श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 10/119-120 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—हे दयानिधे श्रीचैतन्य! जो अनायास ही समस्त खेद दूर करती है, जिसमें सम्पूर्ण निर्मलता है, जिसमें परमानन्द (अन्य सभी विषयोंको आच्छादित करके) प्रकाशित होता है, जिसके उदित होनेसे शास्त्रोंके वाद-प्रतिवाद समाप्त हो जाते हैं, जो (मधुरादि) रसकी वर्षा करके देहमें अभिनिवेशको दूर करके चित्तको (दिव्योन्माद अवस्था तक) उन्मत्त बना देती है, जिसकी भक्तिविनोदनक्रिया सर्वदा (समदया पाठसे) प्रणयोन्मत्त अथवा (शमदया पाठसे) श्रीकृष्णेतर-तृष्णा-रहित करती है, माधुर्य मर्यादाके द्वारा आपकी अति विस्तृत वह शुभ प्रदान करनेवाली दया मेरे प्रति उदित हो। औदार्यमय प्रेम विग्रह भगवान् श्रीचैतन्यचन्द्र तीन प्रकारसे अपनी करुणाको सुकृतिसम्पन्न जीवोंमें वितरण करते हैं। जीव सांसारिक अभावोंसे दुःखी होकर अनेक उपायोंके द्वारा क्लेश दूर करनेका प्रयास करनेपर भी सफल नहीं होते। भगवान्की दया जीवके प्रयासके द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। भगवद्-कृपासे जीवके हृदयमें श्रीकृष्ण-चरणकमलकी गन्धका विकास होता है, उससे चित्तसे खेदरूपी धूलि अनायास ही उड़ जाती है, इसलिये हृदय निर्मल हो जाता है। तब हृदयमें श्रीकृष्णसेवाजनित परमानन्द प्रकाशित होता है। शास्त्रोंकी विभिन्न प्रकारकी व्याख्याओंसे विवाद चित्तमें उदित होकर अनेक वाद-प्रतिवाद करते हैं। भगवद्-कृपा प्राप्त करनेपर ही कृपा प्राप्त करनेवाला हृदय भगवद्-रसमें उन्मत्त हो जाता है। दूसरी ओर, श्रीकृष्णरस प्रदान करनेवाली मत्तता भी भगवद्-कृपाके बलसे ही उदित होती है, इसलिये शास्त्र-विवाद शान्त हो जाते हैं। माधुर्य-मर्यादा जीवको निरन्तर श्रीकृष्ण-चरणोंमें अवस्थित कराती है और सौभाग्यवान् जीव उस समयमें केवल प्रेमभक्तिसे ही प्रीति प्राप्त करता हैं। श्रीकृष्णकृपा-निर्मला, रसदा और स-मदा है। श्रीकृष्णकृपाके कारण हृदयके निर्मल होनेपर अभाव-जनित कोई खेदरूपी मल नहीं रहता। श्रीकृष्ण कृपावशतः रस प्राप्त करनेपर शास्त्र-विवाद शान्त होनेसे भक्तिसिद्धान्त सुदृढ़ होता है, इसलिये चित्त श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त हो जाता है। श्रीकृष्णकृपाके कारण शमता (भगवन् निष्ठा बुद्धि) प्राप्त करके माधुर्य-गौरवमें निरन्तर भक्तिमें विनोदकी प्राप्ति होती है। जीव-पहले ईश्वरविमुख होता है और विषयोंमें फंसकर खिन्न रहता है। उसके बाद ईश्वरके अनुसन्धानमें लगता है और अन्तमें भगवान्की सेवामें रत होता है। भगवान्की दयासे पहले उसकी अनर्थ-निवृत्ति, उससे उत्पन्न हृदयकी निर्मलता एवं हृदयकी निर्मलताके परिणामसे श्रीकृष्ण-आमोदका विकास होता है। भगवान्की दयासे तब भक्तिसिद्धान्तकी प्राप्ति तथा फलस्वरूप रसोत्पत्तिसे प्रेमोन्मत्तताकी प्राप्ति होती है। भगवान्की दयासे अन्तमें भक्तिमें अनुरक्ति तथा उसके फलस्वरूप सर्वत्र भगवद्-लीलाकी स्फूर्तिकी प्राप्ति एवं स्फूर्तिसे माधुर्य-पराकाष्ठाकी प्राप्ति होती है। श्रीकृष्ण-कृपासे तृष्णासे मुक्त होकर श्रीकृष्णकीर्तन-सेवा (प्रचार) करते हुए भी जीवका श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यत्र विराग हो सकता है अथवा उसे मुक्तिकी कामना हो सकती है। तब जीवके विषयी होनेपर भी श्रीकृष्णकृपाके बलसे श्रवण-मनोभिराम (कानों और मनको आनन्द देनेवाले) हरिगुणानुवादके फलसे उसका विषय-भोगका त्याग हो सकता है अथवा भवरोगकी औषधि प्राप्त करके मुक्तिकी कामनाका त्याग हो सकता है। तब श्रीकृष्णकी अनुभूति प्राप्तकर अन्तमें जीव शुद्धभक्तिमें अवस्थित हो सकता है। इसलिये सब समय भगवान्की दया ही आश्रय करने योग्य है ॥ 119 ॥ परस्परके स्पर्शसे महाप्रभु और स्वरूप दामोदरका प्रेम :- उठाञा महाप्रभु कैल आलिङ्गन। दुइजने प्रेमावेशे हैल अचेतन ॥ 120 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरको उठाकर उनका आलिङ्गन किया और दोनों ही प्रेमावेशमें अचेतन हो गये॥ 120 ॥ 420 ।