श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/११९-१२१ ] श्रीचैतन्यमें निष्ठा उत्पन्न करानेके लिये ही श्रीकृष्णतत्त्वका वर्णन :- चैतन्यप्रभुर महिमा कहिबार तरे। कृष्णेर महिमा कहि करिया विस्तारे॥११९॥ जो श्रीकृष्ण, वे ही श्रीचैतन्य :- चैतन्य-गोसाञिर एइ तत्त्व निरूपण। स्वयं भगवान् कृष्ण व्रजेन्द्रनन्दन॥१२०॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाको प्रकाश करनेके लिये ही मैंने श्रीकृष्णकी महिमाका विस्तारसे वर्णन किया। श्रीचैतन्य महाप्रभुका तत्त्व-निरूपण यही है कि वे स्वयं भगवान् व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही हैं॥११९-१२०॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥१२१॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे वस्तुनिर्देशमङ्गलाचरणे श्रीकृष्णचैतन्यतत्त्वनिरूपणं नाम द्वितीयः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥१२१॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डके मङ्गलाचरणमें वस्तुनिर्देशके अन्तर्गत श्रीकृष्णचैतन्यके तत्त्व-निरूपण नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त। ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ दूसरा अध्याय | ८७