भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1271

[ 10/145-152 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (रेणुकायां) द्विषद्वत् (शत्रुवत्) प्रहतं (निहतम्) इति सः श्रीगोविन्द सभी वैष्णवोंके प्रियपात्र :- (लक्ष्मणः) शुश्रुवान् (श्रुतवान्); तत् अग्रजशासनं (सीता- प्रभुर प्रिय भृत्य करि' सबे करे मान। वनवासस्वरूपं स्वीयाग्रजस्य श्रीरामचन्द्रस्य आदेशं) प्रत्यग्रहीत् सकल वैष्णवेर गोविन्द करे समाधान॥ 148 ॥ (प्रतिपालितवान्); हि (यतः) गुरूणां आज्ञा अविचारणीया (उचितानुचितादि-विचारानर्हा)। अनुवाद—श्रीगोविन्दको महाप्रभुका प्रिय सेवक जानकर श्लोक-भावानुवाद—परशुरामजीने अपने पिता सभी उनका सम्मान करते थे तथा श्रीगोविन्द भी सभी जमदग्निके आदेशसे अपनी माता रेणुकाका शत्रुवत् वध वैष्णवोंकी सभी प्रकारसे सेवा करते थे ॥ 148 ॥ किया था, यह सुनकर सीताजीको वनमें छोड़कर अमृतप्रवाह भाष्य—'समाधान'—सेवाकार्य ॥ 148 ॥ आनेकी अपने बड़े भ्राता श्रीरामचन्द्रकी आज्ञाका उनके सङ्ग छोटे और बड़े हरिदास एवं रामाइ-नन्दाइ :- लक्ष्मणजीने पालन किया था, क्योंकि गुरुकी आज्ञा छोट-बड़-कीर्त्तनीया—दुइ हरिदास। अविचारणीया है अर्थात् उसपर उचित-अनुचितका रामाइ-नन्दाइ रहे गोविन्देर पाश॥ 149 ॥ विचार नहीं करना चाहिये ॥ 145 ॥ श्रीगोविन्दका सेवाका सौभाग्य :- गुरु-आज्ञा पालनेसे ही जीवोंको कल्याणकी प्राप्ति :- गोविन्देर सङ्गे करे प्रभुर सेवन। रामायणमें अयोध्याकाण्डमें (23/10)— गोविन्देर भाग्यसीमा ना याय वर्णन॥ 150 ॥ निर्विचारं गुरोराज्ञा मया कार्या महात्मनः। श्रेयो ह्येवं भवत्याश्च मम चैव विशेषतः॥"146॥ अनुवाद—दो कीर्तनीया—छोटे हरिदास और बड़े हरिदास तथा रामाइ और नन्दाइ—ये चारों श्रीगोविन्दके अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 146॥ साथ रहकर उनके साथ महाप्रभुकी सेवा करते थे। अमृतप्रवाह भाष्य—महात्मा गुरुदेवकी आज्ञा मेरे श्रीगोविन्दके भाग्यकी सीमाका वर्णन नहीं किया जा लिये बिना कुछ विचार किये ही अनुष्ठान करने योग्य सकता, क्योंकि उन्हें महाप्रभुकी साक्षात् सेवाका सौभाग्य है। इसमें आपका भी मङ्गल है, विशेष करके मेरा भी प्राप्त हुआ था॥ 149-150 ॥ मङ्गल है॥ 146॥ श्रीब्रह्मानन्द भारतीका आगमन :- अनुभाष्य— मया महात्मनः गुरोः (पितुः दशरथस्य) आज्ञा निर्विचारं आर दिने मुकुन्ददत्त कहे प्रभुर स्थाने। कार्या (पालनीया)। भवत्याश्च एवं हि विशेषतः मम एव च “ब्रह्मानन्द-भारती आइला तोमार दरशने॥ 151 ॥ श्रेयः। महाप्रभुकी मर्यादा :- श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। गुरुदेवसे आज्ञा देह' यदि ताँरे आनिये एथाइ।" यहाँ अभिप्राय पिता श्रीदशरथसे है॥ 146 ॥ प्रभु कहे,—"गुरु तेंह, याब ताँर ठाञि॥" 152 ॥ महाप्रभुका श्रीगोविन्दको सेवकके रूपमें अङ्गीकार :- तबे महाप्रभु ताँरे कैल अङ्गीकार। अनुवाद—अगले दिन श्रीमुकुन्द दत्तने महाप्रभुसे आपन-श्रीअङ्ग-सेवाय दिल अधिकार ॥ 147 ॥ कहा,—“श्रीब्रह्मानन्द भारती आपके दर्शनके लिये आये अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके विचारको सुनकर हैं। यदि आप आज्ञा दें, तो मैं उन्हें यहाँ ले आऊँ।” तब महाप्रभुने श्रीगोविन्दको स्वीकार करके उन्हें अपने महाप्रभुने कहा,—“वे मेरे गुरुके समान हैं, इसलिये मैं श्रीअङ्गकी सेवा करनेका अधिकार दिया॥ 147 ॥ स्वयं ही उनके पास जाऊँगा॥”151-152 ॥ 424 ।