श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/९६-१०० ] अर्थात् “वही एकमात्र परमतत्त्व अपनी स्वाभाविक, मनुष्यकी बुद्धिसे परे अचिन्त्य-शक्तिबलसे स्वरूप, तद्रूपवैभव, जीव और प्रधान, इन चार रूपोंमें सर्वदा अवस्थान करते हैं। उदाहरणके लिये उस परमतत्त्वकी सूर्यसे समानता दिखलायी है। जैसे सूर्यदेव (व्यक्ति), अन्तर्मण्डलमें स्थित तेजके समान सूर्यमण्डल, मण्डलसे निकलती किरणें और दूर स्थानपर सूर्यकी प्रतिच्छवि, इन चार रूपोंमें सूर्यकी प्रतीति होती है, वैसी ही उस परमतत्त्वकी उपरोक्त चार रूपोंमें प्रतीति होती है। असम्भवको सम्भव बनाना ही अचिन्त्य शक्तिका प्रभाव है। परमतत्त्वकी शक्तियाँ तीन प्रकारकी हैं—अन्तरङ्गा, तटस्था और बहिरङ्गा। इनमेंसे अन्तरङ्गा स्वरूप-शक्तिके प्रभावसे पूर्णस्वरूप-विग्रह और वैकुण्ठ-गोलोकादि स्वरूप-वैभव (सूर्यके उदाहरणमें जैसे सूर्यदेव और सूर्यमण्डल); तटस्थाशक्तिके प्रभावसे वे किरणरूप चिन्मयशुद्ध-जीव विग्रह और बहिरङ्गा मायाशक्तिके प्रभावसे वैकुण्ठकी प्रतिच्छविरूपमें जड़प्रधान बहिरङ्गवैभव (असंख्य ब्रह्माण्डों) को प्रकाश करते हैं। इस प्रकार वे परमतत्त्व अपनी तीन शक्तियोंके द्वारा स्वयंको इन चार रूपोंमें प्रकाशित करते हैं। इसलिये परमतत्त्वकी स्वयंकी शक्ति होनेपर भी जीवको तटस्था-शक्तिका प्रकाश और प्रधानको मायाके अन्तर्भुक्त गणना करके विष्णु-पुराणमें तीन प्रकारकी शक्तियोंका वर्णन है। जो अविद्याका विस्तार करती है, उसीका नाम ही माया है। यद्यपि यह शक्ति बहिरङ्गा है, तो भी तटस्थ-शक्तिमय जीवको आवरण करनेकी क्षमता उसमें निहित की गयी है। मायाके द्वारा आवृत होकर जीव पत्थर-वृक्षादि (अचल वस्तुएँ जिनमें चेतनता लगभग पूर्णरूपसे ढकी होती है) से लेकर ब्रह्मा (जिनमें चेतनताका परम विकास है) तक सभी देहोंमें विद्यमान हैं। चिद्रूपत्व और विकार-रहितादि गुणरहित प्रधानका जड़त्व और विकार-विशिष्टता उस अचिन्त्य-मायाके द्वारा ही घटित होती है, ऐसा जानना होगा। एक ही परमतत्त्वकी शक्ति होनेके कारण अन्तरङ्गा, तटस्था और बहिरङ्गा शक्तियोंमें समानता रहनेपर भी वे सम्पूर्णरूपमें परस्पर समान नहीं हैं, अर्थात् उनकी क्रियाएँ भिन्न-भिन्न हैं। इसलिये तटस्था शक्तिसे प्रकटित जीवमें और बहिरङ्गा शक्तिसे प्रकटित जड़ जगत्में जो दोष हैं, उनका अन्तरङ्गा शक्तिसे प्रकाशित चिन्मय जगत्में होनेकी सम्भावना नहीं है। इसी प्रकार बहिरङ्गाके दोष तटस्थामें तथा तटस्थाके दोष बहिरङ्गामें नहीं हो सकते॥”९६॥ श्रीकृष्णके छह प्रकारके विलास; (१) दो प्रकारके प्रकाश :- कृष्णेर स्वरूपेर हय षड्विध विलास। प्राभव-वैभव-रूपे द्विविध प्रकाश॥९७॥ (२) दो प्रकारके अवतार, (३) दो प्रकारके वयस धर्म :- अंश-शक्त्यावेशरूपे द्विविधावतार। बाल्य-पौगण्ड-धर्म दुइ त' प्रकार॥९८॥ किशोरस्वरूप कृष्ण स्वयं अवतारी। क्रीड़ा करे एइ छय-रूपे विश्व भरि' ॥९९॥ विलासमें लीलाभेद होनेपर भी तत्त्वतः अभेद :- एइ छय-रूपे हय अनन्त विभेद। अनन्तरूपे एकरूप, नाहि किछु भेद॥१००॥ दूसरा अध्याय | ७७