श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1231, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय [right] 9/261-263 ] [बायाँ स्तम्भ] शुद्ध श्रवण-कीर्तनके फलसे ही श्रीकृष्णप्रेम :- श्रवण-कीर्त्तन हइते कृष्णे हय 'प्रेम'। सेइ पञ्चम पुरुषार्थ-पुरुषार्थेर सीमा ॥ 261 ॥ **अनुवाद—**श्रवण-कीर्तनादि नवधा भक्तिके अङ्गोंका पालन करनेसे श्रीकृष्णमें प्रेम होता है। यह प्रेम ही पाँचवाँ पुरुषार्थ है, जो सभी पुरुषार्थोंकी चरम सीमा है॥ 261 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रवण-कीर्तनरूपी नौ प्रकारकी साधनभक्तिसे श्रीकृष्णमें जिस प्रेमभक्तिका उदय होता है, वही 'पाँचवाँ'-पुरुषार्थ है और वही पुरुषार्थोंकी सीमा है। तात्पर्य यह है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, -ये चारों 'सकैतव' (छलयुक्त) पुरुषार्थ हैं; प्रेमरूप पुरुषार्थ ही 'अकैतव' (छलरहित) पुरुषार्थ है॥ 261 ॥ **अनुभाष्य—**धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चार पुरुषार्थ हैं। 'श्रीकृष्णप्रेम'—इन चारों पुरुषार्थोंसे परे 'पाँचवाँ'-पुरुषार्थ है और सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। श्रीकृष्णनाम-श्रवण-कीर्तनादिसे ही श्रीकृष्णप्रेम उदित होता है। अन्य प्रकारकी भक्तिका आचरण करनेपर भी कीर्तनके संयोगसे उनका करना ही कर्त्तव्य है, -यही श्रीमन्महाप्रभुका अभिप्राय है। मध्यलीला 22/105- “नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम 'साध्य' कभु नय। श्रवणादि-शुद्धचित्ते करये उदय। अर्थात् “शुद्ध श्रीकृष्णप्रेम जीवोंके हृदयमें नित्य स्थित है। यह कोई बाहरसे प्राप्त होनेवाली वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण नाम-रूप-गुण-लीलादिके श्रवण-कीर्तनसे शुद्ध हुए चित्तमें श्रीकृष्णप्रेम स्वाभाविक रूपमें उदित होता है॥" 261॥ जातरुचि व्यक्तिके श्रीकृष्णप्रेमका लक्षण :- श्रीमद्भागवत (11/2/40)— एवंव्रतः स्वप्रियनाम-कीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ 262 ॥ [दायाँ स्तम्भ] **अनुवाद—**श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥ 262 ॥ **अनुभाष्य—**आदिलीला 7/94 संख्या देखें॥ 262 ॥ फलभोगतात्पर्यकी निन्दा; काम प्रेमका जनक नहीं :- कर्मनिन्दा, कर्मत्याग, सर्वशास्त्रे कहे। कर्म हैते प्रेमभक्ति कृष्णे कभु नहे ॥ 263 ॥ **अनुवाद—**सभी शास्त्र कर्मकी निन्दा करते और कर्मका त्याग कहते हैं। कर्मसे श्रीकृष्णमें प्रेमभक्तिकी प्राप्ति कभी नहीं होती ॥ 263 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**कर्म-प्रतिपादक शास्त्रोंमें कर्मके उपदेश और प्रशंसा बहुत स्थानोंपर होनेपर भी अन्तमें कर्मकी निन्दा और कर्मके त्यागकी व्यवस्था ही सभी शास्त्रोंमें कही गयी है। कर्म अथवा कर्मार्पणके द्वारा श्रीकृष्णमें कभी भी प्रेमभक्ति नहीं हो सकती। तात्पर्य यह है कि, कर्मार्पणादिके द्वारा चित्त शुद्ध होता है; चित्त शुद्ध होनेपर सत्सङ्गके बलसे अनन्य-श्रीकृष्ण-भक्तिमें श्रद्धाका उदय होता है। श्रद्धाके उदय होनेपर श्रवण-कीर्तनादिरूप 'साधनभक्ति' होती है। श्रवण-कीर्तनादि भक्ति साधन करते-करते अनर्थोंकी जितनी निवृत्ति होती है, प्रेमका उतना ही आविर्भाव होता है। इसलिये कर्म अथवा कर्मार्पणसे निश्चितरूपसे श्रीकृष्णभक्तिके उदित होनेकी सर्वत्र (सर्वदा) सम्भावना नहीं है; क्योंकि (शुद्ध श्रीकृष्णभक्ति) सत्सङ्गजनित 'श्रवणोत्पत्ति'-लक्षणा श्रद्धाकी अपेक्षा रखती है॥ 263 ॥ **अनुभाष्य—**असत्कर्मकी अपेक्षा सत्कर्म श्रेष्ठ हैं; किन्तु सत्कर्मोंसे कभी भी श्रीकृष्णमें प्रेमभक्तिका उदय नहीं होता। कर्म-जीवोंके सुख और दुःखकी प्राप्तिका । 383