भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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साथ श्रीहरिकी योगनिद्रा), मुक्ति (मायाके संसर्गसे परे जीवकी अपने स्वरूपमें स्थिति), आश्रय (सृष्टिके जन्म, पालन और संहारके मूल कारण परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण); ये दस लक्षण हैं। क. सर्ग—पञ्चमहाभूत, पञ्च तन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, मन, महत्तत्त्व और अहङ्कार, इन सबकी विराट्-रूपसे एवं स्वरूपसे जो उत्पत्ति। ख. विसर्ग—ब्रह्माके द्वारा चर-अचर सृष्टि। ग. स्थिति—भगवान्‌की विजय अर्थात् सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माजी और संहारकारी शिवजीसे उत्कर्ष। घ. पोषण—अपने भक्तोंके प्रति भगवान्‌का अनुग्रह। ङ. ऊति—कर्मवासना। च. मन्वन्तर—सात्त्विक जीवोंके द्वारा आचरणीय धर्म। छ. ईशकथा—श्रीहरिके अवतारोंकी कथा और भागवतों (भक्तों) की कथा। ज. निरोध—श्रीहरिकी योगनिद्रा समयमें उनका अपनी उपाधियों और शक्तियोंके साथ शयन। झ. मुक्ति—स्थूल और सूक्ष्म देह त्यागकर जीवकी शुद्धस्वरूपमें अथवा पार्षदरूपमें अवस्थिति। ञ. आश्रय—जिनसे सृष्टि होती है और जिनमें ही लय होती है तथा जिनसे विश्व प्रकाशित होता है, वही प्रसिद्ध परब्रह्म और परमात्मा ॥९१॥ महात्मनः (विदुरादयः) इह (श्रीमद्भागवते पुराणे) दशमस्य (आश्रयस्य) विशुद्धयर्थं (तत्त्वज्ञानार्थं) नवानां लक्षणं (स्वरूपं) श्रुतेन (तद्वाचकशब्देन) अञ्जसा (साक्षात्) अर्थेन (तात्पर्येण) वर्णयन्ति। श्लोक-भावानुवाद—विदुरादि महात्माओंने इस श्रीमद्भागवत पुराणमें दशम लक्षण अर्थात् आश्रयके तत्त्वज्ञानके लिये अन्य नौ लक्षणोंका (कहीं) श्रुतियोंके वर्णनानुसार व्यतिरेक भावसे और (कहीं) साक्षात् अर्थके द्वारा वर्णन किया है॥९२॥ आश्रय जानिते कहि ए नव पदार्थ। ए नवेर उत्पत्ति-हेतु सेइ आश्रयार्थ ॥ ९३ ॥ कृष्ण एक सर्वाश्रय, कृष्ण सर्वधाम। कृष्णेर शरीरे सर्व-विश्वेर विश्राम ॥ ९४ ॥ अनुवाद—आश्रय तत्त्वको जाननेके लिये इन नौ पदार्थोंका वर्णन किया गया है और इन नौ पदार्थोंकी उत्पत्तिका कारण होनेसे उसे आश्रय कहते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही सभीके एकमात्र आश्रय तथा आधार स्वरूप हैं। श्रीकृष्णका शरीर ही सम्पूर्ण विश्वका विश्राम स्थल है॥९३-९४॥ श्रीमद्भागवत १०/१/१ श्लोककी भावार्थ-दीपिकामें— दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रयविग्रहम्। श्रीकृष्णाख्यं परं धाम जगद्धाम नमामि तत् ॥९५॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण नामक दशम पदार्थ ही भागवतके दशम स्कन्धका लक्ष्य हैं, वे आश्रितोंके दूसरा अध्याय | ७५