भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1282

[ 11/16-26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आविष्ट होकर क्रन्दन करने लगे। श्रीरामानन्द रायके साथ महाप्रभुके ऐसे स्नेहपूर्ण व्यवहारको देखकर सभी भक्तोंके मनमें आश्चर्य हुआ॥16-17॥ श्रीरायका राजकार्य-त्याग करनेके विषयमें बताना :- राय कहे,—“तोमार आज्ञा राजाके कहिल। तोमार इच्छाय राजा मोर विषय छाड़ाइल॥18॥ राजासे श्रीरायकी सेवासे निवृत्तिकी प्रार्थना :- आमि कहि,—‘आमा हैते ना हय विषय’। चैतन्यचरणे रहौं, यदि आज्ञा हय॥’19॥ राजाके द्वारा आनन्दपूर्वक सम्मति प्रदान :- तोमार नाम शुनि’ राजा आनन्दित हैल। आसन हैते उठि’ मोरे आलिङ्गन कैल॥20॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“मैंने आपकी आज्ञा जब राजाको बतलायी, तब आपकी इच्छानुसार राजाने मुझे उन राजकार्योंसे मुक्त कर दिया। मैंने राजा प्रतापरुद्रसे कहा,—‘अब मुझसे यह राजकार्य नहीं होता। आप यदि मुझे आज्ञा दें, तो मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंमें जाकर रहूँ।’ आपका नाम सुनकर राजा बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने अपने आसनसे उठकर मेरा आलिङ्गन किया॥18-20॥ अनुभाष्य—‘तोमार आज्ञा’—मध्यलीला 8/296-297 संख्या देखें। यह बात श्रीरामानन्द रायने जब राजा प्रतापरुद्रको कही, तब महाप्रभुके अभिप्रायके अनुसार राजा प्रतापरुद्रने लौकिक-दृष्टिसे श्रीरामानन्दके विषय छुड़वा दिये अर्थात् उस राजकार्यसे उन्हें निवृत्त कर दिया॥18॥ महाप्रभुके प्रति राजाकी भक्ति :- ‘तोमार नाम शुनि’ हैल महा-प्रेमावेश। मोर हाते धरि’ करे पिरीति विशेष॥21॥ राजाके द्वारा श्रीरायको सेवा-निवृत्तिपर भी वेतन-दान :- तोमार ये वर्त्तन, तुमि खाओ सेइ वर्त्तन। निश्चिन्त हञा भज चैतन्येर चरण॥22॥ राजाका दैन्य :- आमि—छार, योग्य नहि ताँर दरशने। ताँरे येइ भजे, ताँर सफल जीवने॥23॥ परम कृपालु तँह व्रजेन्द्रनन्दन। कोन-जन्मे मोरे अवश्य दिबेन दरशन॥’24॥ अनुवाद—‘आपका नाम सुनकर वे महा-प्रेमावेशमें आ गये। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझसे विशेष प्रीति प्रदर्शित करते हुए कहा कि आपका जो वेतन है, वह आपको मिलता रहेगा। अब आप निश्चिन्त होकर महाप्रभुके श्रीचरणोंकी सेवा करो। मैं तो महापतित हूँ, महाप्रभुके दर्शन करने योग्य भी नहीं हूँ। परन्तु जो उनका भजन करता है, उसीका जीवन सफल है। महाप्रभु परम कृपालु और साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन हैं। किसी-न-किसी जन्ममें वे मुझे अवश्य ही दर्शन देंगे॥’21-24॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दक्षिण-कलिङ्गके शासनकर्त्ता पदपर आप जो वर्त्तन अर्थात् पारिश्रमिक या वेतन प्राप्त करते थे, अब आपको कार्यसे निवृत्त कर दिया है, तथापि आपको वही वेतन प्राप्त होगा॥22॥ रायके द्वारा महाप्रभुके समक्ष राजाकी प्रशंसा :- ये ताँहार प्रेम-आर्त्ति देखिलुँ तोमाते। तार एक प्रेम-लेश नाहिक आमाते॥”25॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥25॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरामानन्द ने कहा,—“प्रभो! मैंने आपके प्रति राजाकी जो प्रेमवेदना देखी थी, उसका लेशमात्र भी मुझमें नहीं है॥”25॥ शुद्धवैष्णवमें प्रीति हेतु महाप्रभुके द्वारा राजाको भावी-कृपा-प्रदान करनेका इङ्गित :- प्रभु कहे,—“तुमि कृष्णभक्त प्रधान। तोमाके ये प्रीति करे, सेइ भाग्यवान्॥26॥ 436 ।