श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/८०-९० ] यदि नारायण अंशी और कृष्ण उनके अंश होते, तो सूत गोस्वामीका वाक्य विपरीत होता। अर्थात् “स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं” इस प्रकार विपरीत अर्थ होता; किन्तु आर्ष अर्थात् ऋषिके द्वारा कहे गये विज्ञवाक्योंमें भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटव, ये चार प्रकारके दोष नहीं रहनेके कारण उन्होंने 'कृष्णस्तु भगवान् स्वयं' ही कहा है। भ्रम-मिथ्याज्ञान; प्रमाद-अनवधानता (असावधानी); विप्रलिप्सा-चित्तका अन्यत्र विक्षेप; करणापाटव-इन्द्रियोंकी अपटुता ॥८०-८६॥ अनुभाष्य- 'भ्रम' अर्थात् जो वस्तु जैसी नहीं है, उसके विषयमें मिथ्या ज्ञान करना; जैसे-रस्सीमें साँपका भ्रम होना अथवा सीपमें रजतका भ्रम होना। 'प्रमाद' अर्थात् असावधानी, एक बातकी किसी दूसरे प्रकारसे उपलब्धि करना, श्रवण करना या कहना। विप्रलिप्सा अर्थात् धोखा देनेकी इच्छा। करणापाटव अर्थात् इन्द्रियोंकी असम्पूर्णता; जैसे आँखोंसे दूरकी वस्तु अथवा बहुत छोटी वस्तुको ना देख पाना, पीलिया आदि रोग होनेपर किसी वस्तुके रंग या रूपमें उलट-फेर देखना और कानोंसे बहुत दूरसे आ रही ध्वनिको नहीं सुन पाना॥८६॥ विरुद्धार्थ कह तुमि, कहिते कर रोष। तोमार अर्थे अविमृष्टविधेयांश-दोष ॥८७॥ अनुवाद-(ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास अन्यथा तर्क करनेवालोंसे कह रहे हैं)—तुम श्लोकका विपरीत अर्थ कह रहे हो और ऐसा कहकसने पर तुम क्रोध भी कर रहे हो, जबकि तुम्हारे अर्थमें 'अविमृष्टविधेयांश' दोष है॥८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अनुवाद ना कहकर विधेय पहले कहनेसे जो दोष होता है, उसे 'अविमृष्ट-विधेयांशदोष' कहते हैं। अविमृष्टका अर्थ है-अविचारित अर्थात् बिना विचार किये ॥८७॥ अनुभाष्य-'अविमृष्ट-विधेयांश'-विधेयांश अर्थात् अज्ञात वस्तु जहाँपर मुख्यरूपमें निर्दिष्ट नहीं हो, वहाँ अविमृष्ट-विधेयांश दोष होता है। इसे 'विधेयाविमर्श' भी कहते हैं॥८७॥ 'स्वयं भगवान्' शब्दका अर्थ और संज्ञा :- याँर भगवत्ता हैते अन्येर भगवत्ता। 'स्वयं भगवान्'-शब्देर ताहातेइ सत्ता॥८८॥ अनुवाद-जिनकी भगवत्तासे दूसरोंकी भगवत्ता साधित होती है, वे ही 'स्वयं-भगवान्' नामसे कहलाने योग्य हैं॥८८॥ अवतारी और अवतारका दृष्टान्त :- दीप हैते यैछे बहु दीपेर ज्वलन। मूल एक दीप ताहा करिये गणन ॥८९॥ तैछे सब अवतारेर कृष्ण से कारण। आर एक श्लोक शुन, कुव्याख्या-खण्डन॥९०॥ अनुवाद-जिस प्रकार एक दीपकसे बहुत सारे दीपोंको प्रज्वलित किया जाय, किन्तु उस एक ही दीपककी मूल दीपकके रूपमें गणना की जाती है। उसी प्रकार सभी अवतारोंका मूल दूसरा अध्याय | ७३