भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 116

कारण श्रीकृष्ण हैं। इसकी विपरीत व्याख्याका खण्डन करनेके लिये एक और श्लोक श्रवण करो॥८९-९०॥ अनुभाष्य—ब्रह्मसंहिता पाँचवाँ अध्याय, श्लोक संख्या ४६— “दीपाच्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्य, दीपायते विवृतहेतुसमानधर्मा। यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति, गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥” विष्णुतत्त्व सर्वत्र ही दीपककी भाँति आलोकमय और मूल-नारायणके समानधर्मा हैं। वैसा होनेपर भी वे सब मूल दीपकसे ही प्रकाशमान हैं। विष्णुतत्त्व जिस प्रकार श्रीगोविन्दके साथ ज्योतिरूप (प्रकाशमान) अंशमें समान हैं, ब्रह्मा और शम्भुतत्त्व गुणावतार होनेपर उस प्रकार नहीं हैं। श्रील श्रीजीवगोस्वामी कहते हैं,— “शम्भोस्तु तमोऽधिष्ठानात् कज्जलमयसूक्ष्मदीप-शिखास्थानीयस्य न तथा साम्यम्।” अर्थात् “श्रीशम्भु तमोगुणका अधिष्ठान होनेके कारण वे विष्णुरूप दीपककी काजलमय सूक्ष्म शिखाके समान हैं, उक्त दीपकसे उनका साम्य नहीं हैं।”॥८९॥ (घ) पुराण-लक्षण विचारसे भी नारायणके बदले श्रीकृष्णका मूलाश्रयत्व :— श्रीमद्भागवत (२/१०/१-२)— अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः। मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः॥९१॥ दशमस्य विशुद्धयर्थं नवानामिह लक्षणम्। वर्णयन्ति महात्मानः श्रुतेनार्थेन चाञ्जसा॥९२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९१-९२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस श्रीमद्भागवत शास्त्रमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, ऊति, पोषण, मन्वन्तर, ईशकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय—इन दस विषयोंका वर्णन हुआ है। दशमतत्त्व जो आश्रयतत्त्व है, उसकी विशुद्ध आलोचनाके लिये पूर्व नौ लक्षणोंको महात्माओंने किसी-किसी स्थानमें स्तुति और आख्यानके (युक्तिपूर्ण कहानीके) छलसे एवं किसी स्थानमें साक्षात् विचारके द्वारा वर्णन किया है॥९१-९२॥ अनुभाष्य—विराट् पुरुषसे किस प्रकार राजस-सृष्टिसमूह उदित हुए, परीक्षित महाराजके इस प्रश्नके उत्तरमें शुकदेवजीने चतुःश्लोकीकी व्याख्याके प्रारम्भमें यह श्लोक कहा— अत्र (श्रीमद्भागवते) सर्गः (भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म), विसर्गः (ब्रह्मणो गुणवैषम्यं), स्थानं (भगवतः विजयः सृष्टानां तत्तन्मर्यादापालनेन उत्कर्षः स्थितिः), पोषणं (स्वभक्तेषु तस्य अनुग्रहः), ऊतयः (कर्मवासनाः), मन्वन्तरेशानुकथाः (मन्वन्तराणि सात्त्विकधर्माणि, ईशानुकथाः हरेः अवतारकथाः), निरोधः (अस्यांनुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः) मुक्तिः (शुद्धावस्थितिः), आश्रयः (जन्मस्थितिलयकारणं परब्रह्म परमात्मा) [इति दश अर्थाः]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीमद्भागवतमें सर्ग (पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, एकादश इन्द्रियाँ, बुद्धि आदिकी उत्पत्ति), विसर्ग (ब्रह्माके द्वारा गुणोंकी विषमता), स्थान (भगवान्‌की सृष्टि-संहार आदि कार्यरूप मर्यादा पालन करनेवाले ब्रह्मा-शिवादि देवताओंपर विजय अर्थात् उनसे ऊँची स्थिति), पोषण (निजभक्तोंपर कृपा), ऊति (कर्मवासना), मन्वन्तर (सात्त्विक जीवोंके द्वारा आचरणीय धर्म), ईशानुकथा (भगवान् श्रीहरिके अवतारोंकी कथा), निरोध (अपनी शक्तियोंके