भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 2549 में से

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[ २/१०१-१०३ सत्त्व, रजः और तमः—इन तीन गुणोंकी साम्यावस्था प्रकृतिको गुणमाया कहते हैं; गुणोंकी साम्यावस्थामें सृष्टि आदि कोई कार्य नहीं होता है। जड़प्रकृतिमें स्वयं कोई क्रिया करनेकी शक्ति नहीं है। ईश्वरशक्तिका उसमें सञ्चार होनेपर ही वह जगत्का सृजन करती है। कारणोदशायी विष्णु जब सृष्टि करनेकी इच्छासे गुणमायापर दृष्टिपातकर उसमें शक्ति सञ्चारित करते हैं, तब गुणोंमें क्षोभ होनेसे गुणमाया महत्तत्त्वादि चौबीस तत्त्वोंके द्वारा अनन्त ब्रह्माण्डोंको प्रकट करती है। अन्यथा भगवत्-शक्तिके अभावमें वह सृष्टि कार्यका सम्पादन नहीं कर सकती। प्राकृत जगत्का मुख्य निमित्त-कारण और मुख्य उपादान-कारण ईश्वर होनेपर भी माया ही गौण निमित्त-कारण और गौण उपादान-कारण है। जीवमायाकी दो प्रकारकी शक्तियाँ हैं—आवरणात्मिका और विक्षेपात्मिका। जिस शक्तिके द्वारा जीवमाया बहिर्मुख जीवके (नित्य कृष्णदास) स्वरूपको आवृत करती है, उसे आवरणात्मिका शक्ति कहते हैं। और जिस शक्तिके द्वारा जीवमाया मायिक वस्तुमें बहिर्मुख जीवके अभिनिवेशको उत्पन्न करती है, उसे विक्षेपात्मिका शक्ति कहते हैं। अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड बहिरङ्गा मायाशक्तिका वैभव हैं; बहिरङ्गा मायाशक्ति शक्तिमान् श्रीकृष्णके ही आश्रित है, इसलिये मायाशक्तिके वैभवरूप ब्रह्माण्ड समूह भी श्रीकृष्णके आश्रित और श्रीकृष्ण उनका आश्रय हैं—पयर संख्या १०२में यही व्यञ्जित हुआ है। मायाशक्तिमें ह्लादिनी-वृत्ति जड़ानन्दके रूपमें, संवित्-वृत्ति भौतिक-ज्ञानके रूपमें तथा सन्धिनीशक्ति सम्पूर्ण जड़ ब्रह्माण्डों तथा जीवोंके जड़ शरीरोंके रूपमें प्रकाशित हैं। ‘जीव-शक्ति’—अनन्त कोटि जीव भगवान्की जिस शक्तिका वैभव हैं, उसे जीव-शक्ति कहते हैं। गीता (७/५)— “अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धिमे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥” अर्थात् “किन्तु, आठ भेदोंवाली यह जड़ा प्रकृति निकृष्टा है। इससे उत्कृष्ट जीवस्वरूपा मेरी एक और प्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है।” गीताके इस वाक्यके अनुसार जीव ईश्वरकी प्रकृति-विशेष है अर्थात् जीव ईश्वरकी शक्ति है। जलती हुई अग्निसे जैसे अनेकों क्षुद्र चिङ्गारियाँ उड़ती हैं, ठीक उसी प्रकार चित्-सूर्यस्वरूप श्रीहरिके किरण-कण स्थानीय चित्-परमाणु-स्वरूप अनन्त जीव हैं। श्रीहरिसे अभिन्न होते हुए भी ये जीव उनसे नित्य भिन्न हैं। ईश्वर और जीवमें नित्य भेद यह है कि ईश्वर मायाशक्ति अर्थात् प्रकृतिके अधीश्वर हैं और जीव मुक्त अवस्थामें भी अपने स्वभावके अनुसार माया-प्रकृतिके अधीन होने योग्य होता है। जीवशक्ति जड़शक्तिसे श्रेष्ठ चेतनामयी है, इसलिये यह बहिरङ्गा मायाशक्ति भी नहीं है और मायाशक्तिके अन्तर्भुक्त भी नहीं है। सूर्यकी किरण जिस प्रकार सूर्यके भीतर नहीं रहती, उसी प्रकार भगवान्की किरणकण-स्थानीय जीवशक्ति भी स्वरूपशक्तिके समान भगवान्में अवस्थान नहीं करती है। इसलिये जीवशक्ति स्वरूपशक्ति नहीं है और स्वरूपशक्तिके अन्तर्भुक्त भी नहीं है। जीवशक्तिको इस कारणसे तटस्था-शक्ति भी कहा गया है। ८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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