श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1230, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 9/250-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य— महाप्रभुके शाङ्कर संन्यास-चिह्नोंको प्रह्लादको 'पुत्र' समझकर यह जिज्ञासा की, - 'तुमने देखकर शुद्धद्वैतवाद परायण तत्त्ववादियोंने पहले तो अपने (तथाकथित) गुरुसे किन-किन विषयोंका अध्ययन महाप्रभुके साथ बातचीत नहीं की, किन्तु बादमें उनका किया है', उसके उत्तरमें अधोक्षज-सेवक श्रीप्रह्लादने प्रेमावेश देखकर उनको वैष्णव समझकर उनका कहा- सत्कार अर्थात् सेवा की थी। तत्त्ववादियोंके अन्तःकरणमें विष्णोः श्रवणं (नामरूपगुणपरिकरलीलामय शब्दानां श्रोत्रस्पर्शः), वैष्णव होनेका अभिमान था, उसे देखकर महाप्रभुने [विष्णोः] कीर्त्तनं (नामरूपगुणपरिकरलीलामय शब्दानां उच्चारणं), थोड़ा हँसकर उनके साथ वार्त्तालाप किया था। महाप्रभुने [विष्णोः] स्मरणं (नामरूपगुणपरिकरलीलामयकृष्णस्य कहा,- 'मैं साध्य-साधन भली-भाँति नहीं जानता हूँ; यत्किञ्चिन्नमनुसानुसन्धानं), [विष्णोः] पादसेवनं (कालदेशा- आप लोग कृपा करके मुझे उसकी शिक्षा प्रदान करें।' द्युचितपरिचर्या), [विष्णोः] अर्चनं (पूजनं), [विष्णोः] वन्दनं तत्त्वाचार्यने उत्तर दिया,- 'वर्णाश्रमधर्म श्रीकृष्णमें समर्पित (नमस्कारः), [विष्णोः] दास्यं (तद्दासोऽस्मीत्यभिमानः) [विष्णोः] करना ही श्रीकृष्णभक्तका श्रेष्ठ साधन है एवं उस सख्यं (बन्धुभावेन तत्-हिताशंसनं), [विष्णौ] आत्मनिवेदनं साधन-बलसे श्रेष्ठ साध्यरूपी पाँच प्रकारकी मुक्ति प्राप्त (देहादि-शुद्धात्मपर्यन्तस्य सर्वतोभावेन तस्मै एवार्पणम्) इति करके सिद्धव्यक्ति वैकुण्ठमें जाता है।' यह सुनकर नवलक्षणा (नवलक्षणानि यस्याः सा) भक्तिः पुंसा (मानवेन) महाप्रभुने कहा, - शास्त्रके मतमें श्रवण-कीर्त्तन ही श्रेष्ठ-साधन [आदौ] अर्पिता [सती] भगवति विष्णो (श्रीहरौ) अद्धा है; उस साधनके बलसे श्रीकृष्णप्रेमसेवारूपी साध्यफलकी (साक्षादेव, न तु ज्ञानकर्माद्यव्यवधानेन) [पश्चात्] चेत् क्रियेत प्राप्ति होती है॥ 250-258 ॥ [न तु आदौ कृता सती, पश्चादर्प्येत, न तु कर्माद्यर्पणरूप-परम्परा अनुभाष्य— निर्विशेष-ब्रह्मवादी कैवलाद्वैतवादियों अथवा इयं भक्तिः; भगवत्तोषणार्थैवेयमिति भाव्यम्, न तु मायावादियोंके साथ शुद्धद्वैतवादियों अथवा तत्त्ववादियोंका धर्मार्थकाममोक्षार्थमिति, एवम्भूता चेत् क्रियेत, तदा तेन कर्त्रा बहुत समयसे विरोध प्रसिद्ध है॥ 250 ॥ शुद्धहरिभजनमेव सर्वशास्त्राध्ययनफलमिति मत्वा यत्] अधीतं, तत् [एव] उत्तमं मन्ये। श्रीमद्भागवत (7/5/23-24) :- श्लोक-भावानुवाद— श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण- श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। परिकर-लीलामय शब्दोंका श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, श्रीकृष्णके अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ 259 ॥ चरणोंकी सेवा (देश-कालोचित परिचर्या), श्रीकृष्णका इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। पूजन, वन्दन (नमस्कार), श्रीकृष्णके दास होनेका क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥ 260 ॥ अभिमान, श्रीकृष्णके प्रति सख्यभाव (बन्धुभावसे श्रीकृष्णके हिताभिलाषी) और श्रीकृष्णको आत्मनिवेदन (श्रीकृष्णको अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 259-260 ॥ देहादि, शुद्धात्मा तक सभी प्रकारसे समर्पण), -इन नौ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीकृष्णका श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, लक्षणोंसे सम्पन्न भक्ति मानवके द्वारा पहले श्रीकृष्णमें पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और साक्षात् (ज्ञान-कर्मादिके व्यवधानसे रहित) अर्पित आत्मनिवेदन, - इन नौ लक्षणोंसे सम्पन्न भक्ति ही होनेके बाद ही कर्मफलका अर्पण हो [ऐसा नहीं कि श्रीकृष्णमें अर्पित होकर साधित होनेसे सर्वसिद्धि होती पहले कर्म करके बादमें उसके फलको अर्पित करें; है, - यही शास्त्रोंका उत्तम तात्पर्य है॥ 259-260 ॥ और भक्ति भी श्रीकृष्णके सन्तोषके लिये हो, अनुभाष्य— प्राकृत सीमित ज्ञान ही जिसका एकमात्र धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादिकी कामनासे नहीं; इस प्रकारके सहारा था, ऐसे दैत्यराज हिरण्यकशिपुने महाभागवत जिस कर्त्ताने यह जान लिया है कि शुद्धहरिभजन ही सभी शास्त्रोंके अध्ययनका फल है], उसने ही शास्त्रोंके अध्ययनको उत्तमरूपसे ग्रहण किया है॥ 259-260 ॥ 382 ।