भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1283

ग्यारहवाँ अध्याय 11/26-31 ] तोमाते ये एत प्रीति हइल राजार। एइ गुणे कृष्ण ताँरे करिबे अङ्गीकार ॥”27॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “आप श्रीकृष्ण-भक्तोंमें प्रधान हैं, इसलिये आपसे जो प्रीति करता है, वह भाग्यवान् है। राजाकी आपके प्रति जो इतनी प्रीति उत्पन्न हुई है, उनके इसी गुणके कारण श्रीकृष्ण उन्हें अवश्य अङ्गीकार करेंगे ॥”26-27॥ भक्तोंके भक्त ही भगवद्भक्त :- आदिपुराण वचन— ये मे भक्तजनाः पार्थ न मे भक्ताश्च ते जनाः। मद्भक्तानाञ्च ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः ॥ 28 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे पार्थ, जो केवल मेरे ही भक्त हैं, वे वास्तवमें मेरे भक्त नहीं है। किन्तु जो मेरे भक्तोंके भक्त हैं, उन्हें ही मैं अपना 'उत्तम भक्त' समझता हूँ ॥ 28 ॥ अनुभाष्य- हे पार्थ (अर्जुन), ये मे (मम) भक्तजनाः, ते मे (मम) भक्ताः जनाः न [भवन्ति]; ये च मद्भक्तानां [एव] भक्ताः, ते मे (मम) भक्ततमाः (श्रेष्ठ-सेवकाः) [इति मयैव] मताः (सम्मताः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥ शुद्धभक्तोंकी क्रिया :- श्रीमद्भागवत (11.19.21-22)- आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्। मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥ 29 ॥ मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्। मय्यर्पणञ्च मनसः सर्वकामविवर्जनम् ॥ 30 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29-30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी परिचर्या (सेवा) का आदर, सर्वाङ्गके द्वारा अभिवन्दन, मेरे भक्तोंकी विशेष पूजा, सभी जीवोंमें मुझसे सम्बन्धित बुद्धि, मेरे लिये अखिल चेष्टा, वाक्यके द्वारा मेरे गुणोंकी व्याख्या, मुझमें मन अर्पण और सब प्रकारकी कामनाओंका परित्याग, – ये सब भक्तोंके लक्षण हैं ॥ 29-30 ॥ अनुभाष्य-श्रीउद्धवके द्वारा भगवद्भक्तियोगके विषयमें जाननेके लिये जिज्ञासा करनेपर श्रीभगवान्‌की उक्ति- [भक्तियोगं तुभ्यं पुनश्च कथयिष्यामीत्याह-मम] परिचर्यायां (सेवायाम्) आदरः, सर्वाङ्गैः (अङ्गप्रत्यङ्गाद्यैः) अभिवन्दनं, [मत्तः] अभ्यधिका (श्रेष्ठा) मद्भक्तपूजा, सर्वभूतेषु (प्राणि-मात्रेषु) मन्मतिः (भगवद्भावदर्शनम्)। मदर्थेषु च (कृष्णैकतात्पर्येषु) कार्येषु अङ्गचेष्टा (अखिल- चेष्टा), वचसा (वाक्यद्वारेण) मद्गुणेरणं (कृष्णगुण-कथनं) मनसः मयि (कृष्णे) अर्पणं (समर्पणं), सर्वकाम-विवर्जनं (मनसः कृष्णेतर-विषयभोगवासना-परित्यागः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29-30 ॥ सर्वेश्वरेश्वर विष्णुकी पूजाकी अपेक्षा वैष्णवपूजा श्रेष्ठ :- लघुभागवतामृत (2/4) पद्मपुराणवचन- आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम्। तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ॥ 31 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 31 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे देवि ! अन्यान्य देवताओंकी आराधनाकी अपेक्षा विष्णुकी आराधना ही श्रेष्ठ है। विष्णुकी आराधनाकी अपेक्षा भक्तोंका अर्चन श्रेष्ठ है॥ 31 ॥ अनुभाष्य- हे देवि, सर्वेषां आराधनानाम् (उपासनानां मध्ये) विष्णोः (भगवतः कृष्णचन्द्रस्य) आराधनं (पूजनं) परं (श्रेष्ठं); तस्मात् (कृष्णोपासनम् अपि) तदीयानां (मधुररसे श्रीरूप-वार्षभानव्यादीनां, वात्सल्ये नन्द-यशोदादीनां, सख्ये श्रीदाम-सुबलादीनां, दास्ये चित्रकादीनां), समर्चनं (दृढ़पूजनं) परतरं (प्रशस्ततरम्)। श्लोक-भावानुवाद—हे देवि ! सभी उपासनाओंमें भगवान् श्रीकृष्णकी उपासना श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण उपासनासे भी उनके भक्तोंकी (मधुर रसमें श्रीरूप मञ्जरी, श्रीमती । 437