भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1280, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1280

[ 11/3-10 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीसार्वभौमकी महाप्रभुसे कुछ निवेदन करनेकी इच्छा :- आर दिन सार्वभौम कहे प्रभुस्थाने। “अभय-दान देह’ यदि, करि निवेदने॥” ३॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा,—“यदि आप अभय-दान दें, तो मैं आपसे कुछ निवेदन करूँ॥” ३॥ महाप्रभुके द्वारा अनुमति प्रदान :- प्रभु कहे,—“कह कमि, नाहि किछु भय। योग्य हैले करिब, अयोग्य हैले नय॥” ४॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“जो कहना है, आप निर्भय होकर कहिये। यदि आपकी बात उचित होगी, तो मैं अवश्य करूँगा, अनुचित होनेपर उसे अस्वीकार कर दूँगा॥” ४॥ प्रतापरुद्रका पक्ष लेकर श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुकी कृपाकी याचना :- सार्वभौम कहे,—“एइ प्रतापरुद्र राय। उत्कण्ठा हञाछे, तोमा मिलिबारे चाय॥” ५॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये राजा प्रतापरुद्र आपसे मिलनेके लिये बहुत उत्कण्ठित हो रहे हैं॥” ५॥ राजादर्शन करनेमें महाप्रभुकी असम्मति और वितृष्णा :- कर्णे हस्त दिया प्रभु स्मरे ‘नारायण’। “सार्वभौम, कह केन अयोग्य वचन॥ ६॥ संन्यासीका धर्म :- विरक्त संन्यासी आमार राज-दरशन। स्त्री-दरशन-सम विषेर भक्षण॥” ७॥ अनुवाद—यह सुनते ही महाप्रभुने अपने कानोंको हाथोंसे ढक करके भगवान् श्रीनारायणका स्मरण किया। तब महाप्रभुने कहा,—“हे सार्वभौम ! आप ऐसी अनुचित बात क्यों कह रहे हैं? मैं एक विरक्त संन्यासी हूँ। मेरे लिये राजाका दर्शन तो स्त्री-दर्शनके समान विषपान करना है॥” ६-७॥ प्रेमाकाङ्क्षीके लिये भोक्ताभावसे भोग्य वस्तुका दर्शन विष खानेके समान निषिध :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/24)— निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य पारं परं जिगमिषोर्भवसागरस्य। सन्दर्शनं विषयिणामथ योषिताञ्च हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु॥ ८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्यदेवने खेदके साथ कहा,—हाय! भवसागरको सम्पूर्णरूपसे पार होनेकी जिनकी इच्छा है, ऐसे भगवद्-भजनोन्मुख निष्किञ्चन व्यक्तिके लिये विषयी और स्त्रीका [भोग बुद्धिसे] दर्शन विषपानकी अपेक्षा अधिक अकल्याणकारी है॥ ८॥ अनुभाष्य— हा हन्त हन्त (खेदातिशये) भवसागरस्य (संसारसमुद्रस्य) परं पारं (देवीधामतीतं परव्योम-भगवद्धाम) जिगमिषोः (गन्तुकामस्य) निष्किञ्चनस्य (निर्विषयिणः) भगवद्भजनोन्मुखस्य (कृष्णसेवापरस्य) विषयिणां (कृष्णेतरविषयभोगपराणां) योषितां (भोग्यानां च) सन्दर्शनं (भोग्यबुद्ध्या अवलोकनादिकं) विषभक्षणतः (आत्मविनाशक-गरलस्य सेवनात्) अपि असाधु (अकल्याणकरम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ८॥ श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा राजाकी प्रशंसा :- सार्वभौम कहे,—“सत्य तोमार वचन। जगन्नाथ-सेवक राजा, किन्तु भक्तोत्तम॥” ९॥ भोक्ता बनकर वस्तुको भोग्य मानकर उसके बाहिरी दर्शनसे द्वितीयाभिनिवेशसे भयकी उत्पत्ति :- प्रभु कहे,—“तथापि राजा कालसर्पाकार। काष्ठनारी-स्पर्शे यैछे उपजाय विकार॥ १०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ९-१०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,— “प्रभो! आपने जो कहा है, वह सत्य है। किन्तु राजा 434 ।