भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1268

दसवाँ अध्याय 10/121–133 ] स्थिर होकर गाढ़-प्रीतिसे भरकर महाप्रभुके द्वारा स्वरूप दामोदरका अभिनन्दन :- कतक्षणे दुइ जने स्थिर यबे हैला। तबे महाप्रभु ताँरे कहिते लागिला ॥ 121 ॥ “तुमि ये आसिबे, आजि स्वप्नेते देखिल। भाल हैल, अन्ध येन दुइ नेत्र पाइल ॥” 122 ॥ अनुवाद—कुछ देरके बाद जब दोनोंने धैर्य धारण किया, तब महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरसे कहने लगे,—“मैंने स्वप्नमें देखा था कि आप आज आयेंगे। बहुत अच्छा हुआ, आपके आनेसे ऐसा आनन्द हो रहा है, मानो अन्धेको दो नेत्र मिल गये हों ॥” 121-122 ॥ स्वरूप दामोदरकी दीनतापूर्ण उक्ति :- स्वरूप कहे,—“प्रभु, मोर क्षम' अपराध। तोमा छाड़ि' अन्यत्र गेनु, करिनु प्रमाद ॥ 123 ॥ तोमार चरणे मोर नाहि प्रेम-लेश। तोमार छाड़ि' पापी मुञ्जि गेनु अन्य-देश ॥ 124 ॥ मुञ्जि तोमा छाड़िल, तुमि मोरे ना छाड़िला। कृपा-पाश गलाय बान्धि' चरणे आनिला ॥ 125 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“हे प्रभो! आप मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। मैं प्रमादवशतः आपको छोड़कर कहीं और चला गया था। आपके चरणकमलोंमें मेरा लेशमात्र भी प्रेम नहीं है, तभी तो मेरे जैसा पापी व्यक्ति आपको छोड़कर किसी और स्थानपर चला गया था। मैंने आपको छोड़ा था, परन्तु आपने मुझे नहीं छोड़ा। अपने कृपारूपी पाशको मेरे गलेमें बाँधकर आप मुझे अपने श्रीचरणकमलोंके आश्रयमें ले आये हैं ॥” 123-125 ॥ निताइको प्रणाम और निताइके द्वारा आलिङ्गन :- तबे स्वरूप कैल निताइर चरण-वन्दन। नित्यानन्दप्रभु कैल प्रेम-आलिङ्गन ॥ 126 ॥ अन्यान्य सभी भक्तोंके साथ मिलन :- जगदानन्द, मुकुन्द, शङ्कर, सार्वभौम। सबा-सङ्गे यथायोग्य करिल मिलन ॥ 127 ॥ श्रीपरमानन्द पुरीकी वन्दना :- परमानन्द पुरीर कैल चरण वन्दन। पुरी-गोसाञि ताँरे कैल प्रेम-आलिङ्गन ॥ 128 ॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की और श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनका प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया। श्रीस्वरूप दामोदर श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीमुकुन्द, श्रीशङ्कर और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे यथोचित रूपसे मिले। श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीपरमानन्द पुरीके चरणोंकी वन्दना की और पुरी गोस्वामीने प्रेमपूर्वक उनका आलिङ्गन किया ॥ 126-128 ॥ योग्य वासस्थान और एक सेवककी प्राप्ति :- महाप्रभु दिल ताँरे निभृते वासाघर। जलादि-परिचर्या लागि' दिल एक किङ्कर ॥ 129 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरको एकान्तमें रहनेका कमरा दिया और जलादि सभी आवश्यकताओंके लिये एक सेवकको भी नियुक्त कर दिया ॥ 129 ॥ भक्तोंसे घिरे महाप्रभु :- आर दिन सार्वभौम-आदि भक्त-सङ्गे। बसिया आछेन महाप्रभु कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 130 ॥ श्रीगोविन्दका आगमन और अपना परिचय देना :- हेनकाले गोविन्देर हैल आगमन। दण्डवत् करि' कहे विनय-वचन ॥ 131 ॥ “ईश्वरपुरीर भृत्य,—'गोविन्द' मोर नाम। पुरी-गोसाञिर आज्ञाय आइनु तोमार स्थान ॥ 132 ॥ सिद्धिप्राप्तिकाले गोसाञि आज्ञा कैल मोरे। कृष्णचैतन्य-निकटे याइ' सेविह ताँहारे ॥ 133 ॥ । 421