श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1281, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय 11/9-17 ] प्रतापरुद्रदेव श्रीजगन्नाथके सेवक और उत्तम भक्त हैं।” महाप्रभुने कहा,—“श्रीजगन्नाथके सेवक और उत्तम भक्त होनेपर भी 'राजा' कालसर्पके समान है। देखो, लकड़ीकी बनी हुई नारीको स्पर्श करनेसे जैसे किसी प्रकारका विकार उत्पन्न हो सकता है, उसी प्रकार उत्तम भक्त राजाके दर्शन करनेपर विरक्त व्यक्तिमें भी अनर्थ उदित हो सकते हैं॥ 9-10॥ श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/25)— आकारादपि भेतव्यं स्त्रीणां विषयाणामपि। यथाहिर्मनसः क्षोभस्तथा तस्याकृतेरपि॥ 11॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 11॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार साँप और उसकी आकृति देखनेसे मनमें क्षोभ (भय) उत्पन्न होता है, उसी प्रकार स्त्री और विषयीका आकार देखते ही भय हुआ करता है॥ 11॥ अनुभाष्य— स्त्रीणां (योषितां) विषयाणाम् (इन्द्रियसेविनां) [(भोक्तृ-भोग्यानामिति यावत्] आकारात् अपि (बहिराकृतेरपि) [कृष्णैक-सेविभिः परमार्थपरैः साधकैः जनैः] भेतव्यम्। यथा अहेः (भुजङ्गात्) मनसः क्षोभः (भयं) भवति, तथा तस्य (सर्पस्य) आकृतेः (सदृशाकारात्) अपि [भयं भवति]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 11॥ लोकशिक्षक महाप्रभुका कठोर सङ्कल्प, आश्रम-मर्यादाकी रक्षाके लिये श्रीसार्वभौमका तिरस्कार :— ऐछे बात पुनरपि मुखे ना आनिबे। कह यदि, तबे आमाय एथा ना देखिबे॥” 12॥ अनुवाद—आप ऐसी बात फिर कभी अपने मुखमें मत लाना। यदि पुनः कहेंगे, तो आप मुझे यहाँ नहीं देखेंगे॥” 12॥ श्रीसार्वभौमका दुःखी मनसे घर जाना :— भय पाञा सार्वभौम निज घरे गेला। बासाय गिया भट्टाचार्य चिन्तित हइला॥ 13॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य यह सुनकर भयभीत होकर अपने घर चले गये। घर आकर श्रीभट्टाचार्य इस विषयपर चिन्तन करने लगे॥ 13॥ कटकसे श्रीरामानन्दादि परिकरोंके साथ राजाका पुरीमें आगमन :— हेनकाले प्रतापरुद्र पुरुषोत्तमे आइला। पात्र-मित्र-सङ्गे राजा दर्शने चलिला॥ 14॥ महाप्रभु और रामानन्दका मिलन :— रामानन्द राय आइला गजपति-सङ्गे। प्रथमेइ प्रभुरे आसि' मिलिला बहुरङ्गे॥ 15॥ अनुवाद—उसी समय राजा प्रतापरुद्र पुरुषोत्तम क्षेत्रमें आ गये तथा वे अपने मन्त्रियों और मित्रोंके साथ भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करनेके लिये चल पड़े। श्रीरामानन्द राय भी गजपति (राजा प्रतापरुद्र)के साथ आये थे। वे आते ही सर्वप्रथम महाप्रभुसे बड़े आनन्दसे मिले॥ 14-15॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'गजपति'—जिस प्रकार अन्यान्य कोई-कोई विशेष राजाओंकी 'छत्रपति', 'नरपति', 'अश्वपति' आदि पदवियाँ थीं, उसी प्रकार 'गजपति'—उड़ीसाके सम्राटोंकी उपाधि थी॥ 15॥ अनुभाष्य—गङ्गावंशीय प्रतापरुद्र-राजाकी राजधानी कटक-नगरमें थी। बादमें कटकसे खुर्द्दामें राजधानी स्थानान्तरित हुई थी॥ 14॥ राय प्रणति कैल, प्रभु कैल आलिङ्गन। दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन॥ 16॥ श्रीरायके प्रति महाप्रभुके आचरणको देखकर सभीको आश्चर्य :— राय-सङ्गे प्रभुर देखि' स्नेह-व्यवहार। सर्व भक्तगणेर मने हैल चमत्कार॥ 17॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको प्रणाम किया और महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। दोनों ही प्रेममें । 435