श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २/१०७-११४ कारणोदकशायी-गर्भोदकशायी-क्षीरोदकशायी-तीनों पुरुषावतार, मत्स्य-कूर्म-वराह-राम-नृसिंहादि नैमित्तिकावतार, ब्रह्मा-शिवादि गुणावतार, निर्विशेष ब्रह्म, महेन्द्रादि-विभूति अवतार आदि) सभीके ईश्वर हैं। वे सच्चिदानन्द-विग्रह (सन्धिनी, संवित् और ह्लादिनी इन शक्तियोंसे युक्त), अनादि (जैसे 'अहमेवासमेवाग्रे' श्लोकमें कहा गया है), आदि (सभीके मूलरूप) तथा सभी कारणोंके मूल कारण श्रीगोविन्द हैं॥१०७॥ ए सब सिद्धान्त तुमि जान भालमते। तबु पूर्वपक्ष कर आमा चालाइते॥१०८॥ अनुवाद—ये सब सिद्धान्त तुम अच्छी तरह जानते हो, तो भी मुझे वृथा उद्वेग देनेके लिये व्यर्थ तर्क कर रहे हो॥१०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चालाइते'—वृथा उद्वेग देनेके लिये॥१०८॥ श्रीचैतन्य ही स्वयं अवतारी श्रीकृष्ण :— सेइ कृष्ण अवतारी व्रजेन्द्रकुमार। आपने चैतन्यरूपे कैल अवतार॥१०९॥ अनुवाद—वे ही अवतारी व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णचन्द्र ही स्वयं चैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतरित हुए हैं॥१०९॥ अवतारी श्रीचैतन्यमें सभी अवतार अन्तर्भुक्त :— अतएव चैतन्य गोसाञि परतत्त्व-सीमा। ताँरे क्षीरोदशायी कहि, कि ताँर महिमा॥११०॥ अनुवाद—इसलिये चैतन्य महाप्रभु परतत्त्वकी चरम सीमा हैं। तब उनको क्षीरोदशायी विष्णु कहनेसे क्या उनकी वास्तविक महिमा प्रकाशित होती है?॥११०॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्यभागवत मध्य ६/९५- (महाप्रभुने कहा)— “शुतिया आछिनु मुइ क्षीरोदसागरे। निद्राभङ्ग हइल मोर नाड़ार हुङ्कारे॥” अर्थात् “मैं क्षीरोदसागरमें सो रहा था और इस ‘नाड़ा’ की हुङ्कारने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी॥”११०॥ उनको जिस किसी विष्णुनामसे सम्बोधित करना दोषयुक्त नहीं है :— सेइ त' भक्तेर वाक्य नहे व्यभिचारी। सकल सम्भवे ताँते, याते अवतारी॥१११॥ अवतारीर देहे सब अवतारेर स्थिति। केहो कोनमत कहे, येमन यार मति॥११२॥ कृष्णके कहये केह—नरनारायण। केहो कहे, कृष्ण हय साक्षात् वामन॥११३॥ केहो कहे, कृष्ण क्षीरोदशायी अवतार। असम्भव नहे, सत्य वचन सबार॥११४॥ ८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत