भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1287

ग्यारहवाँ अध्याय 11/51-63 ] मत होइये। आपपर महाप्रभुकी कृपा अवश्य होगी। आपका उनके प्रति प्रगाढ़ प्रेम है और वे प्रेमके अधीन हैं, इसलिये वे आपपर अवश्य ही कृपा करेंगे॥ 51-52॥ महाप्रभुके साथ राजाके साक्षात्कारका उपाय निर्धारण :- तथापि कहिये आमि एक उपाय। एइ उपाय कर, प्रभु देखिबे याहाय ॥ 53 ॥ रथयात्रा-दिने प्रभु सब भक्त लञा। रथ-आगे नृत्य करिबेन प्रेमाविष्ट हञा ॥ 54 ॥ प्रेमावेशे पुष्पोद्याने करिबेन प्रवेश। सेइकाले एकले तुमि छाड़ि' राजवेश ॥ 55 ॥ 'कृष्ण-रासपञ्चाध्याय' करिते पठन। एकले याइ' महाप्रभुर धरिबे चरण ॥ 56 ॥ बाह्यज्ञान नाहि, से-काले कृष्णनाम शुनि'। आलिङ्गन करिबेन तोमाय 'वैष्णव' जानि' ॥ 57 ॥ श्रीरामानन्दके द्वारा महाप्रभुका कठिन मन भी द्रवीभूत :- रामानन्द राय, आजि तोमार प्रेम-गुण। प्रभु-आगे कहिते, प्रभुर फिरि' गेल मन ॥" 58 ॥ अनुवाद-तथापि मैं आपको एक उपाय बतलाता हूँ। इस उपायको करनेसे आपको महाप्रभुके दर्शन होंगे। रथ-यात्राके दिन महाप्रभु अपने सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर रथके आगे प्रेमाविष्ट होकर नृत्य करेंगे और प्रेमावेशमें वे पुष्पोद्यानमें प्रवेश करेंगे। उस समय आप अपने राजवेशको छोड़कर साधारण वेशमें अकेले वहाँ जाना। कृष्ण-रासपञ्चाध्यायका पाठ करते हुए महाप्रभुके श्रीचरणोंको पकड़ लेना। उस समय महाप्रभुको प्रेमावेशके कारण बाह्यज्ञान नहीं रहेगा, इसलिये उस समय आपके मुखसे श्रीकृष्ण नाम सुनकर वे आपको 'वैष्णव' समझकर आपका आलिङ्गन करेंगे। रामानन्दरायने आज जब आपके प्रेमके गुणोंका महाप्रभुके समक्ष वर्णन किया, तब महाप्रभुका मन आपके प्रति बदल गया ॥" 53-58 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीमद्भागवतके (दशम स्कन्ध, 29-33 अध्याय) श्रीकृष्णके रास-पञ्चाध्यायकी कविताओंका पाठ करते-करते आप अकेले जाकर महाप्रभुके श्रीचरण पकड़ लेना ॥ 56 ॥ अनुभाष्य- 'पुष्पोद्याने'-गुण्डिचामें ॥ 55 ॥ महाप्रभुकी कृपाप्राप्तिकी आशामें राजाका दृढ़ सङ्कल्प :- शुनि' गजपतिर मने सुख उपजिल। प्रभुरे मिलिते एइ मन्त्रणा दृढ़ कैल ॥ 59 ॥ राजाकी अधीरता और दिनोंको गिनना :- स्नानयात्रा कबे हबे पुछिल भट्टेरे। भट्ट कहे, - "तिन दिन आछये यात्रारे ॥" 60 ॥ अनुवाद-यह सुनकर गजपतिका (राजा प्रतापरुद्रका) मन प्रसन्न हो गया। श्रीसार्वभौमके परामर्श अनुसार उन्होंने महाप्रभुसे मिलनेके दृढ़ निश्चय कर लिया और उनसे पूछा, - "श्रीजगन्नाथदेवकी स्नानयात्रा कब होगी? श्रीभट्टाचार्यने उत्तर दिया, - "स्नानयात्रामें अभी तीन दिन बाकी हैं ॥" 59-60 ॥ श्रीसार्वभौमका प्रस्थान; स्नानयात्रामें महाप्रभुकी प्रसन्नता :- राजारे प्रबोधिया भट्ट गेला निजालय। स्नानयात्रा-दिने प्रभुर आनन्द हृदय ॥ 61 ॥ स्नानयात्रा देखि' प्रभुर हैल बड़ सुख। ईश्वरेर 'अनवसरे' पाइल बड़ दुःख ॥ 62 ॥ अनवसरके समय महाप्रभुका श्रीकृष्ण-विरह और अकेले ही आलालनाथ जाना :- गोपीभावे विरहे प्रभु व्याकुल हञा। आलालनाथे गेला प्रभु सबारे छाड़िया ॥ 63 ॥ अनुवाद-इस प्रकार राजा प्रतापरुद्रको आश्वस्त करके श्रीसार्वभौम अपने घर चले गये। स्नान-यात्राके दिन महाप्रभुके हृदयमें बड़ा आनन्द था। श्रीजगन्नाथदेवकी स्नान-यात्रा देखकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए, परन्तु स्नान-यात्राके बाद 'अनवसर'में महाप्रभुको श्रीजगन्नाथके । 441