श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/११०-११७ ]
केहो कहे, परव्योमे नारायण-हरि। सकल सम्भवे कृष्णे, याते अवतारी॥११५॥ अनुवाद—जो इस प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभुको क्षीरोदशायी विष्णु कहते हैं, वे भी भक्त हैं, उनका इस प्रकारका वाक्य भी मिथ्या नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके लिये सब कुछ सम्भव है, क्योंकि वे स्वयं अवतारी हैं। सभी अवतार अवतारीके शरीरमें स्थित हैं, इसलिये जिसकी जैसी भावनाएँ हैं, वह वैसे ही कहता है। श्रीकृष्णको कोई नर-नारायण कहता है, तो कोई साक्षात् वामन कहता है। कोई यह भी कहता है कि श्रीकृष्ण क्षीरोदशायी विष्णुके अवतार हैं। यह सब असम्भव नहीं है और सभीके वचन सत्य हैं। कोई उनको वैकुण्ठके हरि या नारायण कहते हैं। वे अवतारी हैं, इसलिये उनके लिये सब कुछ सम्भव है॥१११-११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—किसी-किसी ग्रन्थमें श्रीचैतन्यमहाप्रभुका क्षीरोदशायी वैकुण्ठनाथ कहकर उल्लेख किया गया है। इसके द्वारा उनकी महिमा सम्पूर्णरूपसे वर्णित नहीं हुई है, किन्तु उन सब भक्तोंके वाक्य मिथ्या नहीं हैं; क्योंकि श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं अवतारी हैं, इसलिये सभी अवतार उनमें विद्यमान हैं॥११०-११२॥ अनुभाष्य—श्रीलघुभागवतामृतमें श्रीकृष्णके अवतारी रूपमें वर्णनके प्रसङ्गमें— “अतएव पुराणादौ केचिन्नरसखात्मताम्। महेन्द्रानुजतां केचित् केचित् क्षीराब्धिशायिताम्॥ सहस्रशीर्षतां केचित् केचित् वैकुण्ठनाथताम्। ब्रुयुः कृष्णस्य मुनयस्तत्तद्वृत्त्यनुगामिनः।” अर्थात् “इसलिये पुराणादिमें श्रीकृष्णको मुनियोंने अपने-अपने अधिकारके अनुसार किसीने नरसखा नारायण, तो किसीने उपेन्द्र, किसीने क्षीरोदशायी, किसीने सहस्रशीर्षा पुरुष अथवा किसीने वैकुण्ठनाथ कहकर कीर्तन किया है॥”११४॥ अमृतानुकणिका—अवतारी श्रीगौरसुन्दरमें सभी अवतार ही अन्तर्भुक्त हैं, इसलिये श्रीगौरसुन्दरको जिस किसी भी विष्णुके नामसे अभिहित करना दोषपूर्ण नहीं है। किन्तु यह कहकर जो वस्तुको (भगवान्को) अवस्तु या माया कहते हैं, उन समस्त अभक्त-सम्प्रदायके वाक्योंको मिथ्या ही मानना चाहिये। जैसे—श्रीगौरसुन्दर साधारण मनुष्य हैं, किंवा धर्मसंस्कारक जीव हैं अथवा पण्डित हैं, किंवा बहिरङ्गा मायाकी विभिन्न कल्पित मूर्तियों या जड़ीय नामोंके साथ श्रीगौराङ्गकी श्रीमूर्त्ति अथवा श्रीनाम समान है अर्थात् गौराङ्ग-मूर्ति या महामायाकी मूर्ति, गौराङ्गका नाम और मानवके द्वारा कल्पित काली-दुर्गा आदि नाम—सभी समान हैं; जो गौराङ्ग हैं, जड़जगत्में पूजिता काली-दुर्गा भी वही हैं, जो कोई भी एक मानवकी रुचिके अनुसार ग्रहण कर लें,—ये सब विचार जिनके भीतर हैं (अर्थात् उनके मोहन पर्देके भीतर निर्विशेषवादके अग्निकुण्ड छिपे हैं), उनके वचनोंको मिथ्या ही जानना होगा। इस प्रकार विचार तत्त्ववस्तु श्रीगौरसुन्दरके अन्वयभावसे समन्वित नहीं होता है॥१११-११५॥ वैध एवं रागानुग, सभी भक्तोंको ही भक्तिसिद्धान्त जानना नितान्त आवश्यक है :— सब श्रोतागणेर करि चरण वन्दन। ए सब सिद्धान्त शुन, करि' एक मन॥११६॥ सिद्धान्त बलिया चित्ते ना कर अलस। इहा हैते कृष्णे लागे सुदृढ़ मानस॥११७॥
दूसरा अध्याय | ८३