भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1270

दसवाँ अध्याय 10/137-145 ] अथवा सेवकरूपमें ग्रहण करनेपर ब्राह्मण-गुरुका पतन हो जाता है। श्रीईश्वरपुरीने सदाचार सम्पन्न होकर भी स्मृतिमें निर्धारित आदेशका किस प्रकार उल्लङ्घन किया ? उसके उत्तरमें महाप्रभुने कहा, — 'मेरे गुरुदेव - ईश्वर' अर्थात् जगत्के प्रभु हैं, इसलिये वे साधारण जीवोंके नियामक स्मृतिशास्त्रके अधीन नहीं है। ईश्वर अर्थात् समर्थवान् गुरुदेवकी कृपा कभी भी वैदिक-शासनके अधीन नहीं है।" परमेश्वर जगद्गुरु श्रीकृष्णने जाति-कुलके लौकिक विचारको छोड़कर विदुरके घरमें भोजन किया था। मेरे प्रभु श्रीईश्वरपुरीने कृपा करके गोविन्दके शौक्र- जन्मादिका विचार नहीं किया, क्योंकि वे जानते हैं कि वैष्णव-दीक्षाके द्वारा वह स्वतः ही ब्राह्मण हो जायेगा। इसलिये उन्होंने गोविन्दको दीक्षा प्रदान करके 'सेवक'के रूपमें ग्रहण किया था ॥ 137-138 ॥ श्रीगोविन्दका आलिङ्गन, श्रीगोविन्दके द्वारा सब भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :- एत बलि' गोविन्दे कैल आलिङ्गन। गोविन्द करिल सबार चरण वन्दन ॥ 141 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने श्रीगोविन्दका आलिङ्गन किया। श्रीगोविन्दने महाप्रभु और सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की ॥ 141 ॥ महाप्रभुकी भट्टाचार्यसे जिज्ञासा - गुरुसेवकसे सेवा ग्रहण करना उचित है या अनुचित :- प्रभु कहे,—“भट्टाचार्य, करह विचार। गुरुर किङ्कर हय मान्य आपनार ॥ 142 ॥ ताँहारे आपन-सेवा कराइते ना युयाय। गुरु-आज्ञा दियाछेन, कि करि उपाय ॥” 143 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे कहा,— “भट्टाचार्य ! कृपया इस बातपर विचार कीजिये कि गुरुदेवका सेवक (गोविन्द) मेरे लिये पूजनीय है। इससे अपनी व्यक्तिगत सेवा कराना उचित नहीं है, किन्तु श्रीगुरुदेवने ऐसा आदेश दिया है। तब ऐसी परिस्थितिमें मुझे क्या करना चाहिये ? ॥” 142-143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'गुरुर किङ्कर' - गुरुका सेवक सहज ही सम्माननीय, उसे अपनी सेवा करने देना उचित नहीं है ॥ 142-143 ॥ अनुभाष्य-गुरुका प्रत्येक सेवक ही अन्यान्य प्रत्येक शिष्यके लिये ही सम्माननीय है। उसे अपनी सेवामें नियुक्त करना उचित नहीं होनेपर भी गुरुके आदेशको पालन करनेके लिये उसे स्वीकार किस प्रकारसे किया जाय, इस विषयमें विचार करो ॥ 142-143 ॥ श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उत्तर,— गुरु-आज्ञा अवश्य ही पालनीय- भट्ट कहे,—“गुरुर आज्ञा हय बलवान् । गुरु-आज्ञा ना लङ्घिये, शास्त्र-प्रमाण ॥” 144 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“गुरुकी आज्ञा अत्यन्त बलवान् होती है। गुरुकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये, शास्त्र ही इस विषयमें प्रमाण हैं॥” 144 ॥ गुरु-आज्ञा पालनका पौराणिक दृष्टान्त :- रघुवंश (14/46) – स शुश्रुवान्मातरि भार्गवेण पितुर्नियोगात् प्रहृतं द्विषद्वत्। प्रत्यग्रहीदग्रजशासनं तदाज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - पिताकी आज्ञासे परशुरामजीने अपनी माता (रेणुका) का शत्रु की भाँति वध किया था, —यह सुनकर लक्ष्मणजीने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रकी आज्ञाको ग्रहण किया था; क्योंकि गुरुवर्गोंकी आज्ञा-अविचारणीया होती है ॥ 145 ॥ अनुभाष्य- भार्गवेण (जामदग्न्येन) पितुर्नियोगात् (जामदग्न्यादेशेन) मातरि । 423