श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ३/४ जो भक्त प्रेमकी अधिकतामें श्रीकृष्णको अपने समान समझते हैं, किसी भी प्रकार श्रीकृष्णको अपनेसे श्रेष्ठ नहीं मानते, वे श्रीकृष्णके सखा कहे जाते हैं। शान्तकी निष्ठा, दास्यभावकी ममतायुक्त सेवा और सख्यभावकी विश्रम्भ सेवा इस सख्यप्रेममें विद्यमान है। तुलनात्मक दृष्टिसे दास्यप्रेममें ममता होनेपर भी यह सम्भ्रम बना रहता है कि वे प्रभु हैं-मैं उनका सेवक हूँ और श्रीकृष्णमें भी प्रभुता बनी रहती है। वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका, मथुरा आदिमें सभी सखागण श्रीकृष्ण और श्रीरामको भगवान् मानते हैं। जब कि व्रजके सख्यप्रेममें भक्तका यह विश्रम्भ भाव रहता है कि कृष्ण मेरे समान ही एक गोप बालक है, वह किसी भी प्रकार मुझसे श्रेष्ठ नहीं। सखा उनकी शय्यापर चढ़कर उन्हें जगा देते हैं और कहने लगते हैं-'कन्हैया ! तू अभी तक सो रहा है, देख गोचारणका समय निकला जा रहा है।' यही विश्रम्भ सख्यके समभावका प्रतीक है। सखा तो द्वारकामें अर्जुन आदि भी हैं, परन्तु वे ऐसा कभी नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण जैसे ही अपना विराट् स्वरूप दिखलाते हैं, अर्जुन काँप जाते हैं, हाथ जोड़ने लगते हैं। इसी प्रकार अयोध्यामें सुग्रीव, विभीषण, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सखा और भाई होनेपर भी श्रीरामके साथ ऐसा कभी नहीं कर सकते। भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न श्रीरामके साथ एक आसनपर भी नहीं बैठ सकते, श्रीरामके प्रति सम्भ्रम एवं गौरवबुद्धिके कारण उनमें व्रजके सखाओं जैसा आत्मीयतापूर्ण विश्रम्भ भाव सम्भव ही नहीं है। व्रजमें सख्य है, प्रीति है, ममता है, माधुर्य है। शान्त एवं दास्यभक्त भगवान्के अधीन होते हैं, परन्तु सख्यरससे भगवान् भक्तके अधीन होने लगते हैं। नित्यसिद्ध-परिकरोंमें माता-पिताके रूपमें जो परिकर स्वयंको श्रीकृष्णसे बड़ा मानते हैं और श्रीकृष्णको अपना लाल्य या अनुग्रहका पात्र समझते हैं—उनके इसी लाल्य-भावको वात्सल्यप्रेम कहा जाता है। इसमें सख्यरससे भी अधिक ममता होती है। वात्सल्यमें शान्तकी निष्ठा, दास्यकी सेवा और सख्यका निःसङ्कोच सख्यभाव तो रहता ही है, अधिकन्तु श्रीकृष्णको पाल्य और अपनेमें पालकका ज्ञान भी रहता है, जो ताड़न-भर्त्सन-बन्धन तक भी पहुँच जाता है। सर्वैश्वर्य पूर्ण स्वयं भगवान् होनेपर भी श्रीकृष्णने माँ यशोदाके बन्धनको स्वीकार किया था-केवल माँ यशोदाके प्रेमके वशीभूत होकर। जो विभु वस्तु हैं, जिनका बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे कुछ भी नहीं—उन्हें कौन बाँध सकता है? परन्तु ममता बुद्धिकी अत्यधिकतासे श्रीकृष्णको अपना लाल्य और अपनेको लालक-पालक समझकर पुत्र कृष्णके मङ्गलके लिये उसे बाँध दिया। अथवा नहीं, वात्सल्यप्रेमके द्वारा वे स्वयं बँध गये। यही यशोदाके प्रति उनका अनुग्रह है। अपनी अगणित लीलाओंमें श्रीकृष्ण कहीं नहीं बँधे। जब वे शान्तिदूत बनकर हस्तिनापुर गये थे, तब दुर्योधनने उन्हें पाशमें बाँधनेका प्रयत्न किया था, परन्तु श्रीकृष्णका विराट् विश्वरूप देखकर वह स्वयं तथा सभी सभासद भयभीत हो गये। देवकी, कौशल्यादिके द्वारा भी भगवान्का बन्धन दिखायी नहीं देता। किन्तु माँ यशोदाके हाथोंसे रस्सीसे उनका बँध जाना यह सूचित करता है कि नन्द-यशोदा जैसा लौकिक सद्बन्धुवत् सम्बन्ध कहीं भी नहीं है। शान्तमें ममताका अभाव, दास्यमें विश्रम्भ या विश्वासका अभाव, सख्यमें लालन-पालनका ९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत