भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

३/४ ] चिन्मय धामके विकृत प्रतिफलन इस जड़-जगत्में भी पाँच रसोंमें पाँच प्रकारकी सेवा देखी जाती है, किन्तु यह असम्पूर्ण और हेय अर्थात् तुच्छ है। श्रीकृष्ण ही सभी रसोंके मूल हैं। हम इन पाँच रसोंमें किसी रसमें अपने सिद्ध स्वरूपसे उनकी सेवा कर सकते हैं। किन्तु श्रीकृष्णके अन्य अवतारोंकी उस प्रकार विश्रम्भ सेवा सम्भवपर नहीं है। 'उन्नत-उज्ज्वल रस'—चित्-जगत्में भक्तोंका श्रीकृष्णके साथ पाँच भावोंमें सम्बन्ध है—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर अथवा शृङ्गार। इन्हें स्थायी भाव कहा जाता है। स्थायीभावके ऊपर सामग्रीका संयोग होनेपर कृष्णभक्तिरस होता है। साधारणतः भावरूपा भक्ति ही कृष्णरति है, जो भक्तोंके पूर्व और आधुनिक संस्कारोंके द्वारा हृदयमें उदित होकर स्वयं आनन्दरूपा होनेपर भी रसावस्थाको प्राप्त करती है। सामग्री चार प्रकारकी होती है—(१) विभाव, (२) अनुभाव, (३) सात्त्विक और (४) व्यभिचारी या सञ्चारी। रस एक अतुलनीय तत्त्व है। इसे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णका लीला-विकाशरूप चन्द्रोदय कहा जा सकता है। जिस समय कृष्णभक्ति पूर्ण शुद्ध होनेपर क्रियाकारता लाभ करती है, उस समय उसे भक्तिरस कहा जाता है। उन्नतका अर्थ है—उच्च। परन्तु किससे उन्नत, यह नहीं कहा गया है। इसलिये व्यापक अर्थमें ही उन्नत शब्दका अर्थ करना होगा अर्थात् जो सर्वापेक्षा उन्नत है, उसकी ही बात इस श्लोकमें कही गयी है। सर्वापेक्षा उन्नत यह रस क्या है? शान्तरसमें इष्टके प्रति ऐश्वर्य बुद्धिसे निष्ठा होती है, परन्तु ममता नहीं होती। वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका और मथुरामें शान्तरस है, परन्तु ब्रजमें शान्तरसकी स्थिति नहीं है। दास्यरस वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका, मथुरा एवं ब्रजमें निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, परन्तु इन धामोंके सभी प्रकोष्ठोंमें एक विशेष प्रकारका तारतम्य है। ऐश्वर्य-परम्परामें वैकुण्ठसे अयोध्या, अयोध्यासे द्वारका और द्वारकासे ब्रजमें आते-आते ऐश्वर्यभाव क्षीण होता जाता है अर्थात् वैकुण्ठके दास्यभक्तोंमें जो ऐश्वर्य है, वह ब्रज तक आते-आते धूमिल हो जाता है। परन्तु प्रेम-माधुर्य और ममता अभिवर्द्धित होते जाते हैं। ब्रजके दास्यभक्तोंके मनको श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त कुछ भी आकर्षित नहीं कर सकता, जब कि वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका एवं मथुराके दास्यभक्त ब्रजवासी दास्यभक्तोंकी सेवा देखकर लालायित हो उठते हैं। ऐसा भी नहीं कह सकते कि ब्रजमें ऐश्वर्य ही नहीं है, ब्रजमें अपितु सर्वाधिक ऐश्वर्य है, परन्तु असीम माधुर्यके द्वारा वह आच्छादित रहता है। ब्रजके दास्यभक्तों रक्तक-पत्रकादिमें शुद्ध दास्य होता ही नहीं, उसमें सख्य या वात्सल्यभाव मिश्रित रहता है। ब्रजके दास्यभक्तोंका एक वैशिष्ट्य यह भी है कि उनमें अन्य स्थानोंके दासोंकी भाँति शुद्ध सम्भ्रम नहीं रहता। ऐश्वर्य भावापन्न दास्यभक्त सेवा-अपराधका विचार करते हैं—अतः प्रेमकी बाढ़ वहाँ नहीं होती। दास्यप्रेममें सेवाका सम्यक् विकास नहीं होता। अयोध्याके सभी भक्तोंमें प्रायः दास्यभाव है, परन्तु इन दासोंमें हनुमानजी सर्वश्रेष्ठ हैं। जब अहिरावण छलकपटसे श्रीराम-लक्ष्मणकी बलि देनेके लिये उन्हें पातालमें ले आया, तब हनुमानजी उसका वहीं वधकर अपने प्रभुको अपने कन्धोंपर बिठाकर ले आये। परन्तु ब्रजके दास्यभक्तोंके समान वे अपने प्रभुको ना तो गोदीमें ले सकते हैं, ना ही उनका चुम्बन कर सकते हैं। द्वारकाके दास्यभक्तोंको अयोध्याके दास्यभक्तोंसे श्रेष्ठ माना जाता है, परन्तु इनमें भी सख्यताकी गन्ध भी नहीं होती। तीसरा अध्याय | ९३