श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २/९७-१०३ अनुवाद-स्वयंरूपके अतिरिक्त श्रीकृष्ण अन्यान्य छह प्रकारके रूपोंमें विलास करते हैं। दो प्रकारके प्रकाश-प्राभव और वैभव रूपसे, दो प्रकारके अवतार-अंशावतार और शक्त्यावेशावतार रूपसे और बाल्य-धर्मयुक्त एवं पौगण्ड-धर्मयुक्त विग्रहसे, इन छह रूपोंमें वे विश्वभरमें लीलाएँ करते हैं। किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण ही स्वयं अवतारी हैं। इन छह रूपोंके अन्तर्गत अनन्त विभेद हैं, किन्तु इन अनन्तरूपोंमें लीला करते हुए श्रीकृष्ण एक ही रूप हैं। श्रीकृष्णसे इनका कुछ भी भेद नहीं है॥९७-१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी हरिके समान ही सच्चिदानन्दमयमूर्ति है, परन्तु स्थिति परावस्थासे किञ्चिन्मात्र कम है, उनको प्राभव और वैभव प्रकाश कहा जाता है। शक्तिके तारतम्यके अनुसार जिनमें प्रभुताकी प्रधानता है, उनको 'प्राभव' और जिनमें विभुताकी प्रधानता है, उनको 'वैभव' कहा जाता है। प्राभव प्रकाश दो प्रकारके हैं-एक जो चिरस्थायी नहीं हैं, जैसे मोहिनी-हंस-शुक्लादि अचिरस्थायी अवतार हैं, जो युगके अनुसार अवतरित होते हैं। दूसरे प्रकारके प्राभव प्रकाशकी कीर्तिका अधिक विस्तार नहीं होता है, जैसे धन्वन्तरी, ऋषभ, व्यास, दत्तात्रेय, कपिलादि। कूर्म, मत्स्य, नर-नारायण, वराह, हयग्रीव, पृश्निगर्भ, बलदेव और चौदह मन्वन्तरावतार (यज्ञ, विभु, सत्यसेन, हरि, वैकुण्ठ, अजित, वामन, सार्वभौम, ऋषभ, विष्वक्सेन, धर्मसेतु, सुधामा, योगेश्वर और वृहद्भानु), ये वैभवावतार हैं। अंशावेश और शक्त्यावेश-अवतारोंकी व्याख्या दूसरे स्थानपर हुई है। इनकी भी प्राभव-वैभवके मध्य गिनती होती है। साथ-ही-साथ गुणावतारोंकी भी ऐसी ही स्थिति है। नित्य किशोरस्वरूप श्रीकृष्णकी बाल्य और पौगण्ड अवस्थाकी दो प्रकारकी लीलाएँ हैं। इसलिये किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण ही स्वयं अवतारी हैं। किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण इन छह प्रकारके स्वरूप विलाससे विश्वभरमें लीला करते हैं। इन छह रूपोंके अनन्त विभेद हैं, परन्तु अनन्त होकर भी श्रीकृष्ण एक ही अखण्ड तत्त्व हैं॥९७-१००॥ चित्-शक्ति और उसका वैभव :- चिच्छक्ति, स्वरूपशक्ति, अन्तरङ्गा नाम। ताहार वैभव अनन्त वैकुण्ठादि धाम॥१०१॥ मायाशक्ति और उसका वैभव :- मायाशक्ति बहिरङ्गा जगत्कारण। ताहार वैभव अनन्त ब्रह्माण्डेर गण॥१०२॥ जीवशक्ति :- जीवशक्ति तटस्थाख्य, नाहि यार अन्त। मुख्य तिनशक्ति, तार विभेद अनन्त॥१०३॥ अनुवाद-चित्शक्तिको स्वरूपशक्ति और अन्तरङ्गा शक्ति भी कहा जाता है, अनन्त वैकुण्ठादि धाम उसके वैभव स्वरूप हैं। मायाशक्तिको बहिरङ्गा कहा जाता है और वह जगत्का कारण है तथा उसका वैभव ये अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। जीवशक्तिका नाम तटस्थाशक्ति भी है, जिसका कोई अन्त नहीं है अर्थात् जीव अनन्त हैं। श्रीकृष्णकी ये तीन मुख्य शक्तियाँ हैं और इनके अनन्त विभेद हैं॥१०१-१०३॥ ७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत