भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

[ २/११७-११८ करके जिसके अभ्युदयको ही धर्मसिद्धान्त स्थापित किया है, उत्तर मीमांसामें वेदव्यासने उसीको पूर्वपक्ष करके "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" सूत्रकी अवतारणाके द्वारा परमेश्वर-भजनरूप कल्याणको ही सिद्धान्त कहकर स्थापित किया है। और सबसे अन्तमें "अनावृत्ति शब्दात्” सूत्रके द्वारा कल्याण-प्राप्त व्यक्तिकी पुनरावृत्ति नहीं होती, ऐसा शब्द-प्रमाणके द्वारा दिखलाया है। इसीके साथ ही सभी मतवादोंका भी खण्डन हो गया है। इसलिये सनातन धर्म सत्-सिद्धान्त अथवा सत्य-विचारमें सुप्रतिष्ठित है और तभी श्रील कविराज गोस्वामी यहाँ सिद्धान्त जाननेकी आवश्यकतापर बल दे रहे हैं। इसलिये जो अन्धविश्वासका ही अधिक सम्मान करते हैं, वे प्राकृत सहजिया अथवा वेषोपजीवीके दलमें सम्मिलित होकर अपने लिये नरकमें जानेका मार्ग ही प्रशस्त करते हैं। और कोई-कोई मनोधर्मके वशीभूत होकर जड़समन्वयवादी अथवा भारवाही साम्प्रदायिक होकर वास्तव सत्यसे बहुत दूर हो जाते हैं। भार्गवीय मनुसंहिताके अन्तमें भृगु ऋषियोंको कहा है- “आर्षं धर्मोपदेशञ्च वेदशास्त्राविरोधिना। यन्तर्केणानुसन्धत्ते सधर्मं वेद नेतरः ॥” अर्थात् “जो वेद और वेदमूलक स्मृति आदि धर्मोपदेशोंका वेदशास्त्र-अविरोधी तर्कके द्वारा अनुसन्धान करते हैं, वे ही धर्मको जानते हैं।” श्रील नरोत्तमदास ठाकुर महाशय कहते हैं- “मध्यस्थ श्रीभागवत पुराण। 'साधु शास्त्र गुरुवाक्य, हृदये करिया ऐक्य, आर ना करिह मने आशा ॥" ११७ ॥ चैतन्य-महिमा जानि ए सब सिद्धान्ते । चित्त दृढ़ हञा लागे महिमा-ज्ञान हैते ॥ ११८ ॥ अनुवाद-इन सब सिद्धान्तोंको जाननेसे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाका ज्ञान होता है। उनकी महिमाका ज्ञान होनेसे चित्त उनके चरणकमलोंमें दृढ़तासे लगता है ॥ ११८ ॥ अनुभाष्य-पञ्चरात्रमें- “माहात्म्यज्ञानयुक्तस्तु सुदृढ़ं सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया सार्ष्यादिर्नान्यथा ॥” “महिमज्ञानयुक्तः स्याद्विधिमार्गानुसारिणाम्। रागानुगाश्रितानास्तु प्रायशः केवलो भवेत्।” अर्थात् “जो भगवत्-महिमाके ज्ञानसे युक्त हैं, उनका स्नेह सभी प्रकारसे अधिक और सुदृढ़ है-इसीको भक्ति कहते हैं, जिसके द्वारा साष्टिं आदि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। विधिमार्गमें भजन करनेवालोंका स्नेह भगवत्-महिमाके ज्ञानसे युक्त होता है, किन्तु रागानुग-आश्रित भक्तोंका स्नेह प्रायः केवल अर्थात् भगवत्-महिमाके ज्ञानपर निर्भर ना रहकर स्वाभाविक होता है ॥" ११८ ॥ इति अनुभाष्ये द्वितीय परिच्छेद । दूसरे अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। ८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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