भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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२/१०१-१०७ ] जल और भूमिके बीचके स्थानको 'तट' कहा जाता है। परन्तु जलसे लगा हुआ स्थान ही भूमि है। फिर 'तट' कहाँ रहा? 'तट'-जल और भूमिके बीच दोनोंको विभक्त करनेवाली रेखा विशेष है। यह तट रेखा स्थूल नेत्रोंसे दिखायी नहीं पड़ती। चित्-जगत्को जल और मायिक जगत्को भूमि मान लेनेपर दोनोंको विभक्त करनेवाली सूक्ष्म रेखा ही 'तट' है। सन्धि स्थानपर जीवशक्तिकी स्थिति है। अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंमें अनन्त कोटि जीव और अप्राकृत भगवद्धाममें साधन-सिद्ध और नित्यसिद्ध जीव-सभी भगवान्की जीव-नामक तटस्था शक्तिका वैभव हैं, और जीवशक्ति शक्तिमान् श्रीकृष्णके आश्रित है, यह इस आधे पयार (संख्या १०३) में व्यञ्जित हुआ है॥१०१-१०३॥ स्वरूप एवं शक्तिवर्गोंका अवस्थान :- एइ त' स्वरूपगण, आर तिन शक्ति। सबार आश्रय कृष्ण, कृष्णे सबार स्थिति॥१०४॥ यद्यपि ब्रह्माण्डगणेर पुरुष आश्रय। सेइ पुरुषादि-सबार कृष्ण मूलाश्रय॥१०५॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण इन सभी स्वरूपों अर्थात् पूर्वोक्त छह प्रकारके विलास और इन तीनों शक्तियोंके आश्रय हैं तथा श्रीकृष्णमें ही सभीकी स्थिति है। यद्यपि तीन पुरुषावतार सभी ब्रह्माण्डोंके आश्रय हैं, किन्तु उनके भी मूल-आश्रय श्रीकृष्ण ही हैं॥१०४-१०५॥ श्रीकृष्णका परिचय :- स्वयं भगवान् कृष्ण, कृष्ण सर्वाश्रय। परम ईश्वर कृष्ण सर्वशास्त्रे कय॥१०६॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् और सभीके आश्रय हैं तथा सभी ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, यह बात सभी शास्त्रोंमें कही गयी है॥१०६॥ ब्रह्मसंहिता (५/१)- ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥१०७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं; वे स्वयं अनादि और सभीके आदि एवं समस्त कारणोंके कारण हैं॥१०७॥ अनुभाष्य-कृष्णः (व्रजेन्द्रनन्दनः) परमः ईश्वरः (बलदेव नारायण-वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध- कारणगर्भक्षीरार्णवत्रयशायि-परमात्म-पुरुषावतार-मत्स्यकूर्मवराह-रामनृसिंहादि नैमित्तिकावतार-ब्रह्मा-शिवादि गुणावतार-निर्विशेष ब्रह्म-महेन्द्रादि-विभूत्यवताराणां सर्वेषां पतिः) सच्चिदानन्द-विग्रहः (सन्धिनी-सम्वित्-ह्लादिनी शक्तित्रय समन्वितः) अनादिः (आदिरहितः-'अहमेवासमेवाग्रे' इति पदवाच्यः) आदिः (सर्वेषां मूलरूपः) सर्वकारणकारणं (सर्वकारणानां कारणं मूलं) गोविन्दः। श्लोक-भावानुवाद-(व्रजेन्द्रनन्दन) श्रीकृष्ण (बलदेव, नारायण-वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध, दूसरा अध्याय | ८१