भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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२/१०१-१०३ ] अमृतप्रवाह भाष्य—‘चिच्छक्ति’—स्वरूपशक्तिका एक दूसरा नाम अन्तरङ्गा शक्ति भी है, उससे ही वैकुण्ठादि धाममें अनन्त वैभव प्रकाश होते हैं। तटस्थाशक्ति नामक जीवशक्तिसे बद्ध और मुक्त अनन्त जीव प्रकाशित होते हैं। बहिरङ्गा अर्थात् मायाशक्तिसे प्राकृत ब्रह्माण्डोंका अनन्त वैभव है॥१०१-१०३॥ अनुभाष्य—श्वेताश्वतर उपनिषद्के अन्तर्गत छठे अध्यायका अष्टम मन्त्र— “न तस्य कार्यं करणञ्च विद्यते, न तत् समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्यशक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।” अर्थात् “उन परमेश्वरकी प्राकृत इन्द्रियाँ आदि नहीं हैं, इसलिये उनके इन्द्रियादि साध्य कार्य भी नहीं हैं। उनके समान अथवा उनसे बड़ी कोई वस्तु नहीं है। उनकी पराशक्ति स्वाभाविकी है और उसके ज्ञान (चित्), बल (सत्) एवं क्रिया (आनन्द)—तीन भेद हैं॥”१०३॥ अमृताणुकणिका—श्रीकृष्णकी एक परा (स्वरूप) शक्ति है, वह अनन्त रूपोंमें प्रकाशित है। उनमेंसे तीन शक्तियाँ प्रधान हैं—चित्-शक्ति, जीव-शक्ति और माया-शक्ति। उनको क्रमशः अन्तरङ्गा, तटस्था और बहिरङ्गा शक्ति भी कहते हैं। स्वरूपशक्ति एक होनेपर भी उक्त तीन रूपोंमें कार्य करती है। स्वरूपशक्तिके जो सब नित्य लक्षण हैं, वे चित्-शक्तिमें पूर्ण रूपमें, जीव-शक्तिमें अणु रूपमें तथा माया-शक्तिमें विकृत रूपमें प्रकाशित हैं। ‘चित्-शक्ति’—चित्-शक्तिका वैभव अनन्त वैकुण्ठ लोक हैं। स्वरूपशक्तिकी तीन प्रकारकी वृत्तियाँ हैं—सन्धिनी, संवित् और ह्लादिनी। सत्-अंशकी अधिष्ठात्री शक्तिका नाम सन्धिनी है; सन्धिनी शक्तिके द्वारा भगवान् अपनी सत्ताकी रक्षा करते हैं। सन्धिनी-शक्तिके सारांशका नाम शुद्धसत्त्व है। समस्त भगवद्धाम, उसमें स्थित भगवान्‌का श्रीमन्दिर, शय्या, आसनादि और पिता-माता आदि परिकरवर्ग—ये समस्त ही सन्धिनी-प्रधान शुद्धसत्त्वकी परिणति हैं। चित्-अंशकी अधिष्ठात्री शक्तिका नाम संवित् है, संवित्-शक्तिके द्वारा भगवान् स्वयंको जानते हैं और अन्योंको जनाते हैं। आनन्द-अंशकी अधिष्ठात्री शक्तिका नाम ह्लादिनी है; ह्लादिनी-शक्तिके द्वारा भगवान् स्वयं आनन्दका अनुभव करते हैं और भक्तोंको आनन्दका अनुभव कराते हैं। वैकुण्ठके सर्वोपरि लोक निर्मल वृन्दावन धाममें स्वेच्छामय व्रजरस विलासी श्रीकृष्ण नित्य-रससमुद्रमें निमग्न रहते हैं। संवित्-वृत्तिके द्वारा प्रकटित भिन्न-भिन्न भावोंसे युक्त होकर प्रणय-रसका आस्वादन करते हैं। वंशी बजाकर उससे गोपियोंको आकर्षण, गोचारण और रास आदि लीलाएँ—ये सब क्रियाएँ श्रीकृष्ण अपनी पराशक्तिकी संवित्-वृत्तिके द्वारा सम्पादित करते हैं। श्रीकृष्ण ह्लादिनीके प्रणय विकारमें सदा अनुरक्त रहते हैं। ‘बहिरङ्गा मायाशक्ति’—कारण-समुद्रके एक ओर चिन्मय भगवद्धाम है और दूसरी ओर जड़मायाका स्थान है। माया सदा ही भगवद्धाम और भगवान्‌से बाहर अवस्थान करती है, इसलिये यह बहिरङ्गा शक्ति है। भगवान्‌की स्वरूपानुबन्धिनी लीलामें भी मायाका कोई स्थान नहीं है। यहाँ तक कि भगवान् जब प्रपञ्चमें अवतीर्ण होते हैं, तो भी मायाके साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। भगवान्‌की स्वरूपशक्तिके अचिन्त्य प्रभावसे माया उनकी शक्ति होनेपर भी भगवान्‌का स्पर्श भी नहीं कर सकती। मायाकी दो प्रकारकी वृत्तियाँ हैं—प्रधान (गुणमाया) और प्रकृति (जीवमाया)। दूसरा अध्याय | ७९

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