भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1272, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1272

दसवाँ अध्याय 10/153–161 ] भारतीके साथ साक्षात्कार :- एत बलि' महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। चलि' आइला ब्रह्मानन्द-भारतीर आगे ॥ 153 ॥ भारतीके मृगचर्म-वस्त्रको देखकर महाप्रभुकी अप्रसन्नता :- ब्रह्मानन्द परियाछे मृगचर्माम्बर। ताहा देखि' प्रभु दुःख पाइला अन्तर ॥ 154 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ चलकर श्रीब्रह्मानन्द भारतीके पास आये। श्रीब्रह्मानन्द भारतीने मृगचर्मका (हिरणके चमड़ेका) वस्त्र पहन रखा था, जिसे देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत दुःख हुआ॥ 153–154 ॥ अनुभाष्य—श्रीब्रह्मानन्द भारती एक शङ्कर-दशनामी संन्यासी थे। मृगचर्म अथवा तृणवल्कल (घास या वृक्षकी छाल) आदिके वस्त्र गृहका त्याग करनेवाले व्यक्तियोंके पहनने योग्य हैं। (मनुसंहिता छठा अ:)—“ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः। वसीत चर्मचीरं वा”; कुल्लूक-भट्ट-कृता टीका—'मृगादिचर्मवस्त्रखण्डं वा आच्छादयेत्॥” अर्थात् “गृहत्यागी व्यक्ति ग्राम छोड़कर वनमें जाकर इन्द्रियोंपर संयम रखते हुए वहाँ वास करेंगे और चर्म या चीरका वस्त्र पहनेंगे। कुल्लूक-भट्टकृत टीका—मृगादिके चर्म या कपड़ेके टुकड़ेसे शरीरका आच्छादन करना चाहिये॥” 154 ॥ महाप्रभुका श्रीभारतीको देखकर भी अनदेखा करना :- देखिया त' छद्म कैल येन देखे नाञि। मुकुन्देरे पुछे,—“काँहा भारती-गोसाञि?” ॥ 155 ॥ मुकुन्द कहे,—“एइ आगे देख विद्यमान।” प्रभु कहे,—“तेँह नहेन, तुमि अगेयान ॥ 156 ॥ अन्येरे अन्य कह, नाहि तोमार ज्ञान। भारती-गोसाञि केने परिबेन चाम?” ॥ 157 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीब्रह्मानन्द भारतीको देखकर भी ऐसा बहाना किया जैसे उन्हें नहीं देखा और श्रीमुकुन्दसे पूछा,–“भारती-गोसाईं कहाँ है?” श्रीमुकुन्दने कहा,—“देखिये, वे आपके सामने ही तो हैं।” महाप्रभुने कहा,—“यह वे नहीं है, तुम्हें भूल हो रही है। तुम किसी दूसरेको भारती-गोसाईं कह रहे हो, तुम तो उन्हें जानते ही नहीं हो। भला भारती-गोसाईं मृगछाला क्यों पहनेंगे?” ॥ 155–157 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'छद्म'—छल, कपट ॥ 155 ॥ महाप्रभुके व्यवहारसे श्रीभारतीको सुबुद्धि :- शुनि' ब्रह्मानन्द करे हृदये विचारे। 'मोर चर्माम्बर एइ, ना भाय इँहारे ॥ 158 ॥ बाह्यचिह्न-धारण करनेसे ही संसार-मुक्ति नहीं मिलती :- भाल कहेन,—चर्माम्बर दम्भ लागि' परि। चर्माम्बर-परिधाने संसार ना तरि ॥ 159 ॥ श्रीभारतीका बहिर्वास-परिधान और महाप्रभुका प्रणाम :- आजि हैते ना परिब एइ चर्माम्बर।' प्रभु बहिर्वास आनाइला जानिया अन्तर ॥ 160 ॥ चर्माम्बर छाड़ि' ब्रह्मानन्द परिल वसन। प्रभु आसि' कैल ताँर चरण वन्दन ॥ 161 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी बातको सुनकर श्रीब्रह्मानन्द भारती मनमें विचार करने लगे,–‘मेरा यह मृगछाला पहनना इन्हें अच्छा नहीं लगा। इन्होंने ठीक ही तो कहा है। मैं प्रतिष्ठाके लिये ही मृगछाला पहनता हूँ। मृगछाला पहननेसे ही संसारसे उद्धार नहीं हो सकता। इसलिये आजसे मैं मृगछाला नहीं पहनूँगा।' महाप्रभुने उनके मनकी बातको जानकर संन्यासका वस्त्र मँगवा लिया। तब श्रीब्रह्मानन्द भारतीने मृगछालाको त्यागकर वह संन्यासका वस्त्र पहन लिया। तब महाप्रभुने आकर उनके श्रीचरणोंकी वन्दना की॥ 158–161 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ना भाय'—शोभा नहीं देता॥ 158 ॥ अनुभाष्य—लोक-संग्रह अर्थात् बहुतसे अनुयायी बनानेके अभिमानके वशीभूत होकर चर्मवस्त्र पहननेसे । 425