाते हैं। किन्तु श्रीगुरुदेव और वैष्णव एवं उनके द्वारा अङ्गीकार किये गये शिष्य, सभी एक-दूसरेको पूज्य-द्योतक ‘प्रभु’ शब्दके द्वारा सम्बोधन करते हैं। इसी सत् सिद्धान्तका प्रचुर व्यवहार भागवत, चैतन्यचरितामृत, चैतन्यभागवतादि प्रमाणिक ग्रन्थों और शुद्धभक्त-सम्प्रदायमें देखा जाता है। प्राकृत-सहजिया वैष्णव कहलाने योग्य नहीं हैं। उनके सम्प्रदायमें तथाकथित गोस्वामियों और उनके मूर्ख शिष्योंके द्वारा मुखसे अपनेको ‘वैष्णव-दासानुदास’, ‘वैष्णव-दासाभास’ कहना दीनताकी आड़में छल या कपटता है। उनका कहना है कि जात-गोस्वामी ही ‘प्रभुपाद’ कहलानेके अधिकारी हैं। जाति-बुद्धिकी प्रबलताके कारण वे यथार्थ श्रीकृष्णतत्त्वविद् गुरु अथवा वैष्णवोंमें मर्त्य-बुद्धि रखकर उनको ‘प्रभुपाद’ सम्बोधनके योग्य नहीं मानते,—यह उनके दुर्भाग्यका परिचायक और नरककी यात्राका सहायक मात्र है॥ २३॥ पुरीवासियोंकी महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा :- एइमत पुरुषोत्तमवासी सर्वजन। प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठित मन॥ २४॥ सेवाकी उत्कण्ठा ही भक्त और भगवान्के मिलनका सूत्र; महाप्रभुका दक्षिणसे आगमन :- सर्वलोकेर उत्कण्ठा यबे अत्यन्त बाड़िल। महाप्रभु दक्षिण हैते त्वराय आइल॥ २५॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये सभीकी भट्टाचार्यसे प्रार्थना :- शुनि’ आनन्दित हैल सबाकार मन। सबे आसि’ सार्वभौमे कैल निवेदन॥ २६॥ 408 ।