भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ २/९५-९६ आश्रयविग्रह स्वरूप हैं, परमधाम और जगत्के आधार स्वरूप हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-दशमस्कन्धमें आश्रितजनोंके आश्रय-विग्रहस्वरूप श्रीकृष्णको लक्षित किया गया है। उन्हीं श्रीकृष्ण नामक परमधाम और जगद्धामको मैं नमस्कार करता हूँ। तात्पर्य यह है कि जगत्में आश्रय और आश्रित नामक दो प्रकारके तत्त्व हैं। जिसको आश्रय करके समस्त आश्रिततत्त्व विद्यमान हैं, वही मूलतत्त्व ही आश्रय है। उसी तत्त्वका आश्रय करके जो सभी तत्त्व हैं, वे सभी आश्रित-तत्त्व हैं। सर्गसे मुक्ति तक (प्रथम नौ पदार्थ) समस्त आश्रित-तत्त्व हैं, इसलिये पुरुषावतार और उनके अनुगत सभी अवतार, समस्त शक्तियाँ और उनके अनुगत जीव और जड़ जगत्, सभी उन्हीं श्रीकृष्णरूप आश्रयके आश्रित हैं। भागवतमें स्तव और उपाख्यानके छलसे कुछ गौणरूपमें और साक्षात् उपदेशके रूपमें स्पष्टरूपसे आश्रयतत्त्वका ही विचार किया गया है। इसलिये श्रीकृष्णके स्वरूपका और उनकी तीनों शक्तियोंका ज्ञान नितान्त आवश्यक है॥९५॥ अनुभाष्य-दशमे (श्रीमद्भागवत-दशमस्कन्धे) आश्रिताश्रयविग्रहं (आश्रितानां प्रपन्नानां आश्रयविग्रहं) दशमम् (आश्रयतत्त्वं) लक्ष्यम्। तत् परं धाम (श्रेष्ठाश्रयं) जगद्धाम (सर्वाश्रयं) श्रीकृष्णाख्यं नमामि। श्लोक-भावानुवाद-श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धमें शरणागतोंके आश्रयविग्रह आश्रयतत्त्वको लक्ष्य किया गया है। उस श्रेष्ठ आश्रय और जगद्धाम (सभीके आश्रय) श्रीकृष्णको प्रणाम करता हूँ॥९५॥ कृष्णज्ञानकी मूलकथा :- कृष्णेर स्वरूप, आर शक्तित्रय ज्ञान। याँर हय, ताँर नाहि कृष्णेते अज्ञान॥ ९६॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके स्वरूप और उनकी तीनों शक्तियोंका ज्ञान जिनको हो जाता है, उनको श्रीकृष्णके विषयमें अज्ञान नहीं रहता है॥ ९६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'शक्तित्रय'-चित्शक्ति, जीवशक्ति और मायाशक्ति, ये तीन शक्तियाँ हैं॥ ९६॥ अनुभाष्य-श्रीजीवप्रभुकृत भगवत्सन्दर्भ अन्तर्गत संख्या १६ में- “एकमेव तत् परमतत्त्वं स्वाभाविकाचिन्त्यशक्त्या सदैव स्वरूप-तद्रूप-वैभव-जीव-प्रधानरूपेण चतुर्द्धावतिष्ठते- सूर्यान्तर्मण्डलस्थतेज इव मण्डल-तद्बहिर्गतरश्मि-तत्प्रतिच्छविरूपेण। दुर्घटघटकत्वं ह्यचिन्त्यत्वम्। शक्तिश्च सा त्रिधा-अन्तरङ्गा, तटस्था, बहिरङ्गा च। तत्रान्तरङ्गया स्वरूपशक्त्याख्यया सूर्यातन्मण्डलस्थानीय-पूर्णेनैव स्वरूपेण वैकुण्ठादिस्वरूपवैभवरूपेण च तद्वतिष्ठते, तटस्थया रश्मिस्थानीय-चिदेकात्मशुद्ध-जीवरूपेण, बहिरङ्गया मायाख्यया प्रतिच्छविगत-वर्णशावल्यस्थानीय-तदीयबहिरङ्गवैभवजड़ात्म-प्रधान रूपेण चेति चतुर्द्धातित्वम्। अतएव तदात्मकत्वेन जीवस्यैव तटस्थशक्तित्वं प्रधानस्य च मायान्तर्भूतत्वमभिप्रेत्य शक्तित्रयं विष्णुपुराणे गणितम्। अविद्या कर्म कार्य यस्याः सा तत्संज्ञा मायेत्यर्थः। यद्यपीयं बहिरङ्गा, तथाप्यस्यास्तटस्थशक्तिमयमपि जीवमावरितुं सामर्थ्यमस्तीति। तारतम्येन तत्कृतावरणस्य ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु देहेषु लघुगुरुभावेन वर्त्तते। ययैव अचिन्त्यमायया चिद्रूपातानिविकारतादि-गुणरहितस्य प्रधानस्य जड़त्वं विकारित्वञ्चेति ज्ञेयम्। अत्रान्तरङ्गत्व-तटस्थत्व-बहिरङ्गत्वादीनां तेषामेकात्मकानां तत्तत्साम्यं, न तु सर्वात्मनेति तत्तत्स्थानित्यत्वमेवोक्तं, न तु तत्तद्रूपत्वम्। ततस्तत्तद्दोषा अपि नावकाशं लभन्ते।” ७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत