भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 2549 में से

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मूर्खतावशतः अनेक बार कृत्रिमरूपसे सात्त्विक-विकारोंका अभ्यासकर लोगोंकी दृष्टिमें वैष्णव-पदवीको हीन बनाते हैं। उनके इस प्रकार असत् अभ्यासकी निन्दास्वरूप उन्हें पाषाण-हृदयकी संज्ञा देते हुए श्रीमद्भागवत (२/३/२४) में “तदश्मसारं” श्लोक कहा गया है। इस श्लोककी टीकामें श्रीपाद चक्रवर्त्ती ठाकुरने कहा है,–“बहिरश्रुपुलकयोः सतोरपि यद्धृदयं न विक्रियेत, तदश्मसारमिति कनिष्ठाधिकारिणामेव अश्रुपुलकादिमत्त्वेऽपि अश्मसारहृदयतया निन्दैषा।” अर्थात् “यदि किसी व्यक्तिमें बाहरसे अश्रु-पुलक आदि विकार दिखायी दें, परन्तु हृदय विगलित नहीं हो, तो उसे पाषाण-हृदय ही समझना चाहिये। तथा कनिष्ठ अधिकारीके बाहरसे अश्रु-पुलकादि सात्त्विक विकारोंका प्रदर्शन करनेपर शास्त्र उन्हें पाषाण-हृदय कहकर निन्दा करते हैं।” सिद्धान्तका अनादर करनेपर जो कृत्रिम भक्ति देखी जाती है, उसका चित्रण श्रीरूप गोस्वामीप्रभुने भक्तिरसामृतसिन्धुमें इस प्रकार किया है,–“निसर्गापिच्छिलस्वान्ते तदभ्यासपरेऽपि च। सत्त्वाभासं बिनापि स्युः क्वाप्यश्रुपुलकादयः॥” अर्थात् “जिनका हृदय बाहरसे कोमल, परन्तु भीतरसे कठोर है और जो अश्रु-कम्पादिके अभ्यास परायण भी हैं, सत्त्वाभासके बिना भी उनमें कभी अश्रु-पुलकादि दिखायी देते हैं, ऐसे भाव ‘निःसत्त्व सात्त्विकाभास’ कहे जाते हैं।” कृत्रिमभक्त सिद्धान्तके अभावमें किस प्रकार मायिक विकारको अप्राकृत सोचते हैं, यह इसका ज्वलन्त उदाहरण है। अनेक लोग भक्तिविरोधी अद्वैतवादियोंके ग्रन्थोंकी आलोचनाके समान ही श्रीरामानुज-मध्वाचार्य-निम्बार्क-विष्णुस्वामी आदि वैष्णवाचार्योंके द्वारा लिखित सिद्धान्त-ग्रन्थोंके पठनकी निन्दा करते हैं। श्रीजीव गोस्वामीपादने इन वैष्णवाचार्योंके सुसिद्धान्तोंको वैष्णवोंके मङ्गलके लिये षट्सन्दर्भमें उद्धृत किया है। निर्विशेषवादी लोग जिस प्रकार भक्तिके अङ्गोंको भ्रमवशतः कर्मका अङ्ग समझते हैं, उसी प्रकार सिद्धान्तहीन वैष्णव-नामधारी लोग भक्तिके अनुकूल-सिद्धान्तोंको भी प्रतिकूल मानकर श्रीकृष्णभक्तिसे विच्युत हो जाते हैं॥११७॥ अमृताणुकणिका—जगत्में हम दो प्रकारके लोगोंको देखते हैं—सारग्राही और भारवाही। जो लोग किसी भी विषयमें भली-भाँति विचार ना करके केवल असार भागको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें भारवाही कहते हैं। और जो किसी भी विषयमें सूक्ष्मरूपसे विचार करके सारभागको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें सारग्राही कहा जाता है। सारग्राही व्यक्ति ही अपना परम कल्याण लाभ करके अन्तमें श्रीहरिके चरणकमलोंको प्राप्त करते हैं। किन्तु शास्त्रोंके सिद्धान्तोंको शास्त्रानुगत विचारोंके द्वारा हृदयमें दृढ़तासे धारण ना होनेसे विपरीत प्राकृत बुद्धि आकर हमें वास्तव तत्त्व वस्तुसे विच्युत कर देती है। इसलिये इस पयारमें श्रील कविराज गोस्वामीने सिद्धान्तको ठीकसे समझनेके लिये बल दिया है जिसके द्वारा भजनमें दृढ़ता आती है। इसी प्रकारसे श्रीगीता, श्रीमद्भागवत, वेदान्त, उपनिषद् आदि शब्द प्रमाणोंको यदि कोई सारग्राही होकर विचार करे, तो वह देखेगा कि भगवद्भक्तिको उक्त सभी शास्त्रोंमें चरम सिद्धान्तके रूपमें कहा गया है। जो शब्द-प्रमाणके इस प्रकार सुसिद्धान्तको भी मतवाद मानते हैं, वे देवीमायासे मोहित होकर स्वयं ही मतवादी हो जाते हैं। वैदिक मीमांसा शास्त्र दो भागोंमें विभक्त है। एक ही मीमांसा शास्त्रमें जैमिनीने पूर्व मीमांसा नाम देकर “अथातो धर्मजिज्ञासा” सूत्रकी अवतारणा

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