श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
२/८०-९० ] यदि नारायण अंशी और कृष्ण उनके अंश होते, तो सूत गोस्वामीका वाक्य विपरीत होता। अर्थात् “स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं” इस प्रकार विपरीत अर्थ होता; किन्तु आर्ष अर्थात् ऋषिके द्वारा कहे गये विज्ञवाक्योंमें भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटव, ये चार प्रकारके दोष नहीं रहनेके कारण उन्होंने 'कृष्णस्तु भगवान् स्वयं' ही कहा है। भ्रम-मिथ्याज्ञान; प्रमाद-अनवधानता (असावधानी); विप्रलिप्सा-चित्तका अन्यत्र विक्षेप; करणापाटव-इन्द्रियोंकी अपटुता ॥८०-८६॥ अनुभाष्य- 'भ्रम' अर्थात् जो वस्तु जैसी नहीं है, उसके विषयमें मिथ्या ज्ञान करना; जैसे-रस्सीमें साँपका भ्रम होना अथवा सीपमें रजतका भ्रम होना। 'प्रमाद' अर्थात् असावधानी, एक बातकी किसी दूसरे प्रकारसे उपलब्धि करना, श्रवण करना या कहना। विप्रलिप्सा अर्थात् धोखा देनेकी इच्छा। करणापाटव अर्थात् इन्द्रियोंकी असम्पूर्णता; जैसे आँखोंसे दूरकी वस्तु अथवा बहुत छोटी वस्तुको ना देख पाना, पीलिया आदि रोग होनेपर किसी वस्तुके रंग या रूपमें उलट-फेर देखना और कानोंसे बहुत दूरसे आ रही ध्वनिको नहीं सुन पाना॥८६॥ विरुद्धार्थ कह तुमि, कहिते कर रोष। तोमार अर्थे अविमृष्टविधेयांश-दोष ॥८७॥ अनुवाद-(ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास अन्यथा तर्क करनेवालोंसे कह रहे हैं)—तुम श्लोकका विपरीत अर्थ कह रहे हो और ऐसा कहकसने पर तुम क्रोध भी कर रहे हो, जबकि तुम्हारे अर्थमें 'अविमृष्टविधेयांश' दोष है॥८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अनुवाद ना कहकर विधेय पहले कहनेसे जो दोष होता है, उसे 'अविमृष्ट-विधेयांशदोष' कहते हैं। अविमृष्टका अर्थ है-अविचारित अर्थात् बिना विचार किये ॥८७॥ अनुभाष्य-'अविमृष्ट-विधेयांश'-विधेयांश अर्थात् अज्ञात वस्तु जहाँपर मुख्यरूपमें निर्दिष्ट नहीं हो, वहाँ अविमृष्ट-विधेयांश दोष होता है। इसे 'विधेयाविमर्श' भी कहते हैं॥८७॥ 'स्वयं भगवान्' शब्दका अर्थ और संज्ञा :- याँर भगवत्ता हैते अन्येर भगवत्ता। 'स्वयं भगवान्'-शब्देर ताहातेइ सत्ता॥८८॥ अनुवाद-जिनकी भगवत्तासे दूसरोंकी भगवत्ता साधित होती है, वे ही 'स्वयं-भगवान्' नामसे कहलाने योग्य हैं॥८८॥ अवतारी और अवतारका दृष्टान्त :- दीप हैते यैछे बहु दीपेर ज्वलन। मूल एक दीप ताहा करिये गणन ॥८९॥ तैछे सब अवतारेर कृष्ण से कारण। आर एक श्लोक शुन, कुव्याख्या-खण्डन॥९०॥ अनुवाद-जिस प्रकार एक दीपकसे बहुत सारे दीपोंको प्रज्वलित किया जाय, किन्तु उस एक ही दीपककी मूल दीपकके रूपमें गणना की जाती है। उसी प्रकार सभी अवतारोंका मूल दूसरा अध्याय | ७३
कारण श्रीकृष्ण हैं। इसकी विपरीत व्याख्याका खण्डन करनेके लिये एक और श्लोक श्रवण करो॥८९-९०॥ अनुभाष्य—ब्रह्मसंहिता पाँचवाँ अध्याय, श्लोक संख्या ४६— “दीपाच्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्य, दीपायते विवृतहेतुसमानधर्मा। यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति, गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥” विष्णुतत्त्व सर्वत्र ही दीपककी भाँति आलोकमय और मूल-नारायणके समानधर्मा हैं। वैसा होनेपर भी वे सब मूल दीपकसे ही प्रकाशमान हैं। विष्णुतत्त्व जिस प्रकार श्रीगोविन्दके साथ ज्योतिरूप (प्रकाशमान) अंशमें समान हैं, ब्रह्मा और शम्भुतत्त्व गुणावतार होनेपर उस प्रकार नहीं हैं। श्रील श्रीजीवगोस्वामी कहते हैं,— “शम्भोस्तु तमोऽधिष्ठानात् कज्जलमयसूक्ष्मदीप-शिखास्थानीयस्य न तथा साम्यम्।” अर्थात् “श्रीशम्भु तमोगुणका अधिष्ठान होनेके कारण वे विष्णुरूप दीपककी काजलमय सूक्ष्म शिखाके समान हैं, उक्त दीपकसे उनका साम्य नहीं हैं।”॥८९॥ (घ) पुराण-लक्षण विचारसे भी नारायणके बदले श्रीकृष्णका मूलाश्रयत्व :— श्रीमद्भागवत (२/१०/१-२)— अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः। मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः॥९१॥ दशमस्य विशुद्धयर्थं नवानामिह लक्षणम्। वर्णयन्ति महात्मानः श्रुतेनार्थेन चाञ्जसा॥९२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९१-९२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस श्रीमद्भागवत शास्त्रमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, ऊति, पोषण, मन्वन्तर, ईशकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय—इन दस विषयोंका वर्णन हुआ है। दशमतत्त्व जो आश्रयतत्त्व है, उसकी विशुद्ध आलोचनाके लिये पूर्व नौ लक्षणोंको महात्माओंने किसी-किसी स्थानमें स्तुति और आख्यानके (युक्तिपूर्ण कहानीके) छलसे एवं किसी स्थानमें साक्षात् विचारके द्वारा वर्णन किया है॥९१-९२॥ अनुभाष्य—विराट् पुरुषसे किस प्रकार राजस-सृष्टिसमूह उदित हुए, परीक्षित महाराजके इस प्रश्नके उत्तरमें शुकदेवजीने चतुःश्लोकीकी व्याख्याके प्रारम्भमें यह श्लोक कहा— अत्र (श्रीमद्भागवते) सर्गः (भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म), विसर्गः (ब्रह्मणो गुणवैषम्यं), स्थानं (भगवतः विजयः सृष्टानां तत्तन्मर्यादापालनेन उत्कर्षः स्थितिः), पोषणं (स्वभक्तेषु तस्य अनुग्रहः), ऊतयः (कर्मवासनाः), मन्वन्तरेशानुकथाः (मन्वन्तराणि सात्त्विकधर्माणि, ईशानुकथाः हरेः अवतारकथाः), निरोधः (अस्यांनुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः) मुक्तिः (शुद्धावस्थितिः), आश्रयः (जन्मस्थितिलयकारणं परब्रह्म परमात्मा) [इति दश अर्थाः]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीमद्भागवतमें सर्ग (पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, एकादश इन्द्रियाँ, बुद्धि आदिकी उत्पत्ति), विसर्ग (ब्रह्माके द्वारा गुणोंकी विषमता), स्थान (भगवान्की सृष्टि-संहार आदि कार्यरूप मर्यादा पालन करनेवाले ब्रह्मा-शिवादि देवताओंपर विजय अर्थात् उनसे ऊँची स्थिति), पोषण (निजभक्तोंपर कृपा), ऊति (कर्मवासना), मन्वन्तर (सात्त्विक जीवोंके द्वारा आचरणीय धर्म), ईशानुकथा (भगवान् श्रीहरिके अवतारोंकी कथा), निरोध (अपनी शक्तियोंके
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साथ श्रीहरिकी योगनिद्रा), मुक्ति (मायाके संसर्गसे परे जीवकी अपने स्वरूपमें स्थिति), आश्रय (सृष्टिके जन्म, पालन और संहारके मूल कारण परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण); ये दस लक्षण हैं। क. सर्ग—पञ्चमहाभूत, पञ्च तन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, मन, महत्तत्त्व और अहङ्कार, इन सबकी विराट्-रूपसे एवं स्वरूपसे जो उत्पत्ति। ख. विसर्ग—ब्रह्माके द्वारा चर-अचर सृष्टि। ग. स्थिति—भगवान्की विजय अर्थात् सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माजी और संहारकारी शिवजीसे उत्कर्ष। घ. पोषण—अपने भक्तोंके प्रति भगवान्का अनुग्रह। ङ. ऊति—कर्मवासना। च. मन्वन्तर—सात्त्विक जीवोंके द्वारा आचरणीय धर्म। छ. ईशकथा—श्रीहरिके अवतारोंकी कथा और भागवतों (भक्तों) की कथा। ज. निरोध—श्रीहरिकी योगनिद्रा समयमें उनका अपनी उपाधियों और शक्तियोंके साथ शयन। झ. मुक्ति—स्थूल और सूक्ष्म देह त्यागकर जीवकी शुद्धस्वरूपमें अथवा पार्षदरूपमें अवस्थिति। ञ. आश्रय—जिनसे सृष्टि होती है और जिनमें ही लय होती है तथा जिनसे विश्व प्रकाशित होता है, वही प्रसिद्ध परब्रह्म और परमात्मा ॥९१॥ महात्मनः (विदुरादयः) इह (श्रीमद्भागवते पुराणे) दशमस्य (आश्रयस्य) विशुद्धयर्थं (तत्त्वज्ञानार्थं) नवानां लक्षणं (स्वरूपं) श्रुतेन (तद्वाचकशब्देन) अञ्जसा (साक्षात्) अर्थेन (तात्पर्येण) वर्णयन्ति। श्लोक-भावानुवाद—विदुरादि महात्माओंने इस श्रीमद्भागवत पुराणमें दशम लक्षण अर्थात् आश्रयके तत्त्वज्ञानके लिये अन्य नौ लक्षणोंका (कहीं) श्रुतियोंके वर्णनानुसार व्यतिरेक भावसे और (कहीं) साक्षात् अर्थके द्वारा वर्णन किया है॥९२॥ आश्रय जानिते कहि ए नव पदार्थ। ए नवेर उत्पत्ति-हेतु सेइ आश्रयार्थ ॥ ९३ ॥ कृष्ण एक सर्वाश्रय, कृष्ण सर्वधाम। कृष्णेर शरीरे सर्व-विश्वेर विश्राम ॥ ९४ ॥ अनुवाद—आश्रय तत्त्वको जाननेके लिये इन नौ पदार्थोंका वर्णन किया गया है और इन नौ पदार्थोंकी उत्पत्तिका कारण होनेसे उसे आश्रय कहते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही सभीके एकमात्र आश्रय तथा आधार स्वरूप हैं। श्रीकृष्णका शरीर ही सम्पूर्ण विश्वका विश्राम स्थल है॥९३-९४॥ श्रीमद्भागवत १०/१/१ श्लोककी भावार्थ-दीपिकामें— दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रयविग्रहम्। श्रीकृष्णाख्यं परं धाम जगद्धाम नमामि तत् ॥९५॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण नामक दशम पदार्थ ही भागवतके दशम स्कन्धका लक्ष्य हैं, वे आश्रितोंके दूसरा अध्याय | ७५
[ २/९५-९६ आश्रयविग्रह स्वरूप हैं, परमधाम और जगत्के आधार स्वरूप हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-दशमस्कन्धमें आश्रितजनोंके आश्रय-विग्रहस्वरूप श्रीकृष्णको लक्षित किया गया है। उन्हीं श्रीकृष्ण नामक परमधाम और जगद्धामको मैं नमस्कार करता हूँ। तात्पर्य यह है कि जगत्में आश्रय और आश्रित नामक दो प्रकारके तत्त्व हैं। जिसको आश्रय करके समस्त आश्रिततत्त्व विद्यमान हैं, वही मूलतत्त्व ही आश्रय है। उसी तत्त्वका आश्रय करके जो सभी तत्त्व हैं, वे सभी आश्रित-तत्त्व हैं। सर्गसे मुक्ति तक (प्रथम नौ पदार्थ) समस्त आश्रित-तत्त्व हैं, इसलिये पुरुषावतार और उनके अनुगत सभी अवतार, समस्त शक्तियाँ और उनके अनुगत जीव और जड़ जगत्, सभी उन्हीं श्रीकृष्णरूप आश्रयके आश्रित हैं। भागवतमें स्तव और उपाख्यानके छलसे कुछ गौणरूपमें और साक्षात् उपदेशके रूपमें स्पष्टरूपसे आश्रयतत्त्वका ही विचार किया गया है। इसलिये श्रीकृष्णके स्वरूपका और उनकी तीनों शक्तियोंका ज्ञान नितान्त आवश्यक है॥९५॥ अनुभाष्य-दशमे (श्रीमद्भागवत-दशमस्कन्धे) आश्रिताश्रयविग्रहं (आश्रितानां प्रपन्नानां आश्रयविग्रहं) दशमम् (आश्रयतत्त्वं) लक्ष्यम्। तत् परं धाम (श्रेष्ठाश्रयं) जगद्धाम (सर्वाश्रयं) श्रीकृष्णाख्यं नमामि। श्लोक-भावानुवाद-श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धमें शरणागतोंके आश्रयविग्रह आश्रयतत्त्वको लक्ष्य किया गया है। उस श्रेष्ठ आश्रय और जगद्धाम (सभीके आश्रय) श्रीकृष्णको प्रणाम करता हूँ॥९५॥ कृष्णज्ञानकी मूलकथा :- कृष्णेर स्वरूप, आर शक्तित्रय ज्ञान। याँर हय, ताँर नाहि कृष्णेते अज्ञान॥ ९६॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके स्वरूप और उनकी तीनों शक्तियोंका ज्ञान जिनको हो जाता है, उनको श्रीकृष्णके विषयमें अज्ञान नहीं रहता है॥ ९६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'शक्तित्रय'-चित्शक्ति, जीवशक्ति और मायाशक्ति, ये तीन शक्तियाँ हैं॥ ९६॥ अनुभाष्य-श्रीजीवप्रभुकृत भगवत्सन्दर्भ अन्तर्गत संख्या १६ में- “एकमेव तत् परमतत्त्वं स्वाभाविकाचिन्त्यशक्त्या सदैव स्वरूप-तद्रूप-वैभव-जीव-प्रधानरूपेण चतुर्द्धावतिष्ठते- सूर्यान्तर्मण्डलस्थतेज इव मण्डल-तद्बहिर्गतरश्मि-तत्प्रतिच्छविरूपेण। दुर्घटघटकत्वं ह्यचिन्त्यत्वम्। शक्तिश्च सा त्रिधा-अन्तरङ्गा, तटस्था, बहिरङ्गा च। तत्रान्तरङ्गया स्वरूपशक्त्याख्यया सूर्यातन्मण्डलस्थानीय-पूर्णेनैव स्वरूपेण वैकुण्ठादिस्वरूपवैभवरूपेण च तद्वतिष्ठते, तटस्थया रश्मिस्थानीय-चिदेकात्मशुद्ध-जीवरूपेण, बहिरङ्गया मायाख्यया प्रतिच्छविगत-वर्णशावल्यस्थानीय-तदीयबहिरङ्गवैभवजड़ात्म-प्रधान रूपेण चेति चतुर्द्धातित्वम्। अतएव तदात्मकत्वेन जीवस्यैव तटस्थशक्तित्वं प्रधानस्य च मायान्तर्भूतत्वमभिप्रेत्य शक्तित्रयं विष्णुपुराणे गणितम्। अविद्या कर्म कार्य यस्याः सा तत्संज्ञा मायेत्यर्थः। यद्यपीयं बहिरङ्गा, तथाप्यस्यास्तटस्थशक्तिमयमपि जीवमावरितुं सामर्थ्यमस्तीति। तारतम्येन तत्कृतावरणस्य ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु देहेषु लघुगुरुभावेन वर्त्तते। ययैव अचिन्त्यमायया चिद्रूपातानिविकारतादि-गुणरहितस्य प्रधानस्य जड़त्वं विकारित्वञ्चेति ज्ञेयम्। अत्रान्तरङ्गत्व-तटस्थत्व-बहिरङ्गत्वादीनां तेषामेकात्मकानां तत्तत्साम्यं, न तु सर्वात्मनेति तत्तत्स्थानित्यत्वमेवोक्तं, न तु तत्तद्रूपत्वम्। ततस्तत्तद्दोषा अपि नावकाशं लभन्ते।” ७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/९६-१०० ] अर्थात् “वही एकमात्र परमतत्त्व अपनी स्वाभाविक, मनुष्यकी बुद्धिसे परे अचिन्त्य-शक्तिबलसे स्वरूप, तद्रूपवैभव, जीव और प्रधान, इन चार रूपोंमें सर्वदा अवस्थान करते हैं। उदाहरणके लिये उस परमतत्त्वकी सूर्यसे समानता दिखलायी है। जैसे सूर्यदेव (व्यक्ति), अन्तर्मण्डलमें स्थित तेजके समान सूर्यमण्डल, मण्डलसे निकलती किरणें और दूर स्थानपर सूर्यकी प्रतिच्छवि, इन चार रूपोंमें सूर्यकी प्रतीति होती है, वैसी ही उस परमतत्त्वकी उपरोक्त चार रूपोंमें प्रतीति होती है। असम्भवको सम्भव बनाना ही अचिन्त्य शक्तिका प्रभाव है। परमतत्त्वकी शक्तियाँ तीन प्रकारकी हैं—अन्तरङ्गा, तटस्था और बहिरङ्गा। इनमेंसे अन्तरङ्गा स्वरूप-शक्तिके प्रभावसे पूर्णस्वरूप-विग्रह और वैकुण्ठ-गोलोकादि स्वरूप-वैभव (सूर्यके उदाहरणमें जैसे सूर्यदेव और सूर्यमण्डल); तटस्थाशक्तिके प्रभावसे वे किरणरूप चिन्मयशुद्ध-जीव विग्रह और बहिरङ्गा मायाशक्तिके प्रभावसे वैकुण्ठकी प्रतिच्छविरूपमें जड़प्रधान बहिरङ्गवैभव (असंख्य ब्रह्माण्डों) को प्रकाश करते हैं। इस प्रकार वे परमतत्त्व अपनी तीन शक्तियोंके द्वारा स्वयंको इन चार रूपोंमें प्रकाशित करते हैं। इसलिये परमतत्त्वकी स्वयंकी शक्ति होनेपर भी जीवको तटस्था-शक्तिका प्रकाश और प्रधानको मायाके अन्तर्भुक्त गणना करके विष्णु-पुराणमें तीन प्रकारकी शक्तियोंका वर्णन है। जो अविद्याका विस्तार करती है, उसीका नाम ही माया है। यद्यपि यह शक्ति बहिरङ्गा है, तो भी तटस्थ-शक्तिमय जीवको आवरण करनेकी क्षमता उसमें निहित की गयी है। मायाके द्वारा आवृत होकर जीव पत्थर-वृक्षादि (अचल वस्तुएँ जिनमें चेतनता लगभग पूर्णरूपसे ढकी होती है) से लेकर ब्रह्मा (जिनमें चेतनताका परम विकास है) तक सभी देहोंमें विद्यमान हैं। चिद्रूपत्व और विकार-रहितादि गुणरहित प्रधानका जड़त्व और विकार-विशिष्टता उस अचिन्त्य-मायाके द्वारा ही घटित होती है, ऐसा जानना होगा। एक ही परमतत्त्वकी शक्ति होनेके कारण अन्तरङ्गा, तटस्था और बहिरङ्गा शक्तियोंमें समानता रहनेपर भी वे सम्पूर्णरूपमें परस्पर समान नहीं हैं, अर्थात् उनकी क्रियाएँ भिन्न-भिन्न हैं। इसलिये तटस्था शक्तिसे प्रकटित जीवमें और बहिरङ्गा शक्तिसे प्रकटित जड़ जगत्में जो दोष हैं, उनका अन्तरङ्गा शक्तिसे प्रकाशित चिन्मय जगत्में होनेकी सम्भावना नहीं है। इसी प्रकार बहिरङ्गाके दोष तटस्थामें तथा तटस्थाके दोष बहिरङ्गामें नहीं हो सकते॥”९६॥ श्रीकृष्णके छह प्रकारके विलास; (१) दो प्रकारके प्रकाश :- कृष्णेर स्वरूपेर हय षड्विध विलास। प्राभव-वैभव-रूपे द्विविध प्रकाश॥९७॥ (२) दो प्रकारके अवतार, (३) दो प्रकारके वयस धर्म :- अंश-शक्त्यावेशरूपे द्विविधावतार। बाल्य-पौगण्ड-धर्म दुइ त' प्रकार॥९८॥ किशोरस्वरूप कृष्ण स्वयं अवतारी। क्रीड़ा करे एइ छय-रूपे विश्व भरि' ॥९९॥ विलासमें लीलाभेद होनेपर भी तत्त्वतः अभेद :- एइ छय-रूपे हय अनन्त विभेद। अनन्तरूपे एकरूप, नाहि किछु भेद॥१००॥ दूसरा अध्याय | ७७
[ २/९७-१०३ अनुवाद-स्वयंरूपके अतिरिक्त श्रीकृष्ण अन्यान्य छह प्रकारके रूपोंमें विलास करते हैं। दो प्रकारके प्रकाश-प्राभव और वैभव रूपसे, दो प्रकारके अवतार-अंशावतार और शक्त्यावेशावतार रूपसे और बाल्य-धर्मयुक्त एवं पौगण्ड-धर्मयुक्त विग्रहसे, इन छह रूपोंमें वे विश्वभरमें लीलाएँ करते हैं। किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण ही स्वयं अवतारी हैं। इन छह रूपोंके अन्तर्गत अनन्त विभेद हैं, किन्तु इन अनन्तरूपोंमें लीला करते हुए श्रीकृष्ण एक ही रूप हैं। श्रीकृष्णसे इनका कुछ भी भेद नहीं है॥९७-१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी हरिके समान ही सच्चिदानन्दमयमूर्ति है, परन्तु स्थिति परावस्थासे किञ्चिन्मात्र कम है, उनको प्राभव और वैभव प्रकाश कहा जाता है। शक्तिके तारतम्यके अनुसार जिनमें प्रभुताकी प्रधानता है, उनको 'प्राभव' और जिनमें विभुताकी प्रधानता है, उनको 'वैभव' कहा जाता है। प्राभव प्रकाश दो प्रकारके हैं-एक जो चिरस्थायी नहीं हैं, जैसे मोहिनी-हंस-शुक्लादि अचिरस्थायी अवतार हैं, जो युगके अनुसार अवतरित होते हैं। दूसरे प्रकारके प्राभव प्रकाशकी कीर्तिका अधिक विस्तार नहीं होता है, जैसे धन्वन्तरी, ऋषभ, व्यास, दत्तात्रेय, कपिलादि। कूर्म, मत्स्य, नर-नारायण, वराह, हयग्रीव, पृश्निगर्भ, बलदेव और चौदह मन्वन्तरावतार (यज्ञ, विभु, सत्यसेन, हरि, वैकुण्ठ, अजित, वामन, सार्वभौम, ऋषभ, विष्वक्सेन, धर्मसेतु, सुधामा, योगेश्वर और वृहद्भानु), ये वैभवावतार हैं। अंशावेश और शक्त्यावेश-अवतारोंकी व्याख्या दूसरे स्थानपर हुई है। इनकी भी प्राभव-वैभवके मध्य गिनती होती है। साथ-ही-साथ गुणावतारोंकी भी ऐसी ही स्थिति है। नित्य किशोरस्वरूप श्रीकृष्णकी बाल्य और पौगण्ड अवस्थाकी दो प्रकारकी लीलाएँ हैं। इसलिये किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण ही स्वयं अवतारी हैं। किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण इन छह प्रकारके स्वरूप विलाससे विश्वभरमें लीला करते हैं। इन छह रूपोंके अनन्त विभेद हैं, परन्तु अनन्त होकर भी श्रीकृष्ण एक ही अखण्ड तत्त्व हैं॥९७-१००॥ चित्-शक्ति और उसका वैभव :- चिच्छक्ति, स्वरूपशक्ति, अन्तरङ्गा नाम। ताहार वैभव अनन्त वैकुण्ठादि धाम॥१०१॥ मायाशक्ति और उसका वैभव :- मायाशक्ति बहिरङ्गा जगत्कारण। ताहार वैभव अनन्त ब्रह्माण्डेर गण॥१०२॥ जीवशक्ति :- जीवशक्ति तटस्थाख्य, नाहि यार अन्त। मुख्य तिनशक्ति, तार विभेद अनन्त॥१०३॥ अनुवाद-चित्शक्तिको स्वरूपशक्ति और अन्तरङ्गा शक्ति भी कहा जाता है, अनन्त वैकुण्ठादि धाम उसके वैभव स्वरूप हैं। मायाशक्तिको बहिरङ्गा कहा जाता है और वह जगत्का कारण है तथा उसका वैभव ये अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। जीवशक्तिका नाम तटस्थाशक्ति भी है, जिसका कोई अन्त नहीं है अर्थात् जीव अनन्त हैं। श्रीकृष्णकी ये तीन मुख्य शक्तियाँ हैं और इनके अनन्त विभेद हैं॥१०१-१०३॥ ७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/१०१-१०३ ] अमृतप्रवाह भाष्य—‘चिच्छक्ति’—स्वरूपशक्तिका एक दूसरा नाम अन्तरङ्गा शक्ति भी है, उससे ही वैकुण्ठादि धाममें अनन्त वैभव प्रकाश होते हैं। तटस्थाशक्ति नामक जीवशक्तिसे बद्ध और मुक्त अनन्त जीव प्रकाशित होते हैं। बहिरङ्गा अर्थात् मायाशक्तिसे प्राकृत ब्रह्माण्डोंका अनन्त वैभव है॥१०१-१०३॥ अनुभाष्य—श्वेताश्वतर उपनिषद्के अन्तर्गत छठे अध्यायका अष्टम मन्त्र— “न तस्य कार्यं करणञ्च विद्यते, न तत् समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्यशक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।” अर्थात् “उन परमेश्वरकी प्राकृत इन्द्रियाँ आदि नहीं हैं, इसलिये उनके इन्द्रियादि साध्य कार्य भी नहीं हैं। उनके समान अथवा उनसे बड़ी कोई वस्तु नहीं है। उनकी पराशक्ति स्वाभाविकी है और उसके ज्ञान (चित्), बल (सत्) एवं क्रिया (आनन्द)—तीन भेद हैं॥”१०३॥ अमृताणुकणिका—श्रीकृष्णकी एक परा (स्वरूप) शक्ति है, वह अनन्त रूपोंमें प्रकाशित है। उनमेंसे तीन शक्तियाँ प्रधान हैं—चित्-शक्ति, जीव-शक्ति और माया-शक्ति। उनको क्रमशः अन्तरङ्गा, तटस्था और बहिरङ्गा शक्ति भी कहते हैं। स्वरूपशक्ति एक होनेपर भी उक्त तीन रूपोंमें कार्य करती है। स्वरूपशक्तिके जो सब नित्य लक्षण हैं, वे चित्-शक्तिमें पूर्ण रूपमें, जीव-शक्तिमें अणु रूपमें तथा माया-शक्तिमें विकृत रूपमें प्रकाशित हैं। ‘चित्-शक्ति’—चित्-शक्तिका वैभव अनन्त वैकुण्ठ लोक हैं। स्वरूपशक्तिकी तीन प्रकारकी वृत्तियाँ हैं—सन्धिनी, संवित् और ह्लादिनी। सत्-अंशकी अधिष्ठात्री शक्तिका नाम सन्धिनी है; सन्धिनी शक्तिके द्वारा भगवान् अपनी सत्ताकी रक्षा करते हैं। सन्धिनी-शक्तिके सारांशका नाम शुद्धसत्त्व है। समस्त भगवद्धाम, उसमें स्थित भगवान्का श्रीमन्दिर, शय्या, आसनादि और पिता-माता आदि परिकरवर्ग—ये समस्त ही सन्धिनी-प्रधान शुद्धसत्त्वकी परिणति हैं। चित्-अंशकी अधिष्ठात्री शक्तिका नाम संवित् है, संवित्-शक्तिके द्वारा भगवान् स्वयंको जानते हैं और अन्योंको जनाते हैं। आनन्द-अंशकी अधिष्ठात्री शक्तिका नाम ह्लादिनी है; ह्लादिनी-शक्तिके द्वारा भगवान् स्वयं आनन्दका अनुभव करते हैं और भक्तोंको आनन्दका अनुभव कराते हैं। वैकुण्ठके सर्वोपरि लोक निर्मल वृन्दावन धाममें स्वेच्छामय व्रजरस विलासी श्रीकृष्ण नित्य-रससमुद्रमें निमग्न रहते हैं। संवित्-वृत्तिके द्वारा प्रकटित भिन्न-भिन्न भावोंसे युक्त होकर प्रणय-रसका आस्वादन करते हैं। वंशी बजाकर उससे गोपियोंको आकर्षण, गोचारण और रास आदि लीलाएँ—ये सब क्रियाएँ श्रीकृष्ण अपनी पराशक्तिकी संवित्-वृत्तिके द्वारा सम्पादित करते हैं। श्रीकृष्ण ह्लादिनीके प्रणय विकारमें सदा अनुरक्त रहते हैं। ‘बहिरङ्गा मायाशक्ति’—कारण-समुद्रके एक ओर चिन्मय भगवद्धाम है और दूसरी ओर जड़मायाका स्थान है। माया सदा ही भगवद्धाम और भगवान्से बाहर अवस्थान करती है, इसलिये यह बहिरङ्गा शक्ति है। भगवान्की स्वरूपानुबन्धिनी लीलामें भी मायाका कोई स्थान नहीं है। यहाँ तक कि भगवान् जब प्रपञ्चमें अवतीर्ण होते हैं, तो भी मायाके साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। भगवान्की स्वरूपशक्तिके अचिन्त्य प्रभावसे माया उनकी शक्ति होनेपर भी भगवान्का स्पर्श भी नहीं कर सकती। मायाकी दो प्रकारकी वृत्तियाँ हैं—प्रधान (गुणमाया) और प्रकृति (जीवमाया)। दूसरा अध्याय | ७९
[ २/१०१-१०३ सत्त्व, रजः और तमः—इन तीन गुणोंकी साम्यावस्था प्रकृतिको गुणमाया कहते हैं; गुणोंकी साम्यावस्थामें सृष्टि आदि कोई कार्य नहीं होता है। जड़प्रकृतिमें स्वयं कोई क्रिया करनेकी शक्ति नहीं है। ईश्वरशक्तिका उसमें सञ्चार होनेपर ही वह जगत्का सृजन करती है। कारणोदशायी विष्णु जब सृष्टि करनेकी इच्छासे गुणमायापर दृष्टिपातकर उसमें शक्ति सञ्चारित करते हैं, तब गुणोंमें क्षोभ होनेसे गुणमाया महत्तत्त्वादि चौबीस तत्त्वोंके द्वारा अनन्त ब्रह्माण्डोंको प्रकट करती है। अन्यथा भगवत्-शक्तिके अभावमें वह सृष्टि कार्यका सम्पादन नहीं कर सकती। प्राकृत जगत्का मुख्य निमित्त-कारण और मुख्य उपादान-कारण ईश्वर होनेपर भी माया ही गौण निमित्त-कारण और गौण उपादान-कारण है। जीवमायाकी दो प्रकारकी शक्तियाँ हैं—आवरणात्मिका और विक्षेपात्मिका। जिस शक्तिके द्वारा जीवमाया बहिर्मुख जीवके (नित्य कृष्णदास) स्वरूपको आवृत करती है, उसे आवरणात्मिका शक्ति कहते हैं। और जिस शक्तिके द्वारा जीवमाया मायिक वस्तुमें बहिर्मुख जीवके अभिनिवेशको उत्पन्न करती है, उसे विक्षेपात्मिका शक्ति कहते हैं। अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड बहिरङ्गा मायाशक्तिका वैभव हैं; बहिरङ्गा मायाशक्ति शक्तिमान् श्रीकृष्णके ही आश्रित है, इसलिये मायाशक्तिके वैभवरूप ब्रह्माण्ड समूह भी श्रीकृष्णके आश्रित और श्रीकृष्ण उनका आश्रय हैं—पयर संख्या १०२में यही व्यञ्जित हुआ है। मायाशक्तिमें ह्लादिनी-वृत्ति जड़ानन्दके रूपमें, संवित्-वृत्ति भौतिक-ज्ञानके रूपमें तथा सन्धिनीशक्ति सम्पूर्ण जड़ ब्रह्माण्डों तथा जीवोंके जड़ शरीरोंके रूपमें प्रकाशित हैं। ‘जीव-शक्ति’—अनन्त कोटि जीव भगवान्की जिस शक्तिका वैभव हैं, उसे जीव-शक्ति कहते हैं। गीता (७/५)— “अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धिमे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥” अर्थात् “किन्तु, आठ भेदोंवाली यह जड़ा प्रकृति निकृष्टा है। इससे उत्कृष्ट जीवस्वरूपा मेरी एक और प्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है।” गीताके इस वाक्यके अनुसार जीव ईश्वरकी प्रकृति-विशेष है अर्थात् जीव ईश्वरकी शक्ति है। जलती हुई अग्निसे जैसे अनेकों क्षुद्र चिङ्गारियाँ उड़ती हैं, ठीक उसी प्रकार चित्-सूर्यस्वरूप श्रीहरिके किरण-कण स्थानीय चित्-परमाणु-स्वरूप अनन्त जीव हैं। श्रीहरिसे अभिन्न होते हुए भी ये जीव उनसे नित्य भिन्न हैं। ईश्वर और जीवमें नित्य भेद यह है कि ईश्वर मायाशक्ति अर्थात् प्रकृतिके अधीश्वर हैं और जीव मुक्त अवस्थामें भी अपने स्वभावके अनुसार माया-प्रकृतिके अधीन होने योग्य होता है। जीवशक्ति जड़शक्तिसे श्रेष्ठ चेतनामयी है, इसलिये यह बहिरङ्गा मायाशक्ति भी नहीं है और मायाशक्तिके अन्तर्भुक्त भी नहीं है। सूर्यकी किरण जिस प्रकार सूर्यके भीतर नहीं रहती, उसी प्रकार भगवान्की किरणकण-स्थानीय जीवशक्ति भी स्वरूपशक्तिके समान भगवान्में अवस्थान नहीं करती है। इसलिये जीवशक्ति स्वरूपशक्ति नहीं है और स्वरूपशक्तिके अन्तर्भुक्त भी नहीं है। जीवशक्तिको इस कारणसे तटस्था-शक्ति भी कहा गया है। ८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/१०१-१०७ ] जल और भूमिके बीचके स्थानको 'तट' कहा जाता है। परन्तु जलसे लगा हुआ स्थान ही भूमि है। फिर 'तट' कहाँ रहा? 'तट'-जल और भूमिके बीच दोनोंको विभक्त करनेवाली रेखा विशेष है। यह तट रेखा स्थूल नेत्रोंसे दिखायी नहीं पड़ती। चित्-जगत्को जल और मायिक जगत्को भूमि मान लेनेपर दोनोंको विभक्त करनेवाली सूक्ष्म रेखा ही 'तट' है। सन्धि स्थानपर जीवशक्तिकी स्थिति है। अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंमें अनन्त कोटि जीव और अप्राकृत भगवद्धाममें साधन-सिद्ध और नित्यसिद्ध जीव-सभी भगवान्की जीव-नामक तटस्था शक्तिका वैभव हैं, और जीवशक्ति शक्तिमान् श्रीकृष्णके आश्रित है, यह इस आधे पयार (संख्या १०३) में व्यञ्जित हुआ है॥१०१-१०३॥ स्वरूप एवं शक्तिवर्गोंका अवस्थान :- एइ त' स्वरूपगण, आर तिन शक्ति। सबार आश्रय कृष्ण, कृष्णे सबार स्थिति॥१०४॥ यद्यपि ब्रह्माण्डगणेर पुरुष आश्रय। सेइ पुरुषादि-सबार कृष्ण मूलाश्रय॥१०५॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण इन सभी स्वरूपों अर्थात् पूर्वोक्त छह प्रकारके विलास और इन तीनों शक्तियोंके आश्रय हैं तथा श्रीकृष्णमें ही सभीकी स्थिति है। यद्यपि तीन पुरुषावतार सभी ब्रह्माण्डोंके आश्रय हैं, किन्तु उनके भी मूल-आश्रय श्रीकृष्ण ही हैं॥१०४-१०५॥ श्रीकृष्णका परिचय :- स्वयं भगवान् कृष्ण, कृष्ण सर्वाश्रय। परम ईश्वर कृष्ण सर्वशास्त्रे कय॥१०६॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् और सभीके आश्रय हैं तथा सभी ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, यह बात सभी शास्त्रोंमें कही गयी है॥१०६॥ ब्रह्मसंहिता (५/१)- ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥१०७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं; वे स्वयं अनादि और सभीके आदि एवं समस्त कारणोंके कारण हैं॥१०७॥ अनुभाष्य-कृष्णः (व्रजेन्द्रनन्दनः) परमः ईश्वरः (बलदेव नारायण-वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध- कारणगर्भक्षीरार्णवत्रयशायि-परमात्म-पुरुषावतार-मत्स्यकूर्मवराह-रामनृसिंहादि नैमित्तिकावतार-ब्रह्मा-शिवादि गुणावतार-निर्विशेष ब्रह्म-महेन्द्रादि-विभूत्यवताराणां सर्वेषां पतिः) सच्चिदानन्द-विग्रहः (सन्धिनी-सम्वित्-ह्लादिनी शक्तित्रय समन्वितः) अनादिः (आदिरहितः-'अहमेवासमेवाग्रे' इति पदवाच्यः) आदिः (सर्वेषां मूलरूपः) सर्वकारणकारणं (सर्वकारणानां कारणं मूलं) गोविन्दः। श्लोक-भावानुवाद-(व्रजेन्द्रनन्दन) श्रीकृष्ण (बलदेव, नारायण-वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध, दूसरा अध्याय | ८१
[ २/१०७-११४ कारणोदकशायी-गर्भोदकशायी-क्षीरोदकशायी-तीनों पुरुषावतार, मत्स्य-कूर्म-वराह-राम-नृसिंहादि नैमित्तिकावतार, ब्रह्मा-शिवादि गुणावतार, निर्विशेष ब्रह्म, महेन्द्रादि-विभूति अवतार आदि) सभीके ईश्वर हैं। वे सच्चिदानन्द-विग्रह (सन्धिनी, संवित् और ह्लादिनी इन शक्तियोंसे युक्त), अनादि (जैसे 'अहमेवासमेवाग्रे' श्लोकमें कहा गया है), आदि (सभीके मूलरूप) तथा सभी कारणोंके मूल कारण श्रीगोविन्द हैं॥१०७॥ ए सब सिद्धान्त तुमि जान भालमते। तबु पूर्वपक्ष कर आमा चालाइते॥१०८॥ अनुवाद—ये सब सिद्धान्त तुम अच्छी तरह जानते हो, तो भी मुझे वृथा उद्वेग देनेके लिये व्यर्थ तर्क कर रहे हो॥१०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चालाइते'—वृथा उद्वेग देनेके लिये॥१०८॥ श्रीचैतन्य ही स्वयं अवतारी श्रीकृष्ण :— सेइ कृष्ण अवतारी व्रजेन्द्रकुमार। आपने चैतन्यरूपे कैल अवतार॥१०९॥ अनुवाद—वे ही अवतारी व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णचन्द्र ही स्वयं चैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतरित हुए हैं॥१०९॥ अवतारी श्रीचैतन्यमें सभी अवतार अन्तर्भुक्त :— अतएव चैतन्य गोसाञि परतत्त्व-सीमा। ताँरे क्षीरोदशायी कहि, कि ताँर महिमा॥११०॥ अनुवाद—इसलिये चैतन्य महाप्रभु परतत्त्वकी चरम सीमा हैं। तब उनको क्षीरोदशायी विष्णु कहनेसे क्या उनकी वास्तविक महिमा प्रकाशित होती है?॥११०॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्यभागवत मध्य ६/९५- (महाप्रभुने कहा)— “शुतिया आछिनु मुइ क्षीरोदसागरे। निद्राभङ्ग हइल मोर नाड़ार हुङ्कारे॥” अर्थात् “मैं क्षीरोदसागरमें सो रहा था और इस ‘नाड़ा’ की हुङ्कारने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी॥”११०॥ उनको जिस किसी विष्णुनामसे सम्बोधित करना दोषयुक्त नहीं है :— सेइ त' भक्तेर वाक्य नहे व्यभिचारी। सकल सम्भवे ताँते, याते अवतारी॥१११॥ अवतारीर देहे सब अवतारेर स्थिति। केहो कोनमत कहे, येमन यार मति॥११२॥ कृष्णके कहये केह—नरनारायण। केहो कहे, कृष्ण हय साक्षात् वामन॥११३॥ केहो कहे, कृष्ण क्षीरोदशायी अवतार। असम्भव नहे, सत्य वचन सबार॥११४॥ ८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/११०-११७ ]
केहो कहे, परव्योमे नारायण-हरि। सकल सम्भवे कृष्णे, याते अवतारी॥११५॥ अनुवाद—जो इस प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभुको क्षीरोदशायी विष्णु कहते हैं, वे भी भक्त हैं, उनका इस प्रकारका वाक्य भी मिथ्या नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके लिये सब कुछ सम्भव है, क्योंकि वे स्वयं अवतारी हैं। सभी अवतार अवतारीके शरीरमें स्थित हैं, इसलिये जिसकी जैसी भावनाएँ हैं, वह वैसे ही कहता है। श्रीकृष्णको कोई नर-नारायण कहता है, तो कोई साक्षात् वामन कहता है। कोई यह भी कहता है कि श्रीकृष्ण क्षीरोदशायी विष्णुके अवतार हैं। यह सब असम्भव नहीं है और सभीके वचन सत्य हैं। कोई उनको वैकुण्ठके हरि या नारायण कहते हैं। वे अवतारी हैं, इसलिये उनके लिये सब कुछ सम्भव है॥१११-११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—किसी-किसी ग्रन्थमें श्रीचैतन्यमहाप्रभुका क्षीरोदशायी वैकुण्ठनाथ कहकर उल्लेख किया गया है। इसके द्वारा उनकी महिमा सम्पूर्णरूपसे वर्णित नहीं हुई है, किन्तु उन सब भक्तोंके वाक्य मिथ्या नहीं हैं; क्योंकि श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं अवतारी हैं, इसलिये सभी अवतार उनमें विद्यमान हैं॥११०-११२॥ अनुभाष्य—श्रीलघुभागवतामृतमें श्रीकृष्णके अवतारी रूपमें वर्णनके प्रसङ्गमें— “अतएव पुराणादौ केचिन्नरसखात्मताम्। महेन्द्रानुजतां केचित् केचित् क्षीराब्धिशायिताम्॥ सहस्रशीर्षतां केचित् केचित् वैकुण्ठनाथताम्। ब्रुयुः कृष्णस्य मुनयस्तत्तद्वृत्त्यनुगामिनः।” अर्थात् “इसलिये पुराणादिमें श्रीकृष्णको मुनियोंने अपने-अपने अधिकारके अनुसार किसीने नरसखा नारायण, तो किसीने उपेन्द्र, किसीने क्षीरोदशायी, किसीने सहस्रशीर्षा पुरुष अथवा किसीने वैकुण्ठनाथ कहकर कीर्तन किया है॥”११४॥ अमृतानुकणिका—अवतारी श्रीगौरसुन्दरमें सभी अवतार ही अन्तर्भुक्त हैं, इसलिये श्रीगौरसुन्दरको जिस किसी भी विष्णुके नामसे अभिहित करना दोषपूर्ण नहीं है। किन्तु यह कहकर जो वस्तुको (भगवान्को) अवस्तु या माया कहते हैं, उन समस्त अभक्त-सम्प्रदायके वाक्योंको मिथ्या ही मानना चाहिये। जैसे—श्रीगौरसुन्दर साधारण मनुष्य हैं, किंवा धर्मसंस्कारक जीव हैं अथवा पण्डित हैं, किंवा बहिरङ्गा मायाकी विभिन्न कल्पित मूर्तियों या जड़ीय नामोंके साथ श्रीगौराङ्गकी श्रीमूर्त्ति अथवा श्रीनाम समान है अर्थात् गौराङ्ग-मूर्ति या महामायाकी मूर्ति, गौराङ्गका नाम और मानवके द्वारा कल्पित काली-दुर्गा आदि नाम—सभी समान हैं; जो गौराङ्ग हैं, जड़जगत्में पूजिता काली-दुर्गा भी वही हैं, जो कोई भी एक मानवकी रुचिके अनुसार ग्रहण कर लें,—ये सब विचार जिनके भीतर हैं (अर्थात् उनके मोहन पर्देके भीतर निर्विशेषवादके अग्निकुण्ड छिपे हैं), उनके वचनोंको मिथ्या ही जानना होगा। इस प्रकार विचार तत्त्ववस्तु श्रीगौरसुन्दरके अन्वयभावसे समन्वित नहीं होता है॥१११-११५॥ वैध एवं रागानुग, सभी भक्तोंको ही भक्तिसिद्धान्त जानना नितान्त आवश्यक है :— सब श्रोतागणेर करि चरण वन्दन। ए सब सिद्धान्त शुन, करि' एक मन॥११६॥ सिद्धान्त बलिया चित्ते ना कर अलस। इहा हैते कृष्णे लागे सुदृढ़ मानस॥११७॥
दूसरा अध्याय | ८३
[ २/११६-११७
अनुवाद-मैं सभी श्रोताओंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ और उनसे यह निवेदन करता हूँ कि वे इन सब सिद्धान्तोंको ध्यानपूर्वक श्रवण करें। सिद्धान्त कहकर उसे सुनने और समझनेमें चित्तमें आलस्य मत लाओ, इन सब सिद्धान्तोंको जाननेसे ही श्रीकृष्णमें मन दृढ़तापूर्वक लगता है॥११६-११७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कोई-कोई भक्तिपिपासु व्यक्ति इन सब सिद्धान्तोंको भक्तिका अङ्ग ना कहकर इनमें प्रवेश करनेमें आलस्य दिखलाते हैं, किन्तु यह मङ्गलका विषय नहीं है। क्योंकि श्रीकृष्णसे सम्बन्धज्ञान जाननेपर उनके चरणकमलोंमें चित्त दृढ़रूपसे संलग्न होता है। इसलिये इस प्रकारके सत्-सिद्धान्त शुद्धभक्तिके मूल हैं॥११७॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये द्वितीय परिच्छेद। दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य-जातरुचि भक्तोंके आदर्शको देखकर अनेक लोग सोचते हैं कि हमें इनके समान सिद्धान्तके विषयमें प्रवेश करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकारके आलस्यसे अनेक लोग भजनके विषयमें अभावग्रस्त होकर श्रीकृष्ण-विमुखता संग्रह करते हैं और भक्ति-विरोधी जड़ीय भावोंको ही भक्ति समझकर अनर्थग्रस्त हो जाते हैं। जिनकी अभी भक्तिमें रुचि जाग्रत नहीं हुई है, ऐसे भक्तोंके लिये विचारप्रधान-मार्ग यद्यपि उपयोगी है, तथापि रुचि जाग्रत करनेके लिये उन लोगोंके लिये नवधा भक्तिका प्रथम अङ्ग 'श्रवण' विशेष आवश्यक है। श्रीकृष्णविषयक सिद्धान्त श्रवण नहीं करनेसे रुचिमें वृद्धि नहीं होती है। नवधा भक्तिके प्रारम्भमें ही कीर्त्तनके पूर्व ही 'श्रवण' की व्यवस्था है। श्रवण-कीर्त्तनरूपी जलसे सींचनेसे भक्तिलता सुष्ठु (सुन्दर) रूपसे बढ़ती है। ब्रह्माजीने श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए जिस श्लोक (भाः १०/१४/३) में ज्ञानके प्रयासको त्याग करनेवाले भक्तोंकी अवस्थाका वर्णन किया है, उसी श्लोकमें ही 'सन्मुखरितां भवदीयवार्त्तां श्रुतिगतां' अर्थात् सत् पुरुषोंके मुखसे श्रीकृष्णकथाको श्रवण करनेकी महिमा कही है। परमहंसोंके अमल-ज्ञानको प्रदान करनेवाले श्रीमद्भागवतके विचारोंके अनुसार पठन-श्रवणादि करनेसे ही जीवको महाभागवत बननेका अधिकार प्राप्त होता है। श्रीमन्महाप्रभुकी सनातन-शिक्षामें हम लोग सुनते हैं- "शास्त्रयुक्त्ये सुनिपुण दृढ़श्रद्धा याँर। उत्तम अधिकारी तिँह तारये संसार॥" अर्थात् “भक्तिशास्त्रोंमें निपुण और भक्तिके इतर मार्गको त्याग करनेवालेको उत्तम अधिकारी कहते हैं तथा वह संसारका उद्धार करनेमें सक्षम है।" श्रीरूपगोस्वामीपादने भी कहा है- “उत्साहान्निश्चयाद्धैर्यात् तत्त्कर्मप्रवर्त्तनात्। सङ्गत्त्यागात् सतोवृत्तेः षड्भिर्भक्तिः प्रसिद्ध्यति॥" अर्थात् “आलस्य त्याग करके भक्तिवर्द्धक नियमोंमें उत्साह रखना, शास्त्र एवं शास्त्रानुकूल श्रीगुरुदेवके वचनोंमें दृढ़ विश्वास रखना; अनेक विघ्न-बाधा आनेपर भी अथवा अभीष्ट-सिद्धिमें विलम्ब होनेपर भी भक्तिके साधनोंमें धैर्य रखना; श्रवण, कीर्त्तन आदि भक्तिके अङ्गोंका पालन तथा श्रीकृष्ण-प्रीतिके लिये अपने भोग-विलासका वर्जन करना; भक्तिविरोधी अवैध स्त्रीसङ्ग, स्त्री-सङ्गीका सङ्ग, मायावादी, निरीश्वरवादी और धर्मध्वजी लोगोंका सङ्ग छोड़ देना; भक्तजनोंका-सा सदाचार और उनकी जैसी वृत्ति ग्रहण करना-इन छः प्रकारके साधनोंसे भक्तिकी सिद्धि होती है।" स्वयंमें भक्त होनेका अभिमान रखनेवाले सिद्धान्तहीन लोग
८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
मूर्खतावशतः अनेक बार कृत्रिमरूपसे सात्त्विक-विकारोंका अभ्यासकर लोगोंकी दृष्टिमें वैष्णव-पदवीको हीन बनाते हैं। उनके इस प्रकार असत् अभ्यासकी निन्दास्वरूप उन्हें पाषाण-हृदयकी संज्ञा देते हुए श्रीमद्भागवत (२/३/२४) में “तदश्मसारं” श्लोक कहा गया है। इस श्लोककी टीकामें श्रीपाद चक्रवर्त्ती ठाकुरने कहा है,–“बहिरश्रुपुलकयोः सतोरपि यद्धृदयं न विक्रियेत, तदश्मसारमिति कनिष्ठाधिकारिणामेव अश्रुपुलकादिमत्त्वेऽपि अश्मसारहृदयतया निन्दैषा।” अर्थात् “यदि किसी व्यक्तिमें बाहरसे अश्रु-पुलक आदि विकार दिखायी दें, परन्तु हृदय विगलित नहीं हो, तो उसे पाषाण-हृदय ही समझना चाहिये। तथा कनिष्ठ अधिकारीके बाहरसे अश्रु-पुलकादि सात्त्विक विकारोंका प्रदर्शन करनेपर शास्त्र उन्हें पाषाण-हृदय कहकर निन्दा करते हैं।” सिद्धान्तका अनादर करनेपर जो कृत्रिम भक्ति देखी जाती है, उसका चित्रण श्रीरूप गोस्वामीप्रभुने भक्तिरसामृतसिन्धुमें इस प्रकार किया है,–“निसर्गापिच्छिलस्वान्ते तदभ्यासपरेऽपि च। सत्त्वाभासं बिनापि स्युः क्वाप्यश्रुपुलकादयः॥” अर्थात् “जिनका हृदय बाहरसे कोमल, परन्तु भीतरसे कठोर है और जो अश्रु-कम्पादिके अभ्यास परायण भी हैं, सत्त्वाभासके बिना भी उनमें कभी अश्रु-पुलकादि दिखायी देते हैं, ऐसे भाव ‘निःसत्त्व सात्त्विकाभास’ कहे जाते हैं।” कृत्रिमभक्त सिद्धान्तके अभावमें किस प्रकार मायिक विकारको अप्राकृत सोचते हैं, यह इसका ज्वलन्त उदाहरण है। अनेक लोग भक्तिविरोधी अद्वैतवादियोंके ग्रन्थोंकी आलोचनाके समान ही श्रीरामानुज-मध्वाचार्य-निम्बार्क-विष्णुस्वामी आदि वैष्णवाचार्योंके द्वारा लिखित सिद्धान्त-ग्रन्थोंके पठनकी निन्दा करते हैं। श्रीजीव गोस्वामीपादने इन वैष्णवाचार्योंके सुसिद्धान्तोंको वैष्णवोंके मङ्गलके लिये षट्सन्दर्भमें उद्धृत किया है। निर्विशेषवादी लोग जिस प्रकार भक्तिके अङ्गोंको भ्रमवशतः कर्मका अङ्ग समझते हैं, उसी प्रकार सिद्धान्तहीन वैष्णव-नामधारी लोग भक्तिके अनुकूल-सिद्धान्तोंको भी प्रतिकूल मानकर श्रीकृष्णभक्तिसे विच्युत हो जाते हैं॥११७॥ अमृताणुकणिका—जगत्में हम दो प्रकारके लोगोंको देखते हैं—सारग्राही और भारवाही। जो लोग किसी भी विषयमें भली-भाँति विचार ना करके केवल असार भागको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें भारवाही कहते हैं। और जो किसी भी विषयमें सूक्ष्मरूपसे विचार करके सारभागको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें सारग्राही कहा जाता है। सारग्राही व्यक्ति ही अपना परम कल्याण लाभ करके अन्तमें श्रीहरिके चरणकमलोंको प्राप्त करते हैं। किन्तु शास्त्रोंके सिद्धान्तोंको शास्त्रानुगत विचारोंके द्वारा हृदयमें दृढ़तासे धारण ना होनेसे विपरीत प्राकृत बुद्धि आकर हमें वास्तव तत्त्व वस्तुसे विच्युत कर देती है। इसलिये इस पयारमें श्रील कविराज गोस्वामीने सिद्धान्तको ठीकसे समझनेके लिये बल दिया है जिसके द्वारा भजनमें दृढ़ता आती है। इसी प्रकारसे श्रीगीता, श्रीमद्भागवत, वेदान्त, उपनिषद् आदि शब्द प्रमाणोंको यदि कोई सारग्राही होकर विचार करे, तो वह देखेगा कि भगवद्भक्तिको उक्त सभी शास्त्रोंमें चरम सिद्धान्तके रूपमें कहा गया है। जो शब्द-प्रमाणके इस प्रकार सुसिद्धान्तको भी मतवाद मानते हैं, वे देवीमायासे मोहित होकर स्वयं ही मतवादी हो जाते हैं। वैदिक मीमांसा शास्त्र दो भागोंमें विभक्त है। एक ही मीमांसा शास्त्रमें जैमिनीने पूर्व मीमांसा नाम देकर “अथातो धर्मजिज्ञासा” सूत्रकी अवतारणा
[ २/११७-११८ करके जिसके अभ्युदयको ही धर्मसिद्धान्त स्थापित किया है, उत्तर मीमांसामें वेदव्यासने उसीको पूर्वपक्ष करके "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" सूत्रकी अवतारणाके द्वारा परमेश्वर-भजनरूप कल्याणको ही सिद्धान्त कहकर स्थापित किया है। और सबसे अन्तमें "अनावृत्ति शब्दात्” सूत्रके द्वारा कल्याण-प्राप्त व्यक्तिकी पुनरावृत्ति नहीं होती, ऐसा शब्द-प्रमाणके द्वारा दिखलाया है। इसीके साथ ही सभी मतवादोंका भी खण्डन हो गया है। इसलिये सनातन धर्म सत्-सिद्धान्त अथवा सत्य-विचारमें सुप्रतिष्ठित है और तभी श्रील कविराज गोस्वामी यहाँ सिद्धान्त जाननेकी आवश्यकतापर बल दे रहे हैं। इसलिये जो अन्धविश्वासका ही अधिक सम्मान करते हैं, वे प्राकृत सहजिया अथवा वेषोपजीवीके दलमें सम्मिलित होकर अपने लिये नरकमें जानेका मार्ग ही प्रशस्त करते हैं। और कोई-कोई मनोधर्मके वशीभूत होकर जड़समन्वयवादी अथवा भारवाही साम्प्रदायिक होकर वास्तव सत्यसे बहुत दूर हो जाते हैं। भार्गवीय मनुसंहिताके अन्तमें भृगु ऋषियोंको कहा है- “आर्षं धर्मोपदेशञ्च वेदशास्त्राविरोधिना। यन्तर्केणानुसन्धत्ते सधर्मं वेद नेतरः ॥” अर्थात् “जो वेद और वेदमूलक स्मृति आदि धर्मोपदेशोंका वेदशास्त्र-अविरोधी तर्कके द्वारा अनुसन्धान करते हैं, वे ही धर्मको जानते हैं।” श्रील नरोत्तमदास ठाकुर महाशय कहते हैं- “मध्यस्थ श्रीभागवत पुराण। 'साधु शास्त्र गुरुवाक्य, हृदये करिया ऐक्य, आर ना करिह मने आशा ॥" ११७ ॥ चैतन्य-महिमा जानि ए सब सिद्धान्ते । चित्त दृढ़ हञा लागे महिमा-ज्ञान हैते ॥ ११८ ॥ अनुवाद-इन सब सिद्धान्तोंको जाननेसे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाका ज्ञान होता है। उनकी महिमाका ज्ञान होनेसे चित्त उनके चरणकमलोंमें दृढ़तासे लगता है ॥ ११८ ॥ अनुभाष्य-पञ्चरात्रमें- “माहात्म्यज्ञानयुक्तस्तु सुदृढ़ं सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया सार्ष्यादिर्नान्यथा ॥” “महिमज्ञानयुक्तः स्याद्विधिमार्गानुसारिणाम्। रागानुगाश्रितानास्तु प्रायशः केवलो भवेत्।” अर्थात् “जो भगवत्-महिमाके ज्ञानसे युक्त हैं, उनका स्नेह सभी प्रकारसे अधिक और सुदृढ़ है-इसीको भक्ति कहते हैं, जिसके द्वारा साष्टिं आदि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। विधिमार्गमें भजन करनेवालोंका स्नेह भगवत्-महिमाके ज्ञानसे युक्त होता है, किन्तु रागानुग-आश्रित भक्तोंका स्नेह प्रायः केवल अर्थात् भगवत्-महिमाके ज्ञानपर निर्भर ना रहकर स्वाभाविक होता है ॥" ११८ ॥ इति अनुभाष्ये द्वितीय परिच्छेद । दूसरे अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। ८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/११९-१२१ ] श्रीचैतन्यमें निष्ठा उत्पन्न करानेके लिये ही श्रीकृष्णतत्त्वका वर्णन :- चैतन्यप्रभुर महिमा कहिबार तरे। कृष्णेर महिमा कहि करिया विस्तारे॥११९॥ जो श्रीकृष्ण, वे ही श्रीचैतन्य :- चैतन्य-गोसाञिर एइ तत्त्व निरूपण। स्वयं भगवान् कृष्ण व्रजेन्द्रनन्दन॥१२०॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाको प्रकाश करनेके लिये ही मैंने श्रीकृष्णकी महिमाका विस्तारसे वर्णन किया। श्रीचैतन्य महाप्रभुका तत्त्व-निरूपण यही है कि वे स्वयं भगवान् व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही हैं॥११९-१२०॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥१२१॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे वस्तुनिर्देशमङ्गलाचरणे श्रीकृष्णचैतन्यतत्त्वनिरूपणं नाम द्वितीयः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥१२१॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डके मङ्गलाचरणमें वस्तुनिर्देशके अन्तर्गत श्रीकृष्णचैतन्यके तत्त्व-निरूपण नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त। ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ दूसरा अध्याय | ८७
तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा। विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः॥
तीसरा अध्याय तीसरे अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके कारणका विचार हुआ है। द्वापरके अन्तमें भगवान् श्रीकृष्ण अपनी लीला संवरण करनेके बाद यह चिन्तन करने लगे कि मैंने अपने भक्तोंके साथ दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार रसकी जो लीलाएँ पृथ्वीपर प्रकाशित की थीं, उनका आस्वादन जगत्के लोग किस प्रकार करेंगे? इसलिये प्रेमभक्ति-विषयक इन रसोंके आस्वादनकी प्रक्रियाको जगत्के लोगोंको दिखलानेके लिये वे स्वयं भक्तरूपमें अवतीर्ण हुए। नामसङ्कीर्तन कलियुगका प्रधान धर्म है, जिसे युगावतार भी प्रकाशित कर सकते हैं, किन्तु पूर्वोक्त चार प्रकारकी रसमय प्रेमभक्तिको साक्षात् श्रीकृष्णके अतिरिक्त उनके कोई भी अंशादि अवतारकी भी दान करनेकी क्षमता नहीं है। इसलिये साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्रने नवद्वीपमें जन्म ग्रहण किया। साक्षात् श्रीकृष्ण जो जन्म ग्रहण करेंगे, उसके प्रमाणस्वरूप ग्रन्थकारने श्रीमद्भागवतके वचनादिको उद्धृत किया है। महापुरुषोंके लक्षणोंके द्वारा श्रीचैतन्य महाप्रभुकी साक्षात् भगवत्ताको स्थापित किया गया है। श्रीकृष्णचैतन्यने अपने अङ्गों और उपाङ्गों अर्थात् श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीवासादि भक्तोंके साथ अवतीर्ण होकर जगत्में हरिभक्तिका प्रचार किया। श्रीचैतन्यावतार अन्य सभी अवतारोंकी अपेक्षा जगत्के लिये उपादेय (कल्याण करनेवाला) है, इसलिये यह सर्वाधिक गूढ़ है। केवल भक्त ही भक्तिके द्वारा उनके स्वरूपका दर्शन करने योग्य हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुने अपने उपादेय तत्त्वको गोपन रखनेके अनेक उपाय किये, किन्तु उनके परम भक्तोंके सामने उनके अवतारका रहस्य गोपनीय नहीं रह सका। वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें भी उनके अवतारको गोपन रखनेके लिये केवल इङ्गित वाक्यके द्वारा ही उनके भावी उदयका उल्लेख किया गया है। इस बातसे प्रच्छन्नावतारकी गूढ़ता और विशेष उपादेयता ही स्पष्ट होती है। श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके गुरुवर्ग (नाना और पिता) के समकालीन जगत्में प्रकट होकर देखा कि जगत्के लोग श्रीकृष्णभक्तिसे विहीन हो रहे हैं और ऐसी स्थितिमें कोई अंशावतार अवतीर्ण होकर जगत्के मङ्गलका विधान नहीं कर सकेंगे। साक्षात् श्रीकृष्णको यदि इस जगत्में अवतीर्ण करा सकूँ, तभी जगत्का कल्याण होगा। निरुपाधिक श्रीकृष्णतत्त्वको अवतीर्ण करानेके लिये वे श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें गङ्गाजल और तुलसीपत्र अर्पण करके हुङ्कार करने लगे। शुद्ध और सरल भक्तकी प्रार्थनापर श्रीकृष्णने उनके ध्येयकी पूर्तिके लिये अपने परम स्वरूपको प्रकट किया। इसलिये शुद्धभक्त श्रीअद्वैताचार्यकी प्रेमहुङ्कारसे जगत्में प्रेम-दान करनेके लिये गौराङ्ग महाप्रभुका अवतार हुआ। (अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तिसिद्धान्त-सङ्कलनके लिये महाप्रभुकी वन्दना :— श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे यत्पादाश्रयवीर्यतः। संगृह्णात्याकरव्रातादज्ञः सिद्धान्तसन्मणीन्॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह-भाष्य—जिनके चरणकमलोंके आश्रयकी शक्तिसे मूर्ख व्यक्ति भी शास्त्ररूपी
[ ३/१-३
खानोंसे सिद्धान्तरूपी उत्कृष्ट मणियोंको संग्रह करनेमें समर्थ होते हैं, उन श्रीचैतन्यप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ अनुभाष्य-यह ग्रन्थकारके द्वारा स्वरचित श्लोक है- अज्ञः (मूर्खोऽपि) यत्पादाश्रय-वीर्यतः (यस्य श्रीचैतन्यस्य पादाश्रयप्रभावात्) आकरव्रातात् (धातूत्पत्तिस्थान- समूहात्) सिद्धान्त-सन्मणीन् (मीमांसारूप-सद्रत्नान्) संगृह्णाति (सम्यग् ग्रहणे समर्थो भवति) [तं] श्रीचैतन्यप्रभुम् [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-मूर्ख होनेपर भी व्यक्ति जिनके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करनेके प्रभावसे धातु उत्पत्तिके स्थान (शास्त्ररूपी खानों) से सिद्धान्तरूप (मीमांसारूप) सुन्दर रत्नोंको सम्पूर्णरूपसे ग्रहण करनेमें समर्थ होते हैं, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ अमृतानुकणिका-इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके गूढ़ कारणोंका विवेचन किया गया है। उन गूढ़ कारणोंके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिये गम्भीर शास्त्रज्ञानकी आवश्यकता है। यहाँ ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने दैन्यवशतः अपनेको 'अज्ञ' कहा है, अर्थात् मुझमें वैसा गम्भीर शास्त्रज्ञान नहीं है। तथापि 'यत्पादाश्रय-वीर्यतः'-इस पदके उल्लेखके द्वारा वे श्रीचैतन्यदेवके श्रीचरणकमलोंकी शरण ग्रहणकर उनके अवतरणके गूढ़ कारणोंका निर्णय करनेकी चेष्टा करेंगे। श्रीचैतन्यदेवके श्रीचरणोंकी शरण लेनेकी एक ऐसी अचिन्त्य-महिमा है, जिसके प्रभावसे अत्यन्त मूर्ख व्यक्ति भी विविध प्रकारके शास्त्रोंकी विवेचनाकर समस्त प्रकारके सार स्वरूप भक्ति-सिद्धान्तोंका संग्रह करनेमें समर्थ हो सकता है। महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंका आश्रय लेनेकी महिमाको प्रकाशित करनेके लिये ही ग्रन्थकारने इस श्लोककी अवतारणाकी है। 'आकरव्रात' का अर्थ हैं-समस्त खानें जिनमें रत्नादि उत्पन्न होते हैं; इस श्लोकमें 'शास्त्रों' की खानोंसे और 'सिद्धान्तों' की मणियोंसे तुलनाकी गयी है। जिस प्रकार खानोंमें मणि-माणिक्य रहते हैं, किन्तु उन्हें ढूँढकर निकालना होता है, उसी प्रकार शास्त्रोंमें भी सार अर्थात् भक्ति-सिद्धान्त विद्यमान रहते हैं, जिन्हें शास्त्रोंकी विवेचनाके द्वारा प्राप्त किया जाता है। किन्तु स्वतन्त्ररूपसे शास्त्रोंकी आलोचना करने मात्रसे ही शास्त्र-सिद्धान्तोंको ढूँढ निकालना सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरणागत होकर अर्थात् श्रीचैतन्य अनुगत श्रीस्वरूप-रूपानुग-भक्तिविनोद-सारस्वत धाराका आश्रय लेनेसे अनायास ही शास्त्रोंके समस्त सार-सिद्धान्त तथा श्रीमन्महाप्रभुके अवतरणके गूढ़ रहस्य बोधगम्य हो सकते हैं॥१॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ तृतीय श्लोकेर अर्थ कैल विवरण। चतुर्थ श्लोकेर अर्थ शुन भक्तगण॥३॥ अनुवाद-तीसरे श्लोकके अर्थका विवरण मैंने पूर्व अध्यायमें दिया। हे भक्तजनों ! अब चौथे श्लोकका अर्थ सुनो॥३॥
९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/४ ] प्रथम चौदह श्लोकोंमें चतुर्थ श्लोककी व्याख्या :— विदग्धमाधव (१/२)— अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्। हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः॥४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सुवर्ण कान्तिसमूहके द्वारा देदीप्यमान् शचीनन्दन श्रीगौरहरिकी सदा तुम्हारे हृदय-कन्दरामें स्फूर्ति हो। उन्होंने जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वलरसका दान कभी जगत्को नहीं किया, उसी निजभक्तिरूपी सम्पत्तिका दान करनेके लिये वे परमकुरुणावशतः कलियुगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४॥ अनुभाष्य—श्रीरूपगोस्वामीने विदग्धमाधव-नाटकके प्रारम्भमें इस श्लोकके द्वारा जगत्के प्रति आशीर्वादपूर्वक मङ्गलाचरण किया है। श्रीरूपानुगवर ग्रन्थकार श्रील कविराज गोस्वामी भी यहाँ अपने अभीष्ट गुरुदेवके चरणकमलोंका अनुसरण कर रहे हैं— चिरात् (चिरकालं व्याप्य) अनर्पितचरीं (अदत्तपूर्वां) उन्नतोज्ज्वलरसां (उन्नत सम्बर्द्धितः उज्ज्वलः शृङ्गाररसो यस्यां तां) स्वभक्तिश्रियं (निजप्रेमशोभां) समर्पयितुं (सम्यक् दातुं) कलौ करुणयावतीर्णः (कृपया प्रपञ्चागतः) पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः (सुवर्णोत्थसौन्दर्यकान्तिपुञ्जेन सम्यक् प्रकाशित यः सः) शचीनन्दन हरिः वः (युष्माकं) हृदयकन्दरे (चित्तगुहायां) सदा (सर्वस्मिन् काले अहर्निशं) स्फुरतु (प्रकाशयतु)। श्लोक-भावानुवाद—चिरकालसे अर्थात् ब्रह्माके एक दिनमें जिसको दान नहीं किया गया, उस सम्बर्द्धित शृङ्गाररसरूप अपने प्रेमकी शोभाको सम्पूर्णरूपसे दान करनेके लिये (कलियुगमें) जो करुणापूर्वक अवतीर्ण हुए हैं, स्वर्णसे उदित सौन्दर्यकान्तिके पुञ्जसे भलीभाँति प्रकाशित वे शचीनन्दन तुम लोगोंकी (चित्त) हृदयरूपी गुफामें रात-दिन अर्थात् निरन्तर प्रकाशित हों॥४॥ अमृतानुकणिका—ग्रन्थ लिखनेके प्रारम्भमें मङ्गलाचरण प्रयोजनीय है। मङ्गलाचरण करते हुए नमस्काररूप और वस्तुनिर्देशरूप मङ्गलाचरणकी भाँति आशीर्वादरूप मङ्गलाचरण भी आवश्यक है, अन्यथा मङ्गलाचरण सम्पूर्ण नहीं होता है। यह श्लोक श्रीरूपगोस्वामीके विदग्धमाधव नाटकके मङ्गलाचरणसे उद्धृत किया गया है। श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने नमस्कार रूप मङ्गलाचरण और वस्तु निर्देशरूप मङ्गलाचरणके श्लोकोंकी स्वयं रचना की, किन्तु आशीर्वादरूप मङ्गलाचरणके लिये स्वयं किसी श्लोककी रचना ना करके श्रीरूप गोस्वामीके रचित श्लोकको उद्धृत किया है। श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकके द्वारा ही आशीर्वादरूप मङ्गलाचरण करनेका एक कारण है। श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकमें श्रीमन्महाप्रभुके अवतारके एक कारणका उल्लेख किया है—उन्नत और उज्ज्वल रसमयी भक्तिकी शोभा दान करनेके लिये महाप्रभु अवतीर्ण हुए हैं। नीलाचलमें जब महाप्रभु अपने परिकरोंके साथ विदग्धमाधव नाटकका श्रवण और आस्वादन कर रहे थे, उस समय श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकका उल्लेख किया था। इस श्लोकको सुनकर महाप्रभुने स्वाभाविक दैन्यवशतः इसे अपनी अति-स्तुति कहा था, किन्तु श्रीरूप तीसरा अध्याय | ९१
[ ३/४
गोस्वामीकी यह उक्ति भ्रान्त है, ऐसा महाप्रभुने नहीं कहा। महाप्रभुके सभी पार्षदोंने इस श्लोककी उक्तिका अनुमोदन किया था। महाप्रभु और उनके परिकरोंके द्वारा अनुमोदित महाप्रभुके अवतारके इस कारणका श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकमें उल्लेख किया है। प्रसङ्गानुसार सङ्गत मानकर श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकको ही यहाँपर उद्धृत किया है। इस श्लोकमें महाप्रभुको श्रीकृष्णचैतन्य ना कहकर शचीनन्दन कहा गया है, वे श्रीशचीदेवीके गर्भसे प्रकट हुये हैं। सन्तानके प्रति माताका जैसा वात्सल्य रहता है, जीवोंके प्रति महाप्रभुका वैसा वात्सल्य है। माताके गुण सन्तानमें भी सञ्चारित होते हैं, इसलिये शचीमाता जो वात्सल्यकी परावधि हैं, उनकी सन्तान श्रीचैतन्यमें भी यह वात्सल्य प्रेम अत्यधिक होगा—ऐसा स्वाभाविक ही है। माताके नामसे इनका परिचय देनेपर उनके माताके गुणोंके समान या उनसे अधिक वात्सल्य ही यहाँ सूचित हो रहा है। 'अनर्पितचरीं चिरात्'—सहस्र चतुर्युग पर्यन्त ब्रह्माके एक दिनमें एक बार द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण अवतार ग्रहण करते हैं। उसी द्वापरके परवर्ती कलियुगमें श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतीर्ण होते हैं। पूर्वकल्पमें जब स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णचैतन्य रूपमें अवतीर्ण हुए थे, तब एक बार यह उन्नत-उज्ज्वल रस दिया गया था। उसके बाद सैंकड़ों-सैंकड़ों अवतार रूपोंमें वे जगत्में अवतीर्ण हुए, किन्तु तब इस वस्तुको कभी भी नहीं दिया। यहाँ तक, द्वापरके श्रीकृष्णावतारमें भी इस असाधारण वस्तुको उन्होंने दान नहीं किया। स्वभावतः ही परम आस्वादनीय भक्ति वस्तुको एक अनिर्वचनीय आस्वादन चमत्कारिताके रसरूपमें सराबोर करके श्रीगौरसुन्दरने जीवोंके प्रति करुणावश होकर कलियुगमें श्रीचैतन्य महाप्रभुने इस उन्नत-उज्ज्वल रसका पात्र-अपात्रका विचार किये बिना यहाँ-तहाँ वितरण किया। हम लोग उनके चरणकमलोंमें एकान्त भावसे शरणागत होकर अनर्थ निवृत्तिके पश्चात् स्वरूपमें स्थित होकर इस रसका आस्वादन कर सकते हैं। महाप्रभुके आनेके पूर्व पाँच रसोंमें वैकुण्ठमें शान्त, दास्य और गौरवमिश्रित सख्य (निम्न-अर्द्ध)—इन अढ़ाई रसोंका विषय भगवद्भक्तोंको ज्ञात था। आत्माकी स्वाभाविक वृत्ति श्रीकृष्णका नित्य दास्य है। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं। जागतिक विचार-प्रणालीका अवलम्बन करके पहले भगवान्की सेवा होती थी, किन्तु जीवन्मुक्त पुरुष किस प्रकार भगवान्में अहैतुकी भक्ति विधान करते हैं, वह जगत्में अज्ञात था। उन्नत उज्ज्वल रसमें भगवान् हमारे निजजन हैं, इस विषयमें पहले नहीं जानकर भक्त लोग भगवान्की गौरव और मन्त्रोंके साथ सेवा करते थे। भगवान्की सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें सेवा की जाती है, यह श्रीगौरसुन्दरके आविर्भावके पूर्व अज्ञात था। विश्रम्भ-सख्य (उच्च-अर्द्ध), वात्सल्य और मधुररसमें भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका किस प्रकारसे भली-भाँति रूपसे अनुशीलन करना चाहिये, उसका श्रीगौरसुन्दरने स्वयं आचरण करके सेवाभिलाषी जीवोंको शिक्षा प्रदान की है। मधुररसमें सेवाका उत्कर्ष एकमात्र श्रीगौरसुन्दरकी शिक्षामें ही प्राप्त होता है। भगवान्के मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन और राम अवतारोंमें जो सेवा प्रचलित है, उसके मूलमें गौरव मिश्रित सम्भ्रम सेवा है। इसलिये उसमें आत्माका सीमाबद्ध विकास ही है।
९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत