भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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गोस्वामीकी यह उक्ति भ्रान्त है, ऐसा महाप्रभुने नहीं कहा। महाप्रभुके सभी पार्षदोंने इस श्लोककी उक्तिका अनुमोदन किया था। महाप्रभु और उनके परिकरोंके द्वारा अनुमोदित महाप्रभुके अवतारके इस कारणका श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकमें उल्लेख किया है। प्रसङ्गानुसार सङ्गत मानकर श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकको ही यहाँपर उद्धृत किया है। इस श्लोकमें महाप्रभुको श्रीकृष्णचैतन्य ना कहकर शचीनन्दन कहा गया है, वे श्रीशचीदेवीके गर्भसे प्रकट हुये हैं। सन्तानके प्रति माताका जैसा वात्सल्य रहता है, जीवोंके प्रति महाप्रभुका वैसा वात्सल्य है। माताके गुण सन्तानमें भी सञ्चारित होते हैं, इसलिये शचीमाता जो वात्सल्यकी परावधि हैं, उनकी सन्तान श्रीचैतन्यमें भी यह वात्सल्य प्रेम अत्यधिक होगा—ऐसा स्वाभाविक ही है। माताके नामसे इनका परिचय देनेपर उनके माताके गुणोंके समान या उनसे अधिक वात्सल्य ही यहाँ सूचित हो रहा है। 'अनर्पितचरीं चिरात्'—सहस्र चतुर्युग पर्यन्त ब्रह्माके एक दिनमें एक बार द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण अवतार ग्रहण करते हैं। उसी द्वापरके परवर्ती कलियुगमें श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतीर्ण होते हैं। पूर्वकल्पमें जब स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णचैतन्य रूपमें अवतीर्ण हुए थे, तब एक बार यह उन्नत-उज्ज्वल रस दिया गया था। उसके बाद सैंकड़ों-सैंकड़ों अवतार रूपोंमें वे जगत्में अवतीर्ण हुए, किन्तु तब इस वस्तुको कभी भी नहीं दिया। यहाँ तक, द्वापरके श्रीकृष्णावतारमें भी इस असाधारण वस्तुको उन्होंने दान नहीं किया। स्वभावतः ही परम आस्वादनीय भक्ति वस्तुको एक अनिर्वचनीय आस्वादन चमत्कारिताके रसरूपमें सराबोर करके श्रीगौरसुन्दरने जीवोंके प्रति करुणावश होकर कलियुगमें श्रीचैतन्य महाप्रभुने इस उन्नत-उज्ज्वल रसका पात्र-अपात्रका विचार किये बिना यहाँ-तहाँ वितरण किया। हम लोग उनके चरणकमलोंमें एकान्त भावसे शरणागत होकर अनर्थ निवृत्तिके पश्चात् स्वरूपमें स्थित होकर इस रसका आस्वादन कर सकते हैं। महाप्रभुके आनेके पूर्व पाँच रसोंमें वैकुण्ठमें शान्त, दास्य और गौरवमिश्रित सख्य (निम्न-अर्द्ध)—इन अढ़ाई रसोंका विषय भगवद्भक्तोंको ज्ञात था। आत्माकी स्वाभाविक वृत्ति श्रीकृष्णका नित्य दास्य है। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं। जागतिक विचार-प्रणालीका अवलम्बन करके पहले भगवान्की सेवा होती थी, किन्तु जीवन्मुक्त पुरुष किस प्रकार भगवान्में अहैतुकी भक्ति विधान करते हैं, वह जगत्में अज्ञात था। उन्नत उज्ज्वल रसमें भगवान् हमारे निजजन हैं, इस विषयमें पहले नहीं जानकर भक्त लोग भगवान्की गौरव और मन्त्रोंके साथ सेवा करते थे। भगवान्की सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें सेवा की जाती है, यह श्रीगौरसुन्दरके आविर्भावके पूर्व अज्ञात था। विश्रम्भ-सख्य (उच्च-अर्द्ध), वात्सल्य और मधुररसमें भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका किस प्रकारसे भली-भाँति रूपसे अनुशीलन करना चाहिये, उसका श्रीगौरसुन्दरने स्वयं आचरण करके सेवाभिलाषी जीवोंको शिक्षा प्रदान की है। मधुररसमें सेवाका उत्कर्ष एकमात्र श्रीगौरसुन्दरकी शिक्षामें ही प्राप्त होता है। भगवान्के मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन और राम अवतारोंमें जो सेवा प्रचलित है, उसके मूलमें गौरव मिश्रित सम्भ्रम सेवा है। इसलिये उसमें आत्माका सीमाबद्ध विकास ही है।

९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत