श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1273, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 10/159-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ही संसारसे उद्धार नहीं होता। मनुसंहिता छठा अध्याय— “फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्। न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति।” और इस श्लोककी कुल्लुक-भट्टकृत टीका— “कतक-वृक्षस्य फलं कलुषजलस्वच्छताजनकं, तथापि तन्नामोच्चारणवशात् न प्रसीदति किन्तु फलप्रक्षेपेण। एवं न लिङ्गधारणमात्रम् धर्म-कारणम्।” अर्थात् “ 'कतक'-वृक्षका फल (रीठा) यद्यपि जलको निर्मल करता है, किन्तु इस फलका नाम लेनेसे ही जल निर्मल नहीं होता। कुल्लुक-भट्टकृत टीका—'कतक'-वृक्षका फल गन्दे-जलको स्वच्छ करता है। ऐसा कहकर 'कतक' 'कतक', इस प्रकार नामके उच्चारणसे जल निर्मल नहीं होता, बल्कि जलमें रीठा फल डालनेपर ही जल स्वच्छ होता है। उसी प्रकार केवल धार्मिक-चिह्न धारण करनेसे ही धर्मका पालन नहीं होता।” 'बहिर्वास'—कौपीनके ऊपर पहना जानेवाला वस्त्र ॥ 159-160 ॥ महाप्रभुके प्रणामको ग्रहण करनेमें श्रीभारतीको आपत्ति :- भारती कहे,—“तोमार आचार लोक शिखाइते। पुनः ना करिबे नति, भय पाङ चित्ते ॥ 162 ॥ श्रीभारतीका तत्त्वदर्शन—महाप्रभु और जगन्नाथमें अभेद दर्शन :- साम्प्रतिक 'दुइ ब्रह्म' इहाँ,—'चलाचल' । जगन्नाथ—अचल, तुमि—ब्रह्म सचल ॥ 163 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 162-163 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'साम्प्रतिक'—वर्तमान कालमें। इस पुरुषोत्तममें 'चल' और 'अचल', दो ब्रह्म देख रहा हूँ॥ 163 ॥ अनुभाष्य—लोकशिक्षाके लिये ही आपका आचरण है। यदि आपके मनके अनुसार मैं सदाचार पालन न करूँ, तो आप पुनः मुझे प्रणाम न करके मेरी उपेक्षा करेंगे, इसलिये मुझे भय हो रहा है। 'श्रीजगन्नाथ विग्रह'—अचल-ब्रह्म एवं आप श्रीचैतन्य महाप्रभु—सचल ब्रह्म हैं। आप दोनों ही मायाधीश चल-अचल ब्रह्मवस्तु स्वरूपमें इस समय श्रीपुरुषोत्तममें विराजमान हैं ॥ 162-163 ॥ तुमि—गौरवर्ण, तेंह—श्यामवरण। दुइ ब्रह्म कैल सब जगत्-तारण ॥” 164 ॥ अनुवाद—आप गौरवर्ण हैं और वे श्यामवर्णके हैं। आप दोनों ब्रह्म समस्त जगत्का उद्धार कर रहे हैं॥” 164 ॥ महाप्रभुके द्वारा उत्तर देना :- प्रभु कहे,—“सत्य कहि, तोमार आगमने। दुइ ब्रह्म प्रकटिल श्रीपुरुषोत्तमे ॥ 165 ॥ 'ब्रह्मानन्द' नाम तुमि—गौर-ब्रह्म 'चल'। श्यामवर्ण जगन्नाथ बसियाछेन 'अचल' ॥” 166 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—“मैं सत्य कह रहा हूँ, आपके आनेसे श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें दो ब्रह्म प्रकट हो गये हैं। 'ब्रह्मानन्द' नामक गौरवर्णके आप 'चल' ब्रह्म हैं और दूसरे श्यामवर्णके श्रीजगन्नाथ 'अचल' ब्रह्म यहाँ पहलेसे ही बैठे हैं॥” 165-166 ॥ महाप्रभु और श्रीभारती, दोनोंके विचारमें श्रीसार्वभौमकी मध्यस्थता :- भारती कहे,—“सार्वभौम, मध्यस्थ हञा। इँहार सने आमार 'न्याय' बुझ' मन दिया ॥ 167 ॥ श्रीभारतीका जीव-ब्रह्म विचार :- 'व्याप्य'-'व्यापक'-भावे 'जीव'-'ब्रह्मे' जानि। जीव—व्याप्य, ब्रह्म—व्यापक, शास्त्रेते बाखानि ॥ 168 ॥ स्वेच्छापूर्वक चालित करानेवाले इच्छाशक्तिके परिचालक प्रभु ही विभु या विष्णु या ब्रह्म, श्रीभारती ही जीव :- चर्म घुचाञा कैल आमारे शोधन। दोँहार व्याप्य-व्यापकत्वे, एइ त' कारण ॥ 169 ॥ अनुवाद—श्रीब्रह्मानन्द भारतीने कहा,—“हे सार्वभौम 426 ।