भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1285

ग्यारहवाँ अध्याय 11/37-43 ] श्रीरायका चित्त औदार्यप्रधान-विग्रहमें ही अधिक आकृष्ट :- राय कहे,—“चरण—रथ, हृदय—सारथि। याँहा लञा याय, ताँहा याय जीव-रथी ॥ 37 ॥ आमि कि करिब, मन इँहा लञा आइल। जगन्नाथ-दरशने विचार ना कैल ॥” 38 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“चरण रथ हैं और हृदय इस रथका सारथी। जहाँ सारथी ले जाता है, वहीं रथपर सवार जीव जाता है। मैं क्या करूँ, मेरे मनने श्रीजगन्नाथके दर्शनका विचार ही नहीं किया और मुझे यहाँ ले आया ॥ 37-38 ॥ अनुभाष्य—'जीव'—रथके सवारके समान, 'जीवके चरण'—रथके समान, और 'जीवका मन'—रथचालक सारथिके समान। इसलिये मनरूप सारथी जीवरूप सवारको चरण-रथपर बैठाकर जहाँ ले जाता है, जीव वहीं गमन करता है। कठोपनिषद् (3/3/6-9)— 'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥ यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥ यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥ ××× विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः-प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥” अर्थात् “आत्माको रथी (रथपर सवार व्यक्ति) जानो और शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि और मनको लगाम-रूपमें जानो। पण्डित लोग इन्द्रियोंको घोड़े और विषयोंको इन्द्रियरूप घोड़ोंकी चारणभूमि कहते हैं और इस प्रकारसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धियुक्त जीवात्माको सुख-दुःखादिके भोक्ताके रूपमें निर्देश करते हैं। जो व्यक्ति किन्तु असंयत मनमें आविष्ट होकर सर्वदा अविज्ञानवान् (विवेकहीन बुद्धियुक्त) होते हैं, उनकी इन्द्रियाँ अदक्ष (अनाड़ी) सारथिके दुष्ट घोड़ोंके समान अनियन्त्रित हो जाती हैं। किन्तु जो सर्वदा संयत मनके साथ विज्ञानवान् (विवेकयुक्त बुद्धिसम्पन्न) होते हैं, उनकी इन्द्रियाँ सारथिके नियन्त्रित घोड़ोंके समान वशीभूत होती हैं। जिन व्यक्तियोंने विवेकयुक्त-बुद्धिरूप सारथिके द्वारा मनोरूप लगाम धारण की है, वे व्यवस्थित-चित्तवाले व्यक्ति संसारसे परे जाकर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं॥” 37-38 ॥ श्रीरायको जगन्नाथ और स्वजनोंके दर्शनका आदेश :- प्रभु कहे,—“शीघ्र गिया कर दरशन। ऐछे घर याइ' कर कुटुम्ब मिलन ॥” 39 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अब शीघ्र जाकर श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करो और वहाँसे घर जाकर अपने परिवारजनोंसे मिलो ॥” 39 ॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी आज्ञाका पालन :- प्रभु आज्ञा पाञा राय चलिला दरशने। रायेर प्रेमभक्ति-रीति बुझे कोन् जने ॥ 40 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा पाकर श्रीरामानन्द राय श्रीजगन्नाथका दर्शन करने चले। श्रीरामानन्द रायकी प्रेमभक्तिकी रीतिको कौन समझ सकता है ? ॥ 40 ॥ श्रीसार्वभौमसे राजाकी अपने प्रति महाप्रभुकी कृपा-प्राप्तिके विषयमें जिज्ञासा :- क्षेत्रे आसि' राजा सार्वभौमे बोलाइला। सार्वभौमे नमस्करि' ताँहारे पुछिला ॥ 41 ॥ “मोर लागि' प्रभुपदे कैले निवेदन?” सार्वभौम कहे,—“कैनु अनेक यतन ॥ 42 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुकी दृढ़ और अचल वितृष्णाका ज्ञापन :- तथापि ना करे तँह राज-दरशन। क्षेत्र छाड़ि' याबेन पुनः यदि करि निवेदन ॥” 43 ॥ अनुवाद—नीलाचलमें आकर राजा प्रतापरुद्रने । 439