श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 10/119-120 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—हे दयानिधे श्रीचैतन्य! जो अनायास ही समस्त खेद दूर करती है, जिसमें सम्पूर्ण निर्मलता है, जिसमें परमानन्द (अन्य सभी विषयोंको आच्छादित करके) प्रकाशित होता है, जिसके उदित होनेसे शास्त्रोंके वाद-प्रतिवाद समाप्त हो जाते हैं, जो (मधुरादि) रसकी वर्षा करके देहमें अभिनिवेशको दूर करके चित्तको (दिव्योन्माद अवस्था तक) उन्मत्त बना देती है, जिसकी भक्तिविनोदनक्रिया सर्वदा (समदया पाठसे) प्रणयोन्मत्त अथवा (शमदया पाठसे) श्रीकृष्णेतर-तृष्णा-रहित करती है, माधुर्य मर्यादाके द्वारा आपकी अति विस्तृत वह शुभ प्रदान करनेवाली दया मेरे प्रति उदित हो। औदार्यमय प्रेम विग्रह भगवान् श्रीचैतन्यचन्द्र तीन प्रकारसे अपनी करुणाको सुकृतिसम्पन्न जीवोंमें वितरण करते हैं। जीव सांसारिक अभावोंसे दुःखी होकर अनेक उपायोंके द्वारा क्लेश दूर करनेका प्रयास करनेपर भी सफल नहीं होते। भगवान्की दया जीवके प्रयासके द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। भगवद्-कृपासे जीवके हृदयमें श्रीकृष्ण-चरणकमलकी गन्धका विकास होता है, उससे चित्तसे खेदरूपी धूलि अनायास ही उड़ जाती है, इसलिये हृदय निर्मल हो जाता है। तब हृदयमें श्रीकृष्णसेवाजनित परमानन्द प्रकाशित होता है। शास्त्रोंकी विभिन्न प्रकारकी व्याख्याओंसे विवाद चित्तमें उदित होकर अनेक वाद-प्रतिवाद करते हैं। भगवद्-कृपा प्राप्त करनेपर ही कृपा प्राप्त करनेवाला हृदय भगवद्-रसमें उन्मत्त हो जाता है। दूसरी ओर, श्रीकृष्णरस प्रदान करनेवाली मत्तता भी भगवद्-कृपाके बलसे ही उदित होती है, इसलिये शास्त्र-विवाद शान्त हो जाते हैं। माधुर्य-मर्यादा जीवको निरन्तर श्रीकृष्ण-चरणोंमें अवस्थित कराती है और सौभाग्यवान् जीव उस समयमें केवल प्रेमभक्तिसे ही प्रीति प्राप्त करता हैं। श्रीकृष्णकृपा-निर्मला, रसदा और स-मदा है। श्रीकृष्णकृपाके कारण हृदयके निर्मल होनेपर अभाव-जनित कोई खेदरूपी मल नहीं रहता। श्रीकृष्ण कृपावशतः रस प्राप्त करनेपर शास्त्र-विवाद शान्त होनेसे भक्तिसिद्धान्त सुदृढ़ होता है, इसलिये चित्त श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त हो जाता है। श्रीकृष्णकृपाके कारण शमता (भगवन् निष्ठा बुद्धि) प्राप्त करके माधुर्य-गौरवमें निरन्तर भक्तिमें विनोदकी प्राप्ति होती है। जीव-पहले ईश्वरविमुख होता है और विषयोंमें फंसकर खिन्न रहता है। उसके बाद ईश्वरके अनुसन्धानमें लगता है और अन्तमें भगवान्की सेवामें रत होता है। भगवान्की दयासे पहले उसकी अनर्थ-निवृत्ति, उससे उत्पन्न हृदयकी निर्मलता एवं हृदयकी निर्मलताके परिणामसे श्रीकृष्ण-आमोदका विकास होता है। भगवान्की दयासे तब भक्तिसिद्धान्तकी प्राप्ति तथा फलस्वरूप रसोत्पत्तिसे प्रेमोन्मत्तताकी प्राप्ति होती है। भगवान्की दयासे अन्तमें भक्तिमें अनुरक्ति तथा उसके फलस्वरूप सर्वत्र भगवद्-लीलाकी स्फूर्तिकी प्राप्ति एवं स्फूर्तिसे माधुर्य-पराकाष्ठाकी प्राप्ति होती है। श्रीकृष्ण-कृपासे तृष्णासे मुक्त होकर श्रीकृष्णकीर्तन-सेवा (प्रचार) करते हुए भी जीवका श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यत्र विराग हो सकता है अथवा उसे मुक्तिकी कामना हो सकती है। तब जीवके विषयी होनेपर भी श्रीकृष्णकृपाके बलसे श्रवण-मनोभिराम (कानों और मनको आनन्द देनेवाले) हरिगुणानुवादके फलसे उसका विषय-भोगका त्याग हो सकता है अथवा भवरोगकी औषधि प्राप्त करके मुक्तिकी कामनाका त्याग हो सकता है। तब श्रीकृष्णकी अनुभूति प्राप्तकर अन्तमें जीव शुद्धभक्तिमें अवस्थित हो सकता है। इसलिये सब समय भगवान्की दया ही आश्रय करने योग्य है ॥ 119 ॥ परस्परके स्पर्शसे महाप्रभु और स्वरूप दामोदरका प्रेम :- उठाञा महाप्रभु कैल आलिङ्गन। दुइजने प्रेमावेशे हैल अचेतन ॥ 120 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरको उठाकर उनका आलिङ्गन किया और दोनों ही प्रेमावेशमें अचेतन हो गये॥ 120 ॥ 420 ।
दसवाँ अध्याय 10/121–133 ] स्थिर होकर गाढ़-प्रीतिसे भरकर महाप्रभुके द्वारा स्वरूप दामोदरका अभिनन्दन :- कतक्षणे दुइ जने स्थिर यबे हैला। तबे महाप्रभु ताँरे कहिते लागिला ॥ 121 ॥ “तुमि ये आसिबे, आजि स्वप्नेते देखिल। भाल हैल, अन्ध येन दुइ नेत्र पाइल ॥” 122 ॥ अनुवाद—कुछ देरके बाद जब दोनोंने धैर्य धारण किया, तब महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरसे कहने लगे,—“मैंने स्वप्नमें देखा था कि आप आज आयेंगे। बहुत अच्छा हुआ, आपके आनेसे ऐसा आनन्द हो रहा है, मानो अन्धेको दो नेत्र मिल गये हों ॥” 121-122 ॥ स्वरूप दामोदरकी दीनतापूर्ण उक्ति :- स्वरूप कहे,—“प्रभु, मोर क्षम' अपराध। तोमा छाड़ि' अन्यत्र गेनु, करिनु प्रमाद ॥ 123 ॥ तोमार चरणे मोर नाहि प्रेम-लेश। तोमार छाड़ि' पापी मुञ्जि गेनु अन्य-देश ॥ 124 ॥ मुञ्जि तोमा छाड़िल, तुमि मोरे ना छाड़िला। कृपा-पाश गलाय बान्धि' चरणे आनिला ॥ 125 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“हे प्रभो! आप मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। मैं प्रमादवशतः आपको छोड़कर कहीं और चला गया था। आपके चरणकमलोंमें मेरा लेशमात्र भी प्रेम नहीं है, तभी तो मेरे जैसा पापी व्यक्ति आपको छोड़कर किसी और स्थानपर चला गया था। मैंने आपको छोड़ा था, परन्तु आपने मुझे नहीं छोड़ा। अपने कृपारूपी पाशको मेरे गलेमें बाँधकर आप मुझे अपने श्रीचरणकमलोंके आश्रयमें ले आये हैं ॥” 123-125 ॥ निताइको प्रणाम और निताइके द्वारा आलिङ्गन :- तबे स्वरूप कैल निताइर चरण-वन्दन। नित्यानन्दप्रभु कैल प्रेम-आलिङ्गन ॥ 126 ॥ अन्यान्य सभी भक्तोंके साथ मिलन :- जगदानन्द, मुकुन्द, शङ्कर, सार्वभौम। सबा-सङ्गे यथायोग्य करिल मिलन ॥ 127 ॥ श्रीपरमानन्द पुरीकी वन्दना :- परमानन्द पुरीर कैल चरण वन्दन। पुरी-गोसाञि ताँरे कैल प्रेम-आलिङ्गन ॥ 128 ॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की और श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनका प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया। श्रीस्वरूप दामोदर श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीमुकुन्द, श्रीशङ्कर और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे यथोचित रूपसे मिले। श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीपरमानन्द पुरीके चरणोंकी वन्दना की और पुरी गोस्वामीने प्रेमपूर्वक उनका आलिङ्गन किया ॥ 126-128 ॥ योग्य वासस्थान और एक सेवककी प्राप्ति :- महाप्रभु दिल ताँरे निभृते वासाघर। जलादि-परिचर्या लागि' दिल एक किङ्कर ॥ 129 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरको एकान्तमें रहनेका कमरा दिया और जलादि सभी आवश्यकताओंके लिये एक सेवकको भी नियुक्त कर दिया ॥ 129 ॥ भक्तोंसे घिरे महाप्रभु :- आर दिन सार्वभौम-आदि भक्त-सङ्गे। बसिया आछेन महाप्रभु कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 130 ॥ श्रीगोविन्दका आगमन और अपना परिचय देना :- हेनकाले गोविन्देर हैल आगमन। दण्डवत् करि' कहे विनय-वचन ॥ 131 ॥ “ईश्वरपुरीर भृत्य,—'गोविन्द' मोर नाम। पुरी-गोसाञिर आज्ञाय आइनु तोमार स्थान ॥ 132 ॥ सिद्धिप्राप्तिकाले गोसाञि आज्ञा कैल मोरे। कृष्णचैतन्य-निकटे याइ' सेविह ताँहारे ॥ 133 ॥ । 421
[ 10/130-140 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अपने गुरुभ्राता श्रीकाशीश्वरकी बादमें महाप्रभुका उचित उत्तर-दान—ईश्वर या शक्तिशालीका आनेकी सम्भावनाको बताना :— आचरण; स्नेह-कृपा और मर्यादाका वैशिष्ट्य :— काशीश्वर आसिबेन सब तीर्थ देखिया। प्रभु कहे,—“ईश्वर हय परम स्वतन्त्र। प्रभु-आज्ञाय मुञि आइनु तोमा-पदे धाञा॥” 134॥ ईश्वरेर कृपा नहे वेद-परतन्त्र॥ 137॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौमादि भक्तोंके साथ ईश्वरेर कृपा जाति-कुल नाहि माने। महाप्रभु जब बैठकर श्रीकृष्णकथाका आस्वादन कर रहे विदुरेर घरे कृष्ण करिला भोजने॥ 138॥ थे, तभी श्रीगोविन्द वहाँ आ गये। उन्होंने महाप्रभुको स्नेह-सेवापेक्षा मात्र श्रीकृष्ण-कृपार। दण्डवत् प्रणाम करके विनयपूर्वक कहा,—“मैं श्रीईश्वरपुरीका स्नेहवश हञा करे स्वतन्त्र आचार॥ 139॥ दास हूँ, मेरा नाम ‘गोविन्द’ है। मैं उनकी आज्ञासे मर्यादा हैते कोटि सुख स्नेह-आचरणे। आपके पास आया हूँ। अप्रकट होनेके समय उन्होंने परमानन्द हय यार नाम-श्रवणे॥” 140॥ मुझे आदेश दिया था कि मैं आपके पास आकर आपकी सेवा करूँ। श्रीकाशीश्वर भी तीर्थोंका दर्शन अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—“ईश्वर परम स्वतन्त्र करके यहाँ आयेंगे। मैं तो प्रभुके आदेशानुसार सीधा हैं, इसलिये उनकी कृपा भी वेदोंके अधीन नहीं है। आपके चरणोंमें तुरन्त उपस्थित हुआ हूँ॥”130-134॥ ईश्वरकी कृपामें जाति-कुलादिका भेद-भाव नहीं है। अमृतप्रवाह भाष्य— ‘काशीश्वर और गोविन्द’,—ये जैसे विदुरके शूद्र होनेपर उनके घरमें श्रीकृष्णने भोजन दोनों ही श्रीईश्वरपुरीके साथ रहते थे। श्रीकाशीश्वर किया था। श्रीकृष्णकी कृपा स्नेहपूर्वक की गयी सेवाकी अन्यान्य तीर्थ भ्रमण करके महाप्रभुके पास बादमें ही अपेक्षा करती है। और उसी स्नेहके वशीभूत होकर आयेंगे। श्रीगोविन्दने श्रीईश्वरपुरीकी सिद्धि-प्राप्ति (अप्रकट श्रीकृष्ण स्वतन्त्र आचरण करते हैं। मर्यादापूर्ण आचरणकी होने)के तुरन्त बाद ही महाप्रभुके चरणोंका आश्रय अपेक्षा स्नेहपूर्ण आचरणमें करोड़ो गुणा अधिक आनन्द किया था॥134॥ होता है। भक्तको भगवान्के नाम सुनने मात्रसे ही महाप्रभुकी दीनता :— परमानन्दकी प्राप्ति होती है॥”137-140॥ गोसाञि कहिल,—“पुरीश्वर वात्सल्य करे मोरे। अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकृपा और किसीकी कृपा करि' मोर ठाञि पाठाइला तोमारे॥” 135॥ अपेक्षा नहीं रखती, केवल स्नेहसेवाकी ही अपेक्षा अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“श्रीईश्वरपुरी पादका मेरे करती है। सेवा दो प्रकारकी है—स्नेह-सेवा ओर प्रति वात्सल्य स्नेह था, इसलिये उन्होंने कृपा करके मर्यादा-सेवा। जहाँ स्नेह-सेवा होती है, वहींपर ही आपको मेरे पास भेजा है॥”135॥ केवल श्रीकृष्णकृपा होती है। जहाँ मर्यादा-सेवा होती है, गोविन्दके सम्बन्धमें श्रीसार्वभौमका प्रश्न :— वहाँ श्रीकृष्णकृपा सहज नहीं है; कृपामें जाति-कुलका एत शुनि' सार्वभौम प्रभुरे पुछिल। विचार नहीं रहता॥139॥ “पुरी-गोसाञि शूद्र-सेवक काँहे त' राखिल॥” 136॥ अनुभाष्य—‘श्रीईश्वर पुरी’—श्रीमध्व-वैष्णव-संन्यासी थे। उन्होंने शूद्रवंशमें जन्में दीक्षित-ब्राह्मण गोविन्दको अनुवाद—यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने ‘सेवक’-रूपमें किस प्रकार अपना शिष्य बनाया था?—यही महाप्रभुसे पूछा,—“श्रीईश्वरपुरीने शूद्रको सेवक क्यों श्रीसार्वभौमके प्रश्नका कारण था। स्मृतिके मतानुसार— रखा था?॥”136॥ ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य वर्णके किसी व्यक्तिको शिष्य 422 ।
दसवाँ अध्याय 10/137-145 ] अथवा सेवकरूपमें ग्रहण करनेपर ब्राह्मण-गुरुका पतन हो जाता है। श्रीईश्वरपुरीने सदाचार सम्पन्न होकर भी स्मृतिमें निर्धारित आदेशका किस प्रकार उल्लङ्घन किया ? उसके उत्तरमें महाप्रभुने कहा, — 'मेरे गुरुदेव - ईश्वर' अर्थात् जगत्के प्रभु हैं, इसलिये वे साधारण जीवोंके नियामक स्मृतिशास्त्रके अधीन नहीं है। ईश्वर अर्थात् समर्थवान् गुरुदेवकी कृपा कभी भी वैदिक-शासनके अधीन नहीं है।" परमेश्वर जगद्गुरु श्रीकृष्णने जाति-कुलके लौकिक विचारको छोड़कर विदुरके घरमें भोजन किया था। मेरे प्रभु श्रीईश्वरपुरीने कृपा करके गोविन्दके शौक्र- जन्मादिका विचार नहीं किया, क्योंकि वे जानते हैं कि वैष्णव-दीक्षाके द्वारा वह स्वतः ही ब्राह्मण हो जायेगा। इसलिये उन्होंने गोविन्दको दीक्षा प्रदान करके 'सेवक'के रूपमें ग्रहण किया था ॥ 137-138 ॥ श्रीगोविन्दका आलिङ्गन, श्रीगोविन्दके द्वारा सब भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :- एत बलि' गोविन्दे कैल आलिङ्गन। गोविन्द करिल सबार चरण वन्दन ॥ 141 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने श्रीगोविन्दका आलिङ्गन किया। श्रीगोविन्दने महाप्रभु और सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की ॥ 141 ॥ महाप्रभुकी भट्टाचार्यसे जिज्ञासा - गुरुसेवकसे सेवा ग्रहण करना उचित है या अनुचित :- प्रभु कहे,—“भट्टाचार्य, करह विचार। गुरुर किङ्कर हय मान्य आपनार ॥ 142 ॥ ताँहारे आपन-सेवा कराइते ना युयाय। गुरु-आज्ञा दियाछेन, कि करि उपाय ॥” 143 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे कहा,— “भट्टाचार्य ! कृपया इस बातपर विचार कीजिये कि गुरुदेवका सेवक (गोविन्द) मेरे लिये पूजनीय है। इससे अपनी व्यक्तिगत सेवा कराना उचित नहीं है, किन्तु श्रीगुरुदेवने ऐसा आदेश दिया है। तब ऐसी परिस्थितिमें मुझे क्या करना चाहिये ? ॥” 142-143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'गुरुर किङ्कर' - गुरुका सेवक सहज ही सम्माननीय, उसे अपनी सेवा करने देना उचित नहीं है ॥ 142-143 ॥ अनुभाष्य-गुरुका प्रत्येक सेवक ही अन्यान्य प्रत्येक शिष्यके लिये ही सम्माननीय है। उसे अपनी सेवामें नियुक्त करना उचित नहीं होनेपर भी गुरुके आदेशको पालन करनेके लिये उसे स्वीकार किस प्रकारसे किया जाय, इस विषयमें विचार करो ॥ 142-143 ॥ श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उत्तर,— गुरु-आज्ञा अवश्य ही पालनीय- भट्ट कहे,—“गुरुर आज्ञा हय बलवान् । गुरु-आज्ञा ना लङ्घिये, शास्त्र-प्रमाण ॥” 144 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“गुरुकी आज्ञा अत्यन्त बलवान् होती है। गुरुकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये, शास्त्र ही इस विषयमें प्रमाण हैं॥” 144 ॥ गुरु-आज्ञा पालनका पौराणिक दृष्टान्त :- रघुवंश (14/46) – स शुश्रुवान्मातरि भार्गवेण पितुर्नियोगात् प्रहृतं द्विषद्वत्। प्रत्यग्रहीदग्रजशासनं तदाज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - पिताकी आज्ञासे परशुरामजीने अपनी माता (रेणुका) का शत्रु की भाँति वध किया था, —यह सुनकर लक्ष्मणजीने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रकी आज्ञाको ग्रहण किया था; क्योंकि गुरुवर्गोंकी आज्ञा-अविचारणीया होती है ॥ 145 ॥ अनुभाष्य- भार्गवेण (जामदग्न्येन) पितुर्नियोगात् (जामदग्न्यादेशेन) मातरि । 423
[ 10/145-152 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (रेणुकायां) द्विषद्वत् (शत्रुवत्) प्रहतं (निहतम्) इति सः श्रीगोविन्द सभी वैष्णवोंके प्रियपात्र :- (लक्ष्मणः) शुश्रुवान् (श्रुतवान्); तत् अग्रजशासनं (सीता- प्रभुर प्रिय भृत्य करि' सबे करे मान। वनवासस्वरूपं स्वीयाग्रजस्य श्रीरामचन्द्रस्य आदेशं) प्रत्यग्रहीत् सकल वैष्णवेर गोविन्द करे समाधान॥ 148 ॥ (प्रतिपालितवान्); हि (यतः) गुरूणां आज्ञा अविचारणीया (उचितानुचितादि-विचारानर्हा)। अनुवाद—श्रीगोविन्दको महाप्रभुका प्रिय सेवक जानकर श्लोक-भावानुवाद—परशुरामजीने अपने पिता सभी उनका सम्मान करते थे तथा श्रीगोविन्द भी सभी जमदग्निके आदेशसे अपनी माता रेणुकाका शत्रुवत् वध वैष्णवोंकी सभी प्रकारसे सेवा करते थे ॥ 148 ॥ किया था, यह सुनकर सीताजीको वनमें छोड़कर अमृतप्रवाह भाष्य—'समाधान'—सेवाकार्य ॥ 148 ॥ आनेकी अपने बड़े भ्राता श्रीरामचन्द्रकी आज्ञाका उनके सङ्ग छोटे और बड़े हरिदास एवं रामाइ-नन्दाइ :- लक्ष्मणजीने पालन किया था, क्योंकि गुरुकी आज्ञा छोट-बड़-कीर्त्तनीया—दुइ हरिदास। अविचारणीया है अर्थात् उसपर उचित-अनुचितका रामाइ-नन्दाइ रहे गोविन्देर पाश॥ 149 ॥ विचार नहीं करना चाहिये ॥ 145 ॥ श्रीगोविन्दका सेवाका सौभाग्य :- गुरु-आज्ञा पालनेसे ही जीवोंको कल्याणकी प्राप्ति :- गोविन्देर सङ्गे करे प्रभुर सेवन। रामायणमें अयोध्याकाण्डमें (23/10)— गोविन्देर भाग्यसीमा ना याय वर्णन॥ 150 ॥ निर्विचारं गुरोराज्ञा मया कार्या महात्मनः। श्रेयो ह्येवं भवत्याश्च मम चैव विशेषतः॥"146॥ अनुवाद—दो कीर्तनीया—छोटे हरिदास और बड़े हरिदास तथा रामाइ और नन्दाइ—ये चारों श्रीगोविन्दके अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 146॥ साथ रहकर उनके साथ महाप्रभुकी सेवा करते थे। अमृतप्रवाह भाष्य—महात्मा गुरुदेवकी आज्ञा मेरे श्रीगोविन्दके भाग्यकी सीमाका वर्णन नहीं किया जा लिये बिना कुछ विचार किये ही अनुष्ठान करने योग्य सकता, क्योंकि उन्हें महाप्रभुकी साक्षात् सेवाका सौभाग्य है। इसमें आपका भी मङ्गल है, विशेष करके मेरा भी प्राप्त हुआ था॥ 149-150 ॥ मङ्गल है॥ 146॥ श्रीब्रह्मानन्द भारतीका आगमन :- अनुभाष्य— मया महात्मनः गुरोः (पितुः दशरथस्य) आज्ञा निर्विचारं आर दिने मुकुन्ददत्त कहे प्रभुर स्थाने। कार्या (पालनीया)। भवत्याश्च एवं हि विशेषतः मम एव च “ब्रह्मानन्द-भारती आइला तोमार दरशने॥ 151 ॥ श्रेयः। महाप्रभुकी मर्यादा :- श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। गुरुदेवसे आज्ञा देह' यदि ताँरे आनिये एथाइ।" यहाँ अभिप्राय पिता श्रीदशरथसे है॥ 146 ॥ प्रभु कहे,—"गुरु तेंह, याब ताँर ठाञि॥" 152 ॥ महाप्रभुका श्रीगोविन्दको सेवकके रूपमें अङ्गीकार :- तबे महाप्रभु ताँरे कैल अङ्गीकार। अनुवाद—अगले दिन श्रीमुकुन्द दत्तने महाप्रभुसे आपन-श्रीअङ्ग-सेवाय दिल अधिकार ॥ 147 ॥ कहा,—“श्रीब्रह्मानन्द भारती आपके दर्शनके लिये आये अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके विचारको सुनकर हैं। यदि आप आज्ञा दें, तो मैं उन्हें यहाँ ले आऊँ।” तब महाप्रभुने श्रीगोविन्दको स्वीकार करके उन्हें अपने महाप्रभुने कहा,—“वे मेरे गुरुके समान हैं, इसलिये मैं श्रीअङ्गकी सेवा करनेका अधिकार दिया॥ 147 ॥ स्वयं ही उनके पास जाऊँगा॥”151-152 ॥ 424 ।
दसवाँ अध्याय 10/153–161 ] भारतीके साथ साक्षात्कार :- एत बलि' महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। चलि' आइला ब्रह्मानन्द-भारतीर आगे ॥ 153 ॥ भारतीके मृगचर्म-वस्त्रको देखकर महाप्रभुकी अप्रसन्नता :- ब्रह्मानन्द परियाछे मृगचर्माम्बर। ताहा देखि' प्रभु दुःख पाइला अन्तर ॥ 154 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ चलकर श्रीब्रह्मानन्द भारतीके पास आये। श्रीब्रह्मानन्द भारतीने मृगचर्मका (हिरणके चमड़ेका) वस्त्र पहन रखा था, जिसे देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत दुःख हुआ॥ 153–154 ॥ अनुभाष्य—श्रीब्रह्मानन्द भारती एक शङ्कर-दशनामी संन्यासी थे। मृगचर्म अथवा तृणवल्कल (घास या वृक्षकी छाल) आदिके वस्त्र गृहका त्याग करनेवाले व्यक्तियोंके पहनने योग्य हैं। (मनुसंहिता छठा अ:)—“ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः। वसीत चर्मचीरं वा”; कुल्लूक-भट्ट-कृता टीका—'मृगादिचर्मवस्त्रखण्डं वा आच्छादयेत्॥” अर्थात् “गृहत्यागी व्यक्ति ग्राम छोड़कर वनमें जाकर इन्द्रियोंपर संयम रखते हुए वहाँ वास करेंगे और चर्म या चीरका वस्त्र पहनेंगे। कुल्लूक-भट्टकृत टीका—मृगादिके चर्म या कपड़ेके टुकड़ेसे शरीरका आच्छादन करना चाहिये॥” 154 ॥ महाप्रभुका श्रीभारतीको देखकर भी अनदेखा करना :- देखिया त' छद्म कैल येन देखे नाञि। मुकुन्देरे पुछे,—“काँहा भारती-गोसाञि?” ॥ 155 ॥ मुकुन्द कहे,—“एइ आगे देख विद्यमान।” प्रभु कहे,—“तेँह नहेन, तुमि अगेयान ॥ 156 ॥ अन्येरे अन्य कह, नाहि तोमार ज्ञान। भारती-गोसाञि केने परिबेन चाम?” ॥ 157 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीब्रह्मानन्द भारतीको देखकर भी ऐसा बहाना किया जैसे उन्हें नहीं देखा और श्रीमुकुन्दसे पूछा,–“भारती-गोसाईं कहाँ है?” श्रीमुकुन्दने कहा,—“देखिये, वे आपके सामने ही तो हैं।” महाप्रभुने कहा,—“यह वे नहीं है, तुम्हें भूल हो रही है। तुम किसी दूसरेको भारती-गोसाईं कह रहे हो, तुम तो उन्हें जानते ही नहीं हो। भला भारती-गोसाईं मृगछाला क्यों पहनेंगे?” ॥ 155–157 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'छद्म'—छल, कपट ॥ 155 ॥ महाप्रभुके व्यवहारसे श्रीभारतीको सुबुद्धि :- शुनि' ब्रह्मानन्द करे हृदये विचारे। 'मोर चर्माम्बर एइ, ना भाय इँहारे ॥ 158 ॥ बाह्यचिह्न-धारण करनेसे ही संसार-मुक्ति नहीं मिलती :- भाल कहेन,—चर्माम्बर दम्भ लागि' परि। चर्माम्बर-परिधाने संसार ना तरि ॥ 159 ॥ श्रीभारतीका बहिर्वास-परिधान और महाप्रभुका प्रणाम :- आजि हैते ना परिब एइ चर्माम्बर।' प्रभु बहिर्वास आनाइला जानिया अन्तर ॥ 160 ॥ चर्माम्बर छाड़ि' ब्रह्मानन्द परिल वसन। प्रभु आसि' कैल ताँर चरण वन्दन ॥ 161 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी बातको सुनकर श्रीब्रह्मानन्द भारती मनमें विचार करने लगे,–‘मेरा यह मृगछाला पहनना इन्हें अच्छा नहीं लगा। इन्होंने ठीक ही तो कहा है। मैं प्रतिष्ठाके लिये ही मृगछाला पहनता हूँ। मृगछाला पहननेसे ही संसारसे उद्धार नहीं हो सकता। इसलिये आजसे मैं मृगछाला नहीं पहनूँगा।' महाप्रभुने उनके मनकी बातको जानकर संन्यासका वस्त्र मँगवा लिया। तब श्रीब्रह्मानन्द भारतीने मृगछालाको त्यागकर वह संन्यासका वस्त्र पहन लिया। तब महाप्रभुने आकर उनके श्रीचरणोंकी वन्दना की॥ 158–161 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ना भाय'—शोभा नहीं देता॥ 158 ॥ अनुभाष्य—लोक-संग्रह अर्थात् बहुतसे अनुयायी बनानेके अभिमानके वशीभूत होकर चर्मवस्त्र पहननेसे । 425
[ 10/159-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ही संसारसे उद्धार नहीं होता। मनुसंहिता छठा अध्याय— “फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्। न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति।” और इस श्लोककी कुल्लुक-भट्टकृत टीका— “कतक-वृक्षस्य फलं कलुषजलस्वच्छताजनकं, तथापि तन्नामोच्चारणवशात् न प्रसीदति किन्तु फलप्रक्षेपेण। एवं न लिङ्गधारणमात्रम् धर्म-कारणम्।” अर्थात् “ 'कतक'-वृक्षका फल (रीठा) यद्यपि जलको निर्मल करता है, किन्तु इस फलका नाम लेनेसे ही जल निर्मल नहीं होता। कुल्लुक-भट्टकृत टीका—'कतक'-वृक्षका फल गन्दे-जलको स्वच्छ करता है। ऐसा कहकर 'कतक' 'कतक', इस प्रकार नामके उच्चारणसे जल निर्मल नहीं होता, बल्कि जलमें रीठा फल डालनेपर ही जल स्वच्छ होता है। उसी प्रकार केवल धार्मिक-चिह्न धारण करनेसे ही धर्मका पालन नहीं होता।” 'बहिर्वास'—कौपीनके ऊपर पहना जानेवाला वस्त्र ॥ 159-160 ॥ महाप्रभुके प्रणामको ग्रहण करनेमें श्रीभारतीको आपत्ति :- भारती कहे,—“तोमार आचार लोक शिखाइते। पुनः ना करिबे नति, भय पाङ चित्ते ॥ 162 ॥ श्रीभारतीका तत्त्वदर्शन—महाप्रभु और जगन्नाथमें अभेद दर्शन :- साम्प्रतिक 'दुइ ब्रह्म' इहाँ,—'चलाचल' । जगन्नाथ—अचल, तुमि—ब्रह्म सचल ॥ 163 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 162-163 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'साम्प्रतिक'—वर्तमान कालमें। इस पुरुषोत्तममें 'चल' और 'अचल', दो ब्रह्म देख रहा हूँ॥ 163 ॥ अनुभाष्य—लोकशिक्षाके लिये ही आपका आचरण है। यदि आपके मनके अनुसार मैं सदाचार पालन न करूँ, तो आप पुनः मुझे प्रणाम न करके मेरी उपेक्षा करेंगे, इसलिये मुझे भय हो रहा है। 'श्रीजगन्नाथ विग्रह'—अचल-ब्रह्म एवं आप श्रीचैतन्य महाप्रभु—सचल ब्रह्म हैं। आप दोनों ही मायाधीश चल-अचल ब्रह्मवस्तु स्वरूपमें इस समय श्रीपुरुषोत्तममें विराजमान हैं ॥ 162-163 ॥ तुमि—गौरवर्ण, तेंह—श्यामवरण। दुइ ब्रह्म कैल सब जगत्-तारण ॥” 164 ॥ अनुवाद—आप गौरवर्ण हैं और वे श्यामवर्णके हैं। आप दोनों ब्रह्म समस्त जगत्का उद्धार कर रहे हैं॥” 164 ॥ महाप्रभुके द्वारा उत्तर देना :- प्रभु कहे,—“सत्य कहि, तोमार आगमने। दुइ ब्रह्म प्रकटिल श्रीपुरुषोत्तमे ॥ 165 ॥ 'ब्रह्मानन्द' नाम तुमि—गौर-ब्रह्म 'चल'। श्यामवर्ण जगन्नाथ बसियाछेन 'अचल' ॥” 166 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—“मैं सत्य कह रहा हूँ, आपके आनेसे श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें दो ब्रह्म प्रकट हो गये हैं। 'ब्रह्मानन्द' नामक गौरवर्णके आप 'चल' ब्रह्म हैं और दूसरे श्यामवर्णके श्रीजगन्नाथ 'अचल' ब्रह्म यहाँ पहलेसे ही बैठे हैं॥” 165-166 ॥ महाप्रभु और श्रीभारती, दोनोंके विचारमें श्रीसार्वभौमकी मध्यस्थता :- भारती कहे,—“सार्वभौम, मध्यस्थ हञा। इँहार सने आमार 'न्याय' बुझ' मन दिया ॥ 167 ॥ श्रीभारतीका जीव-ब्रह्म विचार :- 'व्याप्य'-'व्यापक'-भावे 'जीव'-'ब्रह्मे' जानि। जीव—व्याप्य, ब्रह्म—व्यापक, शास्त्रेते बाखानि ॥ 168 ॥ स्वेच्छापूर्वक चालित करानेवाले इच्छाशक्तिके परिचालक प्रभु ही विभु या विष्णु या ब्रह्म, श्रीभारती ही जीव :- चर्म घुचाञा कैल आमारे शोधन। दोँहार व्याप्य-व्यापकत्वे, एइ त' कारण ॥ 169 ॥ अनुवाद—श्रीब्रह्मानन्द भारतीने कहा,—“हे सार्वभौम 426 ।
दसवाँ अध्याय 10/167-174 ] भट्टाचार्य ! आप मध्यस्थ होकर इनके साथ मेरे न्यायसङ्गत विचारको ध्यानपूर्वक सुनिये। 'व्याप्य' और 'व्यापक'—इन दो प्रकारसे 'जीव' और 'ब्रह्म'को मैं जानता हूँ। जीवको व्याप्य और ब्रह्मको व्यापकके रूपमें शास्त्रोंमें कहा गया है। मृगछाला छुड़ाकर इन्होंने मेरा शोधन किया है, इसलिये ये व्यापक-ब्रह्म हैं और मैं व्याप्य-जीव हूँ॥ 167-169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इनके साथ आप मेरा विचार ध्यानपूर्वक सुनिये। ब्रह्म-व्यापक अर्थात् सर्वव्यापक हैं; जीव-अणु अर्थात् ब्रह्मके द्वारा व्याप्य है। जिन्होंने मृगछाला छुड़ाकर मेरा शोधन किया है, वे-व्यापक हैं और मैं-व्याप्य हूँ। यहाँपर विचार करके देखिये कि ब्रह्मानन्द-भारतीरूप मैं या श्रीकृष्णचैतन्यरूप ये-हम दोनोंमेंसे कौन 'ब्रह्म' हुए॥ 169॥ महाभारतमें दानधर्म 149, विष्णुसहस्त्रनाम-स्तोत्र (92, 75)— सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥ 170॥ अनुवाद—सुवर्णवर्ण, पिघले स्वर्णकी भाँति अङ्ग, सर्वाङ्गसुन्दर गठन, चन्दनमालासे सुशोभित, संन्यासाश्रमी, हरि-रहस्यकी आलोचनारूप शमगुणसे युक्त, हरिकीर्त्तनरूप महायज्ञमें दृढ़तापूर्वक निष्ठावान् और केवलाद्वैतवादी अभक्त-निवृत्तिकारिणी शान्ति-प्राप्त महाभावपरायण—ये विष्णु सहस्त्र नामोंमें आठ नाम हैं॥ 170॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/49 संख्या देखें॥ 170॥ महाप्रभुमें ही उपरोक्त श्लोकका तात्पर्य निहित :- एइसब नामेर इँह हय निजास्पद। चन्दनाक्त प्रसाद-डोर—द्विभुजे अङ्गद॥”171॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 171 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'सुवर्णवर्णः'-श्लोकमें जो सब नाम हैं, उनके श्रीकृष्णचैतन्य ही आस्पद हैं अर्थात् उन नामोंने उन्होंने ही स्थान प्राप्त किया है। चन्दनका लेप और प्रसाद-डोर (श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी डोर जो उन्हें प्राप्त हुई है)—ये उनकी दोनों भुजाओंमें कङ्कनस्वरूप हैं॥” 171॥ श्रीसार्वभौमकी मीमांसा—श्रीभारतीकी जय और महाप्रभुकी पराजय स्वीकार :- भट्टाचार्य कहे,—“भारती, देखि तोमार जय।” प्रभु कहे,—“येइ कह, सेइ सत्य हय॥ 172 ॥ गुरुतुल्य श्रीभारतीके समक्ष शिष्य-स्थानीय महाप्रभुकी पराजय :- गुरु-शिष्य-न्याये शिष्येर सत्य पराजय।” भारती कहे,—“ए नहे, अन्य हेतु हय ॥ 173 ॥ श्रीभारतीकी प्रत्युक्ति—भक्तोंके समक्ष भगवान्की पराजय :- भक्त ठाञि हार' तुमि,—ए तोमार स्वभाव। आर एक शुन तुमि आपन प्रभाव ॥ 174॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“भारती ! मैं तो आपकी विजय देखता हूँ।” उनकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,—“आपने जो कहा, वह सत्य ही है, क्योंकि गुरु और शिष्यके तर्कमें शिष्यकी ही पराजय निश्चित है।” श्रीब्रह्मानन्द भारतीने कहा,—“यह नहीं, बल्कि इसका अन्य कोई कारण है। यह आपका स्वभाव है कि आप अपने भक्तोंसे सदा पराजित होते हैं। इसके अतिरिक्त आप अपना एक और प्रभाव सुनिये ॥ 172-174 ॥ अनुभाष्य—शिष्य-वाक्य सत्य होनेपर भी गुरु-वाक्य ही शिष्यके ऊपर विजयी होता है। गुरु-वाक्य सब समय ही शिष्य-वाक्यकी अपेक्षा अधिक आदरणीय है। महाप्रभुने यह कहा,—उक्त न्यायके अनुसार श्रीब्रह्मानन्द भारती ही गुरु हैं और महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यने स्वयंको उनका शिष्य माना, इसलिये ब्रह्मानन्दके वाक्योंकी ही विजय हुई। किन्तु श्रीब्रह्मानन्दने इस विषयमें महाप्रभुके द्वारा कहे गये गुरु-शिष्य-न्यायके आधारको ही उनकी । 427
[ 10/174-177 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पराजयका कारण स्वीकार नहीं किया; उन्होंने कहा कि उसका एक और कारण है। वह यह है कि भगवान् भक्तके सामने अपनी पराजय स्वीकार करते हैं, —यही भगवत्ताका स्वभाव है; जैसे भीष्मवाक्य (भा: 1/9/34)— “स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः। धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गुर्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ” अर्थात् “श्रीभीष्मदेवने कहा, — 'कुरुक्षेत्र-युद्धमें मैं अस्त्र धारण नहीं करूँगा' - अपनी यह प्रतिज्ञा त्यागकर श्रीकृष्ण मेरी उनसे अस्त्र धारण करवानेकी प्रतिज्ञाको सत्य करनेके लिये रथसे उतरकर चक्र धारणकर मेरा वध करनेके लिये दौड़े थे, जिसमें उनका ऊपरका वस्त्र भी गिर गया था॥” 174 ॥ महाप्रभुकी अलौकिक महिमाका वर्णन,—श्रीभारतीका निर्विशेष-विचार चिद्विलासमें परिवर्तित :— आजन्म करिनु मुञि 'निराकार'-ध्यान। तोमा देखि' 'कृष्ण' हैल मोर विद्यमान ॥ 175 ॥ महाप्रभुकी कृपासे श्रीभारतीको कृष्णभक्तिकी प्राप्ति :— कृष्णनाम स्फुरे मुखे, मने नेत्रे कृष्ण। तोमाके तद्रूप देखि' हृदय—सतृष्ण ॥ 176 ॥ श्रीबिल्वमङ्गलके साथ तुलना :— बिल्वमङ्गल कैल यैछे दशा आपनार। इँह देखि' सेइ दशा हइल आमार ॥” 177 ॥ अनुवाद—मैंने जन्मसे ही निराकारका ध्यान किया है, परन्तु आपके दर्शन करके मुझे ऐसा लगता है कि श्रीकृष्ण साक्षात् मेरे सामने हैं। मेरे मुखसे श्रीकृष्णनाम स्फुरित हो रहा है, मेरे मनमें और नेत्रोंसे श्रीकृष्णके दर्शन हो रहे हैं और मैं आपको श्रीकृष्णरूपमें देख रहा हूँ और आपकी सेवा करनेकी तृष्णा हो रही है। निराकारका ध्यान छोड़कर साकारकी अनुभूतिसे जैसी दशा बिल्वमङ्गल ठाकुरकी हुई थी, मैं देख रहा हूँ कि मेरी भी वैसी ही दशा हो गयी है ॥ 175-177 ॥ अनुभाष्य—मैं सारा जीवन निराकार-ब्रह्मका ध्यान ही करता था, परन्तु आपके साक्षात्कारके फलस्वरूप अप्राकृत श्रीकृष्णमूर्ति मेरे सामने उदित हुई है। मेरे मुखमें और मनमें श्रीकृष्णनाम स्फुरित हो रहा है एवं नेत्रोंसे श्रीकृष्णके दर्शन हो रहे हैं। फिर, आपमें श्रीकृष्णरूप दर्शन करके हृदयमें भी सेवाकी तृष्णा जाग्रत हुई है। ठाकुर बिल्वमङ्गल पूर्व जीवनमें अद्वैतवादी निराकार-ब्रह्म-ध्यानपरायण थे और बादमें श्रीकृष्णभक्त होकर उन्होंने अपनी यह बात कही है, मेरी भी आज वही दशा हुई है। श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें,— “कैवल्यं नरकायते ××× यत्कारुण्यकटाक्षवैभववतां तं गौरमेव स्तुमः”, “धिक् कुर्वन्ति च ब्रह्मयोगविदुषस्तं गौरचन्द्रं नुमः”; “तावद् ब्रह्मकथा विमुक्तपदवी तावन्न तिक्तीभवेत्तावच्चापि विशृङ्खलत्वमयते नो लोकवेदस्थितिः । तावच्छास्त्रविदां मिथः कलकलो नाना-बहिर्वर्त्मसु श्रीचैतन्यपदाम्बुजप्रियजनो यावन्न दृग्गोचरः”॥ “गौरश्चौरः सकलमहरत् कोऽपि मे तीव्रवीर्यः ॥” अर्थात् “'जिनकी कृपाकटाक्ष-सम्पत्तिसे सम्पत्तिशाली उन गौरभक्तोंको केवलारूपा मुक्ति नरकतुल्य प्रतीत होती है, उन श्रीगौरसुन्दरका मैं स्तव करता हूँ।' 'जिनके चरणकमलोंसे क्षरित उज्ज्वल प्रेमानन्दमय अद्भुत अमृतरस पान करके ब्रह्मज्ञानी और अष्टाङ्ग-योगियोंको धिक्कार करता हूँ, उन श्रीगौरहरिकी मैं वन्दना करता हूँ।' 'उस समय तक ही निर्विशेष-ब्रह्म-आलोचना चलती रहती है, उस समय तक ही ईश्वर-सायुज्यादि मुक्तिमार्ग कड़वा नहीं लगता, उस समय तक ही लौकिक और वैदिक कर्मकाण्ड सभी विशृङ्खलताको प्राप्त न हों (अर्थात् सुन्दररूपसे सम्पन्न होते रहें), उस समय तक ही नाना बहिर्मुख मार्गमें दौड़ते हुए पण्डित-मान्यगणोंका परस्पर वाद-विवाद होता रहता है, जिस समय तक श्रीचैतन्यचरणकमल-प्रिय गौरभक्तगण दृष्टिगोचर नहीं होते।' 'कोई एक अमित प्रभावशाली गौरविग्रहधारी चोर मेरे सभी (कुण्ठा-स्वभावका) अपहरण कर रहा है।'॥” 175-177 ॥ 428 ।
दसवाँ अध्याय 10/178-182 ] श्रीकृष्णकी इच्छा मात्रसे ही कर्म और ज्ञान-निष्ठाका ध्वंस :- श्रीकृष्णकर्णामृतमें बिल्वमङ्गल-वाक्य- अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः स्वानन्दसिंहासन-लब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन ॥ 178 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अद्वैतमार्गके पथिकोंके द्वारा उपास्य, और आत्मानन्द-सिंहासनसे दीक्षा प्राप्त करनेपर भी मैं किसी गोपवधू-लम्पट शठके द्वारा हठतापूर्वक दासीके रूपमें परिणत हो गया हूँ॥ 178॥ दसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य- अद्वैतवीथीपथिकैः (अद्वैतं स्वगत-सजातीय-विजातीय-भेदरहितम् एव वीथी पन्थाः तस्यां ये पथिकाः केवलाद्वैतवादिनः तैः निराकारब्रह्मवादिभिः) उपास्याः (पूजनीयाः) स्वानन्दसिंहासन- लब्धदीक्षा (आत्मानन्द एव सिंहासनम् उच्चपीठः तस्मिन् लब्धा प्राप्ता दीक्षा यैः, एवम्भूताः योगमार्गरताः) वयं (अहं-गौरवे-बहुवचनं) केनापि शठेन (कपटन्) गोपवधूविटेन (गोपीलम्पटेन नन्दनन्दनेन) हठेन (बलात्कारेण) दासीकृताः (स्वदास्ये नियुक्ता इत्येकवचनेनैव बोद्धव्यम्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178 ॥ महाप्रभुकी श्रीभारतीको 'महाभागवत' कहकर प्रशंसा :- प्रभु कहे,-"कृष्णे तोमार गाढ़ प्रेमा हय। याँहा नेत्र पड़े, ताँहा कृष्णस्फूर्ति हय॥" 179॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"श्रीकृष्णके प्रति आपका गाढ़ प्रेम है, इसलिये जहाँ आपकी दृष्टि पड़ती है, वहाँ आपको श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है॥"179॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा श्रीकृष्णकृपाकी महिमाकी व्याख्या :- भट्टाचार्य कहे,-"तोमार हय सत्य वचन। आगे यदि कृष्ण देन साक्षात् दरशन॥180॥ भक्तकी प्रेमसेवा और भगवान्की कृपा ही परस्परका मिलन अथवा योगसूत्र :- प्रेम बिना कभु नहे ताँर साक्षात्कार। इँहार कृपाते हय दरशन इँहार॥" 181 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा,-"आपके वचन सत्य हैं। यदि श्रीकृष्ण साक्षात् दर्शन भी दें, तो भी प्रेमके बिना कभी भी उनका साक्षात्कार नहीं होता। इनकी (महाप्रभुकी) कृपासे ही इन्हें (ब्रह्मानन्द भारतीको) श्रीकृष्णका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है॥"180-181॥ अनुभाष्य-श्रीमहाप्रभुने कहा,-"आप ब्रह्मानन्द भारती प्रेममय महाभागवत हैं, इसलिये सर्वत्र आपको श्रीकृष्णदर्शन होगा, इसमें और सन्देह क्या है?" भट्टाचार्य दोनोंके मध्यस्थ होकर बोले,-"महाभागवत ब्रह्मानन्द भारतीको श्रीकृष्णदर्शन हुए हैं, महाप्रभुका यह वाक्य भी सत्य है, क्योंकि श्रीकृष्ण महाभागवतोंके समक्ष ही साक्षात् दर्शन दिया करते हैं, किन्तु भक्तोंके प्रेमाधिक्यके अतिरिक्त वैसे साक्षात्कारकी सम्भावना नहीं है।" पहले 'इँहार' शब्दका अर्थ-श्रीमहाप्रभुकी कृपासे है; बादवाले 'इँहार' शब्दका अर्थ ब्रह्मानन्द भारतीको दर्शन अर्थात् श्रीकृष्ण दर्शन हुए हैं। (ब्रह्मसंहिता 5/38 श्लोक)-"प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति" अर्थात् "प्रेमरूप काजलके द्वारा रञ्जित भक्तिनेत्रोंसे सन्तपुरुष अपने हृदयमें श्रीकृष्णके दर्शन करते हैं॥" 179-181 ॥ बाह्य-जीवाभिमान-हेतु महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौमके वाक्यका अनादर :- प्रभु कहे,-" 'विष्णु' 'विष्णु', कि कह सार्वभौम। 'अतिस्तुति' हय एइ निन्दार लक्षण॥" 182 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुने कहा,-"'विष्णु'! 'विष्णु'! हे सार्वभौम, आप यह क्या कह रहे हैं? किसीकी अधिक प्रशंसा निन्दाका ही लक्षण है॥" 182 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभु श्रीसार्वभौमके वाक्यसे लज्जित । 429
[ 10/182-190 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला होकर 'विष्णु' 'विष्णु' शब्द उच्चारण करके बोले कि किसी व्यक्तिकी अति-स्तुति करना वास्तवमें उसकी निन्दा करना ही है॥ 182 ॥ श्रीभारतीको साथ लेकर महाप्रभुका अपने स्थानपर आना :- एत बलि' भारतीरे लञा निज-वासा आइला। भारती-गोसाञि प्रभुर निकटे रहिला ॥ 183 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु श्रीब्रह्मानन्द भारतीको अपने निवास-स्थानपर ले आये। तब श्रीभारती गोसाईं महाप्रभुके निकट ही रहने लगे ॥ 183 ॥ महाप्रभुके ऐकान्तिक भक्त-(1) रामभद्र और (2) भगवान्-आचार्य :- रामभद्राचार्य, आर भगवान् आचार्य। प्रभुपदे रहिला दुँहे छाड़ि' सर्व कार्य ॥ 184 ॥ अनुवाद—श्रीरामभद्राचार्य और श्रीभगवान् आचार्य भी अपने सब कार्योंको छोड़कर महाप्रभुकी शरणमें रहने लगे ॥ 184 ॥ काशीश्वरका आगमन :- काशीश्वर गोसाञि आइला आर दिने। सम्मान करिया प्रभु राखिला निज-स्थाने ॥ 185 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीकाशीश्वर गोसाईं भी आ गये। महाप्रभुने उन्हें सम्मानपूर्वक अपने पास रख लिया ॥ 185 ॥ अनुभाष्य— 'रामभद्राचार्य'—आदिलीला 10/148 संख्या देखें। 'भगवान् आचार्य'—आदिलीला 10/136 संख्या देखें। 'काशीश्वर'—आदिलीला 8/66 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'मुरारि-कड़चामें'— “अथ भक्तगणाः सर्वे ये ये गौड़निवासिनः। गन्तुमिच्छन्ति गौराङ्गदर्शनाय नीलाचलम् ॥ श्रीकाशीश्वर-गोस्वामी" इत्यादि। अर्थात् “गौड़देशके निवासी श्रीगौरभक्त श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचल आते। श्रीकाशीश्वर गोस्वामी भी इसी भावसे नीलाचल आये थे।” आदि ॥" 184-185 ॥ दसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। बलवान श्रीकाशीश्वरका महाप्रभुकी सेवामें बलका सद्-व्यवहार :- प्रभुके लञा करा'न ईश्वर दरशन। लोक-भिड़ आगे सब करि' निवारण ॥ 186 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीश्वर गोस्वामी महाप्रभुको श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये मन्दिर लेकर जाते और महाप्रभुके आगे चलते हुए भीड़को हटाकर उनके लिये मार्ग बनाते थे जिससे कोई उन्हें स्पर्श न करे ॥ 186 ॥ महाप्रभुके साथ सभी भक्तोंके मिलनकी उपमा :- यत नद नदी यैछे समुद्रे मिलय। ऐछे महाप्रभुर भक्त याँहा ताँहा हय ॥ 187 ॥ सबे आसि' मिलिला प्रभुर श्रीचरणे। प्रभु कृपा करि' सबाय राखिल निज-स्थाने ॥ 188 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार समस्त नद-नदियाँ आकर समुद्रमें मिलती हैं, उसी प्रकार महाप्रभुके भक्त जहाँ कहीं भी रहते थे, वे सब आकर महाप्रभुके श्रीचरणोंमें उपस्थित हुए और महाप्रभुने कृपापूर्वक उन सबको अपने पास ही रहनेका स्थान दिया ॥ 187-188 ॥ महाप्रभुके साथ भक्त-मिलनके संवादका वर्णन समाप्त :- एत त' कहिल प्रभुर वैष्णव-मिलन। इहा येइ शुने, पाय चैतन्य-चरण ॥ 189 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 190 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे वैष्णवमिलनं नाम दशम परिच्छेदः। 430 ।
दसवाँ अध्याय 10/189-190 ] अनुवाद-यहाँ तक मैंने महाप्रभुके साथ वैष्णवोंके करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन मिलनकी कथाका वर्णन किया है। इसे जो भी श्रवण कर रहा है ॥ 189-190 ॥ करता है, उसे महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यखण्डमें वैष्णवमिलन नामक दसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 431
ग्यारहवाँ अध्याय कथासार—जब श्रीसार्वभौमने राजा प्रतापरुद्रकी महाप्रभुके साथ भेंट करानेकी चेष्टा की, तब महाप्रभुने उसे अस्वीकार कर दिया। श्रीरामानन्द-रायने पुरुषोत्तममें (पुरीमें) आकर महाप्रभुके साथ मिलकर राजाके बहुतसे वैष्णव-गुणोंकी व्याख्या की, जिससे महाप्रभुका चित्त परिवर्तित हो गया। उधर राजाने श्रीसार्वभौमको अपनी दैन्य-प्रतिज्ञा बतलायी। तब श्रीसार्वभौमने राजाको महाप्रभुके चरण-दर्शनका एक उपाय बतला दिया। अनवसर-काल आनेपर भगवद्-दर्शनके विरहमें व्याकुल होकर महाप्रभु आलालनाथ चले गये, कुछ समय बाद गौड़देशसे सभी भक्तोंके आगमनके विषयमें सुनकर महाप्रभु पुरुषोत्तम लौट आये। श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके आनेके समय श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द महाप्रभुके द्वारा दी गयी मालाओंको लेकर उन्हें लाने गये। राजा अट्टालिकासे वैष्णवोंको आते हुए देखने लगे। श्रीसार्वभौमकी इच्छानुसार श्रीगोपीनाथाचार्यने इन सब वैष्णवोंका परिचय दिया। श्रीचैतन्यके श्रीकृष्णत्व और समागत वैष्णवोंके मुण्डन-उपवास आदिको परित्यागकर प्रसादान्न-सेवनके सम्बन्धमें श्रीसार्वभौमके साथ राजाके अनेक विचार उपस्थित हुए। इसके उपरान्त राजाने वैष्णवोंके रहनेके स्थान और प्रसादान्न आदिकी व्यवस्था कर दी। महाप्रभुने श्रीवासुदेव-दत्तादि वैष्णवोंके साथ अनेक आनन्दजनक वार्त्तालाप किया। श्रीहरिदास ठाकुरका दैन्य देखकर महाप्रभुने बगीचेके बीचमें उन्हें एक एकान्त स्थान प्रदान किया और दूसरोंको श्रीहरिदासकी महिमा बतलायी। उसके बाद श्रीजगन्नाथदेवके मन्दिरमें चार मण्डलियाँ बनाकर महासङ्कीर्त्तन हुआ। तदुपरान्त वैष्णवगण महाप्रभुकी आज्ञासे अपने-अपने स्थानपर चले गये। —(अमृतप्रवाहभाष्य) नृत्यशील श्रीगौरका विश्वको प्रेमकी बाढ़में डुबोना :— अत्युद्दण्डं ताण्डवं गौरचन्द्रः कुर्वन् भक्तैः श्रीजगन्नाथगेहे। नानाभावालङ्कृताङ्गः स्वधाम्ना चक्रे विश्वं प्रेमवन्या-निमग्नम्॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीजगन्नाथके मन्दिरमें भक्तोंके साथ नाना प्रकारके भावोंसे अलङ्कृत शरीरवाले श्रीगौरचन्द्रने अतिशय उद्दण्ड नृत्य करके अपने माधुर्यके द्वारा इस विश्वको प्रेमकी बाढ़में डुबोया था॥ 1 ॥ अनुभाष्य— नानाभावालङ्कृताङ्गः (विविधभावाभरणमण्डितदेहः) गौरचन्द्रः श्रीजगन्नाथगेहे (श्रीजगन्नाथदेवस्य मन्दिरे) भक्तैः [सह] स्वधाम्ना (अलौकिक-स्वमाधुर्येण) अत्युद्दण्डं ताण्डवं (अतिमनोज्ञ- नृत्यादिकं) कुर्वन् विश्वं (चिद्रसहीनं जड़रसपरं भुवनं) प्रेमवन्या-निमग्नं चक्रे (कृष्णप्रेमतराङ्गैः प्लावयामास)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो एवं श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ । 433
[ 11/3-10 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीसार्वभौमकी महाप्रभुसे कुछ निवेदन करनेकी इच्छा :- आर दिन सार्वभौम कहे प्रभुस्थाने। “अभय-दान देह’ यदि, करि निवेदने॥” ३॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा,—“यदि आप अभय-दान दें, तो मैं आपसे कुछ निवेदन करूँ॥” ३॥ महाप्रभुके द्वारा अनुमति प्रदान :- प्रभु कहे,—“कह कमि, नाहि किछु भय। योग्य हैले करिब, अयोग्य हैले नय॥” ४॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“जो कहना है, आप निर्भय होकर कहिये। यदि आपकी बात उचित होगी, तो मैं अवश्य करूँगा, अनुचित होनेपर उसे अस्वीकार कर दूँगा॥” ४॥ प्रतापरुद्रका पक्ष लेकर श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुकी कृपाकी याचना :- सार्वभौम कहे,—“एइ प्रतापरुद्र राय। उत्कण्ठा हञाछे, तोमा मिलिबारे चाय॥” ५॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये राजा प्रतापरुद्र आपसे मिलनेके लिये बहुत उत्कण्ठित हो रहे हैं॥” ५॥ राजादर्शन करनेमें महाप्रभुकी असम्मति और वितृष्णा :- कर्णे हस्त दिया प्रभु स्मरे ‘नारायण’। “सार्वभौम, कह केन अयोग्य वचन॥ ६॥ संन्यासीका धर्म :- विरक्त संन्यासी आमार राज-दरशन। स्त्री-दरशन-सम विषेर भक्षण॥” ७॥ अनुवाद—यह सुनते ही महाप्रभुने अपने कानोंको हाथोंसे ढक करके भगवान् श्रीनारायणका स्मरण किया। तब महाप्रभुने कहा,—“हे सार्वभौम ! आप ऐसी अनुचित बात क्यों कह रहे हैं? मैं एक विरक्त संन्यासी हूँ। मेरे लिये राजाका दर्शन तो स्त्री-दर्शनके समान विषपान करना है॥” ६-७॥ प्रेमाकाङ्क्षीके लिये भोक्ताभावसे भोग्य वस्तुका दर्शन विष खानेके समान निषिध :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/24)— निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य पारं परं जिगमिषोर्भवसागरस्य। सन्दर्शनं विषयिणामथ योषिताञ्च हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु॥ ८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्यदेवने खेदके साथ कहा,—हाय! भवसागरको सम्पूर्णरूपसे पार होनेकी जिनकी इच्छा है, ऐसे भगवद्-भजनोन्मुख निष्किञ्चन व्यक्तिके लिये विषयी और स्त्रीका [भोग बुद्धिसे] दर्शन विषपानकी अपेक्षा अधिक अकल्याणकारी है॥ ८॥ अनुभाष्य— हा हन्त हन्त (खेदातिशये) भवसागरस्य (संसारसमुद्रस्य) परं पारं (देवीधामतीतं परव्योम-भगवद्धाम) जिगमिषोः (गन्तुकामस्य) निष्किञ्चनस्य (निर्विषयिणः) भगवद्भजनोन्मुखस्य (कृष्णसेवापरस्य) विषयिणां (कृष्णेतरविषयभोगपराणां) योषितां (भोग्यानां च) सन्दर्शनं (भोग्यबुद्ध्या अवलोकनादिकं) विषभक्षणतः (आत्मविनाशक-गरलस्य सेवनात्) अपि असाधु (अकल्याणकरम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ८॥ श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा राजाकी प्रशंसा :- सार्वभौम कहे,—“सत्य तोमार वचन। जगन्नाथ-सेवक राजा, किन्तु भक्तोत्तम॥” ९॥ भोक्ता बनकर वस्तुको भोग्य मानकर उसके बाहिरी दर्शनसे द्वितीयाभिनिवेशसे भयकी उत्पत्ति :- प्रभु कहे,—“तथापि राजा कालसर्पाकार। काष्ठनारी-स्पर्शे यैछे उपजाय विकार॥ १०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ९-१०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,— “प्रभो! आपने जो कहा है, वह सत्य है। किन्तु राजा 434 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/9-17 ] प्रतापरुद्रदेव श्रीजगन्नाथके सेवक और उत्तम भक्त हैं।” महाप्रभुने कहा,—“श्रीजगन्नाथके सेवक और उत्तम भक्त होनेपर भी 'राजा' कालसर्पके समान है। देखो, लकड़ीकी बनी हुई नारीको स्पर्श करनेसे जैसे किसी प्रकारका विकार उत्पन्न हो सकता है, उसी प्रकार उत्तम भक्त राजाके दर्शन करनेपर विरक्त व्यक्तिमें भी अनर्थ उदित हो सकते हैं॥ 9-10॥ श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/25)— आकारादपि भेतव्यं स्त्रीणां विषयाणामपि। यथाहिर्मनसः क्षोभस्तथा तस्याकृतेरपि॥ 11॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 11॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार साँप और उसकी आकृति देखनेसे मनमें क्षोभ (भय) उत्पन्न होता है, उसी प्रकार स्त्री और विषयीका आकार देखते ही भय हुआ करता है॥ 11॥ अनुभाष्य— स्त्रीणां (योषितां) विषयाणाम् (इन्द्रियसेविनां) [(भोक्तृ-भोग्यानामिति यावत्] आकारात् अपि (बहिराकृतेरपि) [कृष्णैक-सेविभिः परमार्थपरैः साधकैः जनैः] भेतव्यम्। यथा अहेः (भुजङ्गात्) मनसः क्षोभः (भयं) भवति, तथा तस्य (सर्पस्य) आकृतेः (सदृशाकारात्) अपि [भयं भवति]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 11॥ लोकशिक्षक महाप्रभुका कठोर सङ्कल्प, आश्रम-मर्यादाकी रक्षाके लिये श्रीसार्वभौमका तिरस्कार :— ऐछे बात पुनरपि मुखे ना आनिबे। कह यदि, तबे आमाय एथा ना देखिबे॥” 12॥ अनुवाद—आप ऐसी बात फिर कभी अपने मुखमें मत लाना। यदि पुनः कहेंगे, तो आप मुझे यहाँ नहीं देखेंगे॥” 12॥ श्रीसार्वभौमका दुःखी मनसे घर जाना :— भय पाञा सार्वभौम निज घरे गेला। बासाय गिया भट्टाचार्य चिन्तित हइला॥ 13॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य यह सुनकर भयभीत होकर अपने घर चले गये। घर आकर श्रीभट्टाचार्य इस विषयपर चिन्तन करने लगे॥ 13॥ कटकसे श्रीरामानन्दादि परिकरोंके साथ राजाका पुरीमें आगमन :— हेनकाले प्रतापरुद्र पुरुषोत्तमे आइला। पात्र-मित्र-सङ्गे राजा दर्शने चलिला॥ 14॥ महाप्रभु और रामानन्दका मिलन :— रामानन्द राय आइला गजपति-सङ्गे। प्रथमेइ प्रभुरे आसि' मिलिला बहुरङ्गे॥ 15॥ अनुवाद—उसी समय राजा प्रतापरुद्र पुरुषोत्तम क्षेत्रमें आ गये तथा वे अपने मन्त्रियों और मित्रोंके साथ भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करनेके लिये चल पड़े। श्रीरामानन्द राय भी गजपति (राजा प्रतापरुद्र)के साथ आये थे। वे आते ही सर्वप्रथम महाप्रभुसे बड़े आनन्दसे मिले॥ 14-15॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'गजपति'—जिस प्रकार अन्यान्य कोई-कोई विशेष राजाओंकी 'छत्रपति', 'नरपति', 'अश्वपति' आदि पदवियाँ थीं, उसी प्रकार 'गजपति'—उड़ीसाके सम्राटोंकी उपाधि थी॥ 15॥ अनुभाष्य—गङ्गावंशीय प्रतापरुद्र-राजाकी राजधानी कटक-नगरमें थी। बादमें कटकसे खुर्द्दामें राजधानी स्थानान्तरित हुई थी॥ 14॥ राय प्रणति कैल, प्रभु कैल आलिङ्गन। दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन॥ 16॥ श्रीरायके प्रति महाप्रभुके आचरणको देखकर सभीको आश्चर्य :— राय-सङ्गे प्रभुर देखि' स्नेह-व्यवहार। सर्व भक्तगणेर मने हैल चमत्कार॥ 17॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको प्रणाम किया और महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। दोनों ही प्रेममें । 435
[ 11/16-26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आविष्ट होकर क्रन्दन करने लगे। श्रीरामानन्द रायके साथ महाप्रभुके ऐसे स्नेहपूर्ण व्यवहारको देखकर सभी भक्तोंके मनमें आश्चर्य हुआ॥16-17॥ श्रीरायका राजकार्य-त्याग करनेके विषयमें बताना :- राय कहे,—“तोमार आज्ञा राजाके कहिल। तोमार इच्छाय राजा मोर विषय छाड़ाइल॥18॥ राजासे श्रीरायकी सेवासे निवृत्तिकी प्रार्थना :- आमि कहि,—‘आमा हैते ना हय विषय’। चैतन्यचरणे रहौं, यदि आज्ञा हय॥’19॥ राजाके द्वारा आनन्दपूर्वक सम्मति प्रदान :- तोमार नाम शुनि’ राजा आनन्दित हैल। आसन हैते उठि’ मोरे आलिङ्गन कैल॥20॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“मैंने आपकी आज्ञा जब राजाको बतलायी, तब आपकी इच्छानुसार राजाने मुझे उन राजकार्योंसे मुक्त कर दिया। मैंने राजा प्रतापरुद्रसे कहा,—‘अब मुझसे यह राजकार्य नहीं होता। आप यदि मुझे आज्ञा दें, तो मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंमें जाकर रहूँ।’ आपका नाम सुनकर राजा बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने अपने आसनसे उठकर मेरा आलिङ्गन किया॥18-20॥ अनुभाष्य—‘तोमार आज्ञा’—मध्यलीला 8/296-297 संख्या देखें। यह बात श्रीरामानन्द रायने जब राजा प्रतापरुद्रको कही, तब महाप्रभुके अभिप्रायके अनुसार राजा प्रतापरुद्रने लौकिक-दृष्टिसे श्रीरामानन्दके विषय छुड़वा दिये अर्थात् उस राजकार्यसे उन्हें निवृत्त कर दिया॥18॥ महाप्रभुके प्रति राजाकी भक्ति :- ‘तोमार नाम शुनि’ हैल महा-प्रेमावेश। मोर हाते धरि’ करे पिरीति विशेष॥21॥ राजाके द्वारा श्रीरायको सेवा-निवृत्तिपर भी वेतन-दान :- तोमार ये वर्त्तन, तुमि खाओ सेइ वर्त्तन। निश्चिन्त हञा भज चैतन्येर चरण॥22॥ राजाका दैन्य :- आमि—छार, योग्य नहि ताँर दरशने। ताँरे येइ भजे, ताँर सफल जीवने॥23॥ परम कृपालु तँह व्रजेन्द्रनन्दन। कोन-जन्मे मोरे अवश्य दिबेन दरशन॥’24॥ अनुवाद—‘आपका नाम सुनकर वे महा-प्रेमावेशमें आ गये। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझसे विशेष प्रीति प्रदर्शित करते हुए कहा कि आपका जो वेतन है, वह आपको मिलता रहेगा। अब आप निश्चिन्त होकर महाप्रभुके श्रीचरणोंकी सेवा करो। मैं तो महापतित हूँ, महाप्रभुके दर्शन करने योग्य भी नहीं हूँ। परन्तु जो उनका भजन करता है, उसीका जीवन सफल है। महाप्रभु परम कृपालु और साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन हैं। किसी-न-किसी जन्ममें वे मुझे अवश्य ही दर्शन देंगे॥’21-24॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दक्षिण-कलिङ्गके शासनकर्त्ता पदपर आप जो वर्त्तन अर्थात् पारिश्रमिक या वेतन प्राप्त करते थे, अब आपको कार्यसे निवृत्त कर दिया है, तथापि आपको वही वेतन प्राप्त होगा॥22॥ रायके द्वारा महाप्रभुके समक्ष राजाकी प्रशंसा :- ये ताँहार प्रेम-आर्त्ति देखिलुँ तोमाते। तार एक प्रेम-लेश नाहिक आमाते॥”25॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥25॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरामानन्द ने कहा,—“प्रभो! मैंने आपके प्रति राजाकी जो प्रेमवेदना देखी थी, उसका लेशमात्र भी मुझमें नहीं है॥”25॥ शुद्धवैष्णवमें प्रीति हेतु महाप्रभुके द्वारा राजाको भावी-कृपा-प्रदान करनेका इङ्गित :- प्रभु कहे,—“तुमि कृष्णभक्त प्रधान। तोमाके ये प्रीति करे, सेइ भाग्यवान्॥26॥ 436 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/26-31 ] तोमाते ये एत प्रीति हइल राजार। एइ गुणे कृष्ण ताँरे करिबे अङ्गीकार ॥”27॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “आप श्रीकृष्ण-भक्तोंमें प्रधान हैं, इसलिये आपसे जो प्रीति करता है, वह भाग्यवान् है। राजाकी आपके प्रति जो इतनी प्रीति उत्पन्न हुई है, उनके इसी गुणके कारण श्रीकृष्ण उन्हें अवश्य अङ्गीकार करेंगे ॥”26-27॥ भक्तोंके भक्त ही भगवद्भक्त :- आदिपुराण वचन— ये मे भक्तजनाः पार्थ न मे भक्ताश्च ते जनाः। मद्भक्तानाञ्च ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः ॥ 28 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे पार्थ, जो केवल मेरे ही भक्त हैं, वे वास्तवमें मेरे भक्त नहीं है। किन्तु जो मेरे भक्तोंके भक्त हैं, उन्हें ही मैं अपना 'उत्तम भक्त' समझता हूँ ॥ 28 ॥ अनुभाष्य- हे पार्थ (अर्जुन), ये मे (मम) भक्तजनाः, ते मे (मम) भक्ताः जनाः न [भवन्ति]; ये च मद्भक्तानां [एव] भक्ताः, ते मे (मम) भक्ततमाः (श्रेष्ठ-सेवकाः) [इति मयैव] मताः (सम्मताः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥ शुद्धभक्तोंकी क्रिया :- श्रीमद्भागवत (11.19.21-22)- आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्। मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥ 29 ॥ मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्। मय्यर्पणञ्च मनसः सर्वकामविवर्जनम् ॥ 30 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29-30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी परिचर्या (सेवा) का आदर, सर्वाङ्गके द्वारा अभिवन्दन, मेरे भक्तोंकी विशेष पूजा, सभी जीवोंमें मुझसे सम्बन्धित बुद्धि, मेरे लिये अखिल चेष्टा, वाक्यके द्वारा मेरे गुणोंकी व्याख्या, मुझमें मन अर्पण और सब प्रकारकी कामनाओंका परित्याग, – ये सब भक्तोंके लक्षण हैं ॥ 29-30 ॥ अनुभाष्य-श्रीउद्धवके द्वारा भगवद्भक्तियोगके विषयमें जाननेके लिये जिज्ञासा करनेपर श्रीभगवान्की उक्ति- [भक्तियोगं तुभ्यं पुनश्च कथयिष्यामीत्याह-मम] परिचर्यायां (सेवायाम्) आदरः, सर्वाङ्गैः (अङ्गप्रत्यङ्गाद्यैः) अभिवन्दनं, [मत्तः] अभ्यधिका (श्रेष्ठा) मद्भक्तपूजा, सर्वभूतेषु (प्राणि-मात्रेषु) मन्मतिः (भगवद्भावदर्शनम्)। मदर्थेषु च (कृष्णैकतात्पर्येषु) कार्येषु अङ्गचेष्टा (अखिल- चेष्टा), वचसा (वाक्यद्वारेण) मद्गुणेरणं (कृष्णगुण-कथनं) मनसः मयि (कृष्णे) अर्पणं (समर्पणं), सर्वकाम-विवर्जनं (मनसः कृष्णेतर-विषयभोगवासना-परित्यागः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29-30 ॥ सर्वेश्वरेश्वर विष्णुकी पूजाकी अपेक्षा वैष्णवपूजा श्रेष्ठ :- लघुभागवतामृत (2/4) पद्मपुराणवचन- आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम्। तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ॥ 31 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 31 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे देवि ! अन्यान्य देवताओंकी आराधनाकी अपेक्षा विष्णुकी आराधना ही श्रेष्ठ है। विष्णुकी आराधनाकी अपेक्षा भक्तोंका अर्चन श्रेष्ठ है॥ 31 ॥ अनुभाष्य- हे देवि, सर्वेषां आराधनानाम् (उपासनानां मध्ये) विष्णोः (भगवतः कृष्णचन्द्रस्य) आराधनं (पूजनं) परं (श्रेष्ठं); तस्मात् (कृष्णोपासनम् अपि) तदीयानां (मधुररसे श्रीरूप-वार्षभानव्यादीनां, वात्सल्ये नन्द-यशोदादीनां, सख्ये श्रीदाम-सुबलादीनां, दास्ये चित्रकादीनां), समर्चनं (दृढ़पूजनं) परतरं (प्रशस्ततरम्)। श्लोक-भावानुवाद—हे देवि ! सभी उपासनाओंमें भगवान् श्रीकृष्णकी उपासना श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण उपासनासे भी उनके भक्तोंकी (मधुर रसमें श्रीरूप मञ्जरी, श्रीमती । 437
[ 11/31-36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला राधिका आदिकी, वात्सल्य रसमें श्रीनन्द-यशोदा आदिकी, सख्य रसमें श्रीदाम-सुबल आदिकी और दास्य रसमें चित्रक आदिकी) दृढ़ उपासना श्रेष्ठ है॥31॥ शुद्धभक्तकी सेवा बहुत सुकृतिसे प्राप्त होती है :- श्रीमद्भागवत (3/7/20)- दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु। यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ 32 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवदेव श्रीजनार्दनका जो नित्य गान करते हैं, उन वैकुण्ठपथपर चलनेवाले कृष्णदासोंकी सेवा अल्प-तपस्यावान् व्यक्तिको प्राप्त नहीं हो सकती॥ 32 ॥ अनुभाष्य-महाभागवत श्रीमैयात्रेय ऋषिसे हरिकथा सुनकर विदुरके संशय दूर होनेपर विदुरके द्वारा हरिभक्तोंके गुण-माहात्म्य-कीर्तन- यत्र (येषु महत्सु साधुषु) नित्यं (सर्वदा) देवदेवः (सर्वदेवमयः) जनार्दनः (कृष्णः) उपगीयते, तत्र (तेषु) वैकुण्ठवर्त्मसु (वैकुण्ठस्य श्रीकृष्णस्य वैकुण्ठलोकस्य वा, वर्त्मसु मार्गभूतेषु हरिजनेषु) सेवा-अल्पतपसः (क्षीणपुण्यजनस्य) दुरापा (दुर्लभा) हि (एव)। [महत्सेवयैव हरिकथाश्रवणं, ततो हरौ प्रेम, तेन च देहाद्यनुसन्धानमपि निवर्त्तते इति तात्पर्यम्।] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [महत्-सेवाके द्वारा ही हरिकथा श्रवण होती है, इसके फलस्वरूप श्रीहरिमें प्रेम उत्पन्न होता है और इसके द्वारा देहादिमें अभिनिवेश निवृत्त होता है, यही तात्पर्य है।] इस प्रसङ्गमें पद्मपुराणके ये श्लोक आलोच्य हैं- “भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन परिजायते। सत्सङ्गः प्राप्यते पुंभिः सुकृतैः पूर्वसञ्चितैः॥” एवं “महाप्रसादे गोविन्दे नामब्रह्मणि वैष्णवे। स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते॥” अर्थात् “भगवद्भक्तके साथ सङ्गवशतः भक्तिका उदय होता है और पूर्व पूर्व जन्मकी सञ्चित सुकृतिके फलसे जीव वह भक्तसङ्ग प्राप्त करते हैं।' 'हे राजन्! अति अल्प सुकृतिवान् व्यक्तिको महाप्रसादमें, श्रीगोविन्दमें, श्रीनामब्रह्ममें और वैष्णवमें विश्वास उत्पन्न नहीं होता॥”32॥ श्रीरायके द्वारा सभी भक्तोंको यथायोग्य सम्मान :- पुरी, भारती-गोसाञि, स्वरूप, नित्यानन्द। जगदानन्द, मुकुन्दादि यत भक्तवृन्द ॥ 33 ॥ चारि गोसाञिर कैल राय चरण वन्दन। यथायोग्य सब भक्तेर करिल मिलन ॥ 34 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीनित्यानन्द प्रभु, इन चार गोस्वामियोंके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना की और श्रीजगदानन्द पण्डित तथा श्रीमुकुन्दादि अन्यान्य भक्तोंके साथ वे उन्हें यथोचित सम्मान देते हुए मिले॥ 33-34 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुरी'- श्रीपरमानन्दपुरी। 'भारती'-श्रीब्रह्मानन्द भारती। 'स्वरूप'-प्रसिद्ध श्रीदामोदर- स्वरूप। 'नित्यानन्द' - श्रीनित्यानन्द प्रभु; श्रीरामानन्दने इन चारों गोसाइयोंके चरणोंकी वन्दना की॥ 33-34 ॥ श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये श्रीरायको आदेश :- प्रभु कहे,-“राय, देखिले कमलनयन?” राय कहे,-“एबे याइ' पाब दरशन ॥”35॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “राय! क्या आपने कमलनयन श्रीजगन्नाथका दर्शन किया है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, - “अभी तो दर्शन मिलेंगे, इसलिये अब जाऊँगा ॥"35॥ महाप्रभुके दर्शनसे पहले श्रीजगन्नाथका दर्शन न करनेके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,-“राय, तुमि कि कार्य करिले ? ईश्वरे ना देखि' केने आगे एथा आइल?" ॥ 36 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे राय! आपने यह कैसा कार्य किया? श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन न करके आप पहले यहाँ क्यों आये?" ॥ 36 ॥ 438 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/37-43 ] श्रीरायका चित्त औदार्यप्रधान-विग्रहमें ही अधिक आकृष्ट :- राय कहे,—“चरण—रथ, हृदय—सारथि। याँहा लञा याय, ताँहा याय जीव-रथी ॥ 37 ॥ आमि कि करिब, मन इँहा लञा आइल। जगन्नाथ-दरशने विचार ना कैल ॥” 38 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“चरण रथ हैं और हृदय इस रथका सारथी। जहाँ सारथी ले जाता है, वहीं रथपर सवार जीव जाता है। मैं क्या करूँ, मेरे मनने श्रीजगन्नाथके दर्शनका विचार ही नहीं किया और मुझे यहाँ ले आया ॥ 37-38 ॥ अनुभाष्य—'जीव'—रथके सवारके समान, 'जीवके चरण'—रथके समान, और 'जीवका मन'—रथचालक सारथिके समान। इसलिये मनरूप सारथी जीवरूप सवारको चरण-रथपर बैठाकर जहाँ ले जाता है, जीव वहीं गमन करता है। कठोपनिषद् (3/3/6-9)— 'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥ यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥ यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥ ××× विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः-प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥” अर्थात् “आत्माको रथी (रथपर सवार व्यक्ति) जानो और शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि और मनको लगाम-रूपमें जानो। पण्डित लोग इन्द्रियोंको घोड़े और विषयोंको इन्द्रियरूप घोड़ोंकी चारणभूमि कहते हैं और इस प्रकारसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धियुक्त जीवात्माको सुख-दुःखादिके भोक्ताके रूपमें निर्देश करते हैं। जो व्यक्ति किन्तु असंयत मनमें आविष्ट होकर सर्वदा अविज्ञानवान् (विवेकहीन बुद्धियुक्त) होते हैं, उनकी इन्द्रियाँ अदक्ष (अनाड़ी) सारथिके दुष्ट घोड़ोंके समान अनियन्त्रित हो जाती हैं। किन्तु जो सर्वदा संयत मनके साथ विज्ञानवान् (विवेकयुक्त बुद्धिसम्पन्न) होते हैं, उनकी इन्द्रियाँ सारथिके नियन्त्रित घोड़ोंके समान वशीभूत होती हैं। जिन व्यक्तियोंने विवेकयुक्त-बुद्धिरूप सारथिके द्वारा मनोरूप लगाम धारण की है, वे व्यवस्थित-चित्तवाले व्यक्ति संसारसे परे जाकर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं॥” 37-38 ॥ श्रीरायको जगन्नाथ और स्वजनोंके दर्शनका आदेश :- प्रभु कहे,—“शीघ्र गिया कर दरशन। ऐछे घर याइ' कर कुटुम्ब मिलन ॥” 39 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अब शीघ्र जाकर श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करो और वहाँसे घर जाकर अपने परिवारजनोंसे मिलो ॥” 39 ॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी आज्ञाका पालन :- प्रभु आज्ञा पाञा राय चलिला दरशने। रायेर प्रेमभक्ति-रीति बुझे कोन् जने ॥ 40 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा पाकर श्रीरामानन्द राय श्रीजगन्नाथका दर्शन करने चले। श्रीरामानन्द रायकी प्रेमभक्तिकी रीतिको कौन समझ सकता है ? ॥ 40 ॥ श्रीसार्वभौमसे राजाकी अपने प्रति महाप्रभुकी कृपा-प्राप्तिके विषयमें जिज्ञासा :- क्षेत्रे आसि' राजा सार्वभौमे बोलाइला। सार्वभौमे नमस्करि' ताँहारे पुछिला ॥ 41 ॥ “मोर लागि' प्रभुपदे कैले निवेदन?” सार्वभौम कहे,—“कैनु अनेक यतन ॥ 42 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुकी दृढ़ और अचल वितृष्णाका ज्ञापन :- तथापि ना करे तँह राज-दरशन। क्षेत्र छाड़ि' याबेन पुनः यदि करि निवेदन ॥” 43 ॥ अनुवाद—नीलाचलमें आकर राजा प्रतापरुद्रने । 439
[ 11/41-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने पास बुलवाया। श्रीसार्वभौमके आनेपर राजाने उन्हें प्रणाम किया और उनसे पूछा,—“क्या आपने मेरे लिये महाप्रभुके चरणोंमें प्रार्थना की?” श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“यद्यपि मैंने अनेक यत्न किये, तथापि वे राजाका दर्शन नहीं करना चाहते और यदि मैं उनसे पुनः निवेदन करूँगा, तो वे नीलाचल छोड़कर चले जायेंगे ॥” 41-43 ॥ राजाका गम्भीर विलाप और खेदपूर्ण उक्ति :- शुनिया राजार मने दुःख उपजिला। विषाद करिया किछु कहिते लागिला ॥ 44 ॥ “पापी-नीच उद्धारिते ताँर अवतार। जगाइ माधाइ करियाछेन उद्धार ॥ 45 ॥ प्रतापरुद्र छाड़ि' करिबे जगत् निस्तार। एइ प्रतिज्ञा करि' करियाछेन अवतार ? ॥ 46 ॥ अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्रके मनमें बहुत दुःख हुआ और वे निराश होकर कहने लगे,—“पापी और नीच लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही उनका अवतार हुआ है और उन्होंने जगाइ-माधाइ तकका भी उद्धार किया। क्या वे ऐसी प्रतिज्ञा करके अवतरित हुए हैं कि प्रतापरुद्रको छोड़कर समस्त जगत्का उद्धार करेंगे ? ॥ 44-46 ॥ श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/70)— अदर्शनीयानपि नीचजातीन् संवीक्षते हन्त तथापि नो माम्। मदेकवर्जं कृपयिष्यतीति निर्णीय किं सोऽवततार देवः ॥ 47 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अदर्शनीय नीच जातिके भी सभी लोगोंको दर्शन दे रहे हैं, तथापि मुझे दर्शन नहीं देंगे। मेरे अतिरिक्त सभी जीवोंपर कृपा करेंगे, यही निश्चय करके ही क्या वे अवतीर्ण हुए हैं? ॥ 47 ॥ अनुभाष्य— अदर्शनीयान् (द्रष्टुमनर्हान्) नीचजातीन् (नीचकुलोद्भूतान् अधमवृत्तिजीवनान्) अपि संवीक्षते (करुणया अवलोकयति, कृपयति); तथापि, हन्त (खेदे) मां न [वीक्षते]; मदेकवर्ज्जं (मामेकं त्यक्त्वा अन्यं सर्वं) कृपयिष्यति इति निर्णीय (स्थिरीकृत्य) किं सः देवः (गौरहरिः) भुवि अवततार (प्रकटोऽभूत्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥ महाप्रभु-कृपा न पाकर राजाका प्राण-त्यागका सङ्कल्प :- ताँर प्रतिज्ञा—मोरे ना करिबे दरशन। मोर प्रतिज्ञा—ताँहा बिना छाड़िब जीवन ॥ 48 ॥ यदि सेइ महाप्रभुर ना पाइ कृपा-धन। किवा राज्य, किवा देह,—सब अकारण ॥” 49 ॥ अनुवाद—उनकी यह प्रतिज्ञा है—वे मेरा मुख नहीं देखेंगे। तो मेरी भी यह प्रतिज्ञा है—मैं उनके दर्शनके बिना अपना जीवन त्याग दूँगा। यदि महाप्रभुका कृपा-धन मुझे प्राप्त नहीं हुआ, तो मेरा राज्य और मेरी यह देह—सब व्यर्थ हैं ॥” 48-49 ॥ राजाकी महाप्रभुमें प्रीतिको देखकर श्रीसार्वभौमको आश्चर्य :- एत शुनि' सार्वभौम हइला चिन्तित। राजार अनुराग देखि' हइला विस्मित ॥ 50 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत चिन्तित हो गये और साथ ही राजाका महाप्रभुके प्रति अनुराग देखकर वे विस्मित हो गये ॥ 50 ॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा सान्त्वना दान :- भट्टाचार्य कहे,—“देव, ना कर विषाद। तोमारे प्रभुर अवश्य हइबे प्रसाद ॥ 51 ॥ तेँह—प्रेमाधीन, तोमार प्रेम—गाढ़तर। अवश्य करिबेन कृपा तोमार उपर ॥ 52 ॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“राजन्! आप निराश 440 ।