श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/१-३
खानोंसे सिद्धान्तरूपी उत्कृष्ट मणियोंको संग्रह करनेमें समर्थ होते हैं, उन श्रीचैतन्यप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ अनुभाष्य-यह ग्रन्थकारके द्वारा स्वरचित श्लोक है- अज्ञः (मूर्खोऽपि) यत्पादाश्रय-वीर्यतः (यस्य श्रीचैतन्यस्य पादाश्रयप्रभावात्) आकरव्रातात् (धातूत्पत्तिस्थान- समूहात्) सिद्धान्त-सन्मणीन् (मीमांसारूप-सद्रत्नान्) संगृह्णाति (सम्यग् ग्रहणे समर्थो भवति) [तं] श्रीचैतन्यप्रभुम् [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-मूर्ख होनेपर भी व्यक्ति जिनके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करनेके प्रभावसे धातु उत्पत्तिके स्थान (शास्त्ररूपी खानों) से सिद्धान्तरूप (मीमांसारूप) सुन्दर रत्नोंको सम्पूर्णरूपसे ग्रहण करनेमें समर्थ होते हैं, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ अमृतानुकणिका-इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके गूढ़ कारणोंका विवेचन किया गया है। उन गूढ़ कारणोंके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिये गम्भीर शास्त्रज्ञानकी आवश्यकता है। यहाँ ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने दैन्यवशतः अपनेको 'अज्ञ' कहा है, अर्थात् मुझमें वैसा गम्भीर शास्त्रज्ञान नहीं है। तथापि 'यत्पादाश्रय-वीर्यतः'-इस पदके उल्लेखके द्वारा वे श्रीचैतन्यदेवके श्रीचरणकमलोंकी शरण ग्रहणकर उनके अवतरणके गूढ़ कारणोंका निर्णय करनेकी चेष्टा करेंगे। श्रीचैतन्यदेवके श्रीचरणोंकी शरण लेनेकी एक ऐसी अचिन्त्य-महिमा है, जिसके प्रभावसे अत्यन्त मूर्ख व्यक्ति भी विविध प्रकारके शास्त्रोंकी विवेचनाकर समस्त प्रकारके सार स्वरूप भक्ति-सिद्धान्तोंका संग्रह करनेमें समर्थ हो सकता है। महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंका आश्रय लेनेकी महिमाको प्रकाशित करनेके लिये ही ग्रन्थकारने इस श्लोककी अवतारणाकी है। 'आकरव्रात' का अर्थ हैं-समस्त खानें जिनमें रत्नादि उत्पन्न होते हैं; इस श्लोकमें 'शास्त्रों' की खानोंसे और 'सिद्धान्तों' की मणियोंसे तुलनाकी गयी है। जिस प्रकार खानोंमें मणि-माणिक्य रहते हैं, किन्तु उन्हें ढूँढकर निकालना होता है, उसी प्रकार शास्त्रोंमें भी सार अर्थात् भक्ति-सिद्धान्त विद्यमान रहते हैं, जिन्हें शास्त्रोंकी विवेचनाके द्वारा प्राप्त किया जाता है। किन्तु स्वतन्त्ररूपसे शास्त्रोंकी आलोचना करने मात्रसे ही शास्त्र-सिद्धान्तोंको ढूँढ निकालना सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरणागत होकर अर्थात् श्रीचैतन्य अनुगत श्रीस्वरूप-रूपानुग-भक्तिविनोद-सारस्वत धाराका आश्रय लेनेसे अनायास ही शास्त्रोंके समस्त सार-सिद्धान्त तथा श्रीमन्महाप्रभुके अवतरणके गूढ़ रहस्य बोधगम्य हो सकते हैं॥१॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ तृतीय श्लोकेर अर्थ कैल विवरण। चतुर्थ श्लोकेर अर्थ शुन भक्तगण॥३॥ अनुवाद-तीसरे श्लोकके अर्थका विवरण मैंने पूर्व अध्यायमें दिया। हे भक्तजनों ! अब चौथे श्लोकका अर्थ सुनो॥३॥
९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत