भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131

तीसरा अध्याय तीसरे अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके कारणका विचार हुआ है। द्वापरके अन्तमें भगवान् श्रीकृष्ण अपनी लीला संवरण करनेके बाद यह चिन्तन करने लगे कि मैंने अपने भक्तोंके साथ दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार रसकी जो लीलाएँ पृथ्वीपर प्रकाशित की थीं, उनका आस्वादन जगत्‌के लोग किस प्रकार करेंगे? इसलिये प्रेमभक्ति-विषयक इन रसोंके आस्वादनकी प्रक्रियाको जगत्‌के लोगोंको दिखलानेके लिये वे स्वयं भक्तरूपमें अवतीर्ण हुए। नामसङ्कीर्तन कलियुगका प्रधान धर्म है, जिसे युगावतार भी प्रकाशित कर सकते हैं, किन्तु पूर्वोक्त चार प्रकारकी रसमय प्रेमभक्तिको साक्षात् श्रीकृष्णके अतिरिक्त उनके कोई भी अंशादि अवतारकी भी दान करनेकी क्षमता नहीं है। इसलिये साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्रने नवद्वीपमें जन्म ग्रहण किया। साक्षात् श्रीकृष्ण जो जन्म ग्रहण करेंगे, उसके प्रमाणस्वरूप ग्रन्थकारने श्रीमद्भागवतके वचनादिको उद्धृत किया है। महापुरुषोंके लक्षणोंके द्वारा श्रीचैतन्य महाप्रभुकी साक्षात् भगवत्ताको स्थापित किया गया है। श्रीकृष्णचैतन्यने अपने अङ्गों और उपाङ्गों अर्थात् श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीवासादि भक्तोंके साथ अवतीर्ण होकर जगत्‌में हरिभक्तिका प्रचार किया। श्रीचैतन्यावतार अन्य सभी अवतारोंकी अपेक्षा जगत्‌के लिये उपादेय (कल्याण करनेवाला) है, इसलिये यह सर्वाधिक गूढ़ है। केवल भक्त ही भक्तिके द्वारा उनके स्वरूपका दर्शन करने योग्य हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुने अपने उपादेय तत्त्वको गोपन रखनेके अनेक उपाय किये, किन्तु उनके परम भक्तोंके सामने उनके अवतारका रहस्य गोपनीय नहीं रह सका। वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें भी उनके अवतारको गोपन रखनेके लिये केवल इङ्गित वाक्यके द्वारा ही उनके भावी उदयका उल्लेख किया गया है। इस बातसे प्रच्छन्नावतारकी गूढ़ता और विशेष उपादेयता ही स्पष्ट होती है। श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके गुरुवर्ग (नाना और पिता) के समकालीन जगत्‌में प्रकट होकर देखा कि जगत्‌के लोग श्रीकृष्णभक्तिसे विहीन हो रहे हैं और ऐसी स्थितिमें कोई अंशावतार अवतीर्ण होकर जगत्‌के मङ्गलका विधान नहीं कर सकेंगे। साक्षात् श्रीकृष्णको यदि इस जगत्‌में अवतीर्ण करा सकूँ, तभी जगत्‌का कल्याण होगा। निरुपाधिक श्रीकृष्णतत्त्वको अवतीर्ण करानेके लिये वे श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें गङ्गाजल और तुलसीपत्र अर्पण करके हुङ्कार करने लगे। शुद्ध और सरल भक्तकी प्रार्थनापर श्रीकृष्णने उनके ध्येयकी पूर्तिके लिये अपने परम स्वरूपको प्रकट किया। इसलिये शुद्धभक्त श्रीअद्वैताचार्यकी प्रेमहुङ्कारसे जगत्‌में प्रेम-दान करनेके लिये गौराङ्ग महाप्रभुका अवतार हुआ। (अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तिसिद्धान्त-सङ्कलनके लिये महाप्रभुकी वन्दना :— श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे यत्पादाश्रयवीर्यतः। संगृह्णात्याकरव्रातादज्ञः सिद्धान्तसन्मणीन्॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह-भाष्य—जिनके चरणकमलोंके आश्रयकी शक्तिसे मूर्ख व्यक्ति भी शास्त्ररूपी