श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1279, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय कथासार—जब श्रीसार्वभौमने राजा प्रतापरुद्रकी महाप्रभुके साथ भेंट करानेकी चेष्टा की, तब महाप्रभुने उसे अस्वीकार कर दिया। श्रीरामानन्द-रायने पुरुषोत्तममें (पुरीमें) आकर महाप्रभुके साथ मिलकर राजाके बहुतसे वैष्णव-गुणोंकी व्याख्या की, जिससे महाप्रभुका चित्त परिवर्तित हो गया। उधर राजाने श्रीसार्वभौमको अपनी दैन्य-प्रतिज्ञा बतलायी। तब श्रीसार्वभौमने राजाको महाप्रभुके चरण-दर्शनका एक उपाय बतला दिया। अनवसर-काल आनेपर भगवद्-दर्शनके विरहमें व्याकुल होकर महाप्रभु आलालनाथ चले गये, कुछ समय बाद गौड़देशसे सभी भक्तोंके आगमनके विषयमें सुनकर महाप्रभु पुरुषोत्तम लौट आये। श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके आनेके समय श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द महाप्रभुके द्वारा दी गयी मालाओंको लेकर उन्हें लाने गये। राजा अट्टालिकासे वैष्णवोंको आते हुए देखने लगे। श्रीसार्वभौमकी इच्छानुसार श्रीगोपीनाथाचार्यने इन सब वैष्णवोंका परिचय दिया। श्रीचैतन्यके श्रीकृष्णत्व और समागत वैष्णवोंके मुण्डन-उपवास आदिको परित्यागकर प्रसादान्न-सेवनके सम्बन्धमें श्रीसार्वभौमके साथ राजाके अनेक विचार उपस्थित हुए। इसके उपरान्त राजाने वैष्णवोंके रहनेके स्थान और प्रसादान्न आदिकी व्यवस्था कर दी। महाप्रभुने श्रीवासुदेव-दत्तादि वैष्णवोंके साथ अनेक आनन्दजनक वार्त्तालाप किया। श्रीहरिदास ठाकुरका दैन्य देखकर महाप्रभुने बगीचेके बीचमें उन्हें एक एकान्त स्थान प्रदान किया और दूसरोंको श्रीहरिदासकी महिमा बतलायी। उसके बाद श्रीजगन्नाथदेवके मन्दिरमें चार मण्डलियाँ बनाकर महासङ्कीर्त्तन हुआ। तदुपरान्त वैष्णवगण महाप्रभुकी आज्ञासे अपने-अपने स्थानपर चले गये। —(अमृतप्रवाहभाष्य) नृत्यशील श्रीगौरका विश्वको प्रेमकी बाढ़में डुबोना :— अत्युद्दण्डं ताण्डवं गौरचन्द्रः कुर्वन् भक्तैः श्रीजगन्नाथगेहे। नानाभावालङ्कृताङ्गः स्वधाम्ना चक्रे विश्वं प्रेमवन्या-निमग्नम्॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीजगन्नाथके मन्दिरमें भक्तोंके साथ नाना प्रकारके भावोंसे अलङ्कृत शरीरवाले श्रीगौरचन्द्रने अतिशय उद्दण्ड नृत्य करके अपने माधुर्यके द्वारा इस विश्वको प्रेमकी बाढ़में डुबोया था॥ 1 ॥ अनुभाष्य— नानाभावालङ्कृताङ्गः (विविधभावाभरणमण्डितदेहः) गौरचन्द्रः श्रीजगन्नाथगेहे (श्रीजगन्नाथदेवस्य मन्दिरे) भक्तैः [सह] स्वधाम्ना (अलौकिक-स्वमाधुर्येण) अत्युद्दण्डं ताण्डवं (अतिमनोज्ञ- नृत्यादिकं) कुर्वन् विश्वं (चिद्रसहीनं जड़रसपरं भुवनं) प्रेमवन्या-निमग्नं चक्रे (कृष्णप्रेमतराङ्गैः प्लावयामास)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो एवं श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ । 433