श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 11/31-36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला राधिका आदिकी, वात्सल्य रसमें श्रीनन्द-यशोदा आदिकी, सख्य रसमें श्रीदाम-सुबल आदिकी और दास्य रसमें चित्रक आदिकी) दृढ़ उपासना श्रेष्ठ है॥31॥ शुद्धभक्तकी सेवा बहुत सुकृतिसे प्राप्त होती है :- श्रीमद्भागवत (3/7/20)- दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु। यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ 32 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवदेव श्रीजनार्दनका जो नित्य गान करते हैं, उन वैकुण्ठपथपर चलनेवाले कृष्णदासोंकी सेवा अल्प-तपस्यावान् व्यक्तिको प्राप्त नहीं हो सकती॥ 32 ॥ अनुभाष्य-महाभागवत श्रीमैयात्रेय ऋषिसे हरिकथा सुनकर विदुरके संशय दूर होनेपर विदुरके द्वारा हरिभक्तोंके गुण-माहात्म्य-कीर्तन- यत्र (येषु महत्सु साधुषु) नित्यं (सर्वदा) देवदेवः (सर्वदेवमयः) जनार्दनः (कृष्णः) उपगीयते, तत्र (तेषु) वैकुण्ठवर्त्मसु (वैकुण्ठस्य श्रीकृष्णस्य वैकुण्ठलोकस्य वा, वर्त्मसु मार्गभूतेषु हरिजनेषु) सेवा-अल्पतपसः (क्षीणपुण्यजनस्य) दुरापा (दुर्लभा) हि (एव)। [महत्सेवयैव हरिकथाश्रवणं, ततो हरौ प्रेम, तेन च देहाद्यनुसन्धानमपि निवर्त्तते इति तात्पर्यम्।] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [महत्-सेवाके द्वारा ही हरिकथा श्रवण होती है, इसके फलस्वरूप श्रीहरिमें प्रेम उत्पन्न होता है और इसके द्वारा देहादिमें अभिनिवेश निवृत्त होता है, यही तात्पर्य है।] इस प्रसङ्गमें पद्मपुराणके ये श्लोक आलोच्य हैं- “भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन परिजायते। सत्सङ्गः प्राप्यते पुंभिः सुकृतैः पूर्वसञ्चितैः॥” एवं “महाप्रसादे गोविन्दे नामब्रह्मणि वैष्णवे। स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते॥” अर्थात् “भगवद्भक्तके साथ सङ्गवशतः भक्तिका उदय होता है और पूर्व पूर्व जन्मकी सञ्चित सुकृतिके फलसे जीव वह भक्तसङ्ग प्राप्त करते हैं।' 'हे राजन्! अति अल्प सुकृतिवान् व्यक्तिको महाप्रसादमें, श्रीगोविन्दमें, श्रीनामब्रह्ममें और वैष्णवमें विश्वास उत्पन्न नहीं होता॥”32॥ श्रीरायके द्वारा सभी भक्तोंको यथायोग्य सम्मान :- पुरी, भारती-गोसाञि, स्वरूप, नित्यानन्द। जगदानन्द, मुकुन्दादि यत भक्तवृन्द ॥ 33 ॥ चारि गोसाञिर कैल राय चरण वन्दन। यथायोग्य सब भक्तेर करिल मिलन ॥ 34 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीनित्यानन्द प्रभु, इन चार गोस्वामियोंके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना की और श्रीजगदानन्द पण्डित तथा श्रीमुकुन्दादि अन्यान्य भक्तोंके साथ वे उन्हें यथोचित सम्मान देते हुए मिले॥ 33-34 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुरी'- श्रीपरमानन्दपुरी। 'भारती'-श्रीब्रह्मानन्द भारती। 'स्वरूप'-प्रसिद्ध श्रीदामोदर- स्वरूप। 'नित्यानन्द' - श्रीनित्यानन्द प्रभु; श्रीरामानन्दने इन चारों गोसाइयोंके चरणोंकी वन्दना की॥ 33-34 ॥ श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये श्रीरायको आदेश :- प्रभु कहे,-“राय, देखिले कमलनयन?” राय कहे,-“एबे याइ' पाब दरशन ॥”35॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “राय! क्या आपने कमलनयन श्रीजगन्नाथका दर्शन किया है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर दिया, - “अभी तो दर्शन मिलेंगे, इसलिये अब जाऊँगा ॥"35॥ महाप्रभुके दर्शनसे पहले श्रीजगन्नाथका दर्शन न करनेके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,-“राय, तुमि कि कार्य करिले ? ईश्वरे ना देखि' केने आगे एथा आइल?" ॥ 36 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे राय! आपने यह कैसा कार्य किया? श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन न करके आप पहले यहाँ क्यों आये?" ॥ 36 ॥ 438 ।