भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1269

[ 10/130-140 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अपने गुरुभ्राता श्रीकाशीश्वरकी बादमें महाप्रभुका उचित उत्तर-दान—ईश्वर या शक्तिशालीका आनेकी सम्भावनाको बताना :— आचरण; स्नेह-कृपा और मर्यादाका वैशिष्ट्य :— काशीश्वर आसिबेन सब तीर्थ देखिया। प्रभु कहे,—“ईश्वर हय परम स्वतन्त्र। प्रभु-आज्ञाय मुञि आइनु तोमा-पदे धाञा॥” 134॥ ईश्वरेर कृपा नहे वेद-परतन्त्र॥ 137॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौमादि भक्तोंके साथ ईश्वरेर कृपा जाति-कुल नाहि माने। महाप्रभु जब बैठकर श्रीकृष्णकथाका आस्वादन कर रहे विदुरेर घरे कृष्ण करिला भोजने॥ 138॥ थे, तभी श्रीगोविन्द वहाँ आ गये। उन्होंने महाप्रभुको स्नेह-सेवापेक्षा मात्र श्रीकृष्ण-कृपार। दण्डवत् प्रणाम करके विनयपूर्वक कहा,—“मैं श्रीईश्वरपुरीका स्नेहवश हञा करे स्वतन्त्र आचार॥ 139॥ दास हूँ, मेरा नाम ‘गोविन्द’ है। मैं उनकी आज्ञासे मर्यादा हैते कोटि सुख स्नेह-आचरणे। आपके पास आया हूँ। अप्रकट होनेके समय उन्होंने परमानन्द हय यार नाम-श्रवणे॥” 140॥ मुझे आदेश दिया था कि मैं आपके पास आकर आपकी सेवा करूँ। श्रीकाशीश्वर भी तीर्थोंका दर्शन अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—“ईश्वर परम स्वतन्त्र करके यहाँ आयेंगे। मैं तो प्रभुके आदेशानुसार सीधा हैं, इसलिये उनकी कृपा भी वेदोंके अधीन नहीं है। आपके चरणोंमें तुरन्त उपस्थित हुआ हूँ॥”130-134॥ ईश्वरकी कृपामें जाति-कुलादिका भेद-भाव नहीं है। अमृतप्रवाह भाष्य— ‘काशीश्वर और गोविन्द’,—ये जैसे विदुरके शूद्र होनेपर उनके घरमें श्रीकृष्णने भोजन दोनों ही श्रीईश्वरपुरीके साथ रहते थे। श्रीकाशीश्वर किया था। श्रीकृष्णकी कृपा स्नेहपूर्वक की गयी सेवाकी अन्यान्य तीर्थ भ्रमण करके महाप्रभुके पास बादमें ही अपेक्षा करती है। और उसी स्नेहके वशीभूत होकर आयेंगे। श्रीगोविन्दने श्रीईश्वरपुरीकी सिद्धि-प्राप्ति (अप्रकट श्रीकृष्ण स्वतन्त्र आचरण करते हैं। मर्यादापूर्ण आचरणकी होने)के तुरन्त बाद ही महाप्रभुके चरणोंका आश्रय अपेक्षा स्नेहपूर्ण आचरणमें करोड़ो गुणा अधिक आनन्द किया था॥134॥ होता है। भक्तको भगवान्‌के नाम सुनने मात्रसे ही महाप्रभुकी दीनता :— परमानन्दकी प्राप्ति होती है॥”137-140॥ गोसाञि कहिल,—“पुरीश्वर वात्सल्य करे मोरे। अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकृपा और किसीकी कृपा करि' मोर ठाञि पाठाइला तोमारे॥” 135॥ अपेक्षा नहीं रखती, केवल स्नेहसेवाकी ही अपेक्षा अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“श्रीईश्वरपुरी पादका मेरे करती है। सेवा दो प्रकारकी है—स्नेह-सेवा ओर प्रति वात्सल्य स्नेह था, इसलिये उन्होंने कृपा करके मर्यादा-सेवा। जहाँ स्नेह-सेवा होती है, वहींपर ही आपको मेरे पास भेजा है॥”135॥ केवल श्रीकृष्णकृपा होती है। जहाँ मर्यादा-सेवा होती है, गोविन्दके सम्बन्धमें श्रीसार्वभौमका प्रश्न :— वहाँ श्रीकृष्णकृपा सहज नहीं है; कृपामें जाति-कुलका एत शुनि' सार्वभौम प्रभुरे पुछिल। विचार नहीं रहता॥139॥ “पुरी-गोसाञि शूद्र-सेवक काँहे त' राखिल॥” 136॥ अनुभाष्य—‘श्रीईश्वर पुरी’—श्रीमध्व-वैष्णव-संन्यासी थे। उन्होंने शूद्रवंशमें जन्में दीक्षित-ब्राह्मण गोविन्दको अनुवाद—यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने ‘सेवक’-रूपमें किस प्रकार अपना शिष्य बनाया था?—यही महाप्रभुसे पूछा,—“श्रीईश्वरपुरीने शूद्रको सेवक क्यों श्रीसार्वभौमके प्रश्नका कारण था। स्मृतिके मतानुसार— रखा था?॥”136॥ ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य वर्णके किसी व्यक्तिको शिष्य 422 ।