श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २/११६-११७
अनुवाद-मैं सभी श्रोताओंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ और उनसे यह निवेदन करता हूँ कि वे इन सब सिद्धान्तोंको ध्यानपूर्वक श्रवण करें। सिद्धान्त कहकर उसे सुनने और समझनेमें चित्तमें आलस्य मत लाओ, इन सब सिद्धान्तोंको जाननेसे ही श्रीकृष्णमें मन दृढ़तापूर्वक लगता है॥११६-११७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कोई-कोई भक्तिपिपासु व्यक्ति इन सब सिद्धान्तोंको भक्तिका अङ्ग ना कहकर इनमें प्रवेश करनेमें आलस्य दिखलाते हैं, किन्तु यह मङ्गलका विषय नहीं है। क्योंकि श्रीकृष्णसे सम्बन्धज्ञान जाननेपर उनके चरणकमलोंमें चित्त दृढ़रूपसे संलग्न होता है। इसलिये इस प्रकारके सत्-सिद्धान्त शुद्धभक्तिके मूल हैं॥११७॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये द्वितीय परिच्छेद। दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य-जातरुचि भक्तोंके आदर्शको देखकर अनेक लोग सोचते हैं कि हमें इनके समान सिद्धान्तके विषयमें प्रवेश करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकारके आलस्यसे अनेक लोग भजनके विषयमें अभावग्रस्त होकर श्रीकृष्ण-विमुखता संग्रह करते हैं और भक्ति-विरोधी जड़ीय भावोंको ही भक्ति समझकर अनर्थग्रस्त हो जाते हैं। जिनकी अभी भक्तिमें रुचि जाग्रत नहीं हुई है, ऐसे भक्तोंके लिये विचारप्रधान-मार्ग यद्यपि उपयोगी है, तथापि रुचि जाग्रत करनेके लिये उन लोगोंके लिये नवधा भक्तिका प्रथम अङ्ग 'श्रवण' विशेष आवश्यक है। श्रीकृष्णविषयक सिद्धान्त श्रवण नहीं करनेसे रुचिमें वृद्धि नहीं होती है। नवधा भक्तिके प्रारम्भमें ही कीर्त्तनके पूर्व ही 'श्रवण' की व्यवस्था है। श्रवण-कीर्त्तनरूपी जलसे सींचनेसे भक्तिलता सुष्ठु (सुन्दर) रूपसे बढ़ती है। ब्रह्माजीने श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए जिस श्लोक (भाः १०/१४/३) में ज्ञानके प्रयासको त्याग करनेवाले भक्तोंकी अवस्थाका वर्णन किया है, उसी श्लोकमें ही 'सन्मुखरितां भवदीयवार्त्तां श्रुतिगतां' अर्थात् सत् पुरुषोंके मुखसे श्रीकृष्णकथाको श्रवण करनेकी महिमा कही है। परमहंसोंके अमल-ज्ञानको प्रदान करनेवाले श्रीमद्भागवतके विचारोंके अनुसार पठन-श्रवणादि करनेसे ही जीवको महाभागवत बननेका अधिकार प्राप्त होता है। श्रीमन्महाप्रभुकी सनातन-शिक्षामें हम लोग सुनते हैं- "शास्त्रयुक्त्ये सुनिपुण दृढ़श्रद्धा याँर। उत्तम अधिकारी तिँह तारये संसार॥" अर्थात् “भक्तिशास्त्रोंमें निपुण और भक्तिके इतर मार्गको त्याग करनेवालेको उत्तम अधिकारी कहते हैं तथा वह संसारका उद्धार करनेमें सक्षम है।" श्रीरूपगोस्वामीपादने भी कहा है- “उत्साहान्निश्चयाद्धैर्यात् तत्त्कर्मप्रवर्त्तनात्। सङ्गत्त्यागात् सतोवृत्तेः षड्भिर्भक्तिः प्रसिद्ध्यति॥" अर्थात् “आलस्य त्याग करके भक्तिवर्द्धक नियमोंमें उत्साह रखना, शास्त्र एवं शास्त्रानुकूल श्रीगुरुदेवके वचनोंमें दृढ़ विश्वास रखना; अनेक विघ्न-बाधा आनेपर भी अथवा अभीष्ट-सिद्धिमें विलम्ब होनेपर भी भक्तिके साधनोंमें धैर्य रखना; श्रवण, कीर्त्तन आदि भक्तिके अङ्गोंका पालन तथा श्रीकृष्ण-प्रीतिके लिये अपने भोग-विलासका वर्जन करना; भक्तिविरोधी अवैध स्त्रीसङ्ग, स्त्री-सङ्गीका सङ्ग, मायावादी, निरीश्वरवादी और धर्मध्वजी लोगोंका सङ्ग छोड़ देना; भक्तजनोंका-सा सदाचार और उनकी जैसी वृत्ति ग्रहण करना-इन छः प्रकारके साधनोंसे भक्तिकी सिद्धि होती है।" स्वयंमें भक्त होनेका अभिमान रखनेवाले सिद्धान्तहीन लोग
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