श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/४ ] अभाव और वात्सल्यरसमें निःसङ्कोच सर्वाङ्गसे सेवाभावका अभाव होनेके कारण प्रेमकी पूर्णता उन-उन रसोंमें नहीं होती। मधुररसमें जब श्रीकृष्णके प्रति कान्ताभाव हृदयमें उदित हो जाता है, तब सारे अभावोंका अभाव हो जाता है अर्थात् सारे अभाव पूर्ण हो जाते हैं, और अखण्ड प्रेमतत्त्वका स्रोत अहर्निश बहने लगता है। कान्ताप्रेमसे तात्पर्य है-व्रजगोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति प्रेम। शान्तका गुण श्रीकृष्ण-निष्ठा, दास्यादिकी भाँति सेवा, सख्यकी विश्रम्भ सेवा एवं वात्सल्यकी मङ्गलकामना एवं प्रेमाधीन होकर कृष्णका लालन-पालन आदि सभी गुण तो इसमें होते ही हैं, अधिकन्तु मधुरभावसे युक्त होकर सर्वांगके द्वारा सेवाका अवसर इसी रसके द्वारा उपलब्ध हो सकता है। इन सब कारणोंसे दास्यकी अपेक्षा सख्य और सख्यकी अपेक्षा वात्सल्य और वात्सल्यकी अपेक्षा मधुररसमें रसास्वादनकी चमत्कारिता और प्रेमवशियता अधिक है, इसलिये मधुररस सर्वोन्नत है। इस कान्ताप्रेमके मध्य श्रीराधाका प्रेम सर्वशिरोमणि है जिसकी महिमा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें वर्णित है। साधकोंके लिये इस मुकुटमणि राधाप्रेमको ग्रहण करना असम्भव है, लेकिन इसके अनुगत कृष्णप्रेमके अत्युच्च भावको जीव सिद्धावस्थामें प्राप्त करने योग्य हो जाता है। इसी भावको इस श्लोकमें 'स्वभक्तिश्रियं' कहा गया है। स्वभक्तिश्रियं - निज भक्तिकी शोभा। निजभक्ति अर्थात् श्रीराधिकाकी श्रीकृष्णके प्रति प्रेमरूपी लता। पत्ते-मञ्जरियाँ आदि रहनेसे ही लताकी शोभा होती है। इसी प्रकार ही जो सदा श्रीराधिकाका श्रीकृष्णसे मिलनकी चेष्टापरायण हैं और उनके मिलनमें सभी प्रकारसे निसङ्कोच सेवारत हैं, ऐसी सखियाँ (मञ्जरियाँ) ही श्रीराधिका प्रेमकी शोभा हैं। साधनावस्थामें राधिकाकी सखियाँ (मञ्जरीभाव) ही अनुसरणीय है। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है। आनुगत्यमयी सेवामें ही दासका अधिकार है, स्वातन्त्र्यमयी सेवामें दासका अधिकार नहीं है। श्रीराधिकादि व्रजसुन्दरियोंकी श्रीकृष्णसेवा स्वातन्त्र्यमयी है; इस प्रकार सेवामें जीवका अधिकार नहीं है। तो भी श्रीकृष्णकी कान्ताभाववती व्रजसुन्दरियोंके आनुगत्यमें-उनकी अनुगत दासीरूपमें श्रीकृष्णकी प्रीति विधानोपयोगी लीलाको आनुकूल्य करके जीव श्रीकृष्णकी सेवा कर पाता है। इस जातीय सेवाके अनुकूल उन्नत-उज्ज्वल-रसस्वरूपा जो प्रेमभक्ति है, उसे ही श्रीकृष्णचैतन्यने जीवोंको प्रदान किया। इस आनुगत्यमयी सेवामें जो सुख है, उसकी कहीं भी तुलना नहीं है। श्रीकृष्णके साथ व्रजसुन्दरियोंके सङ्गम-सुखकी अपेक्षा भी श्रीकृष्ण सेवाका सुख अनेक गुणा लोभनीय है। (अन्त्य २०/६०)- “कान्त-सेवा-सुखपूर, सङ्गम हैते सुमधुर, ताते साक्षी-लक्ष्मी ठाकुराणी। नारायण-हृदि स्थिति, तबु पादसेवाय मति, सेवा करे 'दासी'-अभिमानी॥” अर्थात् “कान्तकी सेवामें ही पूर्ण आनन्द है। सङ्गमसे भी यह अति सुमधुर है, इस बातकी साक्षी स्वयं लक्ष्मी ठाकुरानी हैं। यद्यपि नारायणका उनसे अपार प्रेम होनेके कारण उनकी स्थिति सदा नारायणके हृदयमें है, तथापि उनकी रति-मति नारायणके पादसेवनमें ही है और वे सदा दासी अभिमानसे उनकी सेवा करती हैं।” इस श्लोकमें ग्रन्थकारके आर्शीवादका मर्म इस प्रकार है- श्रीकृष्णचैतन्य सभीके हृदयमें तीसरा अध्याय | ९५