श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
नौवाँ अध्याय 9/106-114 ] अनुवाद—तब महाप्रभुने उस ब्राह्मणको शिक्षा दी और कहा, — “मुझे तुमने कृष्ण समझा है, इस बातको किसीके सामने प्रकाशित मत करना ॥” 106 ॥
महाप्रभु-भक्त ब्राह्मण :— सेइ विप्र महाप्रभुर बड़ भक्त हैल। चारि मास प्रभु-सङ्ग कभु ना छाड़िल॥ 107 ॥
अनुवाद—वह ब्राह्मण महाप्रभुका बड़ा भक्त बन गया। चार महीने जब तक महाप्रभु श्रीरङ्गम्में थे, तब तक उस ब्राह्मणने कभी भी उनका साथ नहीं छोड़ा॥ 107 ॥
व्येङ्कटभट्टके घरमें महाप्रभु गौरचन्द्र :— एइमत भट्टगृहे रहे गौरचन्द्र। निरन्तर भट्ट-सङ्गे कृष्णकथानन्द॥ 108 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र व्येङ्कट भट्टके घरमें रहे और निरन्तर कृष्णकथा करते हुए दोनोंने उसका आनन्द लिया॥ 108 ॥
लक्ष्मीनारायण-सेवक श्रीसम्प्रदायी भट्ट :— 'श्री-वैष्णव' भट्ट सेवे लक्ष्मी-नारायण। ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन॥ 109 ॥
अनुवाद—व्येङ्कट भट्ट 'श्रीवैष्णव' सम्प्रदायके थे, इसलिये वे श्रीलक्ष्मी-नारायणकी सेवा करते थे। उनकी भक्तिको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 109 ॥
महाप्रभुके साथ उनका सख्यभाव :— निरन्तर ताँर सङ्गे हैल सख्यभाव। हास्य-परिहास दुँहे सख्येरे स्वभाव॥ 110 ॥
अनुवाद—निरन्तर साथ रहनेके कारण महाप्रभु और व्येङ्कट भट्टका साथ सख्यभाव हो गया, इसलिये दोनों कभी सखाकी भाँति हास-परिहास भी करते थे॥ 110 ॥
महाप्रभुकी उनको श्रीकृष्णसेवा-दानकी इच्छा, महाप्रभु और भट्टका संवाद; महाप्रभुका कौतुकपूर्ण प्रश्न—लक्ष्मी और गोपियोंकी श्रीकृष्णसेवाका वैशिष्ट्य :— प्रभु कहे, — “भट्ट, तोमार लक्ष्मी-ठाकुराणी। कान्त-वक्षःस्थिता, पतिव्रता-शिरोमणि॥ 111 ॥
नारायणाश्रित होते हुए भी लक्ष्मीका श्रीकृष्णके माधुर्यसे आकर्षित होकर श्रीकृष्णसङ्ग प्राप्त करनेकी प्रार्थना :— आमार ठाकुर कृष्ण—गोप, गो-चारण। साध्वी हञा केने चाहे ताँहार सङ्गम॥ 112 ॥
इस उद्देश्यसे लक्ष्मीकी कठोर तपस्या :— एइ लागि' सुखभोग छाड़ि' चिरकाल। व्रत-नियम करि' तप करिल अपार ॥” 113 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, “भट्ट! आपकी ठाकुराणी श्रीलक्ष्मी देवी पतिव्रता शिरोमणि हैं और सदा अपने कान्तके वक्षःस्थलपर विराजमान रहती हैं। मेरे ठाकुर श्रीकृष्ण एक गोप हैं और गैया चराते हैं, परन्तु तुम्हारी ठाकुराणी साध्वी होकर भी उनका सङ्ग क्यों चाहती हैं? इसके लिये उन्होंने बहुत लम्बे समय तक वैकुण्ठके समस्त सुख-भोगोंको छोड़कर व्रत लेकर नियमोंका पालन करते हुए बहुत कठोर तपस्या भी की है॥” 111-113 ॥
श्रीमद्भागवत (10/16/36)— कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे, तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः। यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपो, विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥ 114 ॥
अनुवाद—हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी वासनासे कमलाने (लक्ष्मीने) बहुत समय तक समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानती॥ 114 ॥
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[ 9/111–121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [बायाँ स्तम्भ] अनुभाष्य—मध्यलीला 8/146 संख्या देखें॥ 114॥ भट्टका उत्तर, श्रीकृष्णके सङ्गसे नारायण-पत्नीके सतीत्वकी हानिकी असम्भावना :— भट्ट कहे, —“कृष्ण-नारायण—एकइ स्वरूप। कृष्णेते अधिक लीला-वैदग्ध्यादिरूप ॥ 115 ॥ ताँर स्पर्शे नाहि याय पतिव्रता-धर्म। कौतुके लक्ष्मी चाहेन कृष्णेर सङ्गम ॥ 116 ॥ अनुवाद—व्येङ्कट भट्टने कहा, —“श्रीकृष्ण और श्रीनारायण—दोनों एक ही स्वरूप हैं, परन्तु श्रीकृष्णमें लीला-वैदग्ध्यादि अधिक है। कौतुकवशतः श्रीलक्ष्मीने श्रीकृष्णके सङ्गकी इच्छा की, क्योंकि श्रीकृष्णके स्पर्शसे उनका पतिव्रता-धर्म नष्ट नहीं होता ॥ 115–116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीनारायण ही श्रीकृष्णकी विलास-मूर्ति हैं, इसलिये श्रीकृष्णसे उनका स्वरूप द्विभुज-चतुर्भुजका भेद होनेपर भी पृथक् नहीं है। नारायणमें श्रीकृष्णके समान लालित्य होनेपर भी उनमें श्रीकृष्ण जैसी वैदग्ध्य आदि रूप लीला नहीं है। श्रीकृष्ण ही जब विलासमूर्तिमें श्रीनारायण हैं, तब नारायण-पत्नी-लक्ष्मीका श्रीकृष्ण-स्पर्शसे पतिव्रता-धर्म नहीं नष्ट होता है। इसलिये श्रीकृष्णसङ्गममें लक्ष्मीका कौतुक होना स्वाभाविक ही है ॥ 115–116 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/223 संख्या और मध्यलीला 8/144 संख्या देखें ॥ 111–116 ॥ श्रीकृष्ण और नारायणकी लीलाका वैचित्र्य :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/59)— सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्णस्वरूपयोः। रसेनोत्कृष्यते कृष्णरूपमेषा रसस्थितिः ॥ 117 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘श्रीनारायण’ और ‘श्रीकृष्ण’के दो स्वरूपोंमें सिद्धान्तके अनुसार कोई भेद नहीं है, तथापि शृङ्गार-रसविचारसे श्रीकृष्णरूपने ही रसके द्वारा [दायाँ स्तम्भ] उत्कर्षता प्राप्त की है। इसी प्रकार ही रसत्तत्त्वकी स्थापना होती है ॥ 117 ॥ अनुभाष्य— सिद्धान्ततः (वस्तुतत्त्वतः) श्रीश्रीकृष्णस्वरूपयोः (नारायण-कृष्णतत्त्वयोः) अभेदे सति अपि रसेन कृष्णरूपम् (एव) उत्कृष्यते, —एषा रसस्थितिः (रस-स्वभावः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। आदिलीला दूसरा और तीसरा अध्याय एवं लघुभागवतामृत देखें ॥ 117 ॥ कृष्णसङ्गे पतिव्रता-धर्म नहे नाश। अधिक लाभ पाइये, आर रासविलास ॥ 118 ॥ विनोदिनी लक्ष्मीर हय कृष्णे अभिलाष। इहाते कि दोष, केने कर परिहास ॥” 119 ॥ अनुवाद—लक्ष्मीजीने विचार किया कि श्रीकृष्णके सङ्गसे उनका पतिव्रता-धर्म नष्ट नहीं होगा, अपितु श्रीकृष्णका सङ्ग होनेसे रासलीलारूपी अधिक लाभ ही मिलेगा। लक्ष्मीजी विनोदिनी हैं, इसलिये उन्होंने यदि श्रीकृष्णके सङ्गकी अभिलाषा की, तो इसमें क्या दोष है? आप क्यों उनका परिहास कर रहे हैं?” ॥ 118–119 ॥ महाप्रभुका पुनः प्रश्न :— प्रभु कहे, —“दोष नाहि, इहा आमि जानि। रास ना पाइल लक्ष्मी, शास्त्रे इहा शुनि ॥ 120 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“इसमें कोई दोष नहीं है, यह मैं भी जानता हूँ। परन्तु मैंने शास्त्रोंमें सुना है कि लक्ष्मीजीका रासमें प्रवेश नहीं हुआ ॥ 120 ॥ व्रजगोपियोंकी महिमा :— श्रीमद्भागवत (10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः। स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम् ॥ 121 ॥ 358 ।
नौवाँ अध्याय 9/121-128 ] अनुवाद-श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ?॥ 121॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/80 संख्या देखें॥ 121 ॥ गोपियोंके आनुगत्यके बिना लक्ष्मीका श्रीकृष्णके साथ रासविलास असम्भव :- लक्ष्मी केने ना पाइल, इहार कि कारण। तप करि' कैछे कृष्ण पाइल श्रुतिगण ॥ 122 ॥ अनुवाद-तपस्या करके श्रुतियोंने कैसे श्रीकृष्णको रासलीलामें प्राप्त किया? और लक्ष्मीजीको रासमें प्रवेश क्यों नहीं मिला? इसका क्या कारण है? ॥ 122॥ गोपियोंके आनुगत्यसे ही श्रुतियोंको रागमार्गमें श्रीकृष्णसेवाकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/87/23)- निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढ़योगयुजो हृदि य- न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात्। स्त्रिय उरगेन्द्र-भोगभुजदण्डविषक्त-धियो वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाः ॥ 123 ॥ अनुवाद-मुनियोंने प्राणायामके द्वारा निश्वासको जीतकर मन और इन्द्रियोंको दृढ़रूपसे योगयुक्त करके हृदयमें जिस ब्रह्मकी उपासना की थी, भगवान्के सभी शत्रुओंने भी उनके निरन्तर ध्यानके बलसे उस ब्रह्ममें प्रवेश किया था। व्रजस्त्रियोंने श्रीकृष्णके सर्पके शरीरतुल्य भुजाओंके सौन्दर्यरूप तीव्र विषके द्वारा हतबृद्धि होकर उनके चरणकमलोंकी सुधाको प्राप्त किया था। हमने भी वैसी गोपीदेह प्राप्त करके गोपीभावसे उनके चरणकमलोंकी सुधाका पान किया है॥123॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/223 संख्या देखें ॥ 123 ॥ महाप्रभुके प्रश्नका उत्तर देनेमें भट्टकी असमर्थता :- श्रुति पाय, लक्ष्मी ना पाय, इथे कि कारण।” भट्ट कहे,-"इहा प्रवेशिते नारे मोर मन॥ 124 ॥ आमि जीव, -क्षुद्रबुद्धि, सहजे अस्थिर। ईश्वरेर लीला-कोटिसमुद्र-गम्भीर ॥ 125 ॥ प्रभुकी कृपासे ही प्रभुकी लीलाका ज्ञान :- तुमि साक्षात् सेइ कृष्ण, जान निजकर्म। यारे जानाह, सेइ जाने तोमार लीलामर्म॥" 126 ॥ अनुवाद-(महाप्रभुका प्रश्न-) श्रुतियोंको रासकी प्राप्ति हुई, परन्तु लक्ष्मीजीको नहीं हुई, इसका क्या कारण है?” व्येङ्कट भट्टने कहा, - "इस रहस्यमें प्रवेश करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। मैं एक जीव हूँ जिसकी बुद्धि अल्प और स्वभावतः चञ्चल है। श्रीकृष्णकी लीला करोड़ों समुद्रकी भाँति गम्भीर (गहरी) है, मेरी बुद्धिका उसमें प्रवेश नहीं है। आप साक्षात् वही श्रीकृष्ण हैं, आप ही अपनी लीलाओंके उद्देश्यको जानते हैं। आप जिसे उसे जनाते हैं, वही आपकी लीलाओंके मर्मको जान पाता है॥” 124-126॥ अनुभाष्य-(कठ, 2/23, मुःउः 3/2/3)- “यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।” अर्थात् “जब जीवात्मा भगवान्के प्रति सेवोन्मुख होकर परमात्माकी कृपायाचना करता है, तब उसीके निकट वे परमात्मा अपना स्वयंप्रकाश श्रीविग्रह प्रकट करते हैं ॥ 126 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण और व्रजवासियोंके सहज रागात्मक स्वभावका वर्णन :- प्रभु कहे,-"कृष्णेर एक सजीव लक्षण। स्वमाधुर्ये सर्व चित्त करे आकर्षण ॥ 127 ॥ व्रजलोकेर भावे पाइये ताँहार चरण। ताँरे ईश्वर करि' नाहि जाने व्रजजन ॥ 128 ॥ । 359
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[ 9/127–135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला केह ताँरे पुत्र-ज्ञाने उदुखले बान्धे। केह सखा-ज्ञाने जिनि' चड़े ताँर कान्धे ॥ 129 ॥ 'व्रजेन्द्रनन्दन' बलि' ताँरे जाने व्रजजन। ऐश्वर्यज्ञाने नाहि कोन सम्बन्ध-मानन ॥ 130 ॥ व्रजलोकेर भावे येइ करये भजन। सेइ व्रजे पाये शुद्ध व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 131 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/137-158 संख्या एवं मध्यलीला 8/138, 142, 147, 148 संख्या देखें। पयार संख्या 130 की पहली पंक्तिके लिये—आदिलीला 4/33 संख्या, मध्यलीला 8/203–204, 220–222, 226, 228–230 संख्या देखें। पयार संख्या 130 की दूसरी पंक्तिके लिये—आदिलीला 4/21–26 संख्या देखें ॥ 127–130 ॥ श्रीमद्भागवत (10/9/21)— नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 132 ॥ अनुवाद—यशोदाके पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं ॥ 132 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/226 संख्या देखें ॥ 132 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “श्रीकृष्णका एक सजीव लक्षण यह है कि वे अपने माधुर्यके द्वारा सबके चित्तको आकर्षित करते हैं। केवल व्रजवासियोंके भावोंका आनुगत्य करके ही श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति की जा सकती है। व्रजवासी श्रीकृष्णको भगवान् नहीं मानते। कोई उन्हें अपना पुत्र मानकर ऊखलसे बाँध देती हैं, तो कोई उन्हें सखा मानकर खेलमें उनसे जीतकर उनके कन्धेपर चढ़ जाता है। व्रजवासी श्रीकृष्णको व्रजेन्द्रनन्दनके रूपमें ही जानते हैं। ऐश्वर्यज्ञानसे श्रीकृष्णके साथ वे कोई सम्बन्ध नहीं मानते हैं। व्रजवासियोंके भावोंके अनुगत होकर जो श्रीकृष्णका भजन करते हैं, वे ही व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको प्राप्त करते हैं॥ 127–131 ॥ गोपियोंके आनुगत्यसे श्रुतियोंको रासमें कृष्णसेवा-प्राप्ति :— श्रुतिगण गोपीगणेर अनुगत हञा। व्रजेश्वरीसुत भजे गोपीभाव लञा ॥ 133 ॥ बाह्यान्तरे गोपीदेह व्रजे यबे पाइल। सेइ देहे कृष्णसङ्गे रासक्रीड़ा कैल ॥ 134 ॥ अनुवाद—श्रुतियोंने गोपियोंके अनुगत होकर गोपीभावसे यशोदानन्दनका भजन किया था। जब श्रुतियोंको व्रजमें गोपीदेहकी प्राप्ति हुई, तब उस देहसे उन्होंने श्रीकृष्णके साथ रासक्रीड़ा की थी ॥ 133-134 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'सजीव-लक्षण'—क्रियालक्षण; पाठान्तरमें 'स्वभाव-लक्षण', इसका अर्थ स्पष्ट है। तीसरा पाठान्तर 'स्वभाव-विलक्षण',—श्रीकृष्णका स्वभाव दूसरोंके स्वभावसे भिन्न प्रकारका है, अथवा 'विलक्षण'-शब्दका अर्थ विशेष लक्षण है। 'उदूखल'—ओखली अर्थात् जिसमें धानादि कूटा जाता है। व्रजवासी श्रीकृष्णको 'नन्दनन्दन'के रूपमें जानते हैं। परम ऐश्वर्यशाली 'परमेश्वर'से जो एक अन्य प्रकारका सम्बन्ध है, वे उसे नहीं मानते। व्रजवासियोंके दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन चार प्रकारके भावोंमेंसे कोई भाव ग्रहण करके जो परमतत्त्वका भजन करता है; वह चरम अवस्थामें व्रजेन्द्रनन्दन-श्रीकृष्णको शुद्ध रूपमें व्रजधाममें प्राप्त होता है ॥ 127–131 ॥ गोपीके अतिरिक्त अन्य चिन्मयी स्त्रीके लिये भी मधुर-सेवा-प्राप्ति असम्भव :— गोपजाति कृष्ण, गोपी-प्रेयसी ताँहार। देवी वा अन्य स्त्री कृष्ण ना करे अङ्गीकार ॥ 135 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण गोपजातिके हैं और गोपियाँ उनकी प्रेयसियाँ हैं। श्रीकृष्ण गोपियोंके अतिरिक्त अन्य किसी और देवी या स्त्रीको अङ्गीकार नहीं करते ॥ 135 ॥ 360 ।
नौवाँ अध्याय 9/133-142 ] लक्ष्मीके ऐश्वर्यज्ञानसे श्रीकृष्णका सङ्ग असम्भव :- लक्ष्मी चाहे सेइ देहे कृष्णेर सङ्गम। गोपी-रागानुगा हञा ना कैल भजन ॥ 136 ॥ अन्य देहे ना पाइये रासविलास। अतएव 'नायं' श्लोक कहे वेदव्यास ॥ *137 ॥ अनुवाद—लक्ष्मीजी अपनी उसी देहसे ही श्रीकृष्णका सङ्ग प्राप्त करना चाहती थीं। किन्तु उन्होंने गोपियोंके अनुरागके अनुगत होकर श्रीकृष्णका भजन नहीं किया था। श्रीवेदव्यासने श्रीमद्भागवतमें 'नायं सुखापो-' श्लोक कहा है, क्योंकि गोपीदेहके अतिरिक्त अन्य किसी देहसे श्रीकृष्णके रासमण्डलमें प्रवेश सम्भव नहीं है॥ *136-137 ॥
- किसी अन्य संस्करणमें 'नायं' से 'नायं श्रियो-' श्लोक लिया गया है। यद्यपि उस श्लोकमें गोपियोंकी महिमा बतलायी गयी है, उनके समान किसी औरका वैसा सौभाग्य नहीं है, परन्तु यह स्पष्ट रूपसे नहीं कहा है कि गोपीदेहके बिना रासमें किसीका प्रवेश सम्भव नहीं है। पहले 'श्रीवैष्णव' सम्प्रदायके व्येङ्कटभट्टकी नारायणकी ही 'स्वयंरूप'के रूपमें धारणा :- पूर्वे भट्टेर मने एक हैत अभिमान। "श्रीनारायण' ह'न स्वयं-भगवान् ॥ 138 ॥ ताँहार भजन सर्वोपरि-कक्षा हय। 'श्री-वैष्णवे'र भजन एइ सर्वोपरि हय ॥ '139 ॥ अनुवाद—पहले व्येङ्कट भट्टके मनमें एक अभिमान था,—“श्रीनारायण' ही स्वयं भगवान् हैं। उनका भजन ही सर्वश्रेष्ठ श्रेणीका है और 'श्रीवैष्णव'-सम्प्रदायकी भजन परिपाटी ही सर्वश्रेष्ठ है ॥' 138-139 ॥ एइ ताँर गर्व प्रभु करिते खण्डन। परिहासद्वारे उठाय एतेक वचन ॥ 140 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उनके इसी गर्वका खण्डन करनेके लिये ही परिहासमें ये सब बातें कहीं॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रुतियाँ श्रीकृष्णके रासमण्डलमें प्रवेश करनेकी चेष्टा करनेपर भी जब सफल नहीं हो पायीं और केवल हृदयगत गोपीभावको लेकर भी जब प्रवेश नहीं कर पायीं, तब बाहरी गोपी-देह और हृदयमें गोपीभाव ग्रहण करके गोपियोंके अनुगत होकर श्रीकृष्णके रासमें प्रविष्ट हुई थीं। श्रीकृष्ण-गोप जातिके हैं, गोपियाँ ही उनकी प्रेयसियाँ हैं, इसलिये ऐश्वर्यमयी देवीके रूपमें या अन्य स्त्रीरूपमें, 'श्रीकृष्णसङ्गम' प्राप्त नहीं होता। लक्ष्मीदेवीने अपनी देवी-देहमें ही श्रीकृष्णके सङ्गमकी प्रार्थना की थी, किन्तु उन्होंने गोपियोंके स्वाभाविक अनुरागके अनुगत होकर भजन नहीं किया। इसलिये वे गोपीसे पृथक् अन्य देहमें रासविलास प्राप्त नहीं कर पायी। इसके सम्बन्धमें श्रीव्यासदेवने “नायं सुखापो भगवान्”—यह श्लोक लिखा है। व्येङ्कट भट्टके मनमें एक अभिमान था कि परव्योममें रहनेवाले श्रीनारायण ही स्वयं भगवान् हैं, उनका भजन ही सर्वोत्तम उपासनाका विशेष स्तर है; इसलिये श्रीसम्प्रदायी वैष्णवोंका भजन ही सर्वोपरि है। इस वृथा गर्वका खण्डन करनेके अभिप्रायसे ही महाप्रभुने परिहासके द्वारा इस विचारको उठाया था ॥ 133-140 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/23-24, 28-115 संख्या और लघुभागवतामृतमें श्रीरूपगोस्वामी प्रभुका विचार आलोच्य है॥ 138-139 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण और नारायणकी लीलाके वैशिष्ट्यका वर्णन और श्रीकृष्णके स्वयंरूप होनेकी संस्थापना :- प्रभु कहे,–“भट्ट, तुमि ना करिह संशय। 'स्वयं भगवान्' कृष्ण एइ त' निश्चय ॥ 141 ॥ कृष्णेर विलासमूर्ति-श्रीनारायण। अतएव लक्ष्मी-आद्येर हरे तेंह मन ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,- “श्रीकृष्णकी विलासमूर्ति श्रीनारायण हैं। इसलिये श्रीकृष्ण लक्ष्मी आदि देवियोंके मनका भी हरण करते हैं। भट्ट, तुम कोई भी संशय । 361
[ 9/141-149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मत करो, श्रीकृष्ण ही 'स्वयं भगवान्' हैं, श्रीमद्भागवत 'चतुर्भुज-मूर्त्ति' देखाय गोपीगणेर आगे। ही इस विषयमें प्रमाण है॥ 141-142 ॥ सेइ 'कृष्णे' गोपिकार नहे अनुरागे ॥ "149 ॥ श्रीमद्भागवत (1/3/28) :- अनुवाद-अपने असाधारण गुणोंके कारण स्वयं एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। भगवान् श्रीकृष्ण लक्ष्मीके मनको हर लेते हैं, परन्तु इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ 143 ॥ श्रीनारायण गोपियोंके मनको नहीं हर सकते। श्रीनारायणकी तो बात ही क्या, गोपियोंके साथ परिहास करनेके लिये अनुवाद-राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या श्रीकृष्ण नारायण हो गये। नारायण रूप धारण करके कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् उन्होंने गोपियोंको 'चतुर्भुज-मूर्ति' दिखलायी। उन (चतुर्भुज) हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये श्रीकृष्णमें भी गोपियोंका अनुराग उत्पन्न नहीं (अवतार) रक्षा करते हैं॥ 143 ॥ हुआ ॥ 147-149 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/67 संख्या देखें॥ 143॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणमें साठ गुण हैं; उन नारायण हैते कृष्णेर असाधारण गुण। गुणोंके ऊपर और भी श्रीकृष्णके चार असाधारण गुण अतएव लक्ष्मीर कृष्णे तृष्णा अनुक्षण ॥ 144 ॥ है, वे श्रीनारायणमें नहीं हैं। जैसे (1) सर्वाद्भुत- चमत्कारलीलासमुद्रविशिष्टता, (2) अतुल्यमधुर-प्रेम- तुमि ये पड़िला श्लोक, से हय प्रमाण। परिशोभितप्रियमण्डलयुक्तता, (3) त्रिजगन्मानसाकर्षि- सेइ श्लोके आइसे 'कृष्ण-स्वयं भगवान्' ॥ 145 ॥ मुरलीगीतपरायणता, (4) चराचरविस्मयकारि-समोर्द्ध- अनुवाद-श्रीकृष्णमें चार असाधारण गुण हैं जो रहितरूप-श्रीयुक्तता। ऐसे असाधारण चार गुणोंसे युक्त श्रीनारायणमें नहीं हैं, इसलिये लक्ष्मी सदा श्रीकृष्णका श्रीकृष्णमें ऐश्वर्यस्वरूपिणी लक्ष्मीकी भी प्रतिक्षण तृष्णा सङ्ग चाहती हैं। आपने जो श्लोक 'सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि--' उत्पन्न होती है। 'सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि' जिस श्लोकका पढ़ा था, वही इस बातका प्रमाण है कि श्रीकृष्ण 'स्वयं तुमने उच्चारण किया है, उसमें ही श्रीकृष्णकी 'स्वयं-भगवत्ता' भगवान्' हैं॥ 144-145 ॥ प्रमाणित होती है। स्वयं-भगवत्तासे युक्त श्रीकृष्ण ही लक्ष्मीके मनका हरण करते हैं। गोपियोंके मनको हरण भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/59) :- करनेके उपयोगी चार गुण श्रीनारायणमें नहीं रहनेपर वे सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्णस्वरूपयोः। गोपियोंके मनका हरण नहीं कर सकते। नारायणकी रसेनोत्कृष्यते कृष्णरूपमेषा रसस्थितिः ॥ 146 ॥ बात तो दूर रहे, श्रीकृष्ण परिहास करते हुए स्वयं अनुवाद-इसी अध्यायमें 117 संख्या देखें॥ 146॥ नारायणके रूपमें 'प्रकाशित' होनेपर भी गोपियोंका उनमें अनुराग नहीं हुआ। लक्ष्मी श्रीकृष्णका माधुर्य चाहती हैं, परन्तु गोपियाँ चतुर्भुज यहाँ यह विचारणीय है कि श्रीरूपगोस्वामीने नारायणका ऐश्वर्य नहीं चाहती :- 'भक्तिरसामृतसिन्धु'की महाप्रभुके साथ व्येङ्कटभट्टके साथ स्वयं भगवान् 'कृष्ण' हरे लक्ष्मीर मन। साक्षात्तारके अनेक दिनोंके बाद रचना की, तब गोपिकार मन हरिते नारे 'नारायण' ॥ 147 ॥ श्रीव्येङ्कटभट्टने किस प्रकार इस ग्रन्थके श्लोकका स्वयं श्रीकृष्णके चतुर्भुजरूपका भी गोपियों द्वारा अनादर :- प्रमाणके रूपमें पाठ किया था? हम इस प्रकार इसका नारायणेरका कथा, श्रीकृष्ण आपने। समाधान करते हैं- गोपिकारे हास्य कराइते हय 'नारायणे' ॥ 148 ॥ 'भक्तिरसामृतसिन्धु' आदि ग्रन्थोंके जो-जो श्लोक 362 ।
नौवाँ अध्याय 9/144-156 ] उन ग्रन्थोंकी रचनासे पहले प्रयोग किये गये हैं—ऐसा कहकर इस ग्रन्थमें उनका उल्लेख हुआ है, तो यह समझना चाहिये कि वे श्लोक बहुत प्राचीन श्रीकृष्णभक्तोंमें भी प्रचलित थे। श्रीलरूप गोस्वामीने उन प्राचीन श्लोकोंका ही अपने ग्रन्थमें प्रयोग किया है। कविराज-गोस्वामीकी इस ग्रन्थकी रचनासे पहले, श्रीरूपके सभी ग्रन्थ रचित हो चुके थे। इसलिये (कविराज गोस्वामीने अपने इस ग्रन्थमें श्रीरूपके) उन-उन ग्रन्थोंसे उद्धृत कहकर इन सब श्लोकोंका उल्लेख किया है। अनेक स्थानोंपर, कविराज गोस्वामीने भावमात्रका सहारा लेकर पूर्व-गोस्वामियोंके श्लोकोंको वार्त्तालापमें प्रवेश कराया है ॥ 144-149 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 17/278-293 संख्या देखें ॥ 148-149 ॥ ललितमाधव (6/14) :- गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दनजुषो भावस्य कस्तां कृती विज्ञातुं क्षमते दुरूहपदवीसञ्चारिणः प्रक्रियाम्। आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन् भुजैर्जिष्णुभि- र्यासां हन्त चतुर्भिरद्भुतरुचिं रागोदयः कुञ्चति ॥ 150 ॥ अनुवाद—किसी समय श्रीकृष्णने कौतुकवशतः अद्भुत-रुचियुक्त चतुर्भुज नारायणरूप प्रकाश किया, जिसे देखकर गोपियोंके रागका उदय सङ्कुचित हो गया। इसलिये नन्दनन्दनमें अनन्य-भजनशील दुर्गम-पारकीय- पथका अवलम्बन करनेवाली गोपियोंकी भाव-क्रियाको कौन पण्डित समझ सकता है? ॥ 150 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 17/281 संख्या देखें ॥ 150 ॥ महाप्रभुके द्वारा लक्ष्मी और गोपियोंके तत्त्वका समन्वय :- एत कहि' प्रभु ताँर गर्व चूर्ण करिया। ताँरे सुख दिते कहे सिद्धान्त फिराइया ॥ 151 ॥ “दुःख ना भाविह, भट्ट, कैलुँ परिहास। शास्त्रसिद्धान्त शुन, याते वैष्णव-विश्वास ॥ 152 ॥ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और नारायणतत्त्व एवं सर्वलक्ष्मीमयी श्रीराधा और लक्ष्मीतत्त्व :- कृष्ण-नारायण, यैछे एकइ स्वरूप। गोपी-लक्ष्मी-भेद नाहि हय एकरूप ॥ 153 ॥ एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप। गोपी-लक्ष्मी-भेद नाहि, जानिह ‘स्वरूप’ ॥ 154 ॥ अनुवाद—ऐसा कहकर महाप्रभुने व्येङ्कट भट्टके गर्वको तो चूर्ण कर दिया, परन्तु उसे प्रसन्न करनेके लिये महाप्रभुने सिद्धान्तको घुमाकर कहा,— “भट्ट, आप दुःखी मत होइये, मैंने तो केवल परिहास किया था। अब आप शास्त्रोंके वे सिद्धान्त सुनो, जिनमें वैष्णवोंका विश्वास है। श्रीकृष्ण और श्रीनारायण जैसे एक ही स्वरूप हैं, वैसे ही गोपियों और लक्ष्मीमें भी कोई भेद नहीं है, वे भी एकरूप हैं। एक ही विग्रह अनेक रूप धारण करते हैं, इसलिये गोपी और लक्ष्मीमें भी कोई भेद नहीं है, इसलिये उनके ‘स्वरूप’को जानो ॥ 151-154 ॥ अनुभाष्य—जिस प्रकार श्रीकृष्ण एवं नारायण—वस्तुतः अभेद अर्थात् एक ही वस्तु हैं, उसी प्रकार गोपी एवं लक्ष्मी वस्तुतः अभिन्न हैं। रस विचारसे लक्ष्मीकी अपेक्षा गोपीकी उत्कर्षता होनेपर भी दोनोंको सिद्धान्तसे अभिन्न ही जानना चाहिये ॥ 153 ॥ कृष्णतत्त्व और विष्णुत्तत्त्व एवं श्रीराधातत्त्व और लक्ष्मीतत्त्वमें भेदबुद्धि—अपराधजनक :- गोपीद्वारे लक्ष्मी करे कृष्णसङ्गास्वाद। ईश्वर-तत्त्वे भेद मानिले हय अपराध ॥ 155 ॥ अनुवाद—गोपियोंके द्वारा ही लक्ष्मी श्रीकृष्णके सङ्गका आस्वादन करती हैं। ईश्वरके विभिन्न रूपोंमें भेद माननेसे अपराध होता है ॥ 155 ॥ भक्तोंके स्वरूपके अनुरूप सेवा-भेदसे आराध्यवस्तुका माधुर्य और ऐश्वर्यभेद :- एक ईश्वर—भक्तेर ध्यान-अनुरूप। एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप ॥” 156 ॥ । 363
[ 9/151-162 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-एक ही विग्रह नाना प्रकारके आकार और रूप प्रकाश करते हैं। एक ईश्वर भक्तोंके ध्यानके अनुरूप भिन्न-भिन्न रूपोंमें स्वयंको प्रकाशित करते हैं॥” 156 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने परिहास-वाक्य छोड़कर अन्तमें कहा, - ओहे भट्ट, तुम दुःखी मत होवो, ‘श्रीकृष्ण’ और ‘श्रीनारायण’ जिस प्रकार अभेद हैं, गोपी और लक्ष्मी भी उसी प्रकार अभेद हैं। सर्वलक्ष्मीमयी राधिका एक ही विग्रहसे नाना आकार और रूप प्रकाशित करती हैं। गोपियोंके द्वारा लक्ष्मी कृष्णसङ्गका आस्वादन करती हैं अर्थात् स्वरूपशक्ति माधुर्यस्वरूपमें गोपीदेहमें श्रीकृष्ण-सङ्गास्वादन करती हैं और ऐश्वर्यदेहमें लक्ष्मीरूपमें नारायण-सङ्गास्वादन करती हैं। ईश्वर-तत्त्वमें भेद नहीं है। भक्तोंके भावोंके भेदसे एक ही चिद्-विग्रहमें अनेक प्रकारके आकार और रूपके ध्यानभेद मात्र जानने चाहिये॥ 151-156 ॥ [औदार्यपराः आदौ गौरादिकं, ततः माधुर्यपर-भावापन्नाः गौराभिन्नरूपं श्यामादिकं पश्यन्ति]। श्लोक-भावानुवाद-वैदूर्यमणि जिस प्रकार नीले-पीले रङ्गोंको अपने विभागसे प्रकट करती हुई विभिन्न रङ्गोंवाली प्रतीत होती है, उसी प्रकार श्रीअच्युत (जिनमें कोई भी च्युति या न्यूनता न हो अथवा भक्तोंका जिनसे कभी भी विच्छेद न हो, जैसा कि स्कन्दपुराणके काशीखण्डमें कहा गया है- 'जिनके भक्त महान विपत्ति (प्रलयादि सङ्कट) में भी उनसे दूर नहीं होते अथवा उन्हें नहीं भुलाते, इसलिये वे सभी लोकोंमें साधुओंके द्वारा अच्युत-नामसे कीर्त्तित होते हैं) भक्तके भावानुसार उपासना-भेदसे ध्यानमें अलग अलग रूप (चतुर्भुज-द्विभुज आकार भेद तथा शुक्ल-रक्त-श्यामादि वर्ण भेद) दिखलायी देते हैं [उदारतापरायण श्रीगौरहरिके भक्त पहले श्रीगौरचन्द्रका ध्यान करते हैं और तब माधुर्य-भावापन्न जन श्रीगौरसे अभिन्न श्याम (द्वापर), रक्त (त्रेता) और शुक्ल (सत्य) आदि रूपोंका दर्शन करते हैं] ॥ 157 ॥ लघुभागवतामृत (1/357) में उद्धृत श्रीनारदपञ्चरात्र-वचन :- मणैर्यथा विभागेन नीलपीतादिभिर्युतः। रूपभेदमवाप्नोति ध्यानभेदात्तथाच्युतः॥ 157 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 157 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैदूर्यमणि जिस प्रकार विभिन्न वस्तुओंके निकट आनेसे उनके रङ्गके अनुसार नीले-पीले आदि रङ्गभेदसे दिखायी देती है, उसी प्रकार भक्तके भावानुसार ध्यानभेदसे एक अद्वितीय अच्युतके ध्यानमें अलग अलग रूप दिखलायी देते हैं ॥ 157 ॥ व्यङ्कटभट्टका महाप्रभुको श्रीकृष्ण समझना :- भट्ट कहे,-“काँहा आमि जीव पामर। काँहा तुमि सेइ कृष्ण, - साक्षात् ईश्वर ॥ 158 ॥ महाप्रभुके सिद्धान्तमें भट्टका दृढ़ विश्वास :- अगाध ईश्वर-लीला किछुइ ना जानि। तुमि येइ कह, सेइ सत्य करि' मानि ॥ 159 ॥ उपास्य लक्ष्मीनारायणकी कृपासे ही महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- मोरे पूर्ण कृपा कैल लक्ष्मी-नारायण। ताँर कृपाय पाइनु तोमार चरण-दरशन ॥ 160 ॥ महाप्रभुकी कृपासे भट्टके द्वारा श्रीकृष्णसेवा आरम्भ :- कृपा करि' कहिले मोरे कृष्णेर महिमा। याँर रूप-गुणैश्वर्येर केह ना पाय सीमा ॥ 161 ॥ एबे से जानिनु कृष्णभक्ति सर्वोपरि। कृतार्थ करिले, मोरे कहिले कृपा करि' ॥” 162 ॥ अनुभाष्य- मणिः (वैदूर्य) नीलादिभिः [गुणैः युतः सन्] यथा विभागेन [उपलक्षितः भवति, यद्वा, विभागेन उपलक्षितः सन् नीलादिभिर्युतः भवति] तथा अच्युतः (च्युतिरहितः, यद्वा, नास्ति च्युतं क्षरणं भक्तानां यस्मात्-“न च्यवन्ते हि यद्भक्ता महत्यां प्रलयापादि। अतोऽच्युतोऽखिले लोके महद्भिः परिगीयते ॥”* इति काशीखण्ड-वचनात्); ध्यानभेदात् (उपासनाभेदात्) रूपभेदं (चतुर्भुज-द्विभुजाद्याकारभेदं शुक्लरक्तश्यामादिकं च) अवाप्नोति 364 ।
नौवाँ अध्याय 9/158–171 ] अनुवाद—व्येङ्कट भट्टने कहा,—“कहाँ मैं एक अधम जीव और कहाँ आप वही श्रीकृष्ण—साक्षात् ईश्वर। ईश्वरकी लीला अगाध (अनन्त) है, उस विषयमें मैं कुछ भी नहीं जानता। आपने जो कहा, मैं उसे ही सत्य मानता हूँ। श्रीलक्ष्मी-नारायणने मुझे अपनी सेवा प्रदान की है और उनकी कृपासे ही मुझे आपके श्रीचरणकमलोंका दर्शन प्राप्त हुआ है। आपने कृपा करके मुझे श्रीकृष्णकी महिमा बतलायी है, जिनके रूप-गुण-ऐश्वर्यकी सीमाको कोई नहीं पा सकता। अब मैं जान गया हूँ कि श्रीकृष्णभक्ति ही सर्वोपरि है। आपने कृपा करके यह सब बतलाकर मुझे कृतार्थ कर दिया है॥” 158–162 ॥ भट्टका महाप्रभुको प्रणाम और महाप्रभुका आलिङ्गन :— एत बलि' भट्ट पड़िला प्रभुर चरणे। कृपा करि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गने॥ 163॥ अनुवाद—इतना कहकर व्येङ्कट भट्ट महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंमें गिर पड़े। महाप्रभुने अहैतुकी कृपाके कारण उनका आलिङ्गन किया॥ 163॥ चातुर्मास्यके अन्तमें महाप्रभुकी पुनः दक्षिण-यात्रा :— चातुर्मास्य पूर्ण हैल, भट्ट-आज्ञा लञा। दक्षिण चलिला प्रभु श्रीरङ्ग देखिया॥ 164॥ अनुवाद—चातुर्मास्यके पूर्ण होनेपर महाप्रभु व्येङ्कट भट्टसे आज्ञा लेकर और श्रीरङ्गनाथके दर्शन करके दक्षिणकी ओर चल दिये॥ 164॥ अनुगामी भट्टको महाप्रभुके द्वारा सान्त्वना-दान :— सङ्गेते चलिला भट्ट, ना याय भवने। ताँरे विदाय दिला प्रभु अनेक यतने॥ 165॥ महाप्रभुके विरहमें भट्ट :— प्रभुर वियोगे भट्ट हैल अचेतन। एइ रङ्गलीला करे शचीर नन्दन॥ 166॥ अनुवाद—व्येङ्कट भट्ट महाप्रभुके साथ-साथ चलने लगे, वे अपने घर लौट नहीं रहे थे। महाप्रभुने बहुत यत्न करके उन्हें विदा किया। महाप्रभुके विरहमें व्येङ्कट भट्ट मूर्च्छित होकर गिर पड़े। श्रीशचीनन्दन इस प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करते हैं॥ 165–166॥ ऋषभ पर्वतपर महाप्रभुके द्वारा नारायणका दर्शन :— ऋषभ-पर्वते चलि' आइला गौरहरि। नारायण देखिला ताँहा नति-स्तुति करि'॥ 167॥ अनुवाद—तब महाप्रभु ऋषभ-पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने भगवान् श्रीमन्नारायणके विग्रहका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और स्तव-स्तुति की॥ 167॥ अनुभाष्य—'ऋषभ पर्वत'—दक्षिण-कर्णाटकमें मादुरा जिलेके एक प्रान्तमें है। मादुराके बारह मील उत्तरमें 'आनागड़मलय-पर्वत' कुटकाचलके उपवनमें जिस स्थानपर ऋषभदेव दावानलके द्वारा भस्मीभूत हुए थे, वही आजकल 'पालनि हिल'के नामसे विख्यात है॥ 167॥ परमानन्दपुरीके साथ मिलन :— परमानन्दपुरी ताँहा रहे चतुर्मास। शुनि' महाप्रभु गेला पुरी-गोसाञिर पाश॥ 168॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्दपुरी भी ऋषभ पर्वतपर रहकर चातुर्मास्यका पालन कर रहे थे। यह सुनकर महाप्रभु श्रीपुरी गोसांईके दर्शनके लिये उनके पास गये॥ 168॥ गुरुज्ञानसे पुरीकी वन्दना और पुरीके द्वारा आलिङ्गन :— पुरी-गोसाञिर प्रभु कैल चरण-वन्दन। प्रेमे पुरी गोसाञि ताँरे कैल आलिङ्गन॥ 169॥ तिनदिन प्रेमे दोँहे कृष्णकथा-रङ्गे। सेइ विप्र-घरे दोँहे रहे एकसङ्गे॥ 170॥ पुरी-गोसाञि बोले,—“आमि याब पुरुषोत्तमे। पुरुषोत्तम देखि' गौड़े याब गङ्गास्नाने॥” 171॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीपरमानन्दपुरीके चरणोंमें प्रणाम करके उनकी वन्दना की। श्रीपुरी गोस्वामीने प्रेममें । 365
[ 9/169-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला विभोर होकर उनका आलिङ्गन किया। महाप्रभु भी परमानन्दपुरीके साथ उस ब्राह्मणके घरमें रहे जहाँ वे पहले रह रहे थे। दोनोंने प्रेमपूर्वक कृष्णकथाकी चर्चामें तीन दिन बिताये। श्रीपुरी गोस्वामीने महाप्रभुसे कहा,—“मैं पुरुषोत्तम जाकर श्रीजगन्नाथका दर्शन करके गङ्गास्नान करनेके लिये गौड़देश जाऊँगा॥” 169-171 ॥ अनुभाष्य- 'सेइ विप्रघरे' (उस ब्राह्मणके घर) -यहाँ किस ब्राह्मणके विषयमें कहा है, वह जानना कठिन है॥ 170॥ प्रभु कहे,—“तुमि पुनः आइस नीलाचले। आमि सेतुबन्ध हैते आसिब अल्पकाले॥ 172॥ तोमार निकटे रहि, -हेन वाञ्छा हय। नीलाचले आसिबे, मोरे हञा सदय ॥” 173॥ अनुवाद-महाप्रभुने उनसे कहा,–“आप वहाँसे पुनः नीलाचल आइयेगा, मैं भी सेतुबन्ध (रामेश्वरसे) होकर थोड़े समयमें नीलाचल पहुँच जाऊँगा। मेरी आपके पास रहनेकी इच्छा है। कृपा करके आप अवश्य ही नीलाचल आइयेगा॥” 172-173 ॥ एत बलि' ताँर ठाञि आज्ञा लञा। दक्षिणे चलिला प्रभु हरषित हञा ॥ 174॥ परमानन्द पुरी तबे चलिला नीलाचले। महाप्रभु चलि तबे आइला श्रीशैले ॥ 175॥ अनुवाद-इस प्रकार निवेदन करके उनसे आज्ञा लेकर महाप्रभु हर्षित होकर दक्षिणकी ओर चल पड़े। श्रीपरमानन्दपुरी भी तब नीलाचलकी ओर चल दिये। महाप्रभु चलते-चलते श्रीशैल पहुँचे॥ 174-175॥ अनुभाष्य— 'श्रीशैल' - यहाँ किस श्रीशैलकी बात कह रहे हैं, यह समझ नहीं आता; यहाँ मल्लिकार्जुनका मन्दिर नहीं है, क्योंकि धारवाड़-जिलेमें अवस्थित श्रीशैल यहाँ नहीं हो सकता, वह श्रीशैल बेलगामके दक्षिणमें है जहाँ अनादिलिङ्ग 'मल्लिकार्जुन' (मध्यलीला 9/15 संख्या) विराजमान है; “श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः। न्यवसत् परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह॥” (माः भाः वनपर्वमें 58 अः) अर्थात् “श्रीपर्वतपर महाद्युतिमान् श्रीमहादेव पार्वतीदेवीजीके साथ और परमप्रीतिमान् ब्रह्माजी देवताओंके साथ वास करते हैं॥” 175॥ महाप्रभुके साथ भव और भवानीका साक्षात्कार :- शिव-दुर्गा रहे ताँहा ब्राह्मणेर वेशे। महाप्रभु देखि' दोँहार हइल उल्लासे ॥ 176॥ दास-दासीके घरमें भिक्षाके छलसे उनकी सेवा ग्रहण :- तिन दिन भिक्षा दिल करि' निमन्त्रण। निभृते बसि' गुप्तवार्त्ता कहे दुइ जन ॥ 177॥ कामकोष्ठोपुरीमें आगमन :- ताँर सङ्गे महाप्रभु करि इष्टगोष्ठी। आज्ञा लञा आइला तबे पुरी कामकोष्ठो ॥ 178॥ अनुवाद—वहाँ श्रीशिव-दुर्गा ब्राह्मण दम्पत्तिके वेशमें रह रहे थे। महाप्रभुको देखकर उन दोनोंको बड़ा उल्लास हुआ। तीन दिन तक उन दोनोंने महाप्रभुको निमन्त्रण करके भोजन कराया और ऐकान्तमें बैठकर उन दोनोंने महाप्रभुके साथ कुछ गुप्त बातें कीं। उन दोनोंके साथ इष्टगोष्ठी करनेके बाद महाप्रभु उनसे आज्ञा लेकर कामकोष्ठो पुरीमें आये॥ 176-178॥ मादुरामें आगमन :- दक्षिण-मथुरा आइला कामकोष्ठि हैते। ताँहा देखा हैल एक ब्राह्मण-सहिते ॥ 179॥ अनुवाद-कामकोष्ठोसे महाप्रभु दक्षिण-मथुरा (मादुरा) आये और वहाँ उनकी एक ब्राह्मणसे भेंट हुई॥ 179॥ अनुभाष्य—'दक्षिण-मथुरा' - वर्तमान समयमें जिसको 'मादुरा' कहते हैं, यह भाग़ाइ-नदीके तटपर है। यह 'शैव क्षेत्र'के नामसे प्रसिद्ध है। यह स्थान पर्वत और वनसे परिपूर्ण है। यहाँ 'रामेश्वर', 'सुन्दरेश्वर' और 'मीनाक्षी देवी' हैं। इन मीनाक्षी-देवीका मन्दिर बहुत 366 ।
नौवाँ अध्याय 9/179–187 ] विशाल और विशेषरूपसे देखने योग्य है। यह नगरी बहुत समय तक पाण्ड्यवंशीय राजाओंके शासनके अधीन थी। मुसलमानोंके आक्रमणसे 'सुन्दरलिङ्ग'के मन्दिरके बहुत अंश विध्वंस हो गये। 1372 ईसवीमें 'कम्पन्न उदयैर'ने मादुराके सिंहासनपर अधिकार किया। बहुत पहले राजा कुलशेखरने इस पुरीका निर्माण करके इसमें ब्राह्मणोंके घरोंको स्थापित किया था। 'अनन्तगुणपाण्ड्य'—कुलशेखरसे ग्यारहवें अधस्तन (वंशज) हैं॥ 179 ॥ वहाँ एक रामभक्त-ब्राह्मणके घरपर भिक्षा :- सेइ विप्र महाप्रभुके कैल निमन्त्रण। रामभक्त सेइ विप्र—विरक्त महाजन॥ 180 ॥ स्नानके बाद प्रसाद सेवाके लिये महाप्रभुका आगमन, किन्तु ब्राह्मणका रसोई न बनाना :- कृतमालाय स्नान करि' आइला ताँर घरे। भिक्षा कि दिबेन विप्र,—पाक नाहि करे॥ 181 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणने महाप्रभुको भिक्षाके लिये अपने घरमें निमन्त्रण किया। वह ब्राह्मण रामभक्त था और विरक्त महात्मा था। कृतमाला नदीमें स्नान करके महाप्रभु उस ब्राह्मणके घर आये, परन्तु वह ब्राह्मण भिक्षा क्या करायेगा, उसने तब तक भोजनके लिये कुछ भी नहीं बनाया था॥ 180-181 ॥ अनुभाष्य—'कृतमाला'—वर्तमान समयमें 'बैगाइ' अथवा 'भगाइ' नदीकी एक धारा है। 'सरुली', 'वराह-नदी' और 'वट्टिल्ल गुण्डु'—ये तीन धाराएँ बैगाई-नदीमें आकर मिलती है। (भा: 11/5/39)—“ताम्रपर्णी-नदी यत्र कृतमाला पयःस्विनी॥” अर्थात् “जहाँ ताम्रपर्णी, कृतमाला और पयस्विनी नदियाँ बहती हैं॥” 181 ॥ रसोई न बनाना और उपवास :- महाप्रभु कहे ताँरे,—“शुन महाशय। मध्याह्न हैल, केने पाक नाहि हय॥” 182 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे कहा,—“सुनो महाशय ! मध्याह्नका समय हो गया है, आपने अब तक रसोई नहीं बनायी है॥” 182 ॥ ब्राह्मणकी मानसी उपासना :- विप्र कहे,—“प्रभु मोर अरण्ये वसति। पाकेर सामग्री वने ना मिले सम्प्रति॥ 183 ॥ वन्य शाक-फल-मूल आनिबे लक्ष्मण। तबे सीता करिबेन पाक-प्रयोजन॥” 184 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“मेरे प्रभु वनमें वास करते हैं। वनमें इस समय भोजन बनानेकी सामग्री नहीं मिलती। लक्ष्मणजी जब वनसे शाक, फल और मूल आदि लायेंगे, तभी श्रीसीतादेवी रसोईका प्रबन्ध करेंगी॥” 183-184 ॥ सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता और ब्राह्मणका रन्धन :- ताँर उपासना शुनि' प्रभु तुष्ट हैला। आस्ते-व्यस्ते सेइ विप्र रन्धन करिला॥ 185 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणकी उपासनाके विषयमें सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। अन्तमें उस ब्राह्मणने बहुत शीघ्रतासे भोजन तैयार किया॥ 185 ॥ तृतीय प्रहरमें महाप्रभुका भोजन, किन्तु ब्राह्मणका उपवास :- प्रभु भिक्षा कैल दिनेर तृतीय प्रहरे। अनिर्विघ्न सेइ विप्र उपवास करे॥ 186 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने दिनके तीसरे प्रहरमें भोजन ग्रहण किया, किन्तु क्षुब्ध होनेके कारण उस ब्राह्मणने उपवास किया॥ 186 ॥ उपवासके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,—“विप्र, काँहे कर उपवास। केने एत दुःख, केने करह हुताश॥” 187 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उससे पूछा,—“हे ब्राह्मण! तुम । 367
[ 9/187–196 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उपवास क्यों कर रहे हैं? तुम इतने दुःखी क्यों हो? किसलिये इतने चिन्तित हो? ॥” 187 ॥ रावणके द्वारा सीतादेवीके अपहरणके विषयमें विचारकर ब्राह्मणका दुःख और आत्महत्याका सङ्कल्प :- विप्र कहे,—“मोर जीवने नाहि प्रयोजन। अग्नि-जले प्रवेशिया छाड़िब जीवन ॥ 188 ॥ जगन्माता महालक्ष्मी सीता-ठाकुराणी। राक्षसे स्पर्शिल ताँरे,—इहा काने शुनि ॥ 189 ॥ ए शरीर धरिबारे कभु ना युयाय। एइ दुःखे ज्वले देह, प्राण नाहि याय ॥” 190 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणने कहा,—“मेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है। मैं अग्नि अथवा जलमें प्रवेश करके अपना जीवन त्याग दूँगा। श्रीसीता-ठाकुराणी जगत्-माता और महालक्ष्मी हैं, उनको रावण नामक राक्षसने स्पर्श किया, यह बात सुनकर मैं बहुत दुःखी हूँ। इस दुःखके कारण मैं अब और शरीर धारण नहीं कर सकता। इस दुःखसे मेरा शरीर जलता है, परन्तु प्राण नहीं निकलते॥” 188–190 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अग्नि-जले'—अग्निमें अथवा जलमें॥ 188 ॥ महाप्रभुके द्वारा आश्वासन और सत्सिद्धान्तका वर्णन :- प्रभु कहे,—“ए भावना ना करिह आर। पण्डित हञा मने ना करह विचार ॥ 191 ॥ अधोक्षजवस्तु अक्षज-चेष्टासे परे :- ईश्वर-प्रेयसी सीता-चिदानन्दमूर्ति। प्राकृत-इन्द्रियेर ताँरे देखिते नाहि शक्ति ॥ 192 ॥ रावण किसी प्रकारसे सीताके दर्शन-स्पर्शयोग्य नहीं :- स्पर्शिवार कार्य आछुक, ना पाय दर्शन। सीतार आकृति-माया हरिल रावण ॥ 193 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने सान्त्वना देते हुए उससे कहा,—“ऐसा विचार कभी भी अपने मनमें मत लाना। पण्डित होकर इसपर विचार क्यों नहीं करते? श्रीसीतादेवी भगवान्की प्रेयसी हैं, उनकी देह चिदानन्दमय है। प्राकृत इन्द्रियोंकी उन्हें देखनेकी शक्ति नहीं है। श्रीसीतादेवीको स्पर्श करनेकी बात तो दूर रहे, कोई मायाबद्ध जीव उनका दर्शन भी नहीं कर सकता। उनकी मायिक-आकृतिका ही रावणने हरण किया था॥ 191–193 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सीताजी स्वयं चिदानन्दमूर्ति हैं, उनकी चिदाकृतिकी छायास्वरूप माया-सीताका ही रावणने हरण किया था॥ 192 ॥ रावणके द्वारा छायारूपी सीताका अपहरण :- रावण आसितेइ सीता अन्तर्धान कैल। रावणेर आगे माया-सीता पाठाइल ॥ 194 ॥ वैकुण्ठ-वस्तु जड़के द्वारा मापी नहीं जा सकती :- अप्राकृत वस्तु नहे प्राकृत-गोचर। वेद-पुराणेते एइ कहे निरन्तर ॥ 195 ॥ महाप्रभुके द्वारा आश्वासन :- विश्वास करह तुमि आमार वचने। पुनरपि कु-भावना ना करिह मने ॥” 196 ॥ अनुवाद—रावणके आते ही वास्तविक सीता अन्तर्धान हो गयी थीं और रावणको छलनेके लिये उन्होंने अपने मायामय रूपको ही उसके सामने भेजा था। अप्राकृत वस्तु प्राकृत इन्द्रियोंसे अनुभव नहीं की जा सकती। वेद-पुराणोंका सदा यही निर्णय है। मेरी बातपर विश्वास करो और फिर कभी भी अपने मनमें इस प्रकारकी बुरी भावना मत लाना॥” 194–196 ॥ अनुभाष्य—(कठोपनिषद् 2/3)— “इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम्। सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम्॥ अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वञ्च गच्छति॥ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य, न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो, य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ×× नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ॥” (भाः 10/84/13)— 368 ।
नौवाँ अध्याय 9/195-200 ] “यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः। यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः॥” अर्थात् “सभी इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे देह और इन्द्रियोंका स्वामी जीवात्मा श्रेष्ठ है एवं जीवात्मासे अव्यक्त (जिसे अतिक्रम करना अति दुष्कर है) माया श्रेष्ठ है। मायासे सर्वव्यापक और प्राकृतधर्मरहित पुरुषोत्तम श्रेष्ठ है। उनको जाननेसे ही जीव अमृतत्व (जन्म-मृत्युसे मुक्ति) प्राप्त करता है। उनका रूप जीवको दिखलायी नहीं देता, कोई भी (अपनी चेष्टासे) नेत्रोंसे उनके दर्शन नहीं कर सकता। वे केवल भक्तिसे पवित्र हुए हृदयसे निर्मल मनके द्वारा और विशुद्ध बुद्धिकी सहायतासे जीवकी धारणाके विषय होते हैं। जो उनको इस प्रकार जानता है, वही अमृतत्व लाभ करता है।xx वे परमेश्वर वाणीके द्वारा नहीं जाने जाते, मनके द्वारा उनका बोध नहीं होता, नेत्रोंके द्वारा वे देखें नहीं जा सकते (कठोपनिषद्)।” “जो मनुष्य त्रिधातुओं (कफ-वात-पित्त) से बने जड़ शरीरमें आत्मबुद्धि, स्त्री-पुत्रादिमें ममत्वबुद्धि, जन्मभूमिमें पूजनीयबुद्धि तथा जलादिमें तीर्थबुद्धि रखता है—किन्तु इन समस्त बुद्धिके मध्य किसी प्रकारकी बुद्धि भगवद्भक्तोंमें नहीं हो, तो वह गाय आदि (घास चरनेवाले) पशुओंमें भी गधा ही है॥”195॥ ब्राह्मणका महाप्रभुके वाक्योंपर विश्वास और भोजन :- प्रभुर वचने विप्रेर हइल विश्वास। भोजन करिल, हैल जीवनेर आश॥ 197॥ अनुवाद-महाप्रभुके वचन सुनकर ब्राह्मणको उनपर विश्वास हुआ। तब उसने भोजन किया और उसमें जीवनको धारण करनेकी आशाका सञ्चार हुआ॥ 197॥ दुर्वशनमें 'रामचन्द्र'का दर्शन :- ताँरे आश्वासिया प्रभु करिला गमन। कृतमालाय स्नान करि' आइला दुर्वशन॥ 198॥ महेन्द्रपर्वतपर भृगुराम-दर्शन :- दुर्वशने रघुनाथे कैल दरशन। महेन्द्र-शैले परशुरामेर कैल वन्दन॥ 199॥ अनुवाद-उस ब्राह्मणको आश्वासन देकर महाप्रभु वहाँसे चल दिये और कृतमाला नदीमें स्नान करके दुर्वशन नामक स्थानपर आये। दुर्वशनमें महाप्रभुने श्रीरघुनाथके दर्शन किये। फिर महेन्द्र-पर्वतपर जाकर श्रीपरशुरामके दर्शनकर उनकी वन्दना की॥198-199॥ अनुभाष्य- 'दुर्वशन'-'दर्भशयन' अथवा श्रीरामचन्द्रजीका मन्दिर, रामनादसे सात मील पूर्वकी ओर समुद्रके तटपर अवस्थित है। 'महेन्द्र-शैल'-'तिनेभेलि'के निकट इस पर्वतकी तलहटीमें 'त्रिचिनगुड़िं'-नगर है; इसके पश्चिममें त्रिवाङ्कुर-राज्य है। रामायणमें महेन्द्र-पर्वतका उल्लेख मिलता है॥199॥ धनुषकोटि-तीर्थ-स्नान, रामेश्वरका दर्शन और विश्राम :- सेतुबन्धे आसिं' कैल धनुस्तीर्थे स्नान। रामेश्वर देखि' ताँहा करि विश्राम॥ 200॥ अनुवाद-वहाँसे सेतुबन्ध (रामेश्वर)में आकर महाप्रभुने धनुस्तीर्थमें स्नान किया और रामेश्वरका दर्शन करके वहाँपर विश्राम किया॥200॥ अनुभाष्य- सेतुबन्ध, धनुस्तीर्थ और रामेश्वर-'मण्डपम्' और 'पम्बम्' द्वीपके बीच समुद्रमें कहीं रेतीला और कहीं जलमग्न मार्ग वर्तमान है। पम्बम् द्वीपकी लम्बाई साढ़े पाँच कोस और चौड़ाई तीन कोस है। पम्बम्-बन्दरगाहसे चार मील उत्तरमें 'रामेश्वर'-मन्दिर है-“देवीपत्तनमारभ्य गच्छेयुः सेतुबन्धम्।” इस स्थानपर चौबीस तीर्थ हैं, उनमेंसे 'धनुष्कोटि' भी एक है। यह रामेश्वरसे बारह मील दक्षिण-पूर्वमें है। विभीषणकी प्रार्थनापर अयोध्या वापिस लौटनेसे पहले श्रीरामचन्द्रने (मतान्तरमें लक्ष्मणने) अपने धनुषके कोनेसे सेतु (पुल) को तोड़ दिया था। इस धनुस्तीर्थका दर्शन करनेसे पुनर्जन्म नहीं होता; धनुस्तीर्थमें स्नान करनेसे । 369
[ 9/200–211 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अग्निष्टोमादि यज्ञोंकी अपेक्षा अधिक फल प्राप्त होता है। पम्बम्-द्वीपमें स्थित सेतुबन्धमें रामेश्वर-शिवमूर्ति अर्थात् 'राम ही जिनके ईश्वर हैं',-ऐसे भक्तावतार शिवकी मूर्ति है॥ 200 ॥ ब्राह्मणोंकी सभामें कूर्मपुराणके पाठका श्रवण :- विप्र-सभाय सुने ताँहा कूर्म-पुराण। तार मध्ये आइला पतिव्रता-उपाख्यान॥ 201 ॥ पतिव्रता-शिरोमणि जनक-नन्दिनी। जगतेर माता सीता-रामेर गृहिणी॥ 202 ॥ अनुवाद—रामेश्वरमें ब्राह्मण-सभामें महाप्रभुने कूर्म-पुराणकी कथाको सुना। कथामें पतिव्रताका प्रसङ्ग आया कि जनकनन्दिनी सीताजी पतिव्रता-शिरोमणि हैं, वे श्रीरामचन्द्रकी पत्नी और जगत्-माता हैं॥ 201-202 ॥ अनुभाष्य—'कूर्मपुराण'—वर्तमान समयके कूर्म-पुराणमें केवलमात्र पूर्व और उत्तर—दो खण्ड ही प्राप्त होते हैं। वास्तविक कूर्मपुराण छह हजार श्लोकवाला नहीं; इसमें सत्तरह हजार श्लोक थे। भागवतके मतानुसार—“तत् सप्त-दशसाहस्रं सूचतुःसंहितं शुभम्। सप्तदश-सहस्राणि लक्ष्मीकल्पानुषङ्गिकम्॥”—यह अठारह महापुराणोंमें पन्द्रहवाँ पुराण है॥ 201 ॥ रावणका छाया-सीताके अपहरणके वृत्तान्तका श्रवण :- रावण देखिया सीता लैल अग्निर शरण। रावण हैते अग्नि कैल सीताके आवरण॥ 203 ॥ 'मायासीता' रावण निल, शुनिला आख्याने। शुनि' महाप्रभु हैल आनन्दित मने॥ 204 ॥ सीता लञा राखिलेन पार्वतीर स्थाने। 'मायासीता' दिया अग्नि वञ्चिला रावणे॥ 205 ॥ रघुनाथ आसि' यबे रावणे मारिल। अग्नि-परीक्षा दिते यबे सीतारे आनिल॥ 206 ॥ तबे मायासीता अग्न्ये कैल अन्तर्धान। सत्य-सीता आनि' दिल राम-विद्यमान॥ 207 ॥ अनुवाद—रावणको देखकर सीताजीने अग्निदेवकी शरण ली और अग्निदेवने सीताजीको रावणसे छिपा लिया। रावणने तो 'मायासीता'का हरण किया था, यह सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। अग्निदेवने असली सीताजीको पार्वतीजीके पास पहुँचा दिया और मायासीता देकर रावणके साथ छल किया। श्रीरघुनाथने जब रावणका वध किया और सीताजीकी अग्नि-परीक्षाके लिये जब उन्हें लाया गया, तब अग्निदेवने मायासीताको अन्तर्धान करके असली सीताजीको लाकर श्रीरामचन्द्रको सौंप दिया॥ 203-207 ॥ सत्-सिद्धान्त सुननेसे महाप्रभुको आनन्द और पुराणके ग्रन्थके पन्नोंको लेना :- ए-सब सिद्धान्त शुनि' प्रभुर आनन्द हैल। ब्राह्मणेर स्थाने मागि' सेइ पत्र निल॥ 208 ॥ नूतन पत्र लेखाञा पुस्तके देओयाइल। प्रतीति लागि' पुरातन पत्र मागि' निल॥ 209 ॥ अनुवाद—ये सब सिद्धान्त सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ और उन्होंने उन ब्राह्मणोंसे कूर्मपुराणके उन पन्नोंको माँगकर ले लिया। महाप्रभुने उन पुराने पन्नोंकी नकल करवाकर नये पन्नोंको पुरानी पुस्तकमें जोड़ दिया और प्रमाणके रूपमें उन्होंने ब्राह्मणोंसे पुराने पन्नोंको अपने पास रखनेकी अनुमति ले ली॥ 208-209 ॥ दक्षिण-मथुरामें आकर सीताभक्त ब्राह्मणको पत्रार्पण :- पत्र लञा पुनः दक्षिण-मथुरा आइला। रामदास-विप्रे सेइ पत्र आनि' दिला॥ 210 ॥ अनुवाद—उन पन्नोंको लेकर महाप्रभु पुनः दक्षिण मथुरा (मदुरा)में आये और उन्होंने रामदास ब्राह्मणको वे मूल-पत्रे दिये॥ 210 ॥ रावणके द्वारा मायासीता-अपहरणसूचक श्लोक :- कूर्मपुराण और बृहद्वह्निपुराण— सीताराधितो वह्निश्च्छाया-सीतामजीजनत्। तां जहार दशग्रीवः सीता वह्निपुरं गता॥ 211 ॥ 370 ।
नौवाँ अध्याय 9/211-218 ] परीक्षा-समये वहिं छाया-सीता विवेश सा। वह्निः सीतां समानीय तत्पुरस्तादनीनयत् ॥ 212 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 211-212 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सीताजीके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर अग्निदेवने 'छायासीता' प्रस्तुत की। दसमूख रावणने उन्हीं छायासीताका हरण किया था, मूल-सीताजी अग्निलोकमें ही रहीं। श्रीरामचन्द्रने जब परीक्षा की, तब छायासीताने अग्निमें प्रवेश किया, अग्निदेवने मूल सीताजीको लाकर उन्हें श्रीरामचन्द्रके निकट उपस्थित किया॥ 211-212 ॥ अनुभाष्य— सीतया (जनकनन्दिन्या) वह्निः (अग्निदेवः) आराधितः (अर्चितः सन्) छायासीतां (मायामयीं तादृशीं मूर्त्तिम्) अजीजनत् (प्रकटितवान्)। दशग्रीवः (दशभिरिन्द्रियैः भोगपरायणः रावणः) तां (प्राकृतां छायासीताम् एव, न तु मूलसीतां, सीतायाः अधोक्षजत्वात्) जहार। सीता (मूलसीता) [तु] वह्निपुरं गता। परीक्षासमये सा छायासीता वहिं विवेश। वह्निः तत्पुरस्तात् सीतां (मूलसीतां) समानीय अनीनयत्। श्लोक-भावानुवाद—जनकनन्दिनी सीताजीके द्वारा प्रार्थना करनेपर अग्निदेवने सीताजीके समान ही एक मायाकी मूर्ति प्रकटित कर दी। दसों इन्द्रियोंके द्वारा जो भोगोंमें ही लगा रहता था, उस दशानन रावणने छाया सीताका ही हरण किया था, मूल सीताका नहीं, क्योंकि सीताजी अधोक्षज हैं अर्थात् प्राकृत इन्द्रियाँ उन्हें देख-स्पर्श नहीं कर सकतीं। मूल सीताजी तो अग्नि लोकमें चली गयीं। परीक्षाके समय वह छाया सीता अग्निमें प्रवेश कर गयी और अग्निदेव मूलसीताको अपने लोकसे अपने साथ ले आये॥ 211-212 ॥ कूर्मपुराणके पन्ने और श्लोक-दर्शनसे विप्रको आनन्द :- पत्र पाञा विप्रेर हैल आनन्दित मन। प्रभुर चरणे धरि' करये क्रन्दन ॥ 213 ॥ अनुवाद—कूर्मपुराणके उन प्राचीन पत्रोंको प्राप्त करके वह ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर रोने लगा॥ 213 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कूर्मपुराण ग्रन्थमें नये पत्रोंको लिखवाकर रामदासको दिखानेके लिये जिन प्राचीन पत्रोंको महाप्रभु लाये थे, उस पत्रोंको पाकर ब्राह्मणका मन बहुत प्रसन्न हुआ॥ 213 ॥ महाप्रभुको 'रघुनाथ' मानना :- विप्र कहे,–“तुमि साक्षात् श्रीरघुनन्दन। संन्यासीर वेषे मोरे दिला दरशन ॥ 214 ॥ ब्राह्मणका दैन्य, महाप्रभुको निमन्त्रण और भिक्षा दान :- महा-दुःख हइते मोरे करिला निस्तार। आजि मोर घरे भिक्षा कर अङ्गीकार ॥ 215 ॥ मनोदुःखे भाल भिक्षा ना दिल सेइ दिने। मोर भाग्ये पुनरपि पाइलुँ दरशने ॥” 216 ॥ एत बलि' सेइ विप्र सुखे पाक कैल। उत्तम प्रकारे प्रभुके भिक्षा कराइल ॥ 217 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने कहा,–“आप तो साक्षात् श्रीरघुनन्दन हैं जो संन्यासीके वेशमें मुझे अपने दर्शन दे रहे हैं। आपने महान् दुःखसे मेरा उद्धार किया है। कृपा करके आज आप मेरे घरपर भिक्षा ग्रहण कीजिये। मनमें दुःख होनेके कारण मैं उस दिन आपको अच्छी तरहसे भोजन नहीं करा सका, परन्तु मेरे सौभाग्यसे आज आप पुनः मेरे घरमें आये हैं।” यह कहकर उस ब्राह्मणने बड़े आनन्दसे भोजन बनाया और उत्तम-उत्तम व्यञ्जनोंके द्वारा महाप्रभुको भोजन कराया ॥ 214-217 ॥ एक रात ब्राह्मणके घरमें वास और ताम्रपर्णीमें स्नान :- सेइ रात्रि ताँहा रहि' ताँरे कृपा करि'। पाण्ड्यदेशे ताम्रपर्णी गेला गौरहरि ॥ 218 ॥ अनुवाद—उस रात महाप्रभु ब्राह्मणके घरमें ही रहे। अगले दिन उसपर कृपा करके श्रीगौरहरि पाण्ड्यदेशमें ताम्रपर्णीके लिये चले गये ॥ 218 ॥ । 371
[ 9/218-222 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य- 'पाण्ड्यदेश'-दक्षिण भारतके 'केरल' और 'चोल' राज्यका मध्यवर्ती प्रदेश है। यहाँपर बहुतसे 'पाण्ड्य' उपाधिधारी राजाओंने मदुरा और रामेश्वरपर राज्य किया। रामायण (किष्किन्धाकाण्ड 41/17-18)में- “ताम्रपर्णीं ग्राहजुष्टां तरिष्यथ महानदीम्। स चन्दनवनैश्चित्रैः प्रच्छन्नद्वीपवारिणीम्। युक्तं कपाटं पाण्ड्यानां गता द्रक्ष्यथ वानराः॥” अर्थात् “ताम्रपर्णी नदीके द्वीप और जल विचित्र चन्दनवनोंसे आच्छादित हैं, अतः वह सुन्दर साड़ीसे विभूषित युवती प्रेयसीकी भाँति अपने प्रियतम समुद्रसे मिलती है। वानरों ! वहाँसे आगे बढ़नेपर तुम लोग पाण्ड्यवंशी राजाओंके नगरद्वारपर लगे हुए सुवर्णमय कपाटका दर्शन करोगे, जो मुक्तामणयोंसे विभूषित और दिव्य है।” 'ताम्रपर्णी'-'तिनेभेली' नदीके बाँये तटपर अवस्थित है; इसको 'परुणे' कहते हैं। यह नदी 'पश्चिम घाट'-पर्वतसे बाहर निकलकर बङ्गालकी खाड़ीमें मिलती है। (भाः 11/5/31)-“ताम्रपर्णी-नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी।” अर्थात् जहाँ ताम्रपर्णी, कृतमाला और पयस्विनी नदियाँ बहती हैं॥ 218 ॥ नव-तिरुपतिका दर्शन :- ताम्रपर्णी स्नान करि' ताम्रपर्णी-तीरे। नय त्रिपति देखि' बुले कुतूहले ॥ 219 ॥ अनुवाद-ताम्रपर्णी नदीमें स्नान करके महाप्रभुने ताम्रपर्णीके तटपर स्थित नौ विष्णुके मन्दिरोंमें दर्शनके लिये कौतूहलसे वहाँ भ्रमण करने लगे ॥ 219 ॥ अनुभाष्य- 'नय तिरुपति'-'आलोवर तिरुनगरी', यह नगर तिनेभेलीसे सतरह मील दक्षिण-पूर्वमें है; इसके चारों ओर नौ श्रीपति अर्थात् विष्णुके मन्दिर वर्तमान हैं। सभी नौ विग्रह उत्सवके उपलक्षमें इस नगरमें एकत्रित होते हैं॥ 219 ॥ चियड़तलामें श्रीराम-लक्ष्मण और तिलकाञ्चीमें शिवका दर्शन :- चियड़तला तीर्थे देखि' श्रीराम-लक्ष्मण। तिलकाञ्ची आसि' कैल शिव-दरशन ॥ 220 ॥ अनुवाद-वहाँसे चियड़तला तीर्थमें आकर महाप्रभुने श्रीराम-लक्ष्मणके दर्शन किये। और फिर तिलकाञ्चीमें आकर शिवजीके दर्शन किये ॥ 220 ॥ अनुभाष्य- 'चियड़तला'-कोई-कोई इसे 'छेरतला' कहते हैं, यह नगरकैलैरेके निकट है; यहाँ श्रीरामलक्ष्मणका मन्दिर है। 'तिलकाञ्ची'-शिवमन्दिर, सम्भवतः इसे तिनेभेली-नगरसे तीस मील उत्तर-पूर्व दिशामें 'तेन काशी'को लक्ष्य करके कहा गया है॥ 220 ॥ गजेन्द्रमोक्षणमें विष्णु और पानागड़िमें श्रीरामका दर्शन :- गजेन्द्रमोक्षण-तीर्थे देखि' विष्णुमूर्त्ति। पानागड़ि-तीर्थे आसि' देखिल सीतापति ॥ 221 ॥ अनुवाद-उसके बाद महाप्रभु गजेन्द्रमोक्षण-तीर्थमें गये और वहाँ श्रीविष्णुमूर्तिके दर्शन किये। और फिर पानागड़ि-तीर्थमें आकर सीतापति श्रीरामचन्द्रके दर्शन किये ॥ 221 ॥ अनुभाष्य- 'गजेन्द्र-मोक्षण'-भ्रमके कारण कोई-कोई इसको नगरकैलवेरसे दो मील दक्षिणमें स्थित 'स्थानुलिङ्ग' अथवा 'देवेन्द्र-मोक्षणशिव'के नामसे कहते हैं, वास्तवमें ये श्रीविष्णुविग्रह हैं। 'पानागड़ि'-'पानागाड़ि', त्रिवेन्द्रम जाते समय तिनेभेलीसे तीस मील दक्षिणमें, थोड़ेसे पश्चिम कोणमें। पहले यहाँपर श्रीराममूर्ति थी, बादमें शैव लोग उनको 'रामेश्वर' अथवा 'रामलिङ्ग शिव'के रूपमें पूजा करते आ रहे हैं॥ 221 ॥ चाम्तापुरमें श्रीराम-लक्ष्मण, श्रीवैकुण्ठमें विष्णु-दर्शन :- चाम्तापुरे आसि' देखि' श्रीराम-लक्ष्मण। श्रीवैकुण्ठे आसि' कैल विष्णु-दरशन ॥ 222 ॥ 372 ।
नौवाँ अध्याय 9/222–225 ]
अनुवाद—चाम्तापुरमें आकर महाप्रभुने श्रीराम-लक्ष्मणके दर्शन किये। और वहाँसे श्रीवैकुण्ठमें आकर श्रीविष्णुके दर्शन किये॥ 222॥ अनुभाष्य—'चाम्तापुर'—सम्भवतः त्रिवाङ्कुर-राज्यमें स्थित 'चेङ्गानुर' है। यहाँपर श्रीराम-लक्ष्मणका मन्दिर है। 'श्रीवैकुण्ठ'—'श्रीवैकुण्ठम्', आलोयार तिरूनगरीसे चार मील उत्तर एवं तिनेर्भेलीसे सोलह मील दक्षिण-पूर्वमें ताम्रपर्णी नदीके बाँये तटपर अवस्थित है॥ 222॥
कुमारिकामें अगस्त्य-दर्शन :— मलय-पर्वते कैल अगस्त्य-वन्दन। कन्याकुमारी ताँहा कैल दरशन॥ 223॥
अनुवाद—महाप्रभुने मलय पर्वतपर आकर श्रीअगस्त्य मुनिकी वन्दना की। महाप्रभुने फिर कन्याकुमारीका दर्शन किया॥ 223॥ अनुभाष्य—'मलय पर्वत'—दक्षिण भारतमें केरलसे कन्याकुमारी (Cape Comorin) तक फैली हुई पर्वतमाला है। 'अगस्त्य'के सम्बन्धमें चार मत हैं—(1) ताञ्जोर जिलेमें कलिमियार प्वाइंटमें वेदारण्यमके निकट अगस्त्यम्पल्ली-ग्राममें एक अगस्त्य-मुनिका मन्दिर है; (2) मादुरा जिलेमें शिवगिरि पर्वतके शिखरपर अगस्त्य मुनिके द्वारा निर्मित एक सुब्रह्मण्यका (स्कन्दका) मन्दिर है; (3) कोई-कोई कन्याकुमारीके निकटवर्ती पठिया-पर्वतको अगस्त्यका वासस्थान कहते हैं; (4) ताम्रपर्णी नदीके दोनों ओर केलेकी आकृतिवाली चोटी 'अगस्त्यमलय'के नामसे जानी जाती है। 'कन्याकुमारी'—कुमारिका-अन्तरीप॥ 223॥
आम्लितलामें श्रीराम-दर्शन :— आम्लितलाय देखि' श्रीराम गौरहरि। मल्लार-देशेते आइला यथा भट्टथारि॥ 224॥
अनुवाद—तब श्रीगौरहरिने आम्लितलामें श्रीरामचन्द्रके दर्शन किये। वहाँसे वे मल्लारदेशमें आये, जहाँ 'भट्टथारि' लोग वास करते थे॥ 224॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भट्टथारि'—जिनको चलती भाषामें किसी-किसी स्थानपर 'भाटओयारी' कहते हैं; इनका अपना कोई घर-द्वार नहीं होता। जब जहाँ भी रहते हैं, वे वहाँ तम्बुओंमें रहते हैं। इनका बाहरसे तो संन्यासी वेश होता है, किन्तु इनका व्यवसाय चोरी करना और दूसरोंको ठगना है। ये बहुतसी स्त्रियोंको ठगकर लाते हैं और उन्हें अपने शिविरमें रखते हैं। फिर दूसरे लोगोंको स्त्रियाँ दिखलाकर उन्हें भ्रमित करके अपने दलको बढ़ाते हैं। बङ्गालमें जैसे वेदोंकी पाठशालाएँ हैं, पश्चिम और दक्षिण भारतमें उस प्रकार भाटओयारियोंकी 'शिरकि' हैं॥ 224॥ अनुभाष्य—'मल्लारदेश'—म्यालेबार-देश। इसके उत्तरमें दक्षिण-कानाड़ा (कर्नाटक), पूर्वमें कूर्ग और महीशूर, दक्षिणमें कोचीन एवं पश्चिममें अरब-सागर है॥ 224॥
मालावरादेशमें तमाल-कार्तिक और वेतापनिमें रामके दर्शनकर एक रात वास :— तमाल-कार्तिक देखि' आइल वेतापनि। रघुनाथ देखि' ताँहा वञ्चिला रजनी॥ 225॥
अनुवाद—तमाल-कार्तिकका दर्शन करके महाप्रभु वेतापनि आये और श्रीरघुनाथके दर्शन करके वहीं रात बितायी॥ 225॥ अनुभाष्य—'तमाल कार्तिक'—तिनेभेलीसे चव्वालीस मील दक्षिणमें और 'अमरवल्ली' पर्वतके बीच सङ्कुचित स्थानसे दो मील दक्षिणमें, तोवल-तालुकाके अन्तर्गत सुब्रह्मण्य या कार्तिकदेवका मन्दिर है। 'वेतापनि'—'भूतपण्डि'। यह त्रिवाङ्कुर राज्यमें, नगर-कैलके उत्तरमें, तोबल-तालुकाके बीचमें है। पहले श्रीमन्दिरमें श्रीरामचन्द्रके विग्रह थे। लगता है, वही बादमें रामेश्वर अथवा भूतनाथ शिवलिङ्गके नामसे पूजित हो रहे हैं॥ 225॥
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[ 9/226-236 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भट्टथारिके चङ्गुलमें महाप्रभुके सङ्गी कृष्णदास ब्राह्मण :- गोसाञिर सङ्गे रहे कृष्णदास ब्राह्मण। भट्टथारि-सह ताँहा हैल दरशन ॥ 226 ॥ स्त्रीधन देखाञा तारे लोभ जन्माइल। आर्य सरल विप्रेर बुद्धिनाश कैल ॥ 227 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके साथ उनका सेवक कृष्णदास आया था। वह ब्राह्मण था, परन्तु भट्टथारियोंके साथ उसकी भेंट हो गयी। भट्टथारियोंने उसे स्त्रियाँ दिखलाकर उसमें लोभ उत्पन्न कर दिया, जिसने उस सरल पवित्र ब्राह्मणकी बुद्धि नष्ट कर दी ॥ 226-227 ॥ अनुभाष्य- 'भट्टथारि'-मध्यलीला 1/112 संख्या देखें ॥ 226 ॥ कृष्णदासको ढूँढ़ते हुए भट्टथारिके शिविरमें महाप्रभुका आगमन :- प्राते उठि' आइला विप्र भट्टथारि-घरे। ताहार उद्देशे प्रभु आइला सत्वरे ॥ 228 ॥ अनुवाद-प्रातःकालमें उठते ही कृष्णदास ब्राह्मण स्त्री लोभसे महाप्रभुको छोड़कर भट्टथारियोंके शिविरमें आ गया। और महाप्रभु उसे ढूँढ़ते हुए शीघ्रतासे वहाँ आ पहुँचे ॥ 228 ॥ भट्टथारियोंसे महाप्रभुके द्वारा कृष्णदासकी याचना :- आसिया कहेन सब भट्टथारिगणे। “आमार ब्राह्मण तुमि राख कि कारणे ॥ 229 ॥ आमिह संन्यासी देख, तुमिह संन्यासी। मोरे दुःख देह, -तोमार 'न्याय' नाहि वासि ॥" 230 ॥ अनुवाद-आकर महाप्रभुने भट्टथारियोंसे कहा,-"मेरे साथी ब्राह्मणको तुमने अपने पास किसलिये रख लिया है? मैं संन्यासी हूँ और आप भी संन्यासी हो, परन्तु आप मुझे जानबूझकर दुःख दे रहे हो, इसका कोई न्यायसङ्गत कारण मुझे दिखलायी नहीं देता ॥ " 229-230 ॥ भट्टथारियोंके द्वारा महाप्रभुपर आक्रमण, किन्तु महाप्रभुके अचिन्त्य-शक्तिबलसे वे ही आक्रान्त हुए :- शुनि' सब भट्टथारि उठे अस्त्र लञा। मारिबारे आइल सबे चारिदिके धाञा ॥ 231 ॥ तार अस्त्र तार अङ्गे पड़े हात हैते। खण्ड खण्ड हैल भट्टथारि पलाय चारिभिते ॥ 232 ॥ महाप्रभुके द्वारा कृष्णदास ब्राह्मणका उद्धार :- भट्टथारि-घरे ताँहा उठिल क्रन्दन। केशे धरि' विप्रे लञा करिल गमन ॥ 233 ॥ अनुवाद-यह सुनकर सभी भट्टथारि अपने अस्त्र लेकर उठ खड़े हुए और महाप्रभुको मारनेके लिये सब चारों ओरसे दौड़कर आये। परन्तु उनके अस्त्र उनके हाथोंसे छूटकर उनके ही अङ्गोंपर आघात करने लगे। जब कुछ भट्टथारियोंके शरीर खण्ड-खण्ड हो गये, तब बचे हुए भट्टथारि चारों दिशाओंमें भागने लगे। भट्टथारियोंके शिविरमें उनके सम्बन्धी जोर-जोरसे रोने लगे और महाप्रभु कृष्णदास ब्राह्मणको केशोंसे पकड़कर वहाँसे लेकर चल दिये ॥ 231-233 ॥ आदिकेशव-मन्दिरमें विष्णु-दर्शनसे महाप्रभुका नृत्य-गीत और उनके दर्शनसे सभीका आश्चर्यचकित होना :- सेइ दिन चलि' आइला पयस्विनी-तीरे। स्नान करि' गेला आदिकेशव-मन्दिरे ॥ 234 ॥ केशव देखिया प्रेमे आविष्ट हैला। नति, स्तुति, नृत्य, गीत, बहुत करिला ॥ 235 ॥ प्रेम देखि' लोके हैल महा-चमत्कार। सर्वलोक कैल प्रभुर परम सत्कार ॥ 236 ॥ अनुवाद-उस दिन चलकर महाप्रभु पयस्विनी नदीके तटपर पहुँचे। वहाँ स्नान करके वे आदिकेशवके मन्दिरमें गये। आदिकेशवके दर्शन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और उनको प्रणाम करके उनकी 374 ।
नौवाँ अध्याय [ 9/234-242 ] स्तव-स्तुति की। तब बहुत देर तक महाप्रभुने नृत्य-गान किया। महाप्रभुके प्रेमको देखकर लोगोंको बहुत आश्चर्य हुआ और सभी लोगोंने महाप्रभुका परम सत्कार किया ॥ 234-236 ॥ शुद्धभक्त-सङ्गसे ब्रह्मसंहिताके पाँचवें अध्यायकी प्राप्ति :- महाभक्तगणसह ताँहा गोष्ठी कैल। 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-पुँथि ताँहा पाइल ॥ 237 ॥ अनुवाद-आदिकेशव मन्दिरमें महाप्रभुने वहाँ एकत्रित महान्-भक्तोंके साथ इष्टगोष्ठी की। वहाँ उन्हें 'ब्रह्मसंहिता' ग्रन्थके एक अध्यायकी (पाँचवें अध्यायकी) एक पोथी प्राप्त हुई ॥ 237 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-ब्रह्मसंहिताका पाँचवाँ अध्याय, जो अब बङ्गालमें श्रीजीवगोस्वामीकी टीकाके साथ मिलता है ॥ 237 ॥ ग्रन्थ-दर्शनसे महाप्रभुको आनन्द :- पुँथि पाञा प्रभुर हैल आनन्द अपार। कम्पाश्रु-पुलक-स्वेद-स्तम्भ विकार ॥ 238 ॥ अनुवाद-इस पोथीको प्राप्त करके महाप्रभुको अपार प्रसन्नता हुई और कम्प, अश्रु, पुलक, स्वेद और स्तम्भादि अष्ट-सात्त्विक विकार उनकी देहमें प्रकाशित हो आये ॥ 238 ॥ ब्रह्मसंहिताका माहात्म्य :- सिद्धान्त-शास्त्र नाहि 'ब्रह्मसंहिता'र सम। गोविन्दमहिमा-तत्त्व परम कारण ॥ 239 ॥ अल्पाक्षरे कहे सिद्धान्त अपार। सकल-वैष्णवशास्त्र-मध्ये अति सार ॥ 240 ॥ अनुवाद-ब्रह्मसंहिताके समान और कोई भी सिद्धान्त-शास्त्र नहीं है। यह ग्रन्थ श्रीगोविन्दकी महिमाको सर्वाधिक प्रकाशित करनेवाला है, क्योंकि इसमें उनका सर्वोत्तम तत्त्व प्रकाशित हुआ है। समस्त सिद्धान्त इस ग्रन्थमें संक्षेपमें वर्णन किये गये हैं। यह ग्रन्थ सभी वैष्णव-शास्त्रोंका परमसार स्वरूप है ॥ 239-240 ॥ अनुभाष्य- 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-'ब्रह्मसंहिता'-ग्रन्थका पाँचवाँ अध्याय। इसमें अचिन्त्यभेदाभेदस्थिति, अभ्यास, अष्टादशाक्षर मन्त्र, आत्मा, आत्माराम, कर्म, कामगायत्री, कामबीज, कारणब्धिशायी, कृष्णधामका चिद्-विशेष, गणेश, गर्भोदकशायी, गायत्री-उत्पत्ति, गोकुल, 'गोविन्द-रूप, स्वरूप-तत्त्व और धाम', जीवतत्त्व, जीवका प्राप्य स्वरूप, दुर्गा, तप, पञ्चभूत, प्रेम, ब्रह्म, ब्रह्माजीकी दीक्षा, भक्तिनेत्र, भक्तिके सोपान (सीढ़ियाँ), मन, महाविष्णु, योगनिद्रा, रमा, रागमार्गीय भक्ति, श्रीरामादि अवतार, लिङ्गादि शब्दका तात्पर्य, बद्धजीव, उसका साधन, विष्णुतत्त्व, वेदसार-स्तव, शम्भु, श्रुत, स्वकीय, परकीय, सदाचार, सूर्य और हैमाण्ड आदि विषय वर्णित हुए हैं ॥ 237-240 ॥ श्रीअनन्त पद्मनाभ-दर्शन :- बहु यत्ने सेइ पुँथि लइला लिखिया। 'अनन्त-पद्मनाभ' आइला हरषित हञा ॥ 241 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने बड़े यत्नसे ब्रह्म-संहिता ग्रन्थ लेकर उसकी नकल करवाकर अपने पास रख ली। फिर महाप्रभु हर्षित होकर 'अनन्त-पद्मनाभ' आये ॥ 241 ॥ अनुभाष्य- 'अनन्त-पद्मनाभ'-मध्यलीला 1/115 संख्या देखें ॥ 241 ॥ दो दिन वहाँ वास और बादमें श्रीजनार्दनका दर्शन :- दिन-दुइ पद्मनाभेर कैल दरशन। आनन्दे देखिते आइला श्रीजनार्दन ॥ 242 ॥ अनुवाद-दो दिन तक वहाँ रहकर महाप्रभुने भगवान् पद्मनाभके दर्शन किये और फिर आनन्दपूर्वक श्रीजनार्दनके दर्शनके लिये आये ॥ 242 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीजनार्दन'-त्रिवेन्द्रमके छब्बीस मील उत्तरमें वर्काला-रेलवे स्टेशनके निकट विराजमान हैं ॥ 242 ॥ । 375
[ 9/243-244 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पयस्विनीके तटपर शङ्कर नारायण-दर्शनः- दिन दुइ ताँहा करि' कीर्त्तन-नर्त्तन। पयस्विनी आसिया देखे शङ्कर नारायण ॥ 243 ॥ अनुवाद-दो दिन तक वहाँ रहकर महाप्रभुने नृत्य-कीर्तन किया और वहाँसे पयस्विनी नदीके तटपर आकर शङ्कर नारायणके दर्शन किये ॥ 243 ॥ शृङ्गेरि-मठमें आगमन और बादमें मत्स्यतीर्थ दर्शन :- शृङ्गेरि-मठे आइला शङ्कराचार्य-स्थाने। मत्स्य-तीर्थ देखि' कैल तुङ्गभद्राय स्नाने ॥ 244 ॥ अनुवाद-उसके बाद महाप्रभु शङ्कराचार्यके स्थान शृङ्गेरि-मठमें आये। फिर मत्स्यतीर्थका दर्शन करके उन्होंने तुङ्गभद्रा नदीमें स्नान किया ॥ 244 ॥ अनुभाष्य- 'शृङ्गेरि-मठ'-महीशूरके अन्तर्गत शिमोगा जिलेमें शृङ्गेरि-मठ है। यह स्थान तुङ्गभद्रा नदीके बाँये तटपर और हरिहरपुरके सात मील दक्षिणमें अवस्थित है। इसका वास्तविक नाम- (ऋष्य) शृङ्गगिरि अथवा शृङ्गवेर पुरी है। इस स्थानपर दक्षिण भारतमें स्थित शङ्कराचार्यका प्रधान मठ है। श्रीशङ्कराचार्यने अपने चार शिष्योंके द्वारा भारतके (1) उत्तरमें-बदरिकामें ज्योतिर्मठ; (2) पूर्वमें-पुरुषोत्तममें भोगवर्द्धन अथवा गोवर्धन मठ; (3) पश्चिममें-द्वारकामें शारदा मठ और (4) दक्षिणमें-'शृङ्गेरि' मठ स्थापित किये। शृङ्गेरि मठमें 'सरस्वती', 'भारती', 'पुरी'-इन तीन प्रकारका एक-दण्ड संन्यास ग्रहण करते हैं। “चतुर्थो दक्षिणाम्नायः शृङ्गेर्यां वर्त्तते मठः। सम्प्रदायो भूरिवारः भूर्भुवः गोत्र उच्यते ॥ पदानि त्रीणि ख्यातानि सरस्वती भारती पुरी। वराहो देवता यत्र क्षेत्रं रामेश्वरं वदेत् ॥ तीर्थञ्च तुङ्गाभद्राख्यं शक्तिः कामाक्षिका स्मृता। चैतन्य-ब्रह्मचारीति हस्तामलकदेशिकः ॥ आन्ध्र-द्राविड़-कर्णाट-केरलादि-प्रभेदतः। शृङ्गेर्यधीना देशास्ते ह्यावाचीदिगवस्थिताः ॥ स्वरज्ञानरतो नित्यं स्वरवादी कवीश्वरः। संसार-सागरासार-हन्तासौ हि 'सरस्वती' ॥ विद्याभारेण सम्पूर्णः सर्वभावं परित्यजन्। दुःखभारं न जानाति 'भारती' परिकीर्त्यते ॥ ज्ञानतत्त्वेन सम्पूर्णः पूर्णतत्त्वपदे स्थितः। परब्रह्मरतो नित्यं 'पुरी'नामा स उच्यते ॥” (मठाम्नाय) अर्थात् मठका नाम-शृङ्गेरि, दिशा-दक्षिण; देश-आन्ध्र, द्रविड़, कर्णाटक और केरलादि; सम्प्रदाय-भूरिवार, गोत्र-भूर्भुवः, क्षेत्र-रामेश्वर; महावाक्य अथवा बोध-'अहं ब्रह्मास्मि'; देव-वराह; शक्ति-कामाक्षी; आचार्य-हस्तामलक; संन्यास-पदवी-'सरस्वती', 'भारती', और 'पुरी'; ब्रह्मचारी-चैतन्य; तीर्थ-तुङ्गभद्रा; वेद-यजुः। शृङ्गेरि मठके गुरु और संन्यास ग्रहण-काल-परम्परा जैसे-
- शङ्कराचार्य-22 शक।
- सुरेश्वराचार्य-30 शक।
- बोधनाचार्य-680 शक।
- ज्ञानधनाचार्य-768 शक।
- ज्ञानोत्तम शिवाचार्य-827 शक।
- ज्ञानगिरि आचार्य-871 शक।
- सिंहगिरि आचार्य-958 शक।
- ईश्वर तीर्थ-1019 शक।
- नारसिंह तीर्थ-1067 शक।
- विद्यातीर्थ विद्याशङ्कर-1150 शक।
- भारतीकृष्ण तीर्थ-1250 शक।
- विद्यारण्य भारती-1253 शक।
- चन्द्रशेखर भारती-1290 शक।
- नरसिंह भारती-1309 शक।
- पुरुषोत्तम भारती-1328 शक।
- शङ्करानन्द-1350 शक।
- चन्द्रशेखर भारती-1371 शक।
- नरसिंह भारती-1386 शक।
- पुरुषोत्तम भारती-1394 शक।
- रामचन्द्र भारती-1430 शक।
- नरसिंह भारती-1479 शक।
- नरसिंह भारती-1485 शक।
- धनमड़ि नरसिंह भारती-1498 शक। 376 ।