श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1286, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/41-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने पास बुलवाया। श्रीसार्वभौमके आनेपर राजाने उन्हें प्रणाम किया और उनसे पूछा,—“क्या आपने मेरे लिये महाप्रभुके चरणोंमें प्रार्थना की?” श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“यद्यपि मैंने अनेक यत्न किये, तथापि वे राजाका दर्शन नहीं करना चाहते और यदि मैं उनसे पुनः निवेदन करूँगा, तो वे नीलाचल छोड़कर चले जायेंगे ॥” 41-43 ॥ राजाका गम्भीर विलाप और खेदपूर्ण उक्ति :- शुनिया राजार मने दुःख उपजिला। विषाद करिया किछु कहिते लागिला ॥ 44 ॥ “पापी-नीच उद्धारिते ताँर अवतार। जगाइ माधाइ करियाछेन उद्धार ॥ 45 ॥ प्रतापरुद्र छाड़ि' करिबे जगत् निस्तार। एइ प्रतिज्ञा करि' करियाछेन अवतार ? ॥ 46 ॥ अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्रके मनमें बहुत दुःख हुआ और वे निराश होकर कहने लगे,—“पापी और नीच लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही उनका अवतार हुआ है और उन्होंने जगाइ-माधाइ तकका भी उद्धार किया। क्या वे ऐसी प्रतिज्ञा करके अवतरित हुए हैं कि प्रतापरुद्रको छोड़कर समस्त जगत्का उद्धार करेंगे ? ॥ 44-46 ॥ श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/70)— अदर्शनीयानपि नीचजातीन् संवीक्षते हन्त तथापि नो माम्। मदेकवर्जं कृपयिष्यतीति निर्णीय किं सोऽवततार देवः ॥ 47 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अदर्शनीय नीच जातिके भी सभी लोगोंको दर्शन दे रहे हैं, तथापि मुझे दर्शन नहीं देंगे। मेरे अतिरिक्त सभी जीवोंपर कृपा करेंगे, यही निश्चय करके ही क्या वे अवतीर्ण हुए हैं? ॥ 47 ॥ अनुभाष्य— अदर्शनीयान् (द्रष्टुमनर्हान्) नीचजातीन् (नीचकुलोद्भूतान् अधमवृत्तिजीवनान्) अपि संवीक्षते (करुणया अवलोकयति, कृपयति); तथापि, हन्त (खेदे) मां न [वीक्षते]; मदेकवर्ज्जं (मामेकं त्यक्त्वा अन्यं सर्वं) कृपयिष्यति इति निर्णीय (स्थिरीकृत्य) किं सः देवः (गौरहरिः) भुवि अवततार (प्रकटोऽभूत्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥ महाप्रभु-कृपा न पाकर राजाका प्राण-त्यागका सङ्कल्प :- ताँर प्रतिज्ञा—मोरे ना करिबे दरशन। मोर प्रतिज्ञा—ताँहा बिना छाड़िब जीवन ॥ 48 ॥ यदि सेइ महाप्रभुर ना पाइ कृपा-धन। किवा राज्य, किवा देह,—सब अकारण ॥” 49 ॥ अनुवाद—उनकी यह प्रतिज्ञा है—वे मेरा मुख नहीं देखेंगे। तो मेरी भी यह प्रतिज्ञा है—मैं उनके दर्शनके बिना अपना जीवन त्याग दूँगा। यदि महाप्रभुका कृपा-धन मुझे प्राप्त नहीं हुआ, तो मेरा राज्य और मेरी यह देह—सब व्यर्थ हैं ॥” 48-49 ॥ राजाकी महाप्रभुमें प्रीतिको देखकर श्रीसार्वभौमको आश्चर्य :- एत शुनि' सार्वभौम हइला चिन्तित। राजार अनुराग देखि' हइला विस्मित ॥ 50 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत चिन्तित हो गये और साथ ही राजाका महाप्रभुके प्रति अनुराग देखकर वे विस्मित हो गये ॥ 50 ॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा सान्त्वना दान :- भट्टाचार्य कहे,—“देव, ना कर विषाद। तोमारे प्रभुर अवश्य हइबे प्रसाद ॥ 51 ॥ तेँह—प्रेमाधीन, तोमार प्रेम—गाढ़तर। अवश्य करिबेन कृपा तोमार उपर ॥ 52 ॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“राजन्! आप निराश 440 ।