श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें३/४ ] प्रथम चौदह श्लोकोंमें चतुर्थ श्लोककी व्याख्या :— विदग्धमाधव (१/२)— अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्। हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः॥४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सुवर्ण कान्तिसमूहके द्वारा देदीप्यमान् शचीनन्दन श्रीगौरहरिकी सदा तुम्हारे हृदय-कन्दरामें स्फूर्ति हो। उन्होंने जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वलरसका दान कभी जगत्को नहीं किया, उसी निजभक्तिरूपी सम्पत्तिका दान करनेके लिये वे परमकुरुणावशतः कलियुगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४॥ अनुभाष्य—श्रीरूपगोस्वामीने विदग्धमाधव-नाटकके प्रारम्भमें इस श्लोकके द्वारा जगत्के प्रति आशीर्वादपूर्वक मङ्गलाचरण किया है। श्रीरूपानुगवर ग्रन्थकार श्रील कविराज गोस्वामी भी यहाँ अपने अभीष्ट गुरुदेवके चरणकमलोंका अनुसरण कर रहे हैं— चिरात् (चिरकालं व्याप्य) अनर्पितचरीं (अदत्तपूर्वां) उन्नतोज्ज्वलरसां (उन्नत सम्बर्द्धितः उज्ज्वलः शृङ्गाररसो यस्यां तां) स्वभक्तिश्रियं (निजप्रेमशोभां) समर्पयितुं (सम्यक् दातुं) कलौ करुणयावतीर्णः (कृपया प्रपञ्चागतः) पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः (सुवर्णोत्थसौन्दर्यकान्तिपुञ्जेन सम्यक् प्रकाशित यः सः) शचीनन्दन हरिः वः (युष्माकं) हृदयकन्दरे (चित्तगुहायां) सदा (सर्वस्मिन् काले अहर्निशं) स्फुरतु (प्रकाशयतु)। श्लोक-भावानुवाद—चिरकालसे अर्थात् ब्रह्माके एक दिनमें जिसको दान नहीं किया गया, उस सम्बर्द्धित शृङ्गाररसरूप अपने प्रेमकी शोभाको सम्पूर्णरूपसे दान करनेके लिये (कलियुगमें) जो करुणापूर्वक अवतीर्ण हुए हैं, स्वर्णसे उदित सौन्दर्यकान्तिके पुञ्जसे भलीभाँति प्रकाशित वे शचीनन्दन तुम लोगोंकी (चित्त) हृदयरूपी गुफामें रात-दिन अर्थात् निरन्तर प्रकाशित हों॥४॥ अमृतानुकणिका—ग्रन्थ लिखनेके प्रारम्भमें मङ्गलाचरण प्रयोजनीय है। मङ्गलाचरण करते हुए नमस्काररूप और वस्तुनिर्देशरूप मङ्गलाचरणकी भाँति आशीर्वादरूप मङ्गलाचरण भी आवश्यक है, अन्यथा मङ्गलाचरण सम्पूर्ण नहीं होता है। यह श्लोक श्रीरूपगोस्वामीके विदग्धमाधव नाटकके मङ्गलाचरणसे उद्धृत किया गया है। श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने नमस्कार रूप मङ्गलाचरण और वस्तु निर्देशरूप मङ्गलाचरणके श्लोकोंकी स्वयं रचना की, किन्तु आशीर्वादरूप मङ्गलाचरणके लिये स्वयं किसी श्लोककी रचना ना करके श्रीरूप गोस्वामीके रचित श्लोकको उद्धृत किया है। श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकके द्वारा ही आशीर्वादरूप मङ्गलाचरण करनेका एक कारण है। श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकमें श्रीमन्महाप्रभुके अवतारके एक कारणका उल्लेख किया है—उन्नत और उज्ज्वल रसमयी भक्तिकी शोभा दान करनेके लिये महाप्रभु अवतीर्ण हुए हैं। नीलाचलमें जब महाप्रभु अपने परिकरोंके साथ विदग्धमाधव नाटकका श्रवण और आस्वादन कर रहे थे, उस समय श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकका उल्लेख किया था। इस श्लोकको सुनकर महाप्रभुने स्वाभाविक दैन्यवशतः इसे अपनी अति-स्तुति कहा था, किन्तु श्रीरूप तीसरा अध्याय | ९१